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तेजेन्द्र शर्मा विशेष : राकेश पाण्डेय का संस्मरण - मंजिल के आगे का मुसाफिर

(तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक शुभकामनाएं - सं.)

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मंजिल के आगे का मुसाफिर - तेजेन्द्र शर्मा

राकेश पाण्डेय

भाई तेजेन्द्र शर्मा पर लिखना आसान नहीं है, क्योंकि यदि लिखते समय वह किसी बात से सहमत नहीं हुए तो उस पर एक लम्बी पूरी बहस हो सकती है और अपनी बात वह समझाए बिना मानेंगे भी नहीं। यह उनका अपने और अपने कार्य के प्रति आत्मविश्वास का प्रतीक है जिसके लिए मैं उनकी कद्र करता हूं और शायद इसीलिए उनसे बेबाक चर्चाएं संभव हो पाती है।

एक दिन मैं श्रीमती उषा राजे सक्सेना व श्री के बी एल सक्सेना के साथ था, कनॉट प्लेस में रीगल सिनेमा के बाहर उनका श्री तेजेन्द्र शर्मा से मिलने का स्थान तय हुआ था। यूं तो तेजेन्द्र शर्मा के एक महत्वपूर्ण प्रवासी हिन्दी लेखक होने के नाते मैं उनके नाम से परिचित था, लेकिन मेरी उनसे रू-ब-रू मुलाकात नहीं थी। वैसे प्रवासी संसार का संपादन करते हुए ई-मेल के माध्यम से उनकी रचना प्रकाशित भी कर चुका था। मेरी तेजेन्द्र भाई से पहली मुलाकात वहीं पर हुईें और तब से आज तक निरंतर सम्पर्क बना हुआ है।

तेजेन्द्र शर्मा ब्रिटेन में रहने वाले प्रमुख प्रवासी साहित्यकार तो हैं ही, वह हिन्दी-सेवी भी हैं और आजकल वह हिन्दी को तकनीक से जोड़ने का अभियान भी छेड़े हुए हैं। जहां एक ओर उनके पांच कहानी संग्रह, एक गजल संग्रह, दो पुस्तकों का संपादन, तीन अनुदित कहानी संग्रह, दो ऑॅडियो बुक्स और तीन अंग्रेजी में पुस्तकें होने के साथ-साथ उन्होंने इंदु कथा सम्मान के माघ्यम से हिन्दी की गूंज को हाऊस ऑॅफ लॉर्ड्रस तक पहुंचाया है। श्री तेजेन्द्र शर्मा का लंदन में रहकर सक्रिय लेखन और स्पष्टवादिता कभी-कभी उनके जी का जंजाल भी बन जाती है। मुझे भली-भांति याद है कि सन 2006 में प्रवासी संसार का ब्रिटेन विशेषांक प्रकाशित किया था। उसमें लंदन के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने अपने साक्षात्कार में उल्लेखित करते हुए ब्रिटेन में हिन्दी की प्रगति के सन्दर्भ में पूछे गए प्रश्न पर तेजेन्द्र शर्मा के कथन का जिक्र करते हुए कहा कि हिन्दी के लेखन का विस्फोट हुआ है, यह सब गलत तथ्य है। यह अनावश्यक विज्ञापन करना है। ऐसा कोई विस्फोट नहीं हुआ है। इन पंक्तियों की वहां के हिन्दी रचनाकारों के बीच खूब प्रतिक्रिया रही और भाई तेजेन्द्र आक्रामक हो गए। उन्होंने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा, जिसे मैंने प्रकाशित भी किया था। उस पत्र् का एक अंश मैं यहां दे रहा हूं

''डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने अपने साक्षात्कार में कहा है कि वहां (लंदन में) कुछ लोग हैं जिन्होंने चार कहानियां छपवा लीं और कहने लगे कि मैंने हिन्दी साहित्य को बहुत कुछ दिया है। संभवतः तेजेन्द्र शर्मा ने कहा था कि हिन्दी लेखन का विस्फोट हुआ है, यह सब गलत तथ्य है। यह अनावश्यक प्रचार है। ऐसा कोई विस्फोट नहीं हुआ है।

पहले तो मैंने सोचा कि उनके कथन को घर के उस बूढ़े की बुड़तुड़ की तरह मान लिया जाए जिसे हर नए काम पर आपत्ति ही जतानी आती है और चुप्पी साध् ली जाए। लेकिन फिर महसूस हुआ कि उनके उक्त वक्तव्य पर टिप्पणी करना आवश्यक है। अगर ऐसा न किया गया तो डॉ. श्रीवास्तव ब्रिटेन में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य का अन्जाने में बहुत अहित कर बैठेंगे।

सत्येन्द्र जी ने मेरे वक्तव्य को शायद न तो ठीक से पढ़ा है और न ही समझा है। मैंने कहा था कि जब कभी प्रवासी हिन्दी साहित्य की बात होती है तो हम सीधे-सीधे मॉरीशस, सूरीनाम और फिजी जैसे देशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य की बात करने लगते है। इंग्लैंड और अमेरिका में जो हिन्दी साहित्य रचा जा रहा है, उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। पिछले एक दशक में यदि किसी देश में हिन्दी साहित्य का विस्फोट हुआ है तो वो है ब्रिटेन ।''

तेजेन्द्र भाई के इस पत्र को प्रकाशित करने के बाद मुझे यह प्रयास करना पड़ा कि यह विवाद आगे नहीं बढ़। इसके बाद डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव की आत्मीयता में कोई कमी तो नहीं दिखाई पड़ती, लेकिन उनकी रचनाएं आना बंद हो गईं।

