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गोवर्धन यादव की कहान - महुआ के वृक्ष

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महुआ के वृक्षऊंचे-ऊंचे दरख्तों से उतरकर अंधियारा सड़कों-खेतों, खलिहानों में आकर पसरने लगा था। गांव के तीन चार आवारा लौंडे खटिया के दाएं-बाएं दीनदयाल के हाथ पांव दबा रहे थे। दीनदयाल ने वहीं से पसरे-पसरे आवाज लगाई। ‘अरे कल्लू... कहां मर गया रे- देखता नहीं अंधियारा घिर आया है। दिया-बत्ती क्या तेरा बाप करेगा?’ ‘आया हुजूर।’ कहता हुआ कल्लू दौड़ता-हांफता उसके पास आकर खड़ा हो गया। अनायास ही उसके हाथ जुड़ आए थे। ‘क्या कर रहा था रे... दिखता नहीं.... गैस बत्ती तो जला ले लपककर।’ ‘हुजूर, गायों को बांधकर चारा-पानी दे रहा था, बस थोड़ी सी देर हो गई। माफ करें अभी दिया बत्ती करता हूं।’ कल्लू ने पेट्रोमैक्स निकाला। हवा भरी, माचिस की तीली दिखाई, थोड़ी ही देर में पेट्रोमैक्स दूधिया रोशनी फेंकने लगा। दीनदयाल अभी भी चित्त पड़ा अपने थुलथुल शरीर को दबवा रहा था। गांव के बाहर, लाला दीनदयाल की दारू की भट्टी थी। शाम होते ही वहां अच्छी खासी चहल पहल हो उठती थी। गांव के सारे दरुवे इकट्ठे होने लगते। रूपलाल भी दारू-भट्ठी के पास, अपनी टिनमिनी जलाए आलू बोंडे, भजिया-समोसा, तेज मिर्च वाला चिऊड़ा थाली में सजाने लगता। लोग …

प्रेम मंगल की कविताएँ

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समय समय प्रतीक्षा करता नहीं किसी की, घड़ियां सदा चलती रहती हैं उसकी, वर्षा ,धूप ,सर्दी, गर्मी सब रूक जाती, समय की गति कभी नहीं रूक सकती। गम भी आते रहते,खुशियां भी आतीं रहतीं, अपना-अपना जोर दिखाकर सब चली जाती, समय की गति है, जो कभी भी नहीं है रूक सकती, गतिमान है वह ,जो तीव्र गति से चलती है रहती । सखा-मित्र आते और जाते हैं रहते, सुख-दुख तो छाया बनकर ही रहते, दिनरात कभी अपना वक्‍त नहीं बदलते वक्‍त के हाथों वक्‍त को ही छुपाये हैं रखते । एक-एक बूंद से है रीता धट भर जाता, इक पल ,मानव की जिन्‍दगी है बदल देता, मत करो गुमान इस मनुष्‍य योनी का भ्राता, हर सुख दुख देने वाला है केवल इक विधाता प्रभु-मिलन की चाहराहें इतनी आसान नहीं, कि जल्‍दी से उनको मैं लांघ सकूं, कंटकाकीर्ण देखती जब राह को हूं, कांटे निकालने बैठ जाती हूं कंटक जैसे ही दूर हटते, जमीन कीचड़ से लबालब हो जाती है, कीचड़ को दूर करने हेतु, पत्‍थर जमीन में बिछाने की जो कोशिश करती, चहुं ओर से विषैले जानवर आ जाते हैं। जानवर हटाने का प्रबन्‍ध जैसे करती, अन्‍य विपदा आकर घेर लेती मुझको है प्रभु मैं कैसे तेरे पास जाती, राहें इतनी आसान नहीं, कि ज…

