रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

शंकरलाल कुमावत की व्यंग्य कविता - काश जो मैं भी ...

 

काश जो मैं भी

देश के हुक्मरानों का दामाद होता

तो मुझे भी

करोड़ों का इनसिक्योर लोन मिला होता

हर नेता मेरी खिदमत में खड़ा होता

कॉरपोरट मेरे आगे दण्डवत पड़ा होता

मेरे लिए देश का कानून बदला गया होता

मेरा घर भी रिजर्व बेंक बना होता

काश जो मैं भी

देश के हुक्मरानों का दामाद होता |

जब कोई गफलत का आरोप

मुझ पर लगा होता

जाँच की माँग लिए आम आदमी खड़ा होता

तो दिल्ली दरबार ने उसे ठुकरा दिया होता

मुझे बचाने के लिए

मंत्रियों का कुनबा लगा दिया होता

काश जो मैं भी

देश के हुक्मरानों का दामाद होता |

मगर बदकिस्मती है मेरी की

मेरे ससुर हुक्मरान नहीं

बल्कि खेत में हल चलाने का काम करते है

लोग मुझे लोन देने से डरते है

इसीलिए मैं चिपका पेट लिए

पेड़ के नीचे पड़े-पड़े ये सपना देखा करता हूँ

काश जो मैं भी,

देश के हुक्मरानों का दामाद होता

तो मुझे भी,

करोड़ों का लोन इनसिक्योर लोन मिला होता |

लेखक : शंकर लाल

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget