शंकरलाल कुमावत की व्यंग्य कविता - काश जो मैं भी ...

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काश जो मैं भी

देश के हुक्मरानों का दामाद होता

तो मुझे भी

करोड़ों का इनसिक्योर लोन मिला होता

हर नेता मेरी खिदमत में खड़ा होता

कॉरपोरट मेरे आगे दण्डवत पड़ा होता

मेरे लिए देश का कानून बदला गया होता

मेरा घर भी रिजर्व बेंक बना होता

काश जो मैं भी

देश के हुक्मरानों का दामाद होता |

जब कोई गफलत का आरोप

मुझ पर लगा होता

जाँच की माँग लिए आम आदमी खड़ा होता

तो दिल्ली दरबार ने उसे ठुकरा दिया होता

मुझे बचाने के लिए

मंत्रियों का कुनबा लगा दिया होता

काश जो मैं भी

देश के हुक्मरानों का दामाद होता |

मगर बदकिस्मती है मेरी की

मेरे ससुर हुक्मरान नहीं

बल्कि खेत में हल चलाने का काम करते है

लोग मुझे लोन देने से डरते है

इसीलिए मैं चिपका पेट लिए

पेड़ के नीचे पड़े-पड़े ये सपना देखा करता हूँ

काश जो मैं भी,

देश के हुक्मरानों का दामाद होता

तो मुझे भी,

करोड़ों का लोन इनसिक्योर लोन मिला होता |

लेखक : शंकर लाल

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