मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

तेजेन्द्र शर्मा की कहानी : कल फिर आना...

कल फिर आना....

: तेजेन्द्र शर्मा

Tej - July 2012 (Mobile)

“देखो रीमा, मैं अब पचास का हो चला हूं। मेरे लिये अब औरत के जिस्म का कोई मतलब नहीं रह गया।.... अब तुम मुझसे कोई उम्मीद न रखना।”

कबीर के ये शब्द रीमा के दिल की धड़कन को गड़बड़ा देने के लिये काफ़ी थे। कुछ पल की चुप्पी के बाद उसने मुंह खोला, “कबीर आप पचास के हो गये तो इसमें मेरा क्या कुसूर है? मैं तो अभी सैंतीस की ही हूं।.... आप कहना चाहते हैं कि हमारी शादीशुदा ज़िन्दगी बस आपके एक वाक्य से ख़त्म हो गई?.... जिस तरह पेट को भूख लगती है, कबीर, जिस्म को भी वैसे ही भूख महसूस होती है। वैसे पेट की भूख शांत करने के तो कई तरीके हैं। मगर जिस्म........ ” ।

रीमा को अपनी बात बीच में ही बन्द करनी पड़ गई। कबीर के बेसुरे ख़र्राटे कमरे में गूंजने लगे।

रीमा को वहम है कि 13 की संख्या उसके लिये दुर्भाग्य लेकर आती है। यदि 13 तारीख़ को शुक्रवार हो तो वह घर से बाहर ही नहीं निकलती। और आज तो उसके विवाह को 13 वर्ष पूरे हुए हैं और 13 तारीख़ वाला शुक्रवार भी है। आज कबीर ने यह वाक्य बोल कर रीमा के दिल में 13 के आंकड़े के प्रति भावनाओं को जैसे आधार दे दिया है। क्या अब उसके बाकी जीवन का हर दिन 13 तारीख़ वाला शुक्रवार बनने वाला है?

शिमला के रिट्ज़ होटल की वो रात! हनीमून के बारे में बस सुन रखा था। उस रात की यादें सच में ब्लो हॉट ब्लो कोल्ड वाली यादें हैं। कबीर ने ज़बरदस्ती उसे संतरे के रस में वोदका डाल कर पिलाई थी। रात दस बजे से तीन बजे तक कबीर ने अपने आपको पांच बार सुख दिया था। और वहम की मारी रीमा हर बार अपना शरीर धोने के लिये बाथरूम में जाती थी। होटल में पावर की समस्या चल रही थी इसलिये रात को गरम पानी उपलब्ध नहीं था। पहली बार तो किसी तरह ठण्डे पानी से हिना नहा ली। बाक़ी के चार बार तो उसने केवल अपने गुप्तांग धोये और बग़लों को गीले तौलिये से पौंछ लिया। एक रात में पांच बार करने वाला कबीर अचानक संत कैसे हो गया?

क्या दो बच्चे पैदा करने के बाद उसके शरीर में नमक नहीं बचा? अपने देश में बिताए तीन साल कबीर की बाहों में बीते थे। मगर यहां लन्दन में आकर बसने के बाद से दोनों के बीच एक अजीब से ठण्डी से दूरी बढ़ती जाने लगी। लन्दन का ठण्डा मौसम शायद उनके रिश्तों में गहरा पैठने लगा था।

अपने मां बाप की तेरहवीं संतान रीमा; अपने पति से तेरह वर्ष छोटी रीमा; अपने विवाह के तेरह वर्ष बाद सोचने को मजबूर है कि आख़िर उसका अपने पति के साथ रिश्ता क्या है। उसका अपना जीवन क्या है। अब बच्चे इतने छोटे भी नहीं कि उन्हें हर काम के लिये मां की ज़रूरत पड़े और इतने बड़े भी नहीं हैं कि पूरी तरह से आत्मनिर्भर हों।

फिर भी रीमा के कुछ काम तो तय हैं कि वह अपने बच्चों को सुबह तैयार करती है, नाश्ता बनाती है, खिलाती है, फिर उन्हें कार पर बैठा कर स्कूल छोड़ने जाती है। दोनों बच्चे पार्क हाई में पढ़ते हैं। रीमा को प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना पसन्द नहीं। इसलिये बच्चे स्टेट स्कूल में ही जाते हैं। कबीर के अहंकार को बुरा लगता है कि इतनी बड़ी एअरलाईन के अधिकारी के बच्चे स्टेट स्कूल में पढ़ें। मगर रीमा की सोच अलग है।

रीमा ने सोचते सोचते दो साल और बिता दिये हैं। अब उसने रातों को रोना बन्द कर दिया है। कितनी रातें वह सज-धज कर डाइनिंग टेबल पर कबीर का इंतज़ार करती। वह ग्यारह बजे रात आता और आसानी से कह देता कि उसने तो खाना दफ़्तर में ही खा लिया है। और रीमा बिना खाना खाये और बिना टेबल साफ़ किये वहां से उठकर कबीर के साथ बेडरूम की तरफ़ चल देती। कबीर वहीं लाउंज में बैठ जाता, और टीवी के सामने ऊंधने लगता और वहीं सो रहता। उसके मुंह से व्हिस्की की महक आती रहती। बेडरूम में वह अकेली तड़पती रहती और उन हसीन रातों को याद करती जब कबीर को उसके शरीर में रुचि थी।

“आप आज रात फिर बेडरूम में नहीं आए?”

“ दफ़्तर के कामों में इतना थक जाता हूं कि बस यहीं टीवी के सामने ही नींद आ जाती है।”

“कबीर मेरा भी तो जी चाहता है कि कभी आप मुझ से भी प्यार की दो बातें करें।... भला मेरा क्या कुसूर है कि मैं अकेली बिस्तर पर करवटें बदलती रहूं?”

“भई देखो रीमा, अब मैंने तुम्हारे आराम के लिये सब इन्तज़ाम कर दिये हैं। घर में तमाम सहूलियत मौजूद हैं। और तुम्हें क्या चाहिये?”