सुरेन्‍द्र कुमार पटेल की लघुकथा - होनी

होनी ‘बाबूजी ,कुछ रुपयों की मदद कर दो । बहू को सात माह का गर्भ है । कसाई पीलिया उसके प्राण लेना चाहता है ।' मंगल ने अपने रइर्स रिश्‍तेदार से याचना की । ‘तुम्‍हारा बेटा कुछ इंतजाम नहीं किया ? ' रिश्‍तेदार ने सवाल किया । ‘इंतजाम में ही परदेश गया है । कुछ रुपए भेजा भी था । उसे क्‍या मालूम था ये आफत आ जाएगी ।' ‘तो उसके भेजे रुपए कहां चट कर दिए । ' ‘एक पाई नहीं उजाड़ा बाबूजी ।सब बहू के दवा -दारू में लग गए ।' ‘मुझसे हजार रुपए से अघिक की मदद न होगी। मेरे भी दिन इस समय अच्‍छे नहीं चल रहे हैं ।' ‘लेकिन मैं आपके पास बड़ी उम्‍मीद लेकर आया था । पाई -पाई चुका दूंगा बाबूजी । फिर मेरे जान-पहचान , नात रिश्‍तेदारों में आप -सा सबल कोइर् और नहीं है ।' रइर्स रिश्‍तेदार ने पांच-पांच सौ रुपए के दो नोट थमाए और चुपचाप अपने दूसरे कामों में लग गया ।यह उसका मौन उत्‍तर था जिसे मंगल ने भी समझ लिया था । अगले दो दिन बाद मंगल के घर दिवंगत के नाम पर इकटठी हुई साड़ियों में उसकी दी साड़ी सबसे मंहगी थी ।उसे मंगल को सौंपते हुए उस रईस रिश्‍तेदार ने मंगल को सीने से लगा लिया और कहा , ‘मंगल , होनी…

गोवर्धन यादव की लघुकथाएँ

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साक्षात्कार. अपनी असफ़लता का स्वाद चख चुके बाकी के प्रतियोगियों ने उसे घेर लिया.   वे सभी इस सफ़लता का राज जानना चाहते थे. आत्मविशवास से भरी उस युवती ने कहा=" मित्रों...मैंने अपनी छोटी सी जिन्दगी में कई कडे इम्तहान दिए है. मैं बहुत छोटी थी,तब मेरे पिता का साया मेरे सिर पर से उठ गया. माँ ने मेरी पढाई-लिखाई का जिम्मा उठाया. उसने कड़ी मेहनत की. घरॊं-घर जाकर लोगों के जूठे बर्तन साफ़ किए. घरों में पॊंछा लगाया. रात जाग-जाग-जाग कर कपड़ों की सिलाई की .इस तरह मेरी आगे की पढाई चल निकली.लेकिन बूढी हड्डियाँ कब तक साथ देतीं. एक दिन वह भी साथ छोड़ गयी. पढने की ललक और कुछ बन दिखाने की जिद के चलते, मुझे भी घरों में जाकर काम करना पडा. इन कठिन परिस्थियों में भी मेरा आत्मविश्वास नहीं डगमगाया. जिस साक्षात्कात की बात आप लोग कर रहे हैं, वह तो एक मामूली सा साक्षात्कार था. बोलते हुए उस युवती के चेहरे पर छाया तेज देखने लायक था. प्रतियोगिता.चित्रकला प्रतियोगिता चल रही थी .कई चित्रों में से दस चित्रों को अलग छांटकर रख दिया गया था. इन्हीं दस में से किसी एक चित्र को पुरस्कृत दिया जाना था. इन दस चित्रों में एक…

प्रमोद भार्गव का आलेख - सविता की मौत बनाम अंधविश्‍वासी आयरलैंड और चर्च से जुड़ा अंधविश्वास

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संदर्भ ः- भारतीय दंतचिकित्‍सक सविता की मौत से जुड़ा आयरलैंड का मामला।चर्च से जुड़ा अंधविश्‍वास प्रमोद भार्गवआमतौर से पश्‍चिमी देश दुनिया को मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते हैं। इन देशों में भी भारत, पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश उनके निशाने पर प्रमुखता से रहते हैं। भारत को तो वे मदारी और सपेरों का ही देश कहकर आत्‍ममुग्‍ध होते रहते हैं। वहीं पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश में इस्‍लामी मान्‍यताओं के चलते महिलाओं को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखने की निंदा करते हैं। अब आयरलैंड में भारतीय मूल की दंत चिकित्‍सक सविता हलप्‍पनवार की मौत ने तय कर दिया है कि चर्च के बाध्‍यकारी कानूनों का पालन करने वाला पश्‍चिमी समाज कितना पाखण्‍डी है ? सविता की कोख में 17 माह का सजीव गर्भ विकसित हो रहा था। पर गंभीर जटिलता के कारण गर्भपात की स्‍थिति निर्मित हो गई। 31 साल की सविता को गैलवे के अस्‍पताल में भर्ती कराया गया। चूंकि सविता खुद चिकित्‍सक थी, इसलिए जांच रिपोर्टों के आधार पर उसने जान लिया था कि गर्भपात नहीं कराया गया तो उसकी जान जोखिम में पड़ सकती है। इसलिए उसने खुद पति प्रवीण हलप्‍पनवार की सहमति से चिकित…

