रविवार, 21 अक्तूबर 2012

कृष्ण गोपाल शरण मिश्र 'किशन' की ग़ज़लें

 

              1

कौन कहता है जमाना बदल गया, 

मय वही है मयखाना बदल गया .

 

सागर भी ,सुराही भी ,मौसम भी वही ,

कुछ न बदला यार पैमाना बदल गया .

 

आशिकी के अब भी हैं जलते चराग

बेवफा,बेरहम,परवाना बदल गया.

 

मत कहो पत्थर में अब वो दम नहीं 

बुतपरस्ती में जो बुतखाना बदल गया.

 

इश्क है अब भी वही नूरे करम वही 

फासला है दिल का दीवाना बदल गया .

 

चाहत की कमी थी नहीं इस दिल में मेरे यार 

उनकी नजर फिरी की अफसाना बदल गया 

 

गुलशन में किसके नाम अब बहार लाये ख़त 

दे उसको कैसे जिसका ठिकाना बदल गया .

 

हरदिल अजीज कौन है जाने जिगर का दर्द

अहसास का 'किशन' जो जमाना बदल गया .

 

समन्दर सामने है, और तिश्नगी भी है ,

सवाल-ए-मौत भी है,और जिंदगी भी है .

 

तमाम उम्र गुजारी किसी की चाहत में

कसक है और उम्मीदें हैं ,तीरगी भी है .

 

जो लम्हे बीत गए अब तलक तसव्वुर में 

बाद में भी रहेगी,और पेशगी भी है .

 

जुबान-ए-कैस या खुद का जुनून कह दूँ मैं

दिले बेदार भी है ,और दिल्लगी भी है .

 

तसव्वुर है उसी का ,रात जगाये है मुझे 

फलक में ज़र्द सितारों की बानगी भी है .

 

कहाँ  पे था कहाँ लेकर के,आ गयी याराँ

हंसी खयाल है और,लुत्फ़-ए सादगी भी है.

 

बड़ा मजा है 'किशन' इश्क की सियासत में

दश्तो-दर रायगी है ,और यारगी भी है.

 

दो गज जमीं आशियाँ जिंदगी का 

जाना जहाँ तयशुदा जिंदगी का .

 

लिखने में पूरी उम्र ही गवां दी 

मगर न भरा फलसफा जिंदगी का.

 

पाने को मंजिल के लम्बे सफ़र में 

थकने लगा कारवां जिंदगी का .

 

बहुत पैर पटके, बहुत हाथ मारे

पाया न पर कुछ मजा जिंदगी का.

 

मिलते गए लोग चलता गया मैं 

कटता गया रास्ता जिंदगी का.

 

राहे- वफ़ा और राहे- मोहब्बत में 

बढ़ता गया फासला जिंदगी का 

 

अब तो फकत रोज मर मर के जीना

बयां हो गया दास्ताँ जिंदगी का .

 

किशन' की उम्मीदें उसी पर है लाज़िम

वही जाने क्या मरतबा जिंदगी का .

 

                         ४

शम्मा जलती है जहाँ पर वो परवाना वहीँ होता 

कोई तोहफा किसी के दिल का पैमाना नहीं होता 

 

बड़ी हसीन हुआ करती है दिलदार की बातें 

जहाँ मोहब्बत नहीं होती वहाँ दीवाना नहीं होता 

 

किसी अंजाम  के पहले फसादे  ला के मुश्किल में 

मोहब्बत की नजर में वो तो अफसाना नहीं होता

 

जहाँ जा के पिए शराब कोई दीवारें चिल्लाएं 

वो कोई मयकश नहीं होता ,वो मयखाना  नहीं होता .

 

जहाँ ऐतबार का हो क़त्ल पुरशुकुं  न मिले यार 

ऐसे उस घर में किसी हाल रह पाना नहीं होता 

 

यारगी की नजर पहचान लेती दिल की हर तस्वीर 

किसी के घर मेरा यूँ ही कभी  जाना नहीं होता 

 

बेगानों पर नजर उट्ठे ज़माने की तो क्या परवा

'किशन' उनकी तरह जीना कभी आसां नहीं होता.

 

                                  ५

तुम्हारी याद बीते पल की जब भी मुझको आयेगी 

तो दिल बेताब होगा और नजरें ठहर जाएँगी.

 

मेरी तन्हाईयों में तुम ही तुम और सिर्फ तुम होगे 

बहारें फिर फिजां में जिंदगी के लौट आयेंगी .

 

मेरी नजरें तलाशेंगी जहाँ में तुम जहाँ  होगे 

ना पा करके तुम्हें मोती लिए फिर लौट आयेंगी.

 

मेरा दिल दिल नहीं यह  तो तुम्हारे प्यार का सागर 

तुम्हारी याद तस्वीरों में आ आ कर  नहायेंगी .

 

खुली पलकों में चेहरे जब तुम्हारे नाचते होंगे 

'किशन' यादें तुम्हारी दिल में आ के महफ़िल सजाएँगी 

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संपर्क- मो-खलवा,निकट-खुनई ठाकुरद्वारा 

            पो व जिला -बलरामपुर ,उ प्र,२७१२०१

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