बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

विजेंद्र शर्मा की जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म......

image

जसपाल भट्टी को समर्पित एक नज़्म......

ज़रुरत

ज़मीं के बदतर हालात देख

कभी – कभी उपरवाला भी

हो जाता है ग़मज़दा..

उसे भी लगता है

कोई उसे हँसाए

कोई उसे गुदगुदाए

और हँसने की फ़िक्र में

वो झांकता है

आसमां से ज़मीं पर

उसकी तलाश ख़त्म हो जाती है

उस शख्स पे जाकर

जो मुसलसल कहकहे बाँट रहा है

बुझे हुए चेहरों को नुस्खे बता रहा है

खिलखिलाने के, ज़िंदगी जीने के

यकबयक ...

एक आवाज़ आती है

चलो , हमे तुम्हारी ज़रुरत है

बहुत ठहाके हो गए यहाँ

और फिर ..

बिना सोचे वो मसखरा

सबको हँसाते-हँसाते

रुलाकर चल देता है

उसको हँसाने

जिसके पास निज़ाम है

सबको रुलाने का ...

सबको हँसाने का ...

अब इस तसल्ली के सिवा

कोई चारा भी तो नहीं है

कि

उस मसखरे की ज़रूरत

हमे नहीं

आसमानों को ज़ियादा है .....

--

विजेंद्र शर्मा

Vijendra.vijen@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. वाह , बेहतरीन श्रधांजलि , एक बेहतर इंसान के लिए ......

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------