शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

तेजेन्द्र शर्मा विशेष : अजय नावरिया का संस्मरण - आर्थिक संबंधों के संजाल का कुशल शिल्पी

(तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक शुभकामनाएं - सं.)

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आर्थिक संबंधों के संजाल का कुशल शिल्पी

डा. अजय नावरिया

कथा लेखन में तेजेन्द्र शर्मा एक लम्बे समय से सक्रिय हैं। अनुभव क्षेत्रों की विविधता के चलते, जल्दी ही, उनकी कहानियों ने कथा आलोचकों का ध्यान खींचा। यों तो, तेजेन्द्र, समाज की सबसे छोटी कड़ी परिवार से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं और परिस्थतियों पर टिप्पणियां करते हैं, परंतु उनके कथा संसार का मुख्य स्वर उन आर्थिक सम्बन्धों के जंजाल को समझना है, जिससे शेष आरे संबंधों का भविष्य या जीवन निर्धारित होता है।

इस एक बिंदु से यदि हम तेजेन्द्र की कहानियों को देखें तो उनकी पूरी कथा यात्रा को साथ साथ देख सकते हैं। वरना तो वहां स्त्री-पुरुष के कलहपूर्ण सम्बंधों से लेकर, पति-पत्नी और वो तक की सम्बन्ध संरचनाएं हैं, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के समाज और की सच्चाइयों का यथार्थपरक प्रस्तुतीकरण है, प्रेमी और प्रेमिका के कभी न खत्म होने वाले किस्से और वादे हैं।

तेजेन्द्र शर्मा की कथा यात्रा के दो मुख्य प्रस्थान या मोड़ हैं। कहा जाना चाहिए कि इन्हीं दो प्रस्थान बिंदुओं से उनके लेखन के स्वभाव को समझा भी जा सकता है, वरना तो ये कहानियां बहिर्गमन और पुनरागमन के भावुक दुष्चक्र में फंसी नज़र आने की गलतफहमी पैदा कर सकती हैं।

कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा का पहला कथा प्रस्थान एक ऐसे संवेदनशील भारतीय का है जो आसपास के बदले हुए या कहें कि बदलते हुए समाज और समय को देख रहा है। ज़ाहिर है कि इस देखने में, सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने के बीच, लोगों की मानसिकताएं भी हैं। और कहना यहां यह भी चाहिए कि तेजेन्द्र के देखने में सिर्फ निष्क्रिय साक्षी भाव नहीं है बल्कि इनके पीछे काम करने वाले सिद्धांत को खोजने की सक्रियता भी है। इस सक्रियता के परिणाम में कथाकार जहां पहुंचता है, वह आर्थिक संबंधों की जटिलता है। इस क्रम में, देह की कीमत, श्वेत-श्याम, कैंसर, ईंटों का जंगल और एक ही रंग जैसी कहानियां हैं।

यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि कथाकार के इस कथा संसार का समय सन 1980 के बाद का भारत है। इस संदर्भ में, क्या यह पलभर को भी भुलाया जा सकता है कि 1984 में इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद देशव्यापी दंगे और निर्दोष लोगों के जनसंहार हुए थे, बाबरी मस्जिद को उग्र और उन्मादी हिन्दूवाद ने ध्वस्त कर दिया था, शोषित और वंचित समाज का कभी दिन सुधरने का आखिरी सपना सोवियत संघ, भी ढह गया था और पूंजीवाद के निरकुंश और नंगे नाच की शुरूआत हो गई थी। तेजेन्द्र की शुरूआती कहानियों में इसी समय और समाज की अभिव्यक्तियां हैं, परंतु सतह के नीचे वही मुख्य स्वर है।

उनका दूसरा प्रस्थान एक ऐसे भारतीय का है, जो विदेशों में या तो आवाजाही करता है या फिर एक लम्बे समय तक वहां प्रवास करने के कारण अपने ही 'नीड़' द्वारा 'प्रवासी' की पदवी जा चुका है। टेलीफोन लाइन, कब्र का मुनाफा, कोख का किराया, पासपोर्ट का रंग और मुझे मार डाल बेटा-उनकी इसी प्रस्थान की परिणति के रूप में हमारे सामने आती है।

