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एस. के. पाण्डेय के व्यंग्य दोहे

दोहे-(१०)

पढ़ने को पढ़ता जगत गुनता विरला कोय ।
यसकेपी गुनि धारिये पढ़ने से क्या होय ।।

एक कान से सुनत सब दूजे देत निकाल ।
यसकेपी गुनि नहि धरत सो बदलै किमि हाल ।।

यसकेपी सब को चहत होना मालामाल ।
घर तो छल बल भरि लिए आप रहे कंगाल ।।

यसकेपी लोगन कियो कलिमल मिलि गुमुराह ।
सद बद जानैं लोग सब छोडि चले सदराह ।।

पैसा बस ऐसा भए मनुज हुए बरबाद ।
यसकेपी कौड़ी लगे छोडि दिए मरजाद ।।

यसकेपी भूला कहै दीजे राह लखाय ।
देते ऐसे लोग हैं उल्टी राह बताय ।।

पैसा लै मारग कहैं देखे ऐसे लोग ।
यसकेपी मुश्किल फँसे बनय लाभ का योग ।।
 
जहाँ नहीं झगड़ा-कलह मिले न कोई ठोर ।
यसकेपी जो भी भले बने धरे मन चोर  ।।

जीना मानो अटल है लोग करें व्यवहार ।
हम सब कुछ तुम कुछ नहीं बात-बात में रार ।।

सबको मरना अटल है कर लो ऐसा काम  ।
भला गैर को हो चले भजो राम का नाम  ।।

मानस की यह सीख है कर लो आप बिचार ।
यसकेपी जग में बसे सब केवल दिन चार ।।

पढ़ने को पढ़ते बहुत नवयुग के नव लोग ।
मानवता बाकी रहे पढ़ते नहि वह योग ।।

पढ़ने वाले भी बहुत विषय नहीं है थोर ।
यसकेपी पढ़ि-पढ़ि फँसे विषय हुआ नहि भोर ।।

पढ़ने वाले खुब बढ़े पुस्तक बढ़ी बजार ।
यसकेपी पर नहि बढ़ा सही ज्ञान संसार ।।

विनय शील अरु चरित नहि नैतिकता को नाम ।
यही पढ़ाई आज की यसकेपी का काम ।।

विनय शील अरु मानना नैतिकता है मूल ।
मानवता की जानिए यसकेपी बिनु धूल ।।

माने से मानव मनुज कहते बारम्बार ।
यसकेपी चित धारिये जग जीवन को सार ।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

     
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