रविवार, 21 अक्तूबर 2012

एस. के. पाण्डेय के व्यंग्य दोहे

दोहे-(१०)

पढ़ने को पढ़ता जगत गुनता विरला कोय ।
यसकेपी गुनि धारिये पढ़ने से क्या होय ।।

एक कान से सुनत सब दूजे देत निकाल ।
यसकेपी गुनि नहि धरत सो बदलै किमि हाल ।।

यसकेपी सब को चहत होना मालामाल ।
घर तो छल बल भरि लिए आप रहे कंगाल ।।

यसकेपी लोगन कियो कलिमल मिलि गुमुराह ।
सद बद जानैं लोग सब छोडि चले सदराह ।।

पैसा बस ऐसा भए मनुज हुए बरबाद ।
यसकेपी कौड़ी लगे छोडि दिए मरजाद ।।

यसकेपी भूला कहै दीजे राह लखाय ।
देते ऐसे लोग हैं उल्टी राह बताय ।।

पैसा लै मारग कहैं देखे ऐसे लोग ।
यसकेपी मुश्किल फँसे बनय लाभ का योग ।।
 
जहाँ नहीं झगड़ा-कलह मिले न कोई ठोर ।
यसकेपी जो भी भले बने धरे मन चोर  ।।

जीना मानो अटल है लोग करें व्यवहार ।
हम सब कुछ तुम कुछ नहीं बात-बात में रार ।।

सबको मरना अटल है कर लो ऐसा काम  ।
भला गैर को हो चले भजो राम का नाम  ।।

मानस की यह सीख है कर लो आप बिचार ।
यसकेपी जग में बसे सब केवल दिन चार ।।

पढ़ने को पढ़ते बहुत नवयुग के नव लोग ।
मानवता बाकी रहे पढ़ते नहि वह योग ।।

पढ़ने वाले भी बहुत विषय नहीं है थोर ।
यसकेपी पढ़ि-पढ़ि फँसे विषय हुआ नहि भोर ।।

पढ़ने वाले खुब बढ़े पुस्तक बढ़ी बजार ।
यसकेपी पर नहि बढ़ा सही ज्ञान संसार ।।

विनय शील अरु चरित नहि नैतिकता को नाम ।
यही पढ़ाई आज की यसकेपी का काम ।।

विनय शील अरु मानना नैतिकता है मूल ।
मानवता की जानिए यसकेपी बिनु धूल ।।

माने से मानव मनुज कहते बारम्बार ।
यसकेपी चित धारिये जग जीवन को सार ।।
---------


डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

     
              *********

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------