इस मोड़ पर तेजेन्द्र की कहानियां एक ऐसे समय और समाज की सच्चाईयों का यथार्थपरक प्रस्तुतीकरण है, जिसका साबका अभी तक भारतीय समाज से नहीं पड़ा है। कहा जा सकता है कि भारतीय समाज का अभी तक वैसा आधुनिकीकरण नहीं हुआ है, जैसा पाश्चात्य देशों में पिछले पचास सालों में हो चुका है। यह बदलाव सिर्फ भौतिक संसाधनों और उन्नति के ही नहीं है, बल्कि औद्योगीकरण और फलस्वरूप शहरीकरण के कारण बदली मानसिकताओं और समस्याओं के भी हैं।

यहां यह स्पष्ट करना शायद जरूरी है कि तेजेन्द्र का बड़ा संसार, इसी प्रस्थान से खुलता है। यह निर्द्वंद्व सच है कि एक प्रवासी भारतीय के प्रति शेष समाज की आंखें बदल जाती हैं और प्रवासी भारतीय भी, चाहे-अनचाहे, आंखें बदलने को मजबूर हो जाता है। तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों में इन्हीं बदलावों को संवेदनशीलता से रेखांकित किया है। भारतीय उपमहाद्वीप के प्रवासी समाज और मन की दुविधाओं, दुश्वारियों और दुश्चिंताओं की भग्न भावस्थितियों का ही भावप्रवण रचनात्मक प्रस्तुतीकरण ही यहां नहीं है बल्कि इसके विपरीत भारतीय समाज का प्रवासी भारतीयों और विदेशों के प्रति जटिल दृष्टिकोण भी सुलझाने का प्रयास दिखाई देता है।

'काला सागर' कहानी अपने यथार्थ में ही कम त्रासद नहीं है, लेकिन पलभर को, यदि उसे प्रतीकात्मक रूप में सारे समाज पर फैला दिया जाए तो भयानक निराशा और क्षोभ घेर लेता है। एक उम्मीद के तौर पर, विमल महाजन और बर्फीले सागर में गिरे विमान यात्रियों को बचाते सुरक्षाकर्मी हैं- यह एक छोटी सी उम्मीद ही जिए चले जाने को विवश करती है।

विमल महाजन विमान हादसे में मरे लोगों तथा उनके परिजनों के प्रति गहरे रूप में चिंतित हैं। दो तीन रातों से वह ठीक से सो भी नहीं पाए हैं। 'नास्तिक होते हुए भी भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि अरूण सुरक्षित हो।' पर सुरक्षा की चिंता सिर्फ अरूण तक नहीं रूकती, वह आगे बढ़ती है- 'फ्लाइट परसर अनिरूद्ध सेन की तो केवल छह महीने की बेटी है, जब उनकी पत्नी को यह समाचार मिलेगा तो वह कैसे सहन कर पायेगी इस वज्रपात को? इस तरह वह नैंसी, मिसेज वाडेकर और मगन भाई तक को शामिल करती है। पर दूसरी तरफ़, लालच का काला सागर हहरा रहा है। लोग शॉपिंग करने की मुनासिब जगहों की जानकारियां ले रहे हैं। किसी ने वी.सी.आर खरीदा तो किसी ने टी.वी। कोई इस बात का दुख मना रहा है कि उसे सोनी ब्रांड का उत्पाद क्यों न मिल सका और वह अपने भाग्य को कोस रहा है।

कुल जमा यह कि जो हादसे में मारे जा चुके हैं, उनका शोक, इन अर्थ संबन्धों ने स्थगित कर दिया है। ये शोक करने का अभिनय करने वाले जीवित लोग जाने किस अर्थ में जीवित हैं- काला सागर में तेजेन्द्र इसका मुआयना करते हैं।

इसी तरह तेजेन्द्र 'ढिबरी टाईट' कहानी में गुरमीत के प्रति खाड़ी देशों में होने वाले भेदभाव को दिखाते हैं। निम्न मध्यवर्गीय परिवार का कमोबेश हर नवयुवक विदेश जाकर पैसा कमाना चाहता है। यहां याद दिलाना जरूरी है कि 1980 का विदेश-दुबई, कुवैत, रियाद आदि खाड़ी देश थे, जहां पेट्रोल के कारण एक नई पेट्रो डॉलर कल्चर पैदा हुई थी। इस समृद्ध और विकसित होते अरब समूह पर सिर्फ़ भारतीयों की नज़र नहीं थी बल्कि पूरे विश्व की थी। हर व्यक्ति उस समृद्धि में अपना 'शेयर' बनाना चाहता था। अमेरिका इस पर दूर से नजरें गड़ाए बैठा था, जिसका परिणाम, इराक द्वारा कुवैत पर हमले के बाद हुआ। अमेरिका ने किस कदर इराक को तबाह किया और सद्दाम हुसैन को दर बदर कर दिया और यह सब हुआ विश्व शांति के नाम पर। आज हम जिस वैश्विक मंदी को झेल रहे हैं, यह उन्हीं गैर जरूरी युद्धों के कारण भी है। 'ढिबरी टाइट' मुहावरे और गुरमीत के मार्फत तेजेन्द्र शर्मा के इस भविष्यकथन को पलभर रूक कर फिर पलटने की जरूरत है कि गुरमीत अभी भी उन्माद में बड़बड़ाए जा रहा था, हुण नहीं छोड़ेगा जी, हुण कुछ नहीं बचेगा, सारे का सारा गल्फ़ तबाह हो जाएगा, दारजी 'हुण ओथे कुछ नहीं बचना जी।'