हां, रीमा को और कुछ चाहने का हक़ कहां है। शरीर की भूख की मांग भला औरत कैसे रख सकती है। अपने जीवन के ऐसे मोड़ पर खड़ी है रीमा जब शरीर और अधिक मांगता है। तभी उसे पता चलता है कि बस उसका साथी थक गया है। मगर यह सब हुआ कैसे। सच्ची बात है कि अचानक तो नहीं ही हुआ है। लन्दन आने के बाद आहिस्ता आहिस्ता ही आया है यह बदलाव।

जब कबीर की पहली सेक्रेटरी ऐनेट आई थी तो कबीर ने घर देर से आना शुरू कर दिया था। ऐनेट स्कॉटलेण्ड से आई थी। उसकी भाषा कभी भी रीमा को समझ नहीं आती थी। मगर उसके शरीर की भाषा शायद कबीर को पूरी तरह समझ आ गई थी। कबीर जब घर आता तो चेहरा निचुड़ा हुआ सा लगता। बस किसी तरह खाना खाता और सो जाता।

रीमा को अच्छी तरह याद है कि जब उसका और कबीर का शारीरिक रिश्ता सक्रिय था तो संभोग के बाद वह कितनी गहरी नींद सोती थी। अब... गहरी नींद कबीर सोता है और संभोग के लिये तड़पने का काम करती है रीमा । रीमा को महसूस होने लगा कि कबीर के कपड़ों से दूसरी औरत के शरीर की गन्ध आने लगी है।

“क्या बकती हो तुम? इस तरह का गन्दा इल्ज़ाम लगाती हो मुझ पर? इतनी बेहूदा बात तुम कह कैसे गईं ?.... ” और कबीर के ग़ुस्से ने रीमा को दहला दिया था। मगर रीमा अपने पति को खोना नहीं चाहती थी। सिर नीचा किये सब सुनती रही। शायद कहीं यह डर भी था कि उसे घर से निकाल ही न दें। आर्थिक स्तर पर कबीर पर ही आश्रित थी। यदि महिला आर्थिक रूप से स्वतन्त्र न हो तो भला अपने मन की बात कैसे कह सकती है।

एक शाम यह हुआ भी था, कि शाम की तन्हाई से तंग आकर रीमा एअरलाईन की एक मुलाज़िम के घर चली गई थी। सीमा काउण्टर पर यात्रियों को चेक-इन करने की ड्यूटी करती थी। कबीर को बिल्कुल पसन्द नहीं था कि उसकी पत्नी छोटे अधिकारियों के साथ कोई सम्बन्ध रखे। मगर अकेलापन रीमा को इस क़दर परेशान कर रहा था कि उससे घर में बैठना मुश्किल हो रहा था। बच्चों को खाना खिलाया और सीमा को फ़ोन किया। सीमा अभी डिनर करने का सोच ही रही थी। आज उसका पति भी घर पर था। पति विमान परिचारक है। रीमा चली गई।

और कबीर उसी दिन कुछ जल्दी घर लौट आया। उसकी तबीयत कुछ ख़राब हो गई थी। हल्का हल्का बुख़ार महसूस हो रहा था। घर में रीमा को न पा कर उसकी ज़मींदाराना प्रकृति को बहुत तेज़ झटका लगा। परेशान घर में घूमता रहा। फिर घर को भीतर से अच्छी तरह बन्द कर दिया ताकि रीमा बाहर से चाबी लगा कर खोल न सके। टीवी के सामने बैठा और सो गया। रात जब रीमा वापिस आई तो दरवाज़ा खुला ही नहीं क्योंकि बच्चे ऊपर अपने बेडरूम में बेख़बर सो रहे थे और कबीर को तो अपनी पत्नी को कुछ साबित करना था। बाहर अन्धेरी ठण्डी रात में रीमा अकेली अपनी कार स्टार्ट करके, हीटिंग चला कर बिना किसी रज़ाई या कम्बल के पड़ी रही।

सुबह को उसका मोबाइल फ़ोन बजा। बेटे को चिन्ता थी। नाश्ते के लिये मां की ज़रूरत थी ....

घर का दरवाज़ा खुला। नज़रें नीची किये रीमा भीतर दाख़िल हुई।

“आ गईं हिरोइन हमारे घर की ! मैं पूछता हूं कि मुझसे इजाज़त लिये बिना तुम्हारे कदम घर से बाहर निकले तो कैसे निकले ! अब तुम्हारी इतनी मजाल हो गई है कि तुम मुझसे बिना पूछे बाहर घूमने लगी हो ! ... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ? ”

“जी बस सीमा के घर तक गई थी। मैं घर में अकेले बैठे बैठे बोर हो जाती हूं। ”

“मैं नहीं चाहता कि तुम छोटे लोगों के साथ मेलजोल रखो। आई बात समझ में?”

रीमा को समझ में आ गया था कि इस वक़्त बात करके बात को बिगाड़ा ही जा सकता है। वह एकदम चुप्पी ओढ़े बच्चों का काम करने लगी।

विवाहित जीवन की यादों में कुछ भी सकारात्मक क्यों याद नहीं आता ? क्यों वह हमेशा किसी अन्धेरी सुरंग के बीच जा कर कहीं खो जाती है ? एक शाम अपने अकेलेपन को दूर करने के प्रयास की सज़ा सारी रात कार में अकेले बिताना ! कबीर अपने आपको दिल्लीवाला कहता है। मगर व्यवहार तो किसी गांव के अनपढ़ ज़मींदार सा है। बेचारी रीमा! अभी तक बरेली की मासूम मानसिकता से नहीं उबर पा रही।

जब लन्दन आई थी तो अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं बोल पाती थी रीमा । कबीर पहले आ गया था नौकरी शुरू करने। क़रीब चार महीने बाद रीमा आ गई थी अपने पुत्र के साथ। अयान क़रीब साल भर का था। कबीर जैसे पगलाया पड़ा था रीमा के लिये। कबीर है बहुत बड़ा प्लैनर। पूरी सूझ बूझ से रीमा को शुक्रवार की फ़्लाइट से लन्दन बुलाया था। शुक्रवार और शनिवार की रातें आज भी रीमा के दिल को गुदगुदा जाती हैं। उसका सारा शरीर लव-बाइट्स के नीले काले निशानों से भर गया था। बस उसके बाद जब कबीर सोमवार को काम पर गया तो आज तक वापिस ही नहीं आया। उसका घिसटता हुआ शरीर घर सोने ज़रूर आता है। किन्तु वह शरीर रीमा के पति का नहीं होता। वह कभी ऐनेट का प्रेमी हो जाता है तो कभी काली शर्ली का।

लन्दन आने के बाद कबीर ने चार सेक्रेटरी बदली हैं। रीमा ने महसूस किया कि शायद उन सेक्रेटेरियों की मुख्य काबिलियत उनके बड़े बड़े वक्ष ही थे। बड़े वक्ष कबीर की कमज़ोरी थे। विवाह के चार दिन बाद ही जब कबीर रीमा के साथ उसके मायके हो कर आया तो रास्ते में ही बेहयाई से कहा था, “भई तुम्हारे भाई के बहुत मज़े हैं।”

“क्या मतलब?” रीमा को कबीर की बात समझ नहीं आई थी।

“तुम्हारी भाभी के ख़ज़ाने देखे कितने बड़े बड़े हैं!” कबीर की आंखों की गन्दगी उसके होठों की लार बन कर टपक रही थी। शर्म की मारी रीमा बस चुप्पी साध कर रह गई थी। रात को नाइटी पहनते समय उसने अपनी छातियों को देखा था। कोई छोटी तो नहीं थी उसकी छातियां। हां भाभी का पांच साल का बेटा है। वो भरी पूरी औरत हैं। ज़ाहिर है कि उनका बदन भी उतना ही गदराया हुआ था। भला कोई भी शरीफ़ आदमी अपने रिश्तेदारों के बारे में इतनी हल्की बात कर सकता है!

