बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

तेजेन्द्र शर्मा विशेष : सुधा ओम ढींगरा का संस्मरण - एक आम आदमी का लेखक

(तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक शुभकामनाएं - सं.)

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तेजेंद्र शर्मा - एक आम आदमी का लेखक

- सुधा ओम ढींगरा

कहानियाँ पढ़ने का शौक मुझे तेजेंद्र शर्मा की कहानियों तक ले गया। कुछेक कहानियाँ पढ़ीं लगा कि शायद मैं लेखक को जानती हूँ। फिर कुछ और कहानियाँ पढ़ीं --जिज्ञासा उन परिस्थितियों को पार कर चुकी थी जहाँ मस्तिष्क सुप्त हो जाता है- पत्रकार का खोजी मन शोध करता ही रहा- पूरी खोज-बीन के बाद पता चला कि मैं इन्हें नहीं जानती।

तेजेंद्र जी कि कहानियाँ 'देह कि कीमत', 'किराये का नरक', 'रेत का घरौंदा', 'टिबरी टाईट', 'गंदगी का बक्सा', 'पासपोर्ट का रंग', 'कला सागर', 'चरमराहट', 'एक बार फिर होली' पढ़ चुकी थी। अन्दर ''कहीं जानती हूँ' का कीड़ा कुलबुलाता रहा। तेजेंद्र जी पर आलेख हों या ग़ज़लें सब पढ़ डालीं पर जिज्ञासु मन शांत नहीं हुआ कई बार अंतर्मन स्वयं प्रश्न पूछता--क्यूँ मैं कुछ जानना चाहतीं हूँ ? क्या फर्क पढ़ता है !

पहचान से लेखनी तो नहीं आंकी जाती। अल्पकालिक यह संवेदना लुप्त हो गई, मैंने अपने मायके में सात जनों को खो दिया था। माँ-पापा, भैया के बाद सम्पत्ति पर जो विवाद खड़ा हुआ और मेरे जीवन के लिए खतरा पैदा हो गया। सम्पत्ति के सब कागज़ों पर हस्ताक्षर कर जब मैं मानसिक तनाव और भावनात्मक चोट खाए अमेरिका लौटी तो साहित्य-प्रेमी मित्रों नें मुझे उस अवस्था से निकालने के लिए एक गोष्ठी रखी। विषय चुनाव मुझे करना था। सब ने ऐसा ही तय किया। न जाने क्यूँ मैंने तेजेंद्र जी की कहानियाँ 'देह की कीमत', 'टिबरी टाईट', 'पासपोर्ट का रंग ' पढ़ने और विचार-विमर्श के लिए चुनीं -उस गोष्ठी में ये कहानियाँ पढ़ीं व बेहद सराहीं गईं। पर उस गोष्ठी के उपरांत मेरे अंदर का कोलाहल शांत हो गया।

मैं लेखक को नहीं कहानियों को पहचानती थी- इनमें वही महक आती है जिसने बचपन से ले कर अब तक मुझे महकाया है-वही वातावरण जिसमें मैं पली-बढ़ी हुई हूँ, इन कहानियों में महसूस करतीं हूँ। मेरे आस पास के चरित्रों की बातें तेजेंद्र शर्मा अपनी कहानियों में कहते हैं। मानवीय संवेदनाएं, पीड़ाएं, कुंठाएं, प्रेम, नफरत प्रत्येक भाव तेजेंद्र शर्मा की लेखनी के स्ट्रोक से ऐसे उभरते हैं कि कहानियों के चरित्र जीवन्त आप के सम्मुख खड़े हो जाते हैं। मैं कोई आलोचक समीक्षक नहीं बस तेजेंद्र शर्मा की कहानियों पर मेरी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है।

अब तो मेरी तेजेंद्र जी से बात भी होती है क्यूंकि विश्व हिन्दी साहित्य (आलोचकों की देन प्रवासी साहित्य) को भारत के हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा के साथ जोड़ने का जो कार्य वे यू। के से कर रहें हैं वही कार्य मैं अमेरिका से कर रहीं हूँ।

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Sudha Om Dhingra

 

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साभार-

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