क्या आज खाड़ी के देश धीरे-धीरे उसी कगार पर नहीं खड़े दिखाई देते है?

गुरमीत का दर्द यह है कि कुवैत की पुलिस अरबी भाषा के अलावा कोई भाषा नहीं जानती। इसी कारण, कई बार गलतफहमी में कई निर्दोष लोग पिट जाते हैं। मारे जाते हैं। अपनी पत्नी की प्रसव पीड़ा की खबर सुनकर, गुरमीत तेज गति से गाड़ी चलाकर घर की ओर भागता है, परंतु कुवैती पुलिस तेज गति से चलाने पर उसे गिरफ्तार कर लेती है। वह पुलिस को अपनी पत्नी की डिलीवरी की बात बताने की कोशिश करता है, पर सब व्यर्थ जाता है। प्रसव के दौरान ही पत्नी अकेले में मर जाती है। कोई उसकी देखभाल को नहीं आ पाता।

यह एक ऐसी निशब्द हत्या है जो भाषा और कानून की आड़ में होती है। प्रवासी लेखन में यह एक महत्वपूर्ण चिंता को लेकर बुनी गई कहानी है।

'देह की कीमत' कहानी भी तेजेन्द्र के इसी अर्थ आधारित सत्ता सरंचना के सिद्धांत की मजबूती से पुष्टि करती है। पम्मी के टोकने के बावजूद हरदीप गैर कानूनी तरीके से जापान पहुंचता है। तेजेन्द्र इस रास्ते या तरीके को बहुत ही विश्वसनीय ढंग से स्पष्ट करते हैं- 'बड़ी सीधी सी जुगत है पम्मी। तीन वर्ष पहले भी चल गई थी; अब की बार भी चल जाएगी। अपना एजेंट हमें दिल्ली से बैंकाक तो अपनी देसी एयरलाईन से भेजेगा। वहां से सिड़नी का टिकट

बनवायेगा, वाया टोकियो। टोकियो में आठ घंटे का ट्रांजिट हॉल्ट होगा....... बस उसी आठ घंटे में अपना एजेंट में एयरपोर्ट से बाहर निकाल कर ले जायेगा।'

तो यह है वह रास्ता जो हरदीप ने अपने एजेंट और एजेंट ने अन्य पचासियों सहयोगियों की सहायता से खोल रखा है। और ऐसा सिर्फ़ भारतीय नहीं कर रहे हैं, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, फिलीपीनी भी इसी तरीके से वहां पहुंच रहे हैं।

और इस गैरकानूनी 'कबूतरबाजी' का नतीजा..... अवैध लाश। दुर्घटना में हरदीप मारा जाता है- 'हरदीप के जीवन का दीप गिजा की व्यस्त सड़क के बीचोंबीच बुझा पड़ा था।' हरदीप दुर्घटना में क्यों मारा जाता है? कहानीकार इसके कारणों में भी जाता है- 'विदेश में बैठे हरदीप का बुखार उसके शरीर में दबकर रहने को तैयार नहीं था। भेद खुल जाने के डर से डाक्टर से दवा लेने में भी डर था।..... अवैध कर्मचारी को तो रोज के पैसे रोज काम करने पर ही मिलते हैं। काम नहीं तो दाम नहीं।' आशय यह कि गैरकानूनी श्रमिक को बीमार नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि इसके नतीजे में हैं दुर्घटनाओं के अंतहीन सिलसिले।