मुझे एक घटना और याद आती है हुआ यूं कि दुबई में आयोजित 'खाड़ी हिन्दी सम्मेलन' में श्री राजेन्द्र यादव, श्री विभूत नारायण राय, रूस से डा अनिल जनविजय, श्री अजीत राय, भाई तेजेन्द्र शर्मा, श्रीमती जकिया जुबेरी और मैं आमंत्रित थे। इस भव्य कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री राजेन्द्र यादव जी थे। स्थानीय आयोजक कथाकार श्री कृष्ण बिहारी दुबई से आबुधाबी हमें अपना स्कूल दिखाने के लिये ले जा रहे थे। अनेक बार बातचीत में भाई तेजेन्द्र शर्मा के ज्ञान और तर्कों पर हम सभी चुप हो जाते थे। हम सभी ने उनके ज्ञान पर हंसते हुए चुटकी ली कि यदि इसकी जानकारी कार्यक्रम के आयोजकों को हो गई तो कहीं वे श्री राजेन्द्र यादव के स्थान पर भाई तेजेन्द्र शर्मा को ही मुख्य अतिथि न बना दें इस प्रकार के अनेक आत्मीय प्रसंग हैं जब उनसे कई संजीदा विषयों पर महीन बात हो जाया करती है।

यह सभी जानते हैं कि यू.के. में प्रतिवर्ष कवि सम्मेलन आयोजित होता है। उसमें कोई-न-कोई जुगाडू कवि/कवियित्री आई.सी.सी.आर. के माध्यम से वहां अवश्य पहुंच जाता है। अभी हाल में कवि सम्मेलन के बाद लंदन से तेजेन्द्र शर्मा का फोन आया कि आप लोग यह कौन-सा कूड़ा लंदन भेजते हैं। मैंने उत्तर दिया कि आप यूरोप वाले हमारे यहां जैविक कूड़ा भेजते हैं और जवाब में हम लोग आपके यहां साहित्यिक कूड़ा भेजते हैं।

इस प्रकार के अनेक प्रसंग भाई तेजेन्द्र शर्मा के साथ चलते रहते हैं। तेजेन्द्र शर्मा की एक बात से मैं बिल्कुल सहमत हूं कि प्रवासी लेखन में जिस भी देश में वह लेखक रह रहा है, उसकी पृष्ठभूमि वहां का समाज, उस समाज की पीड़ा, उसके लेखन में अवश्य प्रतिबिम्बित होनी चाहिए, न कि केवल भारतीय समाज की। तभी उत्कृष्ट प्रवासी लेखन सामने आयेंगे। विदेशों में बसे हिन्दी के लेखक कहीं न कहीं हिन्दू संगठनों अथवा ऐसी विचारधारा से सम्बद्घ हैं जिनसे भारत के कई जनवादी अथवा प्रगतिशील लेखकों को परहेज है। लेकिन भाई तेजेन्द्र शर्मा ने अपने लेखन और व्यवहार में इस बात का प्रचुर ख्याल रखा है कि उनको लेकर किसी को परहेज नहीं है, बल्कि वह भारत में सभी पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले प्रमुख प्रवासी रचनाकार है।

तेजेन्द्र शर्मा लंदन जाने से पहले भी लेखन में सक्रिय थे उन्होंने दूरदर्शन के लिये शांति धारावाहिक का लेखन किया, अन्नू कपूर निर्देशित फिल्म 'अमय' में नाना पाटेकर के साथ अभिनय किये। उनकी रचनाओं के बारे में डॉ. धर्मवीर भारती ने कहा था कि उनकी कहानियों में दम है, तेजेन्द्र के पास समस्या को उठाने का साहस है, पात्र्-निर्माण करने की शक्ति है, कथानक का निर्वाह है। साथ ही उनके मित्र डॉ. प्रेम जनमेजय उनके बारे में कहते हैं - तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों को पढ़ना आसान नहीं है। यह कहानियां आपका रिश्ता एक ऐसे दर्द से जोड़ देती हैं जो आपकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। ऐसे में तेजेन्द्र की कहानी कहानी नहीं रह जाती है, वह अपनी रचनात्मकता के साथ आपके रगो-रेशे में बस जाती है। दर्द से रिश्ता आसान नहीं है पर ये तो ऐसा दर्द है जो करुण रस का सुख देता है, जो जीवन को एक व्यापक सोच देता है और एक विशाल फलक पर मानवीय मूल्यों से साक्षात्कार कराता है।

तेजेन्द्र शर्मा की संवेदनाएं, भारत के प्रति प्रेम सदा उनकी बातचीत में दिखाई पड़ता है। अभी एक दिन तेजेन्द्र शर्मा का फोन आया कि भारत आ गया हूं और बता दूं कि जिंदा हू। मैंने कहा अरे भाई, जिंदा तो लंदन में भी रहते हो। उनका कथन था कि लंदन में तो केवल सांस लेते हैं, लेकिन भारत आने पर ही पता चलता है कि जिंदा है। अपनी मिट्टी से दूर रहने के कारण यहां आने पर जो भाव मन में उमड़ते हैं, उनकी अभिव्यक्ति इन्हीं शब्दों से हो सकती है।

भाई तेजेन्द्र शर्मा की सक्रियता निरंतर बनी हुई है और वह मुझे मंजिल के आगे के मुसाफिर लगते है।

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साभार-

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