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तेजेन्द्र शर्मा विशेष : पुष्पा भारती का संस्मरण - अमित संभावनाओं का कारीगर तेजेन्‍द्र

   (तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक  शुभकामनाएं - सं.)

 

अमित संभावनाओं  का कारीगर तेजेन्‍द्र

पुष्‍पा भारती

कभी-कभी ऐसा होता है कि बरसों बरस साथ उठो बैठो, परिचय भी प्रगाढ़ होता चले, पर ऐसा कुछ नहीं मिलता कि गाहे ब़गाहे वह चेहरा आँखों में कौंध जाये। या कभी कोई उसका नाम लेकर कुछ कहे तो मन को अच्‍छा लगे और मन हो कि सामने वाला और भी कुछ कहता जाय। चाह जगने लगे कि उसके बारे में और कुछ और जान सकें। पर इसी के बरक्‍स कुछ लोग जीवन में ऐसे भी टकरा जाते हैं जिनसे बस यों ही सी, मामूली सी औपचारिक मुलाकातें हों, मुलाकातें भी सिलसिलेवार नहीं बल्‍कि कतरा-कतरा, टुकड़े-टुकड़े मिलना जुलना हो-मगर ऐसा लगे कि उसे तो आप शायद सदियों से जानते हैं। उसका ज़िक्र भला-भला सा लगे और शक्‍ल चिरपरिचित सी, मेरे लिये ऐसे ही हैं श्री तेजेन्‍द्र शर्मा।

पं. रघुनंदन प्रसाद शर्मा की चौथी संतान के रूप में मैंने जन्‍म लिया था और धर्मवीर भारती जी से विवाह होने के पहले तक पुष्‍पलता शर्मा नाम मेरी पहचान था। मैं जातिवादी कतई नहीं हूं जात-पाँत, ऊँच-नीच में भेद न मेरे परिवार ने कभी किया न मैंने। पर जाने क्‍यों, जाति सूचक ‘शर्मा' शब्‍द बरबस मेरा ध्‍यान आकृष्‍ट कर लेता है और जब कभी किसी शर्मा नामधारी के चेहरे पर एक ख़ास किस्‍म का आभिजात्‍य और निष्‍कपट सरलता और आँखों में बौद्धिकता तथा तीक्ष्‍ण मेधा की झलक दिखाई दे तो मुझे अपने परिवार के पुरूष सदस्‍यों - पिता, भाई, चाचा, ताऊ और भतीजों के चेहरे याद आने लगते हैं। याद आने लगता है एक विशिष्‍ट आभिजात्‍य, शांत, सौम्‍य, तेजस्‍वी आलोक! और बस, इसीलिये पहली ही मुलाकात में तेजेन्‍द्र अनायास ही मेरे आत्‍मीय बन गये थे।

यह तो बाद में जाना कि वे बड़े समर्थ और सशक्‍त कहानीकार हैं, यह और भी बाद में जाना कि कवितायें और गज़ल लिखने में भी उन्‍होंने अपनी नई ज़मीन तलाश ली है। अपने शब्‍दों के माध्‍यम से वे पाठक के दिल और दिमाग में सीधे प्रवेश कर जाते है। कुछ पंक्‍तियाँ ऐसी कि आपके मन में अपने लिये घरौंदा बना लेती हैं

“बाजार संस्‍कृति में नदियाँ, नदियाँ ही रह जाती हैं

बनती हैं व्‍यापार का माध्‍यम, माँ नहीं बन पाती हैं।

या

“अजब सी बात है, अजब का ये फ़साना है

कि अपने शहर में, अपना नहीं ठिकाना है।

ऐसी अनेक पंक्‍तियाँ हैं जो जब तब अपनी झलक दिखा देने की सामर्थ्‍य रखती हैं। कुछ कविताओं का मौसम ऐसा कि आपकी उदासी में पतझर सा झरने लगे और सुख के ज़माने में आपकी खुशियों को महका दे।

“कोई वर्षा का गुणगान करें।

कोई गीत बसंत के गाता है।

मेरे बदरंग जीवन में।

छाई तरूणाई है।

क्‍या पतझड़ आया है ?

कहानियाँ ऐसी कि आपको लगे ही नहीं कि कहानी पढ़ रहे हैं। ऐसा लगे क आप अपनी जिंदगी का ही कोई टुकड़ा इन पात्रों के माध्‍यम से फिर दुबारा जी रहे हैं। कुछ पात्र तो ऐसे कि आपके दिमाग की नसें खींच-खींच कर तान दें और कहें- उठो जिंदगी यों ही जाया मत करो। भाषा ऐसी सीधी सरल कि आपको पता ही नहीं चलेगा कि लेखक आपको झिंझोड़ रहा है और कह रहा है - कुछ ठोस करने की बात सोचो। दुनिया तुम्‍हारे अपने निजी दायरे के आगे भी है, उसे भी समझने की चेष्‍टा करो और फिर ऐसा कुछ कर गुज़रो कि तुम्‍हारा कृतित्‍व किसी दूसरे की जिंदगी गुलज़ार कर दे। यह सब इसीलिये संभव हो पाता है कि क्‍योंकि तेजेन्‍द्र शर्मा की कोई भी कहानी महज कहानी नहीं होती वरन हमारे साथ एक संवाद होती है। हमारे अंदर के एक बेहतर इंसान को जगाने की कोशिश होती है क्‍योंकि यह काम वह बड़ी कामयाबी के साथ कर रहे हैं, इसीलिये आप पायेंगे कि उनके बोलने और बात करने के अंदाज में भले ही जरा ज़्‍यादा ही ठहराव दिखाई दे, ज़रा ज़्‍यादा ही सौम्‍य अदा दिखाई दे पर उनकी बेचैन आँखों में आप एक उतावली और जिंदगी की संश्‍लिष्‍ट गाँठों को खोलकर सीधी सपाट बनाकर, पीछे छूटी सलवटों में से धड़कनें तलाश कर कहानी का एक जीता जागता पात्र खोज निकालने की लपलपाती कौंध देख सकते हैं।

मैं तेजेन्‍द्र जी के आत्‍मीय दायरे में उतनी नहीं शामिल हूँ कि उन्‍हें निकट से जान सकूं, पर उनकी वे बड़ी-बड़ी आँखें और प्रशस्‍त ललाट जो उनके व्‍यक्‍तित्‍व को सुदर्शन बनाते हैं। मुझे कभी-कभी ऐसा भी महसूस हुआ है कि उस उन्‍नत माथे पर जब सिकुड़ने आ जायें और आँखों के काले गोलों में शोला सा झलकता दिखाई दे तो सामने वाला आतंकित हो उठता होगा - और ऐसे पल शायद यदा-कदा आ ही जाते होंगे पर उनके अंदर विराजमान कवि और कहानीकार आँखों की उस आग को शीघ्र ही भीतरी रस से आर्द्र कर देता होगा और मुद्दों में से निकलकर सारे चेहरे पर मुस्‍कान फैल जाती होगी और इसी सब प्रक्रिया में कोई कविता, कोई गज़ल, कोई कहानी अपने बीच राय देती होगी।

ईश्‍वर तेजेन्‍द्र को लम्‍बी उम्र दें और वे अपनी कहानियों के माध्‍यम से समाज की बखिया उधेड़ते चलें और कविताओं की सुई से तुरपन करके अपनी और अपने पाठकों की जिंदगी संवारते और सार्थक करते रहें।

आमीन !

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पुष्‍पा भारती

5.11.08

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साभार-

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