और वो शर्ली! वो तो एक बार कबीर और परिवार को हीथ्रो हवाई अड्डे तक छोड़ने भी आई थी। बेशर्म किस तरह कबीर को कस कर गले मिली थी। रीमा को समझ ही नहीं आता था कि कबीर को क्या पसन्द है। क्या वह गोरी अंग्रेज़ औरतों को पसन्द करता है या फिर काली अफ़्रीकनों को। मगर माइ लैन ली तो चीन से थी। ओह! यानि सभी तरह के स्वाद चख रहा है।

इसी लिये तो सीमा के घर जाने पर इतना हंगामा खड़ा कर दिया था और रात बाहर कार में बिताने को मजबूर कर दिया था। क्योंकि सीमा ने कबीर के सम्बन्धों के बारे में खुल कर हिना से बातें की थीं। एक बार तो कबीर ने सीमा पर भी अपने पद का इस्तेमाल करने का प्रयास किया था। मगर सीमा ने किसी भी तरह अपना दामन बचा लिया था। फिर उसका पति भी एअरलाईन में परसर है। शायद उससे डर गया होगा कबीर की बदनामी होगी। एक बार फ़ोन पर किसी से बात करते हुए रीमा ने भी सुन लिया था। किसी महिला के वक्ष और नितम्बों का ज़िक्र हो रहा था। मगर तब भी कबीर बात को टाल गया था। कबीर को हमेशा डर रहता है कि यदि रीमा एअरलाइन के कर्मचारियों से दोस्ती रखेगी तो उसकी अपनी पोल खुल जाने की पूरी संभावना है।

एक बार तो रीमा बेहयाई पर उतर आई, “कबीर चलिये न बिस्तर पर। टी.वी. कल देख लीजियेगा।”

बेबस सा कबीर साथ हो लिया रीमा के। रीमा ने आज कबीर का पसन्दीदा परफ़्यूम पैलोमा पिकासो लगाया था। अपनी नाइटी को हलका सा ऐसा ट्विस्ट दिया कि उसके वक्ष बस जैसे बाहर आने ही वाले थे। मगर कबीर जैसे मुर्दा जिस्म की तरह पड़ा रहा। उसमें कोई हरकत नहीं हुई। रीमा ने हिम्मत की और कबीर के नाइट सूट के पजामें में हाथ डाल दिया। काफ़ी देर तक मेहनत करती रही। मगर कबीर के ख़र्राटों ने रीमा को समझा दिया कि बात उसकी पहुंच से बाहर जी चुकी है।

रीमा उठ कर किचन में गई और वहां दराज़ से बड़ा सा चाकू निकाल लाई। पहले सोचा कि कबीर की हत्या कर दे। बिस्तर तक चल कर आई भी। मगर उस मांस के लिजलिजे लोथड़े को पड़ा देख उसे घिन आने लगी। ऐसी लाश को मार कर क्या हासिल होगा उसे?

रीमा को समझ नहीं आता था कि कबीर बी.बी.सी. या आई.टी.वी. की ख़बरें क्यों नहीं देखता। फिर स्काई न्यूज़ है सी.एन.एन. है, इन चैनलों को क्यों नकार रखा है। भला देसी चैनलों से देस की ख़बर रख कर हासिल क्या होगा। जिस देश में रह रहे हैं, उसके बारे में तो कुछ मालूम नहीं, लालू प्रसाद और मायावती के बारे में पढ़ सुन कर क्या हासिल होगा? उसके घर टी.वी पर बस यह देसी न्यूज़ चैनल चलते या फिर हिन्दी फ़िल्में या सीरियल।

सीरियल की ही तो बात थी। रीमा ने एक बार सोचा था कि चलो रात को कबीर के साथ बैठ कर वीडियो पर पाकिस्तानी ड्रामा ‘धूप किनारे’ देखेगी। भारत में सभी लोग इस नाटक की बहुत तारीफ़ किया करते थे। उसने स्वयं भी एक आध एपिसोड देख रखा था। राहत काज़मी की एक्टिंग उसे बहुत पसन्द आई थी। उसने अपनी पड़ोसन बुशरा से कह कर कराची से ‘धूप किनारे’ के ओरिजनल वीडियो कैसेट मंगवाए। कबीर को मनाया कि कम से कम एक शाम जल्दी घर आ जाए। शुक्रवार की शाम कबीर आठ बजे घर आ गया।

रीमा ने जल्दी से डाइनिंग टेबल पर खाना लगाया। उसने आज खाने में मटन चॉप्स, मशरूम मटर की सूखी सब्ज़ी और मूंग साबुत की दाल बनाई थी। साथ में रायता, सलाद, पापड़ और अचार। खाना खा कर कबीर पहुंच गया टीवी के सामने। कबीर ने आज कपड़े भी नहीं बदले थे। सूट और जूते में ही बन्धा हुआ था अब तक। और रीमा मेज़ की सफ़ाई में जुट गयी। बचा हुआ खाना ठीक से पैक करके फ़्रिज में रखा। बरतन साफ़ किये और हाथ मुंह धोकर, परफ़्यूम लगाया। और कबीर के साथ बैठ गई। याद आने लगा के कैसे भारत में कबीर के साथ सिनेमा देखने जाया करती थी। शादी के बाद जयपुर गये थे और राजमन्दिर में फ़िल्म देखी थी।

“अरे भाई कौन है इस सीरियल में?”

