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एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - अब दुनिया न रही

अब दुनिया न रही

दुनिया रहेगी या जायेगी यह तो कोई भविष्यवेत्ता ही बता सकता है। जो हम तो हैं नहीं। ढ़ंग का कोई भविष्यवेत्ता मिलता तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता। वैसे पचास रूपये किलो वाले दूध को देखकर ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी’ की याद आती है क्योंकि यह समझ में नहीं आता कि दूध में पानी है अथवा पानी में दूध। खैर जब ढ़ंग के भविष्यवेत्ता नहीं मिलेंगे तो बेढ़ंगी बातें ही सुनने को मिलेंगी। इसमें कोई दो राय नहीं है।

‘अब दुनिया न रही’ सुनकर किसी को ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि यह भविष्यवाणी किसी भविष्यवेत्ता की नहीं है। कुछ दिन पहले एक बाबाजी मतलब एक वृद्ध के मुँह से मैंने ऐसा सुना था तो सोचा चलो आप से भी साझा कर लेते हैं। यहाँ यह बताना कि बाबाजी का मतलब एक बृद्ध से है, इसलिए जरूरी है क्योंकि अधिकांश लोग बाबा का मतलब साधू बाबा से ही समझते हैं। और इनकी बातों पर यकीन भी करते हैं। क्योंकि साधू बाबा के पूर्वजों ने सत्य को देखा था, जाना था और समझा था। साधू बाबा हर जगह मिल जाते हैं। गाँव हो अथवा शहर साधू बाबा नजर आ जाएंगे। साधु का वेष धारण करना ज्यादा कठिन थोड़े होता है।

कई लोग और खासकर आज की युवा पीढ़ी यह मुश्किल से ही जानती है कि घर-परिवार में भी बाबा होते हैं। जो साधू बाबा नहीं होते। एक बार एक लड़का अपने दोस्त से कह रहा था कि मैं इस बार गाँव जाऊँगा। दोस्त ने पूछा जब से पैदा हुआ अभी तक गाँव नहीं गया। इस बार इतना मन क्यों कर रहा हैं। वह बोला डैड कह रहे थे कि हमारे गाँव वाले घर में एक बाबा रहते हैं। बहुत दिन के हैं। डैड का बचपन उन्हीं के साथ बीता है। मैं उनसे मिलकर प्रिया के बारे में पूछना चाहता हूँ कि वह हमारे अलावा और किसी से तो प्यार नहीं करती।

हमारे एक रिश्तेदार के यहाँ एक प्रोग्राम था। हम भी गए थे। ‘डीजे’ आया था।

शाम से ही कुछ लड़कियाँ और ढेर सारे लड़के नाचने लगे। जो थक जाते वे थोड़ा आराम कर लेते थे। आराम मिलने पर पुनः नाचने लगते थे। यह सिलसिला चलता रहा। कई लड़कियाँ मुँह मसोसे अपने भाई-बाप को कोसती हुई खड़ी थीं। लगभग दो बजे हमारी चारपाई की ओर एक बाबाजी आते दिखाई पड़े। मुझे भी जागता जानकर वे चारपाई पर बैठ गए और बोले- ‘अब दुनिया न रही’। मैंने सोचा शायद २०१२ की प्रलय वाली बेढ़ंगी भविष्यवाणी के सम्बन्ध में बोल रहें होंगे। मेरे पूछने पर वे आगे बोले कि देख नहीं रहे हो सब लड़के ‘नचिनिहा’ हो गए।

बाबाजी आगे बोले कि आज के सब लड़के खुद को हीरो और लड़कियाँ हिरोइन समझती हैं। जब ये लोग चलते हैं तो भी डांस करते हुए चलते हैं। इनसे सीधा चला भी नहीं जाता। पुराने समय में जब पिक्चर बनती थी तो हिरोइन वाला काम भी मर्द ही करते थे। वह जमाना ही ऐसा था न कोई लड़की हिरोइन बनना चाहती थी और न ही कोई अपनी बहन-बिटिया को हिरोइन बनने के लिए भेजना ही चाहता था। लेकिन आज कल जो लड़कियाँ दिल्ली-मुम्बई नहीं पहुँच पाती वे गाँव-शहर की गलियों और स्कूल कॉलेजों में ही विपाशा बनी घूमती हैं।

