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राजीव आनंद की कविताएँ

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  उँ


ब्रह्मांड का प्रतीक है उँ
प्रणव मंत्र
एक ध्‍वनि
शरीर के भीतर भी
शरीर के बाहर भी
    सून हर कोई सकता नहीं
    सुनने लगता है जो इसे
    जुड़ने लगता है परमात्‍मा से
ब्रह्मांड की अनाहत ध्‍वनि
ध्‍वनि के उत्‍पत्‍ति का अपवाद
ब्रह्मांड की समस्‍त ध्‍वनियों में
सबसे शक्‍तिशाली ध्‍वनि
    प्रारंभ तो है इसका अंत नहीं !

सबसे बड़ा लोकतंत्र


क्‍या बचा है मेरे पास
बाहर आकर जेल से
दशकों बाद
न बाप
न माँ
न बहन
न भाई
न किए जुर्म की सजा काट
पुलिस साबित न कर पायी एक भी बात
गुम हो गयी लंबी अंधेरी रातों में हयात
मां, बाप, बहन, भाई ने छोड़ दिया साथ
    कैसा है ये न्‍याय का तंत्र ?
    फंसाकर पुलिस निर्दोष को
    रचती है षडयंत्र
    जज साहब एक दशक तक
    फैसला सुनाते है
    जाओ अब जेल से बाहर
    तुम हो स्‍वतंत्र
    क्‍या गरीब को ऐसी ही
    जिंदगी मिलती है भारत में ?
    सूना है देश आजाद है
    और है
    सबसे बड़ा लोकतंत्र !
   

      कारखाना


इंसानियत का कारखाना
अब हो गया है पुराना
नहीं बना पा रहा
ममता, त्‍याग, प्रेम व करूणा का
औजार
जो जीवित कर सके इंसानों में
मरती हुई इन संवेदनाओं को
औजार घिस गए लगते है
मन-मस्‍तिष्‍क के आनंदित उत्‍पाद
नहीं बना पा रहा है कारखाना
टाटा, बिड़ला और अंबानी से कहो
लगाए वो दूसरा इंसानियत का कारखाना !

भगत सिंह आए पर.......
भगत सिंह फिर पैदा हो, चाहते है प्राय सभी
पर भगत सिंह पैदा न हो उनके घर कभी
     देश को आज जरूरत है भगत सिंह की
     ऐसा शिद्द‌त से चाहते है लोग सभी
        ब-शर्त्‍त
           बेटा या भाई बनकर न आए कभी
           आए तो पड़ोसी बनकर ही आए कभी

     

बाजारवाद


पैसे की हवस इतनी बढ़ गयी
छाती का दूध दुकानों पर चढ़ गयी
मांओं को समझना होगा
बाजार की जद से बचना होगा
    जैसे ही छाती का दूध
    बोतलों में बंद होगा
    जीवन बच्‍चों को देने से
    ऐसा दूध स्‍वच्‍छंद होगा
छाती का दूध है अनमोल
मत करो इसका नाप-तोल


                          राजीव आनंद
                         मो. 9471765417

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