“कोई राहत काज़मी है जो पाकिस्तान का बहुत बड़ा टी.वी. स्टार है। साथ में मरीना ख़ान है। .. बुशरा बता रही थी कि राहत काज़मी में तीन इंडियन स्टारों की झलक है। अमिताभ, मनोज कुमार और राज बब्बर। ”

“ये कैसा मिक्सचर हुआ जी ? अमिताभ और मनोज तो वैसे ही दिलीप कुमार की नक़ल करते हैं। फिर भला यह काज़मी मियां क्या एक्टिंग करेंगे ? ”

“आप देखिये तो सही। ” रीमा को कबीर की निगेटिव बातें परेशान करने लगती हैं। “और हां इस सीरियल में कुछ बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़लें और नज़में भी हैं। ”

“चलिये अभी सामने आ जाती हैं। ”

धूप किनारे की कास्टिंग शुरू होती है। रीमा को आदत ही नहीं है कि एक जगह मिट्टी का माधो बन कर फ़िल्म या टी.वी. सीरियल देखा जाए। वह एक जीवन्त व्यक्तित्व है। उसे बातें करने की इच्छा होती है। आज तो केवल कबीर का साथ पाने के लिये....। कबीर ने आज भोजन से पहले कोई ड्रिंक नहीं लिया शायद इसी लिये अपने लिये ड्राम्बुई का एक लार्ज सा पोरशन बना लिया है। उसने रीमा को भी अपने लिये एक लिक्योर बनाने को कहा है। रीमा माहौल को रंगीन बना देना चाहती है। उसने कबीर की बात मान ली है। हालांकि मन में कहीं इच्छा थी कि कबीर स्वयं उसके लिये ड्रिंक बनाए। आमतौर पर रीमा खाने के बाद लिक्योर ही ले लेती है। क्रेम-दि-मैन्थ पीने से उसे महसूस होता है कि पान खा लिया है। आज भी उसने वही बोतल खोली, हरे रंग का एक पैग अपने लिक्योर गिलास में डाला और बर्फ़ का चूरा करने लगी ताकि क्रेम-दि-मैन्थ का फ़्रापे बना सके।... एकाएक उसको अपनी ग़लती महसूस हुई। उसने दूसरे गिलास में चूरा की हुई बर्फ़ डाली और फिर पहले गिलास में से लिक्योर आहिस्ता आहिस्ता उस पर उंडेलने लगी। चूरा बर्फ़ के साथ मिल कर हरे रंग की क्रेम-दि-मैन्थ माहौल को कहीं अधिक ख़ूबसूरत और रोमांटिक बना रही थी।

रीमा को यह ड्रिंक बनाना कबीर ने ही सिखाया था। कबीर ने रीमा का गिलास देखा और मुस्कुरा दिया। दोनों ने चीयर्स कहा और अपने अपने गिलास में से एक एक घूंट पी लिया।

पहला एपिसोड ख़त्म होते होते लिक्योर अपना असर दिखाने लगती है और रीमा की आंखें बन्द होने लगती हैं, “कबीर, हम आज दिन भर खाना बनाते और सफ़ाई करते थक गये हैं। हमें नींद आ रही है। चलिये आप भी ऊपर चलिये। यह सीरियल कल सुबह आराम से देखेंगे। कल तो आपकी छुट्टी है। ”

“अरे हमारी छुट्टी की भली कही। एअरलाईन तो हफ़्ते में सातों दिन काम करती हैं। हम हर वक़्त ऑन-कॉल होते हैं। ... अच्छा तुम चलो मैं अभी आता हूं। ”

रीमा अपने बेड-रूम में ऊपर चली गई। और धम से बिस्तर पर गिरते ही सो गई। नींद बहुत गहरी थी। थकावट का असर साफ़ दिखाई दे रहा था और क्रेम-दि-मेन्थ ने अपना काम कर ही दिया था। रीमा की नींद खुली जब कमरे की बिजली जली। उसने हड़बड़ा कर आंखें खोलीं। कुछ पलों के लिये समय का अन्दाज़ उसके दिमाग़ से ग़ायब हो गया था। वह कुछ समझ नहीं पा रही थी। सामने कबीर खड़ा था सूट और हैट में हाथ में बैग लिये। उसे लगा जैसे सुबह हो गई और कबीर दफ़्तर जाने के लिये तैयार है, “अरे कबीर, आप रात भर कमरे में आए ही नहीं ! मैं सोती ही रह गई। क्या दफ़्तर निकल रहे हैं ? ”

“अरे नहीं रीमा । मैं बस ‘धूप किनारे’ देखता रहा। मैंने दोनों वीडियो कैसेट देख डाले। अभी सुबह के चार बजे हैं। अब मैं भी सोता हूं। ”

“आपने दोनों वीडियो देख लिये ! मगर मैंने तो कहा था कि सुबह इकट्ठे बैठ कर देखेंगे। फिर इतनी जल्दी क्या थी। मैं तो आपके साथ एन्जॉय करना चाहती थी। ”

“अरे, तो इसमें कौन सा जुर्म हो गया। हम तुम्हारे साथ दोबारा देख लेंगे। कोई मना थो़ड़े ही किया है कि तुम्हारे साथ नहीं देखेंगे। ”

रीमा तड़प कर उठी। उसकी आंखों में एक अलग किस्म का दर्द था जिसे समझने के लिये दिल में सेंसेटिविटी होना बहुत ज़रूरी है। कबीर के लिये इस सूक्ष्म भावना को समझ पाना संभव नहीं था, “अरे अभी कहां जा रही हो। अभी तो सुबह होने में देर है। ”

उस दिन पहली बार रीमा ने कबीर के साथ सोने से इन्कार कर दिया। और वहीं आकर बैठ गई जहां थोड़ी देर पहले कबीर बैठ कर धूप किनारे का आनन्द ले रहा था। उसे ग़ुस्से के मारे उबकाई सी आ रही थी। आज उसने जी भर कर अपने माता-पिता को कोसा जिन्होंने अच्छी नौकरी, अमीर घर और बिरादरी से उसकी शादी कर दी थी। अगर वह ग़रीब होती और पति का प्यार मिलता तो क्या वह अधिक सुखी न होती।

“अरे ये सब चोंचले हैं। राज कपूर ने तो ग़रीबी को इतना ग्लैमोराइज़ कर दिया था कि इन्सान को ग़रीब होना बहुत रोमांटिक लगने लगता था। दो दिन रोटी नसीब न हो तो सारा का सारा रोमांटिसिज़्म उड़न छू हो जाए। दुनियां की एक ही सच्चाई है – पैसा। जिसके पास नहीं है, उससे पूछ कर देखो। पैसा नहीं तो घर में शांति नहीं, दिलों में प्यार नहीं।”

“हमारे घर में तो पैसे की कमी नहीं है। फिर हमारे घर में शांति क्यों नहीं है ? आपके पास तो बच्चों के लिये पांच मिनट का समय नहीं होता। क्या आपको पता है कि अयान कौन सी क्लास में पढ़ता है। हमारी बेटी की ज़रूरतें क्या हैं, आपने कभी सोचा है ?... आपको अपनी सेक्रेटरियों से फ़ुरसत मिले तो बात बने न।.. आप जैसे इन्सान को प्यार और मुहब्बत का अर्थ क्या पता !”

