शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - गठबन्‍धन का राजधर्म

मैं आपके व्‍याकरण के ज्ञान को आमन्‍त्रित करता हूँ श्रीमान कि कृपया बताये गठबन्‍धन महज एक शब्‍द है या संज्ञा है या सर्वनाम है या विशेषण या राजनीति या कूटनीति है या फिर बस कुर्सी-बचाने की जुगत। कभी एक प्रधानमंत्री ने अपने मुख्‍य मंत्री को राजधर्म निबाहने के निर्देश दिये थे और तब से वे राजधर्म को निभा रहे है। समझ में नहीं आता गठबन्‍धन के धर्म के नाम पर सरकारें अपनी अपनी कमजोरियां और नाकामियां क्‍यों छुपाती है, वे अपनी मजबूरियों को गठबन्‍धन की ढाल से छुपाती है और मौका पाकर गठबन्‍धन पर ही फिर वार करती है।

मुहँ में गठबन्‍धन का नाम और बगल में छुरी। वे कौन सी राजनीतिक, आर्थिक सामाजिक परिस्‍थितियां होती है जो सरकारों के समानान्‍तर सरकारें बना लेती है और गठबन्‍धन धर्म के नाम पर सभी प्रकार के अधर्म करने लग जाती हैं हमारी हालत ये है कि बोफोर्स से चले और कोलगेट तक पहुँचे। बीच की संकरी गलियों की तो चर्चा ही व्‍यर्थ है और खदानों की गहरी खाईयों में सरकारें डूबती उतरती रहती है और कई बार हमेशा के लिए डूब जाती है। गठबन्‍धन का मामला ऐसा है कि गठबन्‍धन है तो कुर्सी है ओर कुरसी है तो देश है। ऐसा देश किस काम का जिसमें एक अदद कुर्सी न हो। देश का सीधा- सादा अर्थ है एक ऐसा द्वीप जो कुर्सियों से भरा हो और गठबन्‍धन धर्म के सहारे उस पर बैठा जा सके।

गठबन्‍धन केवल एक शब्‍द नहीं एक विचार है एक विचार धारा है जो सत्‍ता तक पहुँचाता है। कुर्सी पर काबिज करता है। कुर्सी ही गठबन्‍धन है और गठबन्‍धन ही कुर्सी है। आज कुर्सी के लिए इस गठबन्‍धन में है कल कुर्सी के कारण किसी दूसरे गठबन्‍धन में घुस जाते हे। तीसरा, चौथा, पांचवां, पच्‍चीसवां मोर्चा बना लेते ही सरकार किसी भी नीति वाले प्रमुख दल की हो वे हमेशा सरकार में रहते है। सरकार ही गठबन्‍धन को बनाये रखती है। सरकार हटी गठबन्‍धन टूटा। विचार नदी में चले गये। सरकार बने तो सब वापस गठबन्‍धन में। स्‍थायी सरकार याने गठबन्‍धन सरकार। स्‍थायी सरकार की कल्‍पना में वोटर को बेवकूफ बनाओ और सरकार चलाओ। स्‍थायित्‍व का नारा जब गठबन्‍धन के नारे में गड्‌डमड्‌ड हो जाये तो समझो सरकार में कन्‍फ्‌यूजन है। कन्‍फ्‌यूजन का फ्‌यूजन कुर्सी और घोटालों से है और कहीं कोई सोल्‍यूशन नहीं है।

गठबन्‍धन का विरोध करने वाले भी आगे जाकर गठबन्‍धन ही बनाते है। गठबन्‍धन सरकारों को तो थोड़ी सी छाछ या थोड़े से मक्‍ख्‍न पर नाच नचाने वाली बड़ी बड़ी पूंजी वादी वामपंथी दक्षिण पंथी, ममतावादी प्रवृत्‍तियां हाजिर है और गठबन्‍धन की मजबूरियों का नंगा नाच लोकतन्‍त्र में रोज देखना पड़ रहा है। गठबन्‍धन केवल एक शब्‍द आधा-अधूरा कभी कभी क्रान्‍ति, सुधार, प्रगति, विकास,मजबूरी,मजबूती,आदि की तरह है। बार बार चुनाव का डर दिखा कर गठबन्‍धन को खींचा जा सकता है तब गठबन्‍धन एक तरह लचीला शब्‍द बन जाता हे। तब लचीला शब्‍द स्‍थापित हो जाता है। लोकतंत्र में चल निकलता है। गठबन्‍धन में जो जहां बैठ गया सो बैठ गया। हर नेता एक सीढ़ी उपर जाना चाहता है आगे अवसर मिले ना मिले। गठबन्‍धन का सिक्‍का उछालो। चित्‍त भी मेरी पट्‌ट भी मेरी और अण्‍टा मेरे बाप का। देश का भले चक्‍का जाम हो गठबन्‍धन सरकार गिरती-पड़ती-रेंगती चलती रहती है, देश का क्‍या है ? और देश के इतिहास में पांच बरस क्‍या मायने रखते है मगर सरकार और पार्टी के इतिहास में पांच बरस का गठबन्‍धन धर्म बहुत होता है। ये राजधर्म भी है और राष्ट्रधर्म भी है।

गठबन्‍धन तो वाटर ऑफ इण्‍डिया है। कभी खतम नहीं होगा। गठबन्‍धन की सरकार और सरकार का गठबन्‍धन। व्‍यवस्‍था और तन्‍त्र सब कुछ गठबन्‍धन में समाहित। नैाकरशाही की मौज। छोटे नेताओं के आनन्‍द सब गठबन्‍धन की कृपा। गठबन्‍धन सरकार तो भईया किसी को नहीं धमकाती सब उसे ही धमकाते रहते हैं। गठबन्‍धन में तो बस गांठें ही गांठें। खोलने के प्रयास जारी हे। इति ‍शुभम्‌।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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