शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

कुबेर की छत्तीसगढ़ी लोक कथाएं

लोकथाएँ

कुकरी अउ चिंया

एक ठन कुकरी के चार ठन चिंया रहंय। कुकरी ह रोज अपन चिंया मन ल संगे संग फिराय अउ चारा चराय। एक दिप कुकरी ह चिंया मन ल कहिथे - ''चलो, चरे बर आज भांठा कोती जाबोन।''

चिंया मन कहिथे - ''भांठा म का मिलही? भांटा बारी म जाबोन, उहाँ कीरा-मकोरा गजब मिलही।''

लइका मन के जिदियाही म कुकरी के एको नइ चलिस। चरे बर माई-पिला भांटा बारी गिन। गोड़ म खोधर-खोधर के सब झन चरत रहंय। एक ठन भांटा पेड़ म बड़े जबर गोलिंदा भांटा फरे रहय, कुकरी ह वोकरे खाल्‍हे म बिधुन हो के चरत रहय। भांटा पेड़ ह जोरंग गे अउ कुकरी ह गोलेंदा भांटा म चपका के मर गे।

चिंया मन गजब चींव-चींव करिन। किहिन - ''हमर पेलियाही म हमर दाई के परान चल दिस।''

000

चिंया अउ सांप

जंगल म बर रुख के खोड़रा म तोता रहय। ़़एक दिन वो ह गार पारिस। गार ल रोज सेवय। एक दिन वोमा ले ननाचुक चिंया निकलिस। तोता ह दाना लाय बर जंगल कोती गे रहय। एक ठन सांप ह चिंया ल देख डरिस। चिंया तीर आ के कहिथे - ''मोला गजब भूख लागे हे, मंय ह तोला खाहूँ।''

चिंया ह कहिथे - ''अभी तो मंय ह नानचुक हंव; तोर पेट नइ भरही। बड़े हो जाहूँ, तब पेट भर खा लेबे।''

सांप ह चिंया के बात ल मान गे। रोज वो ह चिंया तीर आय अउ खाय बर मुँहू ल फारे। चिंया ह रोजे वोला विहिच बात ल कहय - ''अभी तो मंय ह नानचुक हंव; तोर पेट नइ भरही। बड़े हो जाहूँ, तब पेट भर खा लेबे।''

धीरे-धीरे चिंया के डेना मन उड़े के लाइक हो गे।

एक दिन सांप ह कहिथे - ''अब तो तंय बड़े हो गे हस। आज तोला खा के रहूँ।''

चिंया ह किहिस - ''खा ले।'' अउ फुर्र ले उड़ गे।

सांप ह देखते रहिगे।

000

 

धरम-नियाव

एक गाँव म दू भाई रहंय। बड़े ह पक्‍का देंहचोर (आलसी), बेईमान अउ एक नंबर के धोखेबाज रहय। कभू खेत नइ जाय, छोटे के कमाई म फुटानी मारय, फुदरय अउ गली-गली मेंछराय। छोटे ह रात-दिन जांगर-टोर कमाय।

खेत म गहूँ के बिरता ह सोना कस पिंवराय रहय। कनिहा भर-भर के पेड़ म खुम-खुम ले बाली भराय रहय। देख के बड़े के नियत ह डोल गे।

बड़ मयारुक भाई कस छोटे ल पुचकार के, दुलार के कहिथे - ''भाई! मंय ह कतका दिन ले तोर कमाई ल खा-खा के मजा उड़ाहूँ? बँटवारा हो जातेन, अपन ऊपर आतिस त महूँ ह कमाय बर सीख जातेंव।''

गरुवा ताय छोटे ह, बड़े भाई के थाप म आ गे।

बड़े ह बाँटे के शुरू करिस। किहिस - ''भाई! तंय आवस सबर दिन के कमइया, सबो खेत ल तंय रख ले; बिरता-बिरवाँ मन ह मोर होही। टेंड़ा अउ कुआँ ह तोर ए, पानी ह मोर ए। खेत रखवार ये कुकुर के एक ठन घउवाहा गोड़ ह तोर ए, तीनों बने गोड़ मन मोर ए।''

छोटे ह भल ला भल जानिस, बड़े के बात ल कभू नइ काँटय, राजी हो गे।

रात म छोटे ह कुकुर संग खेत राखे बर गे रहय। भुर्री बार के तापत रहंय। छोटे ह कुकुर के घउवहा गोड़ म दवा लगा के फरिया म बांध दे रहय, विही फरिया म आगी धर लिस। कुकुर ह कुईं-कुईं करत गहूँ के खेत म खुसर गे। रनाय गहूँ, भुर-भुर ले बर गे।

बिहाने बड़े ह बइसका सकेल डरिस। पंच मन ल भाई बँटवारा के सबो बात ल अउ गहूँ खेत के घटना ल बता के अर्जी-बिनती करिस, किहिस - ''ददा हो! मोर छोटे भाई ल मंय ह बने कहत रेहेंव, फेर वो ह पक्‍का बेइमान निकलिस। मोर गहूँ के होरा भूँज दिस। मोर नियाव ल कर देव।''

पंच मन छोटे के बात ल घला सुनिन। बड़े के चालबाजी ल समझ गिन। मुखिया ह फैसला सुनाइस - ''भई हो! ककरो खेत के बोंता-बिरता म आगी लग जाना किसान के मुड़ी म बजरा गिरे बरोबर होथे। फेर एमा छोटे के कोनो गलती नइ दिखय। कुकुर ह जउन गोड़ मन म रेंग के खेत म खुसरिस, वो गोड़ मन तो बड़े के आवंय। गलती उँखरे मन के आवय।''

फैसला सुन के बड़े के आँखी ह उघर गे। अब छोटे भाई संग वहू ह मेहनत करे लगिस।

000

 

कुबेर

व्‍याख्‍याता,

शास. उच्‍च. माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी,

राजनांदगँव (छ.ग.)

मो. - 9407685557

लेख्‍क-परिचय

कथाकार - कुबेर

जन्‍मतिथि - 16 जून 1956

प्रकाशित कृतियाँ

1 - भूखमापी यंत्र (कविता संग्रह) 2003

2 - उजाले की नीयत (कहानी संग्रह) 2009

3 - भोलापुर के कहानी (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह) 2010

4 - कहा नहीं (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह) 2011

प्रकाशन की प्रक्रिया में

1 - माइक्रो कविता और दसवाँ रस (व्‍यंग्‍य संग्रह)

2 - और कितने सबूत चाहिये (कविता संग्रह)

संपादित कृतियाँ

1 - साकेत साहित्‍य परिषद्‌ की स्‍मारिका 2006, 2007, 2008, 2009, 2010

2 - शासकीय उच्‍चतर माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी की पत्रिका 'नव-बिहान' 2010, 2011

पता

ग्राम - भोड़िया, पो. - सिंघोला, जिला - राजनांदगाँव (छ.ग.)

संप्रति

व्‍याख्‍याता,

शास. उच्‍च. माध्‍य. शाला कन्‍हारपुरी,राजनांदगँव (छ.ग.)

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------