शहरों में लड़के-लड़कियाँ दो-दो बजे रात तक नाचते-गाते हैं। पीते हैं, पिलाते हैं। और लोग कहते हैं कि पार्टी कर रहे हैं। लोगों में न तो बुद्धि बची है और न ही बिचार इसलिए जो भी लोग करने लगते हैं वही स्वीकार्य हो जाता है। और जरूरत बन जाता है। लोग जिसे कहते हैं कि पार्टी कर रहे हैं। हम तो कहते हैं कि पार्टी नहीं पाट कर रहे हैं। कुछ नहीं बचेगा। सब पाट हो जाएगा।

क्या-क्या कहें, मिश्रा जी ने पास में ही एक कॉलेज खोला है। उसी में एक दिन कोई प्रोग्राम था। सुना है लड़कियों ने भी बहुत जोरदार नाच किया। जब सब अपने को हिरोइन ही समझती हैं तो क्या शर्म ? शर्माना ही होता तो हिरोइन क्यों बनती ? लड़के तो हीरो ठहरे शिक्षकों की भी कोई परवाह नहीं। मिश्रा तो पाश्चात्य संस्कृति पर आधा घंटा भाषण दिए। बुरा-भला कहा। और भारतीय संस्कृति की बहुत बड़ाई किया। बोले इस पर पश्चिमी संस्कृति हावी होती जा रही है। इसे बचाना हमारा कर्तव्य है। उसके बाद डांस देखकर मस्त हो गए। बोले कमर पतंग की डोर को भी मात दे रही थी। क्या कला है ? लड़कियों की पीठ सहलाकर शाबासी दिया। क्या समय आ गया है कि लोग जो चाहते हैं, जो अच्छा लगता है, जिसे पसंद करते हैं उसे भी गाली दे देते हैं।

जब किसी का विनाश आता है तो काल उसका बुद्धि-बल, धर्म और बिचार हर लेता है। और इनके अभाव में विनाश सुनिश्चित हो जाता है। बुद्धि, बिचार और धर्म के अभाव में वह दिन दूर नहीं है जब मुँह काला करने को भी लोग कला का नाम देने लगेंगे।

बुद्धि और बिचार का ही यह अभाव है कि साधू को राम की जगह दाम भाने लगा है। राजा लोग लूट के लिए छूट है, ऐसा समझने लगे हैं। सोचते हैं कि लूट लो जनता क्या करेगी अथवा क्या कर लेगी ? थोड़ा बहुत हो हल्ला होगा वो भी कितने दिन ? भूलते देर थोड़े लगती है। वोट तो देगी ही। हमें न सही हमारे भाई को। काम तो हम सबका लगभग एक ही है।

इस प्रकार हर कोई अपने धर्म से, कर्तव्य से च्युत हो गया है। सब कुछ उल्टा होता जा रहा है। क्योंकि न बुद्धि और न ही बिचार शेष रह गया है। देश, समाज और घर सब जगह अराजकता ही अराजकता है। सबका कारण एक है।

इधर बात करते-करते सुबह होने को आ गई। अब तक कई लड़के गर्मी के कारण शर्ट, बनियान सब निकाल कर फेंक चुके थे। कई पैंट भी निकाल दिए थे। कोई बरमूडा तो कोई अंडरवियर ही पहने नाच रहा था। बाबा जी उठ कर जाने लगे और बोले हम तो रहेंगे नहीं लेकिन तुम लोग देखोगे कि वह दिन दूर नहीं है जब ये नचनिहे अंडरवियर भी निकाल कर फेंक देंगे और लोग इसे भी कला का नाम दे देंगे।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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