शनिवार, 17 नवंबर 2012

अशोक गुप्ता की कहानी - राग कुबेला

दीवार घड़ी सुबह चार बज कर सत्रह मिनट पर बंद हो गई  

शाम पाँच पैंतीस पर तो जब मैं कोकिला के साथ निकली थी तब वह घड़ी बाकायदा चल रही थी और मेरी हाथ घड़ी से हम कदम थी। मुझे एकदम ठीक से याद है मधुप के साथ बात करते करते कोकिला ने यकायक चौंक कर घड़ी देखी थी और वह उठ खड़ी हुई थी। मैंने उसका चौंकना देखा था और मेरा ध्‍यान भी घड़ी की तरफ गया था। घड़ी तब चल रही थी... पाँच बज कर तैंतीस मिनट... कोकिला पाँच पचपन की शटल पकड़ने भाग निकली थी। मधुप को लेने उसका पति आता है, करीब छह बजे... तब तक वह मुझे रोक कर रखती है

‘ज़रा रुक न यार, मुकुन्‍द बस अभी आता ही होगा...'

मैं अक्‍सर रुक जाती हूँ। कोकिला को पाँच पचपन की शटल छोड़ना कतई गवारा नहीं है.. उसके बाद सत्ताइस मिनट कौन लटका रहे? आगे पच्‍चीस मिनट का रास्‍ता अकेला कटे सो अलग...

सेन्‍टर से मेरे कमरे तक बस दस मिनट का पैदल का रास्‍ता है. मेरी रूम मेट को आते आते साढ़े छह से ऊपर ही हो जाता है। उसे हरी ताज़ा सब्‍ज़ी की सनक जो है। मेरा तो एक बार का आया दूध ही तीन दिन चलता है।

कोकिला गई। उसे अपनी मनचाही शटल मिल गई होगी। मधुप का मोबाइल बजा.

‘.. आज मुकुन्‍द जल्‍दी आ गये...' वह भागी और हाथ की मैगज़ीन मेज़ पर ही छोड़ गई। मैंने मैगज़ीन उठाई, कम्‍प्‍यूटर बंद किया, कमरा लॉक किया और बाहर चल दी। पाँच बज कर उन्‍सठ मिनट. कमरे की दीवार घड़ी तब भी चल रही थी।

कोकिला का घड़ी देख कर चौंक पड़ना मेरे दिमाग में कील की तरह ठुक गया था। एक खास तरह का उतावलापन उस समय भी उसके चौंक पड़ने में दिखा था मुझे, जो अक्‍सर दिखता है। कोकिला इस उतावलेपन के बावजूद एक गंभीर

और संयत महिला है। नहीं, खडूस किस्‍म की सीरियस औरत नहीं है कोकिला... बस, गंभीर है। एक नपा तुला सा खुलापन है उसके व्‍यवहार में... लेकिन उसका वह चौंकना?

कमरे पर आ कर बहुत से ऐसे काम होते हैं जो घेर लेते हैं। कई कुछ ऐसे भी हैं जिन्‍हें मेरी रूम मेट फालतू ठहराती है, लेकिन मैं बिना किसी की परवाह किये उन्‍हें मन से पूरा करती हूँ। फिर रात तो अपनी ही होती है। जब तक मेरी रूम मेट एक नींद सो चुकती है, मैं बिस्‍तर पर, पीछे तकिया लगाए, दीवार से टिकी बैठी रहती हूँ और अपनी ही दुनिया में खोई रहती हूँ। एक अजीब सा सुख मिलता है यूँ अकारण अनावश्‍यक खो जाने में। मैं अक्‍सर देर रात तक यह सुख लेती रहती हूँ।

सेंटर की घड़ी सुबह चार बज कर सत्रह मिनट पर बंद हो गई थी। मैंने पहले पहुँच कर उसके सेल बदलवा कर उसे ज़िंदा किया था। शालिनी, मधुप, कोकिला और मिसेज़ पद्‌मनाभन के आते तक तो घड़ी भी अपना बंद होना भूल चुकी थी। लेकिन मेरे मन में वह बंद घड़ी अभी तक ठहरी हुई थी, और कोकिला का घड़ी देख कर यकायक चौंक पड़ना... शाम पाँच बज कर तैंतीस मिनट...