उधर भारत में, उसकी विधवा पम्मी का सूना लम्बा जीवन है। तीन लाख रुपये का ड्राफ्ट उस सूनेपन में शब्द भी पैदा करता है तो वह कलरव नहीं है, कोलाहल है। बीजी चिल्ला रही हैं- 'खसमां नूं खाणिये तेरा कख ना रहे।' अंत में, वह इस समझाने तक पहुंचती हैं कि 'गुलदीप पम्मी पर चादर डाल दे, तो कैसा रहे?...... घर की इज्जत भी घर में रह जायेगी और ......।' जाहिर है, इस और के बाद 'देह की कीमत' के रूप में तीन लाख रुपये का ड्राफ्ट है, पर बेचारगी तो पम्मी की है कि वह यह नहीं तय कर पा रही कि 'यह उसके पति के देह की कीमत है या उसके साथ बिताये पांच महीनों की कीमत।'

तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों का यह पड़ाव विदेशों में जमने से पूर्व की स्थितियों को चित्रित करता है। बेशक यह कहानियां या तो रोजगार और समृद्धि की दौड़ में लगे युवाओं की हैं, या फिर विदेशों से किसी तरह धन-सम्पत्ति झटकने की कोशिशों की- परंतु दूसरा पड़ाव विदेशों में जम चुके भारतीयों की पीड़ा, दुविधा और समस्याओं से रूबरू है। और आश्चर्य जनक ढंग से इस पड़ाव में 'नास्टेल्जिया' शामिल होकर इन अनुभवों को जटिल और दुविधापूर्ण बनाता है।

क्या आधुनिक समाज या आधुनिक संदर्भों में नास्टेल्जिया को एक मूल्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है?

आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में देखें तो 'लिजलिजी भावुकता' को बहुत पहले ही खारिज किया जा चुका है। 'नास्टेल्जिया' वास्तव में, अपने घर, राज्य या राष्ट्र के प्रति एक मोहाविष्ट स्थिति है। जब किन्ही कारणों से, एक व्यक्ति या व्यक्ति समूह अपना घर, राज्य या राष्ट्र छोड़ता है, तब यह स्थिति उत्पन्न होती है।

राष्ट्र, आखिर हमें क्या देता है? यदि पलभर को तमाम राष्ट्रवादी भावनाओं को, एक किनारे रखकर सोचा जाए तो शायद हमारे पास सिर्फ़ 'पहचान' ही बचती है, जो किसी भी राष्ट्र का नागरिक होने पर प्राप्त होती है। बेशक, यह एक बड़ी प्राप्ति है। यदि हम पहचान या अस्मिता के इस बड़े दायरे से नीचे उतरते हैं, तो हमारे सामने राज्य या परिवार के अपेक्षाकृत छोटे परंतु बेहद मजबूत दायरे उपस्थित होते हैं।

साहित्य का एक बड़ा हिस्सा पिया के परदेश जाने और प्रिया के संदेश भेजने से भरा हुआ है।

जैसा कि हम जानते हें कि नास्टेल्जिया की अंतिम सीढ़ी भी यही घर होता है। इसी घर-समाज से जुड़ी होती हैं- तीज, त्यौहारों और रस्मों की मीठी स्मृतियां। कुछ लोगों का तो अपने घर में भी किसी कोने, अंतरे या करवट से भी ऐसा प्रगाढ़ लगाव हो जाता है कि वह घर से बाहर जाना पसंद नहीं करते।

विचित्र बात यह है कि आधुनिक मनोविज्ञान, इस गृह आसक्ति को एक मानसिक विकार की श्रेणी में शामिल करता है।

क्या वाकई मनुष्य का अपने खानपान, पहनावे, उत्सव, बोली-भाषा और रीति-रिवाजों के प्रति अनुराग, मानसिक विकार समझा जा सकता है? यहां अनुराग और आसक्ति के बीच के भेद को समझना ही इस दिशा में सार्थक कदम हो सकता है।

यह सुखद है कि तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां, इस नॉस्टेल्जिया' की इस संदर्भ बिंदु से जांच पड़ताल करती है और इससे मुक्त होने की छटपटाहटों को भी रेखांकित करती है। ये छटपटाहटें भावुकता से मुक्ति और संवेदनशीलता की दिशा में बढ़ते कदम हैं।

'पासपोर्ट का रंग कहानी आधुनिक परिदृश्य में, वस्तुतः इसी मनोविकार से जूझने की कहानी है। वर्तमान समय में, भावुकता के लिए कम से कम दया और ज्यादा से ज्यादा खीज है।