प्रेम मंगल की कविता - नारी

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नारीप्रेरणादायिनी, सह्रदया, कोमलता की प्रतीक हो तुम तेजस्‍विनी, महिमामयी, कर्तव्‍यनिष्‍ठावान हो तुम, सर्वरुपिणी, विश्‍वेश्‍वरी, अखिलेश्‍वरी भी हो तुम, दीनों का दुःख हरने वाली, मदर टेरेसा हो तुम । राष्‍ट्र निर्माता,शासन चालक,राष्‍ट्रपति औ प्रधानमंत्री भी हो तुम, अन्‍वेषणकर्ता,व्‍यवसायी औ समन्‍दर जाकर घ्‍वज को फहराने वाली, एवरेस्‍ट चोटी चढने वाली,मंगलग्रह तक जाने वाली भी हो तुम, मानवसंसाधन, विश्‍वविद्यालय औ संस्‍थायें चलाने वाली भी हो तुम फोटोग्राफी ,करने वाली मीडिया कर्मी ऊर्जा स्‍त्रोत भी हो तुम प्रेम, क्रोध औ पथ प्रदर्शक, सब रूपों में दिखने वाली हो तुम । प्रथम रूप में बेटी बनकर प्‍यार सभी का पाती हो तुम द्वितीय रूप में बहना बनकर सच्‍चा प्‍यार लुटाती हो तुम, तृतीय रूप में पत्‍नि बनकर धर-संसार चलाती हो तुम , चतुर्थ रूप मे मां बनकर सबको गले लगाती हो तुम । कौन क्षेत्र वंचित है तुमसे कहां नहीं पहुंच पाई हो तुम गरिमा बनकर अपनी मर्यादा में रहकर सबसे आगे बढ़ने वाली हो तुम दृढ़ निश्‍चय अटूट तुम्‍हारा कभी न धोखा खाने वाली हो तुम दुआ प्रेम की सबसे यह है नित नये स्‍त्रोतों से ऊॅचाइयों को छुओ त…

मोतीलाल की कविता - गर्भ से बाहर

मैं आंसू गिराती हूँ
एक सीलन भरी खोली में
और घुटती रहती हूँ
ठेहुने के बीच सर रखकर ।

मैं मशीन बन जाती हूँ
घर में रसोई की तरह
आफिस में कम्प्यूटर की तरह
बच्चों में नाखूनों की तरह
जो समय बचा पाती हूँ
पलंग के सिलवटो में गुम हो जाती है ।

न जाने कितने वर्ष गुजर गये
उन कविताओं को छुए हुए
होंठों पर के गीत
कहीं भीतर दम तोड़ चुका है
न जाने मन का सुग्गा कहाँ उड़ चला है ।

मैं लागातार बहती रहती हूँ
हस्ती की लय भोगते हुए इसी जमीन में
चेहरे के गरजते सागर में
कोई फूल नहीं उगा है
मैं बेचैन चहलकदमी करती
गमले बन जाने की पीड़ा में
उकड़ू बैठी उस आँच को निहारती हूँ
जहाँ समय की परिधी में कोई रस्सी
लताएं बनकर सामने नहीं आती हैं ।

कभी-कभी मुझे लगता है
इन आंसुओं के पार
इस सीलन से दूर
किसी पेड़ की छांह में जा बैठूं
और निहारुं उन लाल-नीली चिड़ियों को
जो गाते नहीं थकते मधुर गीत
फुनगी के पार फैले अनंत आकाश को
भर लूं अपनी बाहों में
और बन जाऊं एक चिड़िया
डैनों को खोल
उड़ता फिरु अनंत हवाओं में ।

* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

दौलत राव वाढ़ेकर का आलेख - बाज़ार की चपेट में लोक-हास्य

बाज़ार की चपेट में लोक-हास्य डॉ. दौलत राव वाढ़ेकरलोक जीवन में हास्य और  व्यंग्य की सृष्टि का एक बड़ा आधार आपसी नोकझोंक और हाजिर जवाबी रही है। इसमें से ज्यादातर वाचिक परंपरा या बोलचाल में व्यक्त हुआ है और इसलिए लिखित प्रमाण कम ही मिलते हैं। लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाजों, भांड़ों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। मृच्छकटिक नाटक के रचयिता राजा शूद्रक हैं । वह ब्राह्मणों की खास पहचान यज्ञोपवीत की उपयोगिता के बारे में ऐसा व्यंग्य करते हैं जिसे सुन कर हंसी आती है । वह कहता है कि यज्ञोपवीत कसम खाने के काम आता है । अगर चोरी करना हो तो उसके सहारे दीवार लांघी जा सकती है । व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हमें हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं–‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तन…

शिखर जैन का आलेख - रामविलास शर्मा : मूल्यांकन की कसौटी

डॉ.रामविलास शर्मा : मूल्यांकन की कसौटी
शिखर जैन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ. रामविलास शर्मा ही एक ऐसे आलोचक के रूप में स्थापित होते हैं, जो भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं। उनकी आलोचना प्रक्रिया में केवल साहित्य ही नहीं होता, बल्कि वे समाज, अर्थ, राजनीति, इतिहास को एक साथ लेकर साहित्य का मूल्यांकन करते हैं। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल को जाँचने के लिए नहीं किया है, बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह होती है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है। इतिहास की समस्याओं से जूझना मानो उनकी पहली प्रतिज्ञा हो। वे भारतीय इतिहास की हर समस्या का निदान खोजने में जुटे रहे। उन्होंने जब यह कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं, तब इसका विरोध हुआ था। उन्होंने कहा कि आर्य पश्चिम एशिया या किसी दूसरे स्थान से भारत में नहीं आए हैं, बल्कि सच यह है कि वे भारत से पश्चिम एशिया की ओर गए हैं। वे लिखते हैं - ‘‘दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व बड़े-बड़े जन अभियानों की सहस्त्राब्दी है। इसी दौरान भारतीय आर्यों के दल इराक से लेकर तुर्की तक…

राकेश कुमार मालवीय की कविता - हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी!

हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी!
सदियों से मैं मजदूर हूं
चलाता रहा हूं चरखा
कभी खोदता रहा हूं गडढा
बनाता रहा हूं इमारत  बहाता रहा हूं पसीना
सदियों से मेरे पसीने पर
मेरे खून पर
तुम करते रहे हो मौज
मैं देखता हूं, समझता हूं
पर खामोशी से चलाता हूं कुल्हाड़ी
मुझे पता है मेरे बिना नहीं अस्तित्व तुम्हारा
जिस दिन चाहूंगा हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी
लेकिन खामोशी में ही मेरी है खुशी
पसीना बहाए बिना मुझे नींद नहीं आती।
राकेश कुमार मालवीय--
Rakesh Kumar Malviya
Journalist

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श्याम गुप्त की विज्ञान कथा - भुज्यु-राज की रक्षा

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कहानी –  भुज्यु-राज की सागर में डूबने से रक्षा ... ( अश्विनीकुमार बंधुओं का एक और सफल आपात-चिकित्सकीय अभियान )
                                                           (डॉ. श्याम गुप्त)
श्रीकांत जी घूमते हुए महेश जी के घर पहुंचे तो वे लिखने में व्यस्त थे। क्या हो रहा है महेश जी ? श्रीकांत जी ने पूछा तो महेश जी ने बताया, ‘ एक कथा लिखी है, लो पढ़ो’,  महेश जी ने श्रीमती जी को- ‘अरे भई, चाय बनाइये, श्रीकांत जी आये हैं’- आवाज लगाते हुए कहा। श्रीकांत जी पढने लगे
विश्व-शासन व्यवस्था के अधिपति श्रीमन्नारायण की केन्द्रीय राजधानी के “क्षीर-सागर” स्थित महा-मुख्यालय से स्वर्गाधिपति इंद्र के माध्यम से विश्व-चिकित्सा महामुख्यालय के प्रभारी अश्विनी-बंधुओं को आकाशवाणी द्वारा एक आपातकालीन सन्देश प्राप्त हुआ कि श्रीमन्नारायण के सुदूर-उत्तरवर्ती महासागर स्थित मित्र-देश “नार-वेश” के भुज्यु-राज को सागर में डूबने से बचाना है। अश्विनी-बंधु अपने तीव्रगति से आकाशगामी त्रिकोणीय रथ द्वारा तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हो गए।
भुज्यु-राज पृथ्वी के सुदूर उत्तरवर्ती महासागर स्थित तटीय राज्य ‘नारवेश’ के तटीय अन्न-उत्पाद…