मेरी रूम मेट सो गई है। मैं सुख सागर में हूँ. सागर में ज्‍वार की उत्तंग दशा है। कोकिला का चौंकना और भोर सुबह में घड़ी का बंद हो जाना।

क्‍या क्‍या हुआ मेरे साथ भोर के ऐसे ही समय में... प्रणव ने अक्‍सर जगाया है मुझे इसी बेला में। रात तक थक हार कर टूट जाने के बाद मैं और प्रणव एक दूसरे को कठपुतली से लगते रहे हैं। प्रणव मुझे भोर में जगा कर चाँद की सतह पर सूर्योदय रचाते हैं। उसके पहले बाऊ जी इसी बेला घूमने जाते समय भइया को जगा जाते थे कि वह बैठ कर पढ़े। भईया दरवाज़ा बंद कर के फिर सो जाता था और मैं उठ कर पढ़ने बैठ जाती थी कि बाऊ जी के लौटने के कुछ पहले भईया को जगा सकूँ, वरना सुबह सुबह का क्‍लेश कौन झेलेगा... भइया ने बताया था कि भोर की इसी बेला में बाऊ जी ने प्राण तजे थे। उसके पहले के चार दिन से भइया ने पलक भी नहीं झपकी थी। माँ ने यह प्रसंग कई बार बताया था... माँ

मैं पीछे तकिया लगाये बिस्‍तर पर दीवार से टिकी बैठी हूँ। सेंटर की बंद घड़ी, सुबह चार बज कर...

ऐसे ही एकदम भोर में एक बार जयंत ने मेरा मोबाइल बजाया था। जयंत मेरी बेटी का मँगेतर है।

“बैंगलोर से निकल रहा हूँ मम्‍मी। मुंबई पहुँचूँगा और शाम ढाई बजे की फ्‍लाइट से भोपाल... आपके लिए एक चंदन के गणेष हैं, मम्‍मी और सुदीप्‍ता के लिये साड़ी है... कलर, शेड मत पूछियेगा मम्‍मी, प्‍लीज़...

सुबह चार बज कर सत्राह मिनट पर जीवन की एक अपनी जैसी गति है, अबूझ, लेकिन बेचैनी नहीं है। बेचैनी है शाम पाँच बज कर तैंतीस मिनट पर कोकिला का चौंक पड़ना। उठ खड़ा होना और भागना, जैसे वह जीवन की अंतिम शटल हो...

कोकिला की इस पर्त को ज़रूर खोलना है... इसके बिना बेचैनी से निजात कहाँ? क्‍या किसी दिन चल पडूँ कोकिला के साथ उसकी शटल में?

मैं तो कोकिला के साथ उसकी शटल में नहीं जा सकी, लेकिन कुछ हुआ जो कोकिला ने अपना वृतांत मुझसे खुद साझा किया। मुझे सचमुच हैरत है कि बस तीन हफ्‍तों के दौरान साथ की लड़कियों का इतना विश्वास मैने जीत लिया कि वह सब अपने सुख-दुख मुझसे कह पाने लगीं, वरना कहाँ कोई ऐसे दायरे में अपना मन खोलता है जिसे बस चार महीनों की उम्र हासिल हो। मैं भोपाल से, शालिनी बनारस से और मिसेज पद्‌मनाभन हैदराबाद से चार महीनों की विशेष ट्रेनिंग पर यहाँ आ कर इस सेंटर से जुड़े हैं। कोकिला और मधुप भी इस प्रोजेक्‍ट का हिस्‍सा हैं और इसी शहर से हैं। मधुप के घर इस दौरान ही हमारी दो पार्टियाँ हो चुकी हैं। उसका घर बड़ा है और परिवार में खुलापन है... और कोकिला?

