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अजय कुमार मिश्र ‘अजय श्री‘ की कविता - गौरैया की मांग

गौरैया की मांग

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छत पर बैठी गौरैया

फुदक-फुदक कर करती मांग।

दे दो मुझका दाना पानी,

दिखता है बस अब मकान।

नहीं मिले अब वो बाग बगीचे,

नहीं रहे अब वो उपवन।

मेरा मन भी अब उचट गया है,

सोच रही हूं छोड़ दू तन।

पर काल चक्र के आगे,

कौन यहां टिकता है।

चाहे जो मन,

वो सब कर्म कहां होता है।

लेकिन बच्‍चों के खातिर,

मुझको आना जाना है।

रोज भोर में आकर छत पर,

चूं-चूं कर तुम्‍हें जगाना है।

बदले में मिल जायेगा मुझको,

थोड़ा दाना थेाड़ा पानी।

कट जायेगा जीवन मेरा,

कर देना बस इतना एहसान।

छत पर बैठी गौरैया,

फुदक-फुदक कर करती मांग।

 

---अजय कुमार मिश्र ‘अजय श्री‘

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