यह बहस कभी कभार का शग़ल नहीं थी। ये रोज़ाना का झगड़ा था। बच्चे अक़लमन्द हैं। उन्होंने कभी शिकायत ही नहीं की कि उनका पिता क्यों कभी उनके लिये मौजूद नहीं होता। उनके स्कूल के कामों के लिये मां है ; उनके खाने, पहनने, स्पोर्ट्स और टूर पर जाने के लिये सब कुछ मां करती है। भला उन्हें पिता की कमी खले तो कैसे खले। जब सब कुछ पूरा हो रहा हो, तो किसी की कमी भी क्यों खलेगी ?

स्कूल से पेरिस जाने का प्रोग्राम बना है। दोनों भाई बहनों ने अपना नाम लिखवा दिया है ट्रिप के लिये। पैसे मां से ले लिये हैं। ... इसी बात की तो अकड़ है कबीर की। अरे पैसे कमाता हूं। तुम लोगों पर ख़र्च करता हूं। और क्या करूं ? अबकी बार जब स्कूल से पेरिस जाने का कार्यक्रम बना तो दोनों ही बच्चों ने अपने नाम दे दिये। रीमा भी ख़ुश थी कि चलो दोनों इकट्ठे रहेंगे।

मगर तभी कबीर ने घोषणा कर दी, “रीमा, मैं दो हफ़्तों के लिये दिल्ली जा रहा हूं। वहां से मुंबई जाऊंगा। वो क्या है कि एअरलाईन की एक्सपेन्शन की बातचीत चल रही है मेरा वहां होना ज़रूरी है। ”

“मैं भी आपके साथ चलती हूं न। दो हफ़्ते मैं भी अपने मायके लगा आऊंगी। आजकल मां की तबीयत भी ठीक नहीं रहती है। ”

“सोचा तो मैंने भी पहले यही था। मगर वो क्या है कि इन्श्योरेंस वालों ने रूफ़ रिपेयर के लिये यही टाइम लिखा है। अभी वो लोग फंस रहे हैं, तो हम करवा लें। वर्ना हम कहते रहेंगे और उनके पीछे पीछे भागते रहेंगे। कुल तीन दिन का कह रहे हैं। ”

“तो ठीक है मैं काम करवा कर आ जाऊंगी। ... आप ही सोचिये, न तो आप यहां और न बच्चे। मैं करूंगी क्या?”

कबीर और बच्चे रीमा को अकेला छोड़ अपने अपने कामों पर निकल गये। अगली ही सुबह इन्श्योरेंस कम्पनी की तरफ़ से राजगीर आ पहुंचे। बाहर पाइप जोड़ कर खड़े होकर काम करने के लिये स्कैफ़ोल्डिंग तैयार करने लगे। खटर पटर की आवाज़ें आ रही थीं। काम करने वाले पूर्वी युरोप के लोग लग रहे थे। कुछ अलग सी भाषा में बातें कर रहे थे। रीमा के भीतर का भारतीय अभी भी जीवित था, “आप लोग चाय पियेंगे ? ”

एक ने मना कर दिया और दो ने कॉफ़ी की मांग कर दी। रीमा के लिये और भी आसान हो गया। एक की ब्लैक कॉफ़ी थी एक की व्हाइट। दोनों ही शक्कर नहीं लेते थे। रीमा ने फटाफट कॉफ़ी बना कर उनको पकड़ा दी। छत के ऊपर से अजब अजब आवाज़ें आ रही थीं। रीमा को अकेलापन काट रहा था। आज उसने सोच लिया है कि वह भी कबीर की तरह टीवी लगा कर लाइटें जला कर सोने का प्रयास करेगी। मगर उसे ऐसे माहौल में नींद कहां आती है।

“आप रात को इतनी ज़ोर से टेलिविज़न क्यों चलाते हैं?... सारी लाइटें भी जला कर सोते हैं। आपको नींद कैसे आती है ?... ”

“अपनी अपनी आदत है। ” कबीर की ढिठाई का मुकाबला भला कैसे करे रीमा।

“मैडम, एक बोतल पानी की मिलेगी?” एक बिल्डर की आवाज़ आई।

रीमा अपनी सोच से बाहर आई और पानी लाकर कारीगर को दे दिया। कबीर ने जाते जाते भी निर्देश देना नहीं छोड़ा था, “देखो जब एक बार ऊपर से टाइल्ज़ हट जाती हैं कोई भी चोर ऊपर से घर के भीतर पहुंच सकता है। आजकल चोरियां बहुत हो रही हैं। फिर हमारे घर में तो बहुत सी चीज़ों की इन्श्योरेंस भी नहीं करवाई हुई।”

रीमा को समझ नहीं आ रहा कि रात को क्या करेगी। पहले उसने सोचा कि बुशरा को ही बुला ले। दोनों सहेलियां रात भर बातें करेंगी समय बीतते कुछ पता ही नहीं चलेगा। फिर उसने अपने आपको समझाया कि डरने की क्या बात है। जो होगा देखा जाएगा।

रात को उसने कुछ ताज़ा नहीं बनाया। फ़्रिज में से बचा हुआ भोजन निकाला। एक प्लेट में चावल, आलू की तरकारी, और चिकन करी डाल कर माइक्रोवेव में अढ़ाई मिनट के लिये गरम की। थोड़ा सा खीरा भी काटा। खीरे को देखते हुए उसकी नज़रों के भाव कुछ पलों के लिये बदले। मगर फिर अपने भावों पर काबू पा कर चुपचाप खाना खाने लगी।.. उसने टीवी पर चैनल बदला। कोई रोमाण्टिक फ़िल्म आ रही थी। हीरो हीरोइन को वह पहचानती नहीं थी। चुम्बन का दृश्य देखकर उसे भी कुछ कुछ होने लगा। कुछ सोचा, फिर सिर को झटका दिया, टीवी बन्द किया और ऊपर सोने के लिये चल दी। बिस्तर पर लेटी और अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने लगी।