स्वतंत्रता सेनानी गोपालदास त्रिखा का भगवान को हाज़िर नाज़िर जानकर कसम खाना कि वह ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा रखेंगे- दारूण मनः स्थिति को प्रदर्शित करता है, परंतु स्वतंत्रता संघर्ष अब बाकी नहीं है। उसी स्मृति से चिपटे रहने का अर्थ कोई जीवन मूल्य नहीं बन सकता। शपथ की इस रस्म को मात्र एक कानूनी या संवैधानिक प्रक्रिया के चरण से अधिक लेने को किसी भी तरह न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। त्रिखा की इस दुविधा के निस्तार के लिए क्या कोई विकल्प है? उत्तर नकारात्मक है क्योंकि पासपोर्ट प्राप्त करने की यही प्रक्रिया है।

तब फिर रास्ते? रास्ते दो खुलते हैं- पहला रास्ता यह कि जीवनभर इसी भावुकता में रोते कलपते हुए मर जाना। गोपालदास का अंत इसी तरह होता है- 'इन्द्रेश और सरोज दोनों

एक साथ कमरे में आए, बाऊजी को आवाज दी। गोपालदास जी एकटक छत को देखे जा रहे थे। उनके दाएं हाथ में लाल रंग का ब्रिटिश पासपोर्ट था और बाएं हाथ में नीले रंग का भारतीय पासपोर्ट। उन्होंने ऐसे देश की नागरिकता ले ली थी, जहां के लिए इन दोनों पासपोर्ट की जरूरत नहीं थी।'

दूसरा रास्ता, इन्द्रेश और सरोज के चुनाव का है। इस दम्पत्ति ने इसे सहजता से स्वीकार कर लिया है। वे इस भावुक द्वंद्व में नहीं फंसते। उलटे, वे अपने परेशान पिता के प्रति चिंतित हैं और उन्हें समझाते हैं।

एक तीसरा रास्ता भी है। यों तो वह लेखक की एक स्वप्नाकांक्षा भर कहा जा सकता है, परंतु राष्ट्र की बदलती विदेश नीति के कारण धीरे धीरे, वह हकीकत बनती दिखाई देती है। यह विदेश नीति है- दोहरी नागरिकता का प्रस्ताव।

जब 'स्टार न्यूज ने समाचार दिया कि प्रवासी दिवस के दौरान भारत के प्रधानमंत्री ने ऐलान कर दिया है कि पांच देशों के भारतीय मूल के लोगों को दोहरी नागरिकता दी जाएगी।' तब गोपालदास अधीर हो जाते हैं। वह बार बार समाचार सुनते हैं और बार बार भारत भवन पहुंचकर उस फार्म की मांग करते रहते हैं, जो अभी तक अस्तित्व में ही नहीं आया है। वह राजनीतिज्ञों में भी हिंदूवादी दल के नेता के प्रति अधिक विश्वास प्रकट करते हैं परंतु अंततः हर जगह से निराशा ही मिलती है।

तेजेन्द्र की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह घटनाक्रम के बीच से ही बिना बड़बोलेपन और भावुकता के बाजार की सत्ता अर्थात् पारस्परिक आर्थिक हितों का अहसास करा देते हैं।

आखिर क्या वाक़ई दोहरी नागरिकता का यह सारा खेल, वैश्विक पूंजी या एन.आर.आई. निवेश को लुभाने के लिए नहीं जमाया गया है? यह दोहरी नागरिकता उन गरीब मजबूरों के लिए नहीं है जो जाने कब विदेशों में चुपचाप मर जाते हैं। आखिर देह की कीमत' का हरदीप एक अवैध लाश में क्यों बदल जाता है?

पासपोर्ट का रंग' कहानी, तेजेन्द्र शर्मा के राजनैतिक दृष्टिकोण का भी परिचय देती है। इस दृष्टि में एक स्पष्टता है कि राजनीति वित्त प्रेरित और स्वार्थ आधारित है। इसमें कोई दलीय विचारधारा विरोध नहीं रखती।

'बाऊजी पॉलिटीशियन सभी एक से होते हैं। आजादी के बाद सभी का एक उद्देश्य बचा है। बस लूट लो जितना लूट सको। किसी को भी जनता की परवाह नहीं।'

'कब्र का मुनाफ़ा' कहानी को तेजेन्द्र शर्मा की बेहतरीन कहानियों में शामिल किया जाना चाहिए। यह मुस्लिम परिवारों के बहाने से धर्म और बाजार की भयावहता और अनिवार्यता को रेखांकित करने वाली एक महत्वपूर्ण कहानी है। आज के इस आधुनिक समय में भी धर्म