हम सब में कोकिला ही सबसे कम उम्र की है, करीब सैंतीस की। उसके एक बेटा है जो दिमागी तौर पर बीमार है, उसकी उमर करीब बारह साल है और इधर उधर उसका इलाज चल रहा है। पति का अॉटो पाट्‌र्स का बिज़नेस है जो ठीक ठाक चलता दिखने के बावजूद कोकिला की समझ में अक्‍सर नहीं आता. उसके पति की पहली पत्‍नी ने उसकी रोज़ रोज़ की मारपीट और गाली गलौज के चलते आत्‍महत्‍या कर ली। तब यह महाशय करीब करीब फँसते फँसते बचे। गनीमत कहो उस औरत ने मरने से पहले कोई कागज़-चिठ्‌ठी नहीं छोड़ी वरना मुहल्‍ले की खुलती, बंद होती खिड़कियों के पास कम मसाला नहीं था। सत्राह महीने सबर करके उसने कोकिला से ब्‍याह किया। बकौल कोकिला, वह आदमी इतना खूँख्‍वार तो नहीं निकला जितना उसने अपनी माँ और भाभी से जाना था लेकिन कुत्‍ते की पूँछ भला सीधी होती है कभी?

यह कोकिला की पृष्‍ठभूमि थी जो बतानी इसलिये ज़रूरी थी कि इस सेंटर की परम्‍परा के अनुसार लोकल लड़कियों के घर बाहर से आने वालियों के अपने पक्‍के ठिकाने माने जाते हैं। अब देखो, महीने भर में ही मधुप ने दो बार सबको बुला लिया और उसकी बेटी को सारी मौसियों की पक्‍की पहचान हो गई। उसके बावजूद कोकिला ने अपना चित्त सिर्फ मुझसे खोला, जो उसका वृतांत रिस रिस कर ही सही, तीन दिन में मुझ तक पहुँच गया।

मुझसे कह बाँट चुकने के बाद कोकिला बहुत सहज हो गई, लेकिन मैं...?

पाँच पचपन की शटल पर कोकिला के चढ़ने के अगले स्‍टेशन से एक आदमी चढ़ता है। सिगार उसके हाथ में होता है। चमड़े का एक बेतरह भरा हुआ ब्राउन बैग उसके पास है। साठ के ऊपर की उमर, आँख पर फोटोक्रोमिक चश्‍मा, बाल सारे सफेद लेकिन सिर से पैर तक एक खास किस्‍म की चुस्‍ती... अगले स्‍टेशन तक वह आदमी खड़ा रहता है। उसके बाद मूँछ के ऊपर तिल वाला आदमी उठता है, इस आदमी को आइये कह कर सीट की ओर इशारा कर के गेट की ओर बढ़ जाता है। यह आदमी उस खाली हुई सीट पर बैठ जाता है, सिगार को फिर सुलगा कर ज़िंदा करता है और बैग से किताब निकाल कर उस पर ध्‍यान लगा देता है। इस मौसम में शाम के छह बजे के बाद पढ़ने के लिये उजाला कम पड़ने लगता है, फिर भी...

पहला दिन वह था जब कोकिला ने वह शटल भाग कर पकड़ी थी और इस डिब्‍बे में आ गई थी। अपने क्रम से उस आदमी ने सीट पर बैठने के बाद सिगार सुलगाया था और किताब निकालने की तैयारी में लग गया था।

‘इसे बंद कीजिये,... प्‍लीज़'

कोकिला का वाक्‍य पूरा होने के पहले ही उस आदमी ने हाथ का सिगार बाहर फेंक दिया, ‘नो प्रॉब्‍लम...' और किताब में खो गया था।