कोणिक दोषी की कविता - आतंकवाद की सालगिरह

आती है आतंकवाद की सलगिरह, शहीदों की मृत्यु जयन्ती आती है - जब नवम्बर की छ्ब्बीसवीं तारीख आती है / त्राहिमाम की आवाज से गूंज उठ था भारतवर्ष / बम्ब के विस्फोटों ने हिला दी थी सत्य और अहिंसा की दीवारें / भारत माँ ने न जाने खोई थी कितनी संतानें / द्रवित हो जाता है दिल , आँखों से नीर बहता है - जब छब्बीस नवम्बर का वो दृश्य यादों में तैरता है / ताज होटल ,नरीमन हाऊस ,पर्यटन स्थल नहीं श्मशान बन गए थे / यहाँ पर आतंकवाद के नए पताके गढ़ गए थे / मिटा दिया हमने कसाब को/ कसाबियत नहीं मिटा पाए / अब भी घूम रहे हैं कई कसाब आजाद उन्हें हम अब तक सजा नहीं दे पाए / सोचता हूँ- क्या ये सिर्फ छब्बीस नवम्बर को ही होता है ? अरे! ये तो वो हर उस दिन होता है जब भारत का कोई बच्चा भूखा सोता है / आज गरीबी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ने भारत माँ को रुलाया है / फिर क्यू हमारे उसूलों को हमने अब तक सुलाया है ? वो हर दिन जब हमारा रूपया डॉलर के आगे छोटा पड़ जाता है, वो हर दिन जब कोई किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है , जब जला दी जाती है कोई दुल्हन दहेज़ की आग में , गोटालों की बम्बारी से जब हमारी नैतिकत…

हरीन्द्र दवे का धारावाहिक उपन्यास : वसीयत - 8 वीं किश्त

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1ली किश्त | 2री किश्त | 3री किश्त | 4थी किश्त | 5वीं किश्त | 6वीं किश्त | 7वीं किश्तवसीयत – ८ : उपन्यास: हरीन्द्र दवे – भाषांतर: हर्षद दवे ‘आप का ही नाम मानसिंह है, ठीक है?’ इन्स्पेक्टर न्यालचंद ने पिछले तीन दिन से पुलिस की हिरासत में रखे गए मुलजिम की पूछताछ शुरू की‘जी हाँ, साहब.’ जवाब देनेवाला युवक मानसिंह चतुर था. उस के चेहरे पर कुछ थकान थी. पुलिस कस्टडी में उस पर शायद बलप्रयोग हुआ हो ऐसा लगता था. परन्तु उस के कसकर बंद किये गए होंठों पर दृढ़ता थी और आँखों में चमक थी.‘आप श्रीमती मोहिनी पंडित को जानते थे?’ ‘पिछले तीन दिन में यह प्रश्न मुझ से बीसवीं बार पूछा गया है. आप पुलिस के आदमी एक ही सवाल बार बार पूछकर सामने वाले आदमी को क्यों थका देते हो?’ ‘कभी थकान में सच बोल दें इसलिए,’ इन्स्पेक्टर ने हंसकर कहा: ‘इसलिए इक्कीसवीं बार आप इस प्रश्न का उत्तर दीजिए ऐसी मेरी इच्छा है.’ ‘इन्स्पेक्टर साहब, आप आपके साथियों से कुछ अलग से दीखते है, इसलिए आप को अधिक मात्रा में सत्य बताना पसंद करूँगा,’ मानसिंह ने गंभीरतापूर्वक कहा. ‘मैं सुन रहा हूँ.’ ‘पहली बार मुझ से यह सवाल किया गया तब मैं इस नाम से बि…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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