अप्रासंगिक या गैर जरूरी नहीं हुआ है, बाजार ने इसे और हवा दी है। आखिर बाजार का लक्ष्य मुनाफ़ा है, भले वह कब्रों की बुकिंग से हो या फिर बुकिंग कैंसिल करके।

इस कहानी में, एक तरफ़ नादिरा और खलील जैदी हैं तो दूसरी तरफ आबिदा और नज़म का परिवार है। यह कहानी, एक ही समय में, कई बड़े विमर्शों को पैदा करती है। बड़ी बात यह है कि तेजेन्द्र खुद ऐसा कुछ करने की घोषणात्मक कोशिशें नहीं करते।

नज़म और खलील संसार के हर पति की तरह, अपनी वफ़ादार पत्नियों से दुखी हैं। खलील का जीना मुश्किल इन 'हव्वा की औलादों' ने कर रखा है और नज़म की नज़र में ये औरतें सिर्फ़ 'नेसेसरी ईविल' हैं। विश्व की लगभग आधी आबादी के प्रति पुरुषों की कमोबेश यही सोच है। याद आती है, प्रभा खेतान के उपन्यास 'अपने-अपने चेहरे' की अंतिम पंक्तियां- संसार का शायद ही कोई कोना होगा, जो औरतों के आंसूओं से भीगा ना हो।'

दूसरी तरफ़ इनकी पत्नियां हैं। 'दोनों महसूस करती थीं कि उनके पतियों के पास उनके लिए कोई समय नहीं है। उनके पति बस पैसा देते हैं, घर का खर्चा चलाने के लिए, लेकिन उसका भी हिसाब किताब ऐसे रखा जाता है, जैसे कंपनी के किसी कलर्क से खर्चे का हिसाब पूछा जा रहा हो।'

नादिरा ने अपने 'मालिक' के अनुरूप ढलने की आत्मघाती कोशिशें भी की हैं-'नादिरा ने बहुत मेहनत से अपने व्यक्तित्व में परिवर्तन पैदा किया था। उसने हंसी का एक स्थाई भाव अपने चेहरे पर चढ़ा लिया था।' क्योंकि वह जानती है कि 'खलील को बीमारी है- कंट्रोल करने की बीमारी। वह हर चीज, हर स्थिति, हर व्यक्ति को कंट्रोल कर लेना चाहता है।' नादिरा अपने पति के व्यवहार को जब तक समझ नहीं पाई थी, तब तक वह पशोपेश में रहती थी कि आखिर क्या करे, कहां जाए। इसीलिए, वह नौकरी करने की बात करती है तो बात बढ़ते-बढ़ते बहस में बदल गई और 'नादिरा के चेहरे पर ऊँगलियों के निशान बनाने के बाद ही रूकी है।'

नादिरा के भीतर आबिदा की तरह लाचारी, असहायता और निश्चिंतता नहीं है। आबिदा यह जानते हुए भी कि उसका पति किसी और के प्रेम में है, भारतीय फिल्मों में मन रमाए रखती है। जबकि नादिरा सोचती रहती है कि 'अगर वह गमग़ीन चेहरा बनाए रखे तो भी उसके पति को परेशानी हो जाती है। अगर वो मुस्कुराए तो उन्हें लगता है कि जरूर कहीं कोई गड़बड़ है अन्यथा जो व्यवहार वे उसे दे रहे हैं, उसके बाद तो मुस्कुराहट जीवन से गायब हो जानी चाहिए।'

इसीलिए जब खलील कब्रो की बुकिंग करवाता है तो नादिरा घबरा जाती है कि 'मरने के बाद भी खलील की बगल में ही रहना होगा। क्या मरने के बाद भी चैन न मिलेगा।' यह स्त्री संसार का एक बड़ा और मार्मिक प्रश्न है।

कहानी में परिवार का ऐसा सहज दृश्य विधान कहानीकार ने किया है, जो किसी भी सामंती ढंग के पुराने भारीतय परिवार के रोज़ का दृश्य है, वहीं दूसरी तरफ, यह स्त्रियों को अनुत्पादक सदस्य बनाए रखने की साजिश की तह में जाता है। इसीलिए आबिदा और नादिरा 'दोनों को कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वे अपने-अपने घर की मालकिने हैं।'