उस दिन तक कोकिला को सिगार के बारे में कुछ नहीं पता था। फिर एक उसने जाना कि सिगार एक महँगी चीज़ है, जल्‍दी बुझ जाता है और उसे बार बार जला कर पिया जा सकता है। कोकिला यह सब बातें सुन कर भूल गई। फिर उसे एक दिन वह आदमी शटल में दिखा। कोकिला के आने के बाद अगले स्‍टेशन से वह चढ़ा और आकर एक खाली सीट पर बैठ गया। फिर वह कोकिला के सामने था। हाथ में वैसे ही बेतरह ठुँसा हुआ बैग था लेकिन इस बार सिगार नहीं था। एक और बात कोकिला ने नोट की, उस आदमी की चाल में ज़रा लंगड़ापन था।

एक पल उस आदमी की नज़र कोकिला की ओर घूमी और उसने कोकिला को अपनी ओर देखते पाया। वह आदमी ज़रा सा मुस्‍काया, जैसे उस दिन की स्‍मृति को साक्ष्‍य दे रहा हो... कोकिला सकपकाई, तो भी उसने तत्‍काल बुद्धि से काम लिया।

‘आपके पैर में कुछ तकलीफ लगती है... आराम से बैठ जाइये।'

‘ तकलीफ? नहीं। सिर्फ एक टाँग दूसरी से ज़रा छोटी है। '

‘ क्‍या?'

‘हाँ... एक कार एक्‍सीडेंट ने मेहरबानी कर के जान के बदले सिर्फ एक टाँग का डेढ़ इंच टुकड़ा ले कर छोड़ दिया। खैर, अब तो बीस बरस हुए, चल लेता हूँ।'

वह आदमी हँसा। चश्‍मा उतार कर उसने जेब में रखे रूमाल से पोंछा और बैग से निकाल कर किताब पढ़ने लगा। कुछ गिनती के पल उस आदमी की आँख से चश्‍मा हटा और इतने ही भर में कोकिला उसमें न क्‍या झाँक गई।

उसके बाद बार बार वह आदमी किताब से नज़र हटा कर कोकिला की ओर देख लेता रहा। कोकिला इस बीच बस खिड़की के बाहर झाँकती रही। फिर पता नहीं क्‍या हुआ उस आदमी ने किताब बंद करके किनारे रख दी। कोकिला ने कनखियों के किताब देखने की कोशिश की। कालाहाँड़ी की भुखमरी पर एक उपन्‍यास था। पल भर को कोकिला की नज़र उस पर टिकी तो उस आदमी ने वह किताब उठा कर कोकिला को पकड़ा दी।

‘कालाहाँडी का नाम सुना है आपने?'

कोकिला हँसी, ‘मैं सोशल साइंस की स्‍कॉलर हूँ सर...'

‘ओह, तब तो आप इस किताब को ज़रूर पढ़िये। कल, परसों मुझसे ले लीजियेगा।'

‘कल परसों...?'

‘हाँ... मैं इसका अंग्रेजी में अनुवाद कर रहा हूँ, आपको दूसरी कॉपी ला कर दूँगा... अभी इसे तीसरी बार पढ़ रहा हूँ हालाँकि यह दर्दनाक है।'

कोकिला चुप रही।

‘आप सोशल स्‍कॉलर हैं तब तो समाज के दर्द से आपका वास्‍ता होगा ही...'

‘हाँ... बाहर तो बाहर, दर्द तो घर के भीतर तक समाज बन कर घर चुका है।'

‘कोई हैरत नहीं। जब तक दर्द घर में घुस कर दोस्‍ती का हाथ नहीं बढ़ाता तब तक भला कौन उस से मेल-जोल बढ़ाने का सिर दर्द लेता है... लेकिन जब दोस्‍ती हो ही जाती है तब कहीं भी उसे पकड़ कर पास बैठाया जा सकता है...'