उसे अपनी ज़िन्दगी की सभी खट्टी मीठी यादें उसके साथ छेड़ख़ानी करती महसूस हुईं। बचपन, जवानी, विवाह और कबीर के साथ बिताई ज़िन्दगी। सब उसे गुदगुदाते, तड़पाते, परेशान करते और उसे आंखें बन्द कर लेने को विवश करते। क्या हर आदमी पचास की उम्र तक पहुंचते पहुंचते चुक जाता है? क्या हर औरत उसकी उम्र में आकर अधिक सेक्स चाहने लगती है ? ... उसके साथ की औरतें तो अपनी सेक्स लाईफ़ के किस्से चटख़ारे ले ले कर सुनाती हैं। वह बेचारी हर बार दिल मसोस कर रह जाती है।

अचानक रीमा की नींद टूटी। नीचे कोई बर्तन गिरने की आवाज़ हुई थी। पति की बात याद आई – घर का ख़ास ख़्याल रखना होगा। जब छत की टाइल्स निकली हों तो चोर आसानी से घर में आ सकते हैं। क्या नीचे कोई चोर है। हिम्मत नहीं हो रही कि बिस्तर छोड़ कर नीचे जाए। अगर सच में कोई हुआ तो क्या करेगी अकेली। अब लकड़ी के फ़र्श पर किसी के दबे पांव चलने की आवाज़ भी आने लगी है। कबीर कह भी रहा था कि यह फ़र्श ठीक नहीं बना। बहुत आवाज़ करता है। बिल्डर के साथ चिट्ठी पत्री भी चल रही है। लेकिन कम से कम पता तो चल रहा है कि नीचे कोई चल रहा है। कहीं कोई बिल्ली तो नहीं ? हो सकता है कि कोई लोमड़ी हो। रोज़ाना गार्डन में तो आती ही है। कहीं आज पीछे का दरवाज़ा खुला न छूट गया हो !

आवाज़ फिर आई। अगर एक से ज़्यादा लोग हुए तो क्या करेगी। अपना दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लेती हूं, फिर कोई कैसे मुझे देख पाएगा। मगर यह तो शुतुरमुर्ग वाली बात हुई। कि मैं ख़तरे को नहीं देख पा रही तो इसका मतलब है कि ख़तरा भी मुझे नहीं देख पाएगा।

कोई सीढ़ियां चढ़ रहा है। अब क्या करे रीमा? अब तो उठ कर दरवाज़े तक जाने में भी ख़तरा हो सकता है। क्या अब कबीर और बच्चों से कभी मुलाक़ात नहीं हो पाएगी? क्या ज़रूरत थी अभी छत की टाइल्स बदलवाने की ? मुझे अकेला छोड़ गये यहां मरने के लिये ! बच्चों तुम्हारी मां तुमको मरते दम तक याद करेगी। वैसे कबीर के साथ रोज़ रोज़ मरने से कहीं अच्छी है एक बार की मौत।

आने वाला रुक गया है। पहले बेडरूम की तरफ़ बढ़ रहा है। शुक्र है कि बिटिया वहां नहीं है। वर्ना न जाने उसके साथ क्या सुलूक करता। कितनी निडरता से चलता जा रहा है उसके कमरे की तरफ़। क्या मेरे कमरे की तरफ़ भी आएगा ? मुंह से आवाज़ नहीं निकल पा रही। क्या बिल्कुल बेआवाज़ मौत लिखी है मेरी किस्मत में ?

अब कमरे में से कुछ ढूंढने की आवाज़ें आने लगी हैं। बेचारी बिट्टो के कमरे में से उसे भला क्या मिलेगा। उसके पास तो सोने के गहने भी नहीं हैं। मगर वह कुछ सोच कर थोड़े ही उस कमरे में गया है। अभी थोड़ी देर में यहां भी आता ही होगा।

क्या हर्ज है एक बार अपने कमरे का दरवाज़ा अन्दर से बन्द ही कर लूं। उसको पता भी नहीं चलेगा। और जब कमरा अन्दर से बन्द पाएगा तो शायद बाकी घर से माल लेकर मेरी जान बख़्श दे। मेरे कमरे में तो ब्रीफ़ेकेस भर गहने तो पड़े ही हैं। और कुछ हीरे भी तो हैं। अभी पिछले साल इटली से कुछ कोरल के सेट भी बनवाए थे। कहीं मेरी इज़्ज़त ......सिहर गई रीमा ।

हिम्मत की और कमरे के दरवाज़े तक पहुंच गई। हाथ बढ़ाया और दरवाज़े का हैण्डल पकड़ने का प्रयास किया। ... हाथ में एक इन्सानी हाथ आ गया। मुंह से चीख़ निकली। दूसरे हाथ ने मुंह दबा दिया। पल भर में वह चोर की गिरफ़्त में थी। चोर ने अपने जमैका वाले लहजे में कहा, “आवाज़ नहीं, अगर आवाज़ निकाली, जान से मार दूंगा। ”

रीमा के तो होश ही उड़ गये। आवाज़ हलक से बाहर नहीं निकल पा रही थी। अचानक उसके पांव धर्ती से उखड़ गये और वह लड़खड़ा गई। एकाएक बदलती स्थिति में उसका बायां वक्ष चोर के हाथ में था। चोर ने आव देखा न ताव, रीमा की आवाज़ रोकने के लिये अपने होंठों से उसके होंठों को भींच कर दबा दिया। रीमा इस नई स्थिति के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थी। वह जितना उस चोर की गिरफ़्त से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी; उसके वक्ष और होंठों पर दबाव उतना ही सख़्त होता जाता। उसे लगा कि उसका दम घुट जाएगा।

अब तक शायद चोर स्थिति को समझ चुका था। वह इस इरादे से कतई नहीं आया था। वह सीधी सादी चोरी करने के लिये आया था मगर क़ुदरत ने उसके भाग्य में कुछ और ही धर दिया था। उसने आहिस्ता से रीमा को बिस्तर पर लिटा दिया। डरी हुई रीमा अधिक प्रतिरोध भी नहीं कर पा रही थी। चोर ने एक बार उसके होंठों को कुछ पलों के लिये छोड़ा। रीमा ने किसी तरह एक लम्बी सांस ली और अपने आपको व्यवस्थित करने का प्रयास किया।