सबसे बड़ी विडम्बना यही हे कि जब तक स्त्रियां अनुत्पादक सदस्य रहती हैं, तब तक यह मुगलता जरूर जा सकता है कि वह गृह स्वामिनी हैं, परंतु असलियत में यह रहेगा मुगालता ही; क्योंकि यह निर्विवाद सामाजिक स्वामित्व है। इसके अभाव में एक पक्ष नादिरा का बनता है, जो हमेशा डांट झांपड़ खाकर भी, मुस्कुराते रहने का अभ्यास करती है और दूसरा आबिदा का, जो यह जानकर भी कि उसके पति नज़म के बुशरा नाम की स्त्री के साथ सम्बन्ध हैं, वह आमिर खान की मायानगरी में खुद को व्यस्त रखती है।

इस संदर्भ में तेजेन्द्र की देह की कीमत कहानी की पम्मी भी एक अन्य संदर्भ बिंदु बनती है जो अपने पति की मृत्यु के बाद अपने इकलौते पुत्र के साथ परनिर्भर जीवन व्यतीत करती है। 'एक बार फिर होली' कहानी की नज़मा का परिवारिक जीवन भी एक मुहावरे में ही सुखी परिवार कहा जा सकता है, वरना तो नज़मा के बारे में 'यह सच है कि उसने इमरान को कभी अपना शौहर नहीं माना। वैसे निकाह के समय काजी साहब के पूछने पर उसने भी 'हां' ही कहा था लेकिन अगर अम्मा अपनी मौत का वास्ता देकर कसमें दिलवाएं या फिर अब्बा मियां इस्लाम के खतरे में पड़ने का डर दिखाए तो वह बेचारी 'हां' के अतिरिक्त कह भी क्या सकती थी।'

प्रश्न यह भी उठता है कि इन त्रासद स्थितियों में भी, यह परिवार इतने सालों तक चल कैसे जाते हैं?

'कब्र का मुनाफ़ा के खलील जैदी और 'एक बार फिर होली' के इमरान मूलतः पाकिस्तान के हैं। एक ही मजहब के होने के बावजूद राष्ट्र की सीमाओं के बंटवारे ने धर्म की एकता को खंडित कर दिया है।

खलील जैदी का मानना है कि 'हिन्दुओं' या हिन्दुस्तान की पढ़ाई पूरी तरह से एंटी इस्लामिक है।' और यह भी कि 'हिन्दू धर्म एक डीजेनरेट, वल्गर और करप्ट कल्चर है।' इसी तर्ज पर एक बार फिर होली का कैप्टन इमरान भी भारत विरोधी है और बात-बात पर अपनी पत्नी नज़मा को उसके भारत प्रेम के लिए झिड़कता रहता है। वह दो टूक शब्दों में स्पष्ट करता है कि 'मैं बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी बीबी के पास हिन्दुस्तान का पासपोर्ट हो।' इसीलिए वह एक बार नज़मा को घर से पांच मील दूर अकेला छोड़कर घर आ जाता हैं और नज़मा को किसी तरह आटो रिक्शा से आना पड़ता है। ऐसा ही विवाद उर्दू न लिख पाने पर भी परिवार में होता है। उधर, खलील जैदी अपने दोस्त नज़म से उसके भारत प्रेम के कारण चिढ़ जाता है, 'तुम साले हिन्दुस्तानी लोग, कभी सुधर नहीं सकते। अंदर से तुम सबके सब मुत्तासिब होते हो, चाहे मजहब तुम्हारा कोई भी हो।'

विडम्बना यह है कि पाकिस्तान को शिद्दत से चाहने वाले खलील जैदी भी वापस पाकिस्तान जाकर कोई व्यवसाय शुरू नहीं करना चाहते। वहां की सामाजिक और व्यवसायिक स्थितियों को वे खुद इस लायक नहीं समझते।

धर्म के आंतरिक खाने भी कहानी में उठाए गए हैं। शिया और सुन्नी का बंटवारा खलील के चौबीसो घंटे उसी तरह दिमाग में रहता है, जैसे हिन्दुओं के जाति बंटवारा। खलील क्षुब्ध होता है कि 'ये साला कब्रिस्तान शिया लोगों के लिए एक्सक्लूसिव नहीं हो सकता क्या?.......