कोकिला चौंकी। किताब पढ़ने से ज़्‍यादा उतावलापन उसे इस आदमी को पढ़ने का होने लगा... लेकिन कोकिला को तो अगले ही स्‍टेशन पर उतरना था।

फिर कोकिला रोज़ शाम को इसी शटल से जाने लगी। उसका डिब्‍बा खोज कर वह आदमी भी कोकिला के साथ जाने लगा। बे सिलसिला बातें अपना सिलसिला बनाने लगीं। एक दिन कोकिला की शटल स्‍टेशन पर लगी लेकिन वह आदमी उसे नज़र नहीं आया। फिर उसने दूर से उस आदमी को स्‍टेशन में दाखिल होते देखा। किसी भी चाल से वह आदमी अब शटल नहीं पकड़ सकता था, इसलिये उसकी चाल में उतावलापन नहीं था लेकिन चेहरा एक गहरी उद्विग्‍नता की इबारत से सराबोर था। और बस, कोकिला ने उसे पढ़ा और शटल से उतर गई।

शटल हिली। शटल तेज़ हुई और सर्र से प्‍लेटफार्म पार कर गई।

कोकिला जड़ बनी वहीं की वहीं खड़ी रह गई। कुछ देर में उस आदमी की नज़र कोकिला पर पड़ी। उसके चेहरे का ज्‍वार एक रंग छोड़ कर दूसरे से भीगने लगा। अपनी सहज गति से चल कर वह आदमी कोकिला के पास आ गया, ‘ओह स्‍कॉलर, यह तुमने क्‍या किया?'

‘... अनुवाद कहाँ तक पहुँचा... और मेरा वह उपन्‍यास कहाँ है, नहीं देना है क्‍या?'

दोनों के पास अपने अपने संवाद हैं। दोनों तक एक दूसरे की आवाज़ पहुँचते पहुँचते सिर्फ गूँज रह जाती है। दोनों के पास अपने प्रश्‍न हैं और दूसरे के प्रश्‍न उन तक नहीं पहुँचते। कोकिला अपना प्रश्‍न फेंक कर चाय वाले की ओर बढ़ लेती है।

चाय पीते पीते कोकिला चौंक कर पूछती है, ‘अरे, यह हाथ पर टेप क्‍या चिपका है..., कोई चोट लगी है क्‍या?'

‘अरे नहीं, आज सुबह ब्‍लड दिया था..., वही...।'

‘ब्‍लड... किसे... क्‍यों?'

‘मेरा एक प्रकाशक है... उसका अॉपरेशन हुआ है।'

‘तो आपने क्‍यों दिया?'

वह आदमी हँसा।

‘मैं लेखक हूँ और प्रकाशक तो पलता ही लेखकों के खून पर है।' वह आदमी फिर हँसा।

‘मज़ाक नहीं, खून दिया... इस एज में?'

‘एज... इसमें एज का सवाल कहाँ से आ गया? अब तुम ही अपनी शटल छोड़ कर नीचे उतर आइर्ं...। इस एज में। कहो, हाँ या नहीं।'

कोकिला चुप रही।

‘स्‍कॉलर, एज का सवाल सही सवाल नहीं है... सही सवाल यह है कि गिलास कितना भरा है और किस झरने के नीचे रखा है। छेद तो बहरहाल हर गिलास में है ही...'

कोकिला चुप रही।

‘बुरा मान गईं?'

‘नहीं'

‘तो फिर?'

‘रुको, पकौडे़ लाती हूँ, चाय के साथ अच्‍छे लगेंगे। हर बार जब गाड़ी इधर से गुज़रती है, पकौडे़ देखकर बहुत मन करता है कि कभी रुक कर खाऊँ, लेकिन आज तक कभी नहीं हुआ... आज... '

उस आदमी का चेहरा फुहार से जैसे भीग आया। कोकिला जब तक पकौडे़ ले कर लौटी वह आदमी एक खाली बेंच पर बैठ गया।

अगली की अगली शटल गुज़रने तक दोनों लोगों ने पकौडे़ खाये। चाय पी. कोकिला ने उस आदमी को हड़काया, ‘अब कभी ब्‍लड मत देना।' उस आदमी ने कोकिला को उसके बेटे के बारे मेें बात करते हुए एक कन्‍सल्‍टेंट का पता ठिकाना दिया, और साथ ही यह बताया कि अगली शटल तीन मिनट में आने वाली है... ‘क्‍या इरादा है?'