मगर अब तक चोर को रीमा के बदन की ख़ुशबू का अहसास हो चुका था। उसने आहिस्ता से रीमा के सिर को ऊपर उठाया और उसके होंठों को चूसने लगा। उसका एक हाथ रीमा के बदन पर रेंग रहा था। डरी हुई रीमा के बदन में भी कसाव महसूस होने लगा था। रीमा की सांसें ज़ोर ज़ोर से चलने लगी थीं। उसके कान गरम हो चले थे। अचानक चोर को रीमा की तरफ़ से भी दबाव महसूस हुआ। रीमा भी चोर के बदन को महसूस करने का प्रयास कर रही थी। वह पल भर के लिये चकराया। मगर फिर उस दबाव का आनन्द लेने लगा। अब आहिस्ता आहिस्ता उसका हाथ नीचे की तरफ़ सरकने लगा। रीमा के बदन में एक विस्फोट सा होने लगा था। उसे चोर के बोलने के अंदाज़ और बदन की महक से अंदाज़ा हो गया था कि वह जमैका का कोई काला नौजवान है। उसने कभी कबीर के साथ ब्लू फ़िल्म में काले मर्द को नंगा देखा था। आज वह स्वयं एक काले मर्द की आग़ोश में थी।

रीमा की गरमाहट अब पिघलने लगी थी। पूरी तरह गीली हो चुकी रीमा अब उस चोर को अपने अन्दर महसूस कर रही थी। कुछ पलों में ही जो कुछ एक ब्लात्कार की तरह शुरू हुआ था, अब आनन्ददायी रतिक्रिया में परिवर्तित हो चला था। लगभग एक दशक के बाद रीमा को सेक्स का सुख मिल रहा था और वह उसका पूरा आनन्द उठा रही थी। रीमा की सुख से परिपूर्ण सिसकियों के अलावा वातावरण में और कोई आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी। चोर अब पूरी शिद्दत से रीमा को सुख दे रहा था। रीमा की सिसकारियां और चोर की मज़दूर जैसी आवाज़ें घर की दीवारों से टकरा कर एक अलग किस्म का संगीत उत्पन्न कर रही थीं।

रीमा ने चार बार आनन्द की अनुभूति महसूस की। हर बार उसने चोर को दबाव दे कर कुछ पलों के लिये रोका। अब चोर ने पहली बार आवाज़ निकाली, “अब मैं नहीं रुक सकता। मैं भी आ रहा हूं।” रीमा पांचवीं बार चोर के साथ साथ आई और ज़ोर से चिल्लाई।

सब कुछ थम गया। चोर उठा और अन्धेरे में रीमा की तरफ़ देखने लगा। उसके शरीर का रंग कमरे के अन्धेरे का हिस्सा ही बन गया था। रीमा ने इशारे से उसे बाथरूम का दरवाज़ा दिखाया।

चोर साफ़ हो कर, हाथ मुंह धोकर, तौलिये से पोंछ कर बाथरूम से बाहर निकला। उसने चोरी का सामान वहीं छोड़ दिया और घर के मुख्य द्वार की तरफ़ बढ़ने लगा।

रीमा ने कुछ पलों के लिये चोर की पीठ को देखा ; कुछ सोचा और कहा, “सुनो, कल फिर आना ! ”

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परिचय - तेजेन्द्र शर्मा

जन्म / बचपन :

21 अक्टूबर 1952 को पंजाब के शहर जगरांव के रेल्वे क्वार्टरों में। पिता वहां के सहायक स्टेशन मास्टर थे। उचाना, रोहतक (अब हरयाणा में) व मौड़ मंडी में बचपन के कुछ वर्ष बिता कर 1960 में पिता का तबादला उन्हें दिल्ली ले आया । पंजाबी भाषी तेजेन्द्र शर्मा की स्कूली पढ़ाई दिल्ली के अंधा मुग़ल क्षेत्र के सरकारी स्कूल में हुई।

शिक्षा:

दिल्ली विश्विद्यालय से बी.ए. (ऑनर्स) अंग्रेज़ी, एवं एम.ए. अंग्रेज़ी, कम्पयूटर कार्य में डिप्लोमा ।

प्रकाशित कृतियां :

काला सागर (1990) ढिबरी टाईट (1994), देह की कीमत (1999) यह क्या हो गया ! (2003), बेघर आंखें (2007), सीधी रेखा की परतें (2009 - तेजेन्द्र शर्मा की समग्र कहानियां भाग-1), क़ब्र का मुनाफ़ा (2010) सभी कहानी संग्रह । ये घर तुम्हारा है... (2007 - कविता एवं ग़ज़ल संग्रह)। दीवार में रास्ता (कहानी संग्रह – 2012).

अनूदित कृतियां :

ढिबरी टाइट, एवं कल फेर आणा नाम से पंजाबी, इँटों का जंगल नाम से उर्दू तथा पासपोर्ट का रंगहरू नाम से नेपाली में भी उनकी अनूदित कहानियों के संग्रह प्रकाशित हुए हैं। तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां उड़िया, मराठी, गुजराती, चेक भाषा एवं अंग्रेज़ी में भी अनूदित हो चुकी हैं।

संपादन समुद्र पार रचना संसार (2008) (21 प्रवासी लेखकों की कहानियों का संकलन)। यहां से वहां तक – (2006-ब्रिटेन के कवियों का कविता संग्रह), ब्रिटेन में उर्दू क़लम (2010), समुद्र पार हिन्दी ग़ज़ल (2011), प्रवासी संसार – कथा विशेषांक (2011)। सृजन संदर्भ पत्रिका का प्रवासी साहित्य विशेषांक (2012)।

अंग्रेज़ी में : 1. Black & White (biography of a banker – 2007), 2. Lord Byron - Don Juan (1976), 3. John Keats - The Two Hyperions (1977)

*कहानी अभिशप्त चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के एम.ए. हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल।

तेजेन्द्र शर्मा के लेखन पर उपलब्ध पुस्तकें

  1. तेजेन्द्र शर्मा – वक़्त के आइने में (संपादकः हरि भटनागर), 2. रचना समय – तेजेन्द्र शर्मा विशेषांक (संपादकः हरि भटनागर), 3. बातें (तेजेन्द्र शर्मा के साक्षात्कार) – संपादकः मधु अरोड़ा 4. हिन्दी की वैश्विक कहानी (संदर्भ तेजेन्द्र शर्मा का रचना संसार) – संपादकः नीना पॉल।

अन्य लेखन:

दूरदर्शन के लिये शांति सीरियल का लेखन ।

तिविधियां :

अन्नु कपूर द्वारा निर्देशित फ़िल्म अभय में नाना पाटेकर के साथ अभिनय। बी.बी.सी. लंदन, ऑल इंडिया रेडियो, व दूरदर्शन से कार्यक्रमों की प्रस्तुति, नाटकों में भाग एवं समाचार वाचन।

ऑल इंडिया रेडियो, व सनराईज़ रेडियो लंदन से बहुत सी कहानियों का प्रसार‌ण ।

पुरस्कार/सम्मान:

