प्रेम मंगल की कविता - नारी

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नारी

प्रेरणादायिनी, सह्रदया, कोमलता की प्रतीक हो तुम

तेजस्‍विनी, महिमामयी, कर्तव्‍यनिष्‍ठावान हो तुम,

सर्वरुपिणी, विश्‍वेश्‍वरी, अखिलेश्‍वरी भी हो तुम,

दीनों का दुःख हरने वाली, मदर टेरेसा हो तुम ।

 

राष्‍ट्र निर्माता,शासन चालक,राष्‍ट्रपति औ प्रधानमंत्री भी हो तुम,

अन्‍वेषणकर्ता,व्‍यवसायी औ समन्‍दर जाकर घ्‍वज को फहराने वाली,

एवरेस्‍ट चोटी चढने वाली,मंगलग्रह तक जाने वाली भी हो तुम,

मानवसंसाधन, विश्‍वविद्यालय औ संस्‍थायें चलाने वाली भी हो तुम

फोटोग्राफी ,करने वाली मीडिया कर्मी ऊर्जा स्‍त्रोत भी हो तुम

प्रेम, क्रोध औ पथ प्रदर्शक, सब रूपों में दिखने वाली हो तुम ।

 

प्रथम रूप में बेटी बनकर प्‍यार सभी का पाती हो तुम

द्वितीय रूप में बहना बनकर सच्‍चा प्‍यार लुटाती हो तुम,

तृतीय रूप में पत्‍नि बनकर धर-संसार चलाती हो तुम ,

चतुर्थ रूप मे मां बनकर सबको गले लगाती हो तुम ।

 

कौन क्षेत्र वंचित है तुमसे कहां नहीं पहुंच पाई हो तुम

गरिमा बनकर अपनी मर्यादा में रहकर सबसे आगे बढ़ने वाली हो तुम

दृढ़ निश्‍चय अटूट तुम्‍हारा कभी न धोखा खाने वाली हो तुम

दुआ प्रेम की सबसे यह है नित नये स्‍त्रोतों से ऊॅचाइयों को छुओ तुम

 

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प्रेम मंगल

कार्यालय अघीक्षक

स्‍वामी विवेकानन्‍द इंजीनियरिंग कॉलेज

इन्‍दौर म...․प्र․

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