शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

मिलन चौरसिया की कविता - ये देश सलोना है

ये देश सलोना है, माटी का लोना है.
जिसने गूंथा जी भर के इसको गूंथा,
जिसने लूटा जी भर के इसको लूटा,
जबतक इसके टुकड़े टुकड़े काट ना लें,
जबतक इसके टुकड़े टुकड़े बाट ना लें,
इन नेताओं को चैन नहीं होना है.
ये देश सलोना है.

वोट बढ़े जिससे इनका, ऐसा कानून बनाते हैं,
बैठ के जनता के मंदिर में हुँआ हुँआ चिल्लाते हैं,
ये हैं अपने देश के नेता जूता चप्पल खाते हैं ,
देश को गिरवी रखकर ये सब जय हो जय हो गाते हैं ,
आम आदमी पूछे तो ये खुले आम धमकाते हैं .
जनता बनी मूक दर्शक बस इसी बात का रोना है.
ये देश सलोना हैं .

सैकडों घोटाले हुए देश में आज़ादी के बाद.
सभी नहीं तो कुछ तो होगा आप सभी को याद .
कोई ऐसा नहीं कि जिसमे न हो इनका हाथ.
देश लूट कर भी जनता से करते ये फ़रियाद,
मूँछ मुड़ा के, पूछ हिला के, भौंकते यही कि.
वोट इन्हें ही देना है.
ये देश सलोना है.

जनता करती त्राहि त्राहि, तब ये एसी में सोते हैं.
बाढ़ में बहती जनता हो तो ,ये होटल में होते हैं,
य़े नेता हैं देश के अपने,कान में रूई डाल सोते हैं .
वोट मांगना पड़े तो सबके पांव पकड़ के रोते हैं .
इनको अब तो सबक सिखाओ, होगा वही जो होना है.
ये देश सलोना है.

अगर चाहते हो दुनिया में देश का मान बढ़े यारों.
ऐसे नमक हरामों को जब मिलें तो बस जूते मारो.
अपनी मां धरती मां को तुम अपनी हिम्मत से उबारो.
दबे सताये लोगों को तुम अपनी मेहनत से उभारो.
जीने को कीड़ा जी जाता, जो तुमसे जिये वही जीना है.
ये देश सलोना है.  

मिलन चौरसिया. मऊ.

 

 

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------