रविवार, 21 अक्तूबर 2012

शेख मोहम्मद की कविता - मित्र शैलेन्द्र चौहान

मित्र शैलेन्द्र चौहान

क्या जानते हैं वे

कि कोई मित्र होता है ऐसा भी

... कि जिसे जानना जरुरी नहीं

पर जानते हैं सब कि वह है एक अकेला

जो बहुत बोलता नहीं

जियादा चिंता नहीं करता

बरबस नहीं दिखाता प्रेम

बड़े नामवर लोगों को याद दिलाता उनकी औकात

फक्कड़, मस्तमौला

हमेशा याद रहता जिसे हरेक दोस्त का फोन नंबर

और जब तब गाहे बगाहे

टुन टुनाने लगाती घंटी

मैं शैलेन्द्र बोल रहा हूँ

कैसे हैं, क्या हाल हैं और कैसा है परिवार

लिखना लिखाना क्या हो रहा है

कभी कभी सोचने लगता है

कोई मित्र क्यों इतने काल करता है वह

पर जब नहीं आते बहुत दिनों तक उसके फोन

कुछ खाली खाली सा लगता है दिन

क्यों नहीं किया फोन

नाराज हो गया क्या

लेकिन वह ऐसा तो नहीं

और तब होना पता चलता है

शैलेन्द्र का जो बिना स्वार्थ ही लगाता है फोन

जबकि बहुतेरे लोग रखते हैं हिसाब

अपने एक-एक पैसे के मोबाईल खर्च का

बिना लाभ लोभ क्यों करें फोन

क्या नहीं है यह अद्भुत कि

ऐसे संक्रामक समय में

हमारी पृथ्वी पर मौजूद है

एक दुर्लभ प्रजाति का मित्र

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शेख मोहम्मद

बनिहाल (डोडा)

जम्मू कश्मीर

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