मेरा बस चले तो एक कब्रिस्तान बनाकर उस पर बोर्ड लगा दूं- शिया लोगों के लिए रिजर्वड।'

खलील और नज़म का, खुद के लिए और अपनी पत्नियों के लिए कब्र को बुक कराना, सिर्फ उनकी एक धार्मिक सक्रियता भर नहीं है बल्कि यह वह वर्गवादी जड़ता है, जो दूसरे मनुष्यों की पहचान को हीन और हेय मानकर पुष्ट होती है। 'हम श्रेष्ठ और तुम निकृष्ट' के भाव से जीते हुए अभिमानी लोग, मरने के बाद भी, सामान्य लोगों से अपनी दूरी बनाए रखना चाहते है।।

पर तेजेन्द्र की कहानी कला की कुशलता और विचार की स्पष्टता यह है कि वह धर्म की इस घनघोर मजबूत जकड़बंदी को, चार सौ पौंड के हलके से प्रहार से तोड़ देते हैं। दोनों महानुभावों का सारा अभिमान और उच्चनासिका भाव, बाजार में आई तेज़ी के एक हलके से उछाल से चूर-चूर हो जाता है।

मुद्रा स्फीति के कारण, कब्र की बुकिंग का निरस्तीकरण, खलील और नज़म के लिए चार सौ पौंड का मुनाफा ही नहीं देता है बल्कि एक नए व्यवसाय का प्रसव भी करता है। इसीलिए, कट्टर नज़म की आंखों में चमक आ जाती है। उन्हें एक 'नया धंधा मिल गया था।' इसी धंधे की तलाश में तो कहानी की पहली पंक्ति खुली थी- 'यार कुछ न कुछ तो नया करना ही पड़ेगा। सारी जिंदगी नौकरी में गंवा चुके हैं।'

इस घटना से एक विचार उछल कर सामने आता है कि धर्म की जकड़बंदी की काट बाजार से हो सकती है। यह कहानी धर्म और बाजार की भयावहता के साथ साथ स्त्री पीड़ा को भी अभिव्यक्त करती है। यह कहानी किसी भी देशकाल में बुनी जा सकती थी, परंतु कहानीकार की विशेषता यह है कि वह इसे दो देशों की संस्कृतियों के अन्तविरोधी से लगने वाले देशकाल में रचता है।

तेजेन्द्र शर्मा की इन प्रवासी भावों की कहानियों के संदर्भ में, मार्क्स का यह कथन बहुत ही प्रासंगिक है कि 'मनुष्य की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है।' तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां भिन्न सामाजिक अस्तित्व से उत्पन्न भिन्न चेतनाओं की हैं।

टेलीफोन लाइन' कहानी के अवतार सिंह और सोफिया का प्रेम एक मार्मिक व्यथा को उकेर देता है। 'कोख का किराया' और 'मुझे मार डाल बेटा' भी तेजेन्द्र की उल्लेखनीय कहानियों में से हैं।

तेजेन्द्र शर्मा की कहानी कला में एक विशिष्टता उनके सहज कहानी कथन की है। वह विचारों के उलझाव और जटिलता की राह नहीं चुनते बल्कि कहानीपन की सहजबयानी को चुनते हैं। विचार उस कथा में से खुद सारतत्व की तरह निकल आता है।

कहानीकार ने अपने संग्रह 'बेघर आंखें' की भूमिका में अपनी कहानी कला को स्पष्ट किया है- 'मैं स्टाईल या स्ट्रक्चर को लेकर पहले से कुछ तय नहीं करता...... मेरी कहानियों में आपको वो सभी तत्व भी मिलेंगे, लेकिन मेरे लिए यह सब एक अच्छे कहानी कहने के औजार है..... कहानी से अधिक महत्वपूर्ण नहीं....... मेरा प्रयास रहता है कि कहानी में कहानीपन हमेशा बना रहे।'

कहना ही चाहिए कि तेजेन्द्र शर्मा, एक सजग रचनाकार के तौर पर इस प्रयास का पूरा निर्वाह करते हैं। कहना यह भी चाहिए कि कहानीकार अपनी पूरी कथादृष्टि में मार्क्स के आर्थिक सम्बन्धों के विचारों को धारण किए हुये हैं। और बेशक, वह उन विचलनों से भी खुद को बचाए रखते हैं जिसे राजेन्द्र यादव 'भावुकता' कहते हुए खारिज करते हैं।

प्रवासी साहित्य में कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा ने सही अर्थों में नई जमीने तोड़ी हैं। हिंदी साहित्य इस रचनात्मक सहयोग से और समृद्ध ही हुआ है।

डा0. अजय नावरिया

36/1179, डी0 डी0 ए0 फ्लैटस

मदनगीर, नई दिल्ली-110062

 

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साभार-

1 blogger-facebook:

  1. TEJENDRA JI KO HARDIK SHUBHKAMNAYEIN. SUNDAR PRASTUTI .
    मुकेश पाण्डेय "चन्दन": तीन रूप में दर्शन देने वाली माँ हरसिद्धि !

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