  1. ढिबरी टाइट के लिये महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार - 1995 प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों ।
  2. सहयोग फ़ाउंडेशन का युवा साहित्यकार पुरस्कार - 1998
  3. सुपथगा सम्मान - 1987
  4. कृति यू.के. द्वारा वर्ष 2002 के लिये बेघर आंखें को सर्वश्रेष्ठ कहानी का पुरस्कार।
  5. प्रथम संकल्प साहित्य सम्मान – दिल्ली (2007)
  6. तितली बाल पत्रिका का साहित्य सम्मान – बरेली (2007)
  7. भारतीय उच्चायोग, लन्दन द्वारा डॉ. हरिवंशराय बच्चन सम्मान (2008)

विशेष :

वर्ष 1995 से भारत में 40 वर्ष से कम उम्र के कथाकारों के लिये इंदु शर्मा कथा सम्मान की स्थापना। लंदन में प्रवासी हो जाने के पश्चात नई शताब्दी के साथ ही इंदु शर्मा कथा सम्मान को अंतर्राष्ट्रीय स्वरू‏प दिया गया। वर्ष 2000 से ही इंगलैंड में रह कर हिन्दी साहित्य रचने वाले साहित्यकारों को सम्मानित करने हेतु पद्मानंद साहित्य सम्मान की शुरू‏आत की गई। अंर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान का आयोजन अब प्रति वर्ष ब्रिटेन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में आयोजित किया जाता है।

कथा (यू.के.) के माध्यम से लंदन में निरंतर कथा गोष्ठियों, कार्यशालाओं एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन । लंदन में कहानी मंचन की शुरू‏आत वापसी से की। लंदन एवं बेज़िंगस्टोक में, अहिंदीभाषी कलाकारों को लेकर एक हिंदी नाटक हनीमून का सफल निर्देशन एवं मंचन ।

अंर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन :

1999 में लन्दन विश्व हिन्दी सम्मेलन, 2002 में त्रिनिदाद में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में शिरकत की। लंदन, मैनचेस्टर, ब्रैडफ़र्ड व बरमिंघम में आयोजित कवि सम्मेलनों में कविता पाठ ।यॉर्क विश्विद्यालय में कहानी कार्यशाला करने वाले ब्रिटेन के पहले हिन्दी साहित्यकार। बर्मिंघम में रवीन्द्र कालिया एवं ममता कालिया के साथ संयुक्त रूप से हिन्दी कार्यशाला का संचालन।

2010 में डी.ए.वी. गर्ल्ज़ कॉलेज, यमुना नगर के साथ मिल कर कथा यू.के. ने 3-दिवसीय प्रवासी कथा सम्मेलन का आयोजन किया। 2012 में एस.आई.ई.एस. कॉलेज, मुंबई के साथ मिल कर 2-दिवसीय प्रवासी साहित्य सम्मेलन का आयोजन।

संप्रतिः ब्रिटिश रेल (लंदन ओवरग्राउण्ड) में कार्यरत।

संपर्क : 27 Romilly Drive, Carpenders Park, Watford WD19 5EN, United Kingdom.

 

E-mail: kahanikar@gmail.com , kathauk@gmail.com

Website: www.kathauk.connect.to

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  1. इतनी साफगोई किसी रचना में आज तक नहीं देखी। खासतौर से उस समाज के लिए तो यह कसैली हो सकती है जहां अवैध संबंध सालों साल चलते हैं, अनेकों गर्भपात होते हैं, निरोधक वस्तुओं एवं दवाओं का व्यापार अरबों खरबों का होता है और नैतिकता तथा पवित्रता पर ग्रंथ लिखे पढ़े जाते हैं। विधवा को चूसा तो जीवन भर जाता है पर उस पर चादर कोई नहीं डालता। रड़ुआ सारी जिंदगी इधर उधर मुंह मारता फिरता है फिर 55-60 पर कपड़े रंग लेता है। विवाहित भी कोई विशेष पवित्र नहीं होते।

    खोखलापन तो दोनों ही समाजों में है पर वहां स्वीकार करने की निर्भीकता है और हमारे यहां ढ़कने की कुशलता। करत पाप चाहत कल्य़ाना- लोगन राम खिलौना जाना-तुलसी । परिवार, समाज, राष्ट्र, साहित्य और साहित्यकारों के बीच ऐसे पंचमुखी विमर्श से जीवन धारा सरल, सरस एवं निर्मल हो सकती है- परिणाम कोई भी अपने मन, संस्कार, परिवेश, प्रकृति और अध्ययन के अनुभव के आधार पर निकालने को स्वतंत्र होता है।

    तेजेन्द्रजी के अंतः में विराजमान ऐसे रचनाकार को उस भारत भूमि से प्रणाम जहां अधिकांश पुरुष कबीर पात्र का जीवन तो जीना चाहते हैं पर मानेंगे नहीं और पत्नी को रीमा रुप मे स्वीकार नहीं कर पाएंगे। न राम है न सीता हैं यहां पर , किंतु पूजा सीता राम की ही होती है।

    अमृता प्रीतम, मंटों, कमलेश्वर की कुछ रचनाओं में मिले सत्य के वीभत्स अनावरण जैसी ही किंतु स्वीकारोक्ति की सी अवसादग्रस्त मानसिकता के प्रतिक्रियात्मक पल इस रचना की सफलता है जो पाठक को वहां ले पहुंचे जहां रचनाकार था और कहानी कह रहा था या कैनवास पर ये विंब उकेरने का प्रयास कर रहा था ।

    बहुत सशक्त रचना। ज्यादा तारीफ करने पर लंपट कहेंगे लोग और समाज से निष्कासित कर दिया जाऊंगा।

    मेरे अनुरोध पर रवि जी ने तेजेन्द्र जी से कहानी भेजने का आग्रह किया और उदारमना तेजेन्द्र जी ने इतनी शीघ्र ही कहानी पढ़ने हेतु भेज दी-मुझे लगता है कि तेजेन्द्र जी के ऊपर रचनाकार ने पिछले दिनों जो कवरेज की है वह बहुत सार्थक है- इतने उदारचित्त एवं
    प्राकृतिक संवेदनाओं चाहे वे शरीर के स्तर की हों अथवा मन के स्नायु संवेदी तंतुओं की फड़फड़ाहट के संकेत हो, को व्यक्त करने में सक्षम
    कहानीकार से मिलाने के लिए रवि जी का आभार ।
    सादर

    डॉ राजीव कुमार रावत
    हिन्दी अधिकारी
    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर
    9641049944

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