‘बाप रे...मेरे हस्‍बेन्‍ड मुझे कतल कर देंगे।'

कोकिला अपनी बात पर चौंकती है. उसका यह वाक्‍य इस बात की चुगली करता है कि वह उस आदमी के रोके रुकी हुई है... लेकिन क्‍या यह सच है...?

वह आदमी कोकिला का चौंकना देखता है। अपना चश्‍मा उतार कर रूमाल से साफ करता है और फिर लगा लेता है। इस बीच इतना अंतराल है कि कोकिला उसकी आँखों में झाँक ले। इसके बाद शटल आने तक, चल देने तक और अपने स्‍टेशन पर कोकिला के उतर जाने तक दोनों में से कोई किसी से कुछ नहीं बोला। लेकिन चुप भी कहाँ रहे दोनों... अपने अपने से बात करते रहे, लेकिन क्‍या सममुच एक की बात दूसरे तक नहीं पहुँच रही थी?

कोकिला ने इतनी बात मुझे तीन दिनों में रिस रिस कर बताई। उसने बताया कि वह आदमी अभी तक कोकिला का नाम नहीं जानता, बस स्‍कॉलर कहता है। कोकिला को भी उस आदमी का नाम पता नहीं मालूम। वह बस इतना जानती है कि वह आदमी दर्द को बिना तफसील से जाने सह पाने भर बौना बना देता है। वह कहता है कि दर्द को बौना करने के लिये अपना कद कई गुना ऊँचा कर लो और इसके लिये ज़रूरी है कि किसी भी बाड़ की शर्त को अपने ऊपर लदने मत दो।

कोकिला ने उस आदमी को कभी नहीं बताया कि उसका पति उसे पीटता है, लेकिन कोकिला को लगता है कि यह सच उस आदमी तक पहुँच चुका है और वह आदमी उस सच पर मरहम बन कर चुपचाप पिघल जाता है। ऐसे और भी न जाने कितनें सच होंगेे।

‘उस आदमी ने खुद कभी तुम्‍हें अपने बारे में बताया?' मैने कोकिला से पूछा था।

‘नहीं, लकिन उसने शायद सिगार पीना छोड़ दिया है...'

‘क्‍या तुम्‍हें पक्‍का पता है...'

‘क्‍या केवल वि�वास होना काफी नहीं है?'

मैं अवाक्‌ रह गई।

मेरे पास इस प्रसंग में अब जानने को कुछ नहीं बचा था, लेकिन मैं पूरी तरह समझ नहीं पाई थी कि उस आदमी और कोकिला के बीच ऐसा क्‍या खास है? लेकिन मैं यह भी देख पा रही थी कि कोकिला दिनों दिन बदल रही है।

वह अकेली अपने बेटे को लकर कंसल्‍टेंट के पास गई और एक भरोसा ले कर लौटी। लौट कर उसने अपने पति की निर्लिप्‍तता का रोना नहीं रोया... अब उसके चेहरे पर घर से पिट कर आने के बाद वह कथा वृतांत ठहरा नहीं रहता, हालाँकि यदा कदा पिट कर आती ही है वह और मुझसे बाई द वे शेयर भी करती हैं।

और, उस दिन तो हद ही हो गई।

कोकिला ने हम सब सहेलियों को घर बुला लिया। अच्‍छी तरह तैयार कर के, बिना झिझक, अपने विक्षिप्‍त से बेटे को सबके बीच बैठाया और सहेलियों के बीच हँसते मुस्‍काते, उनके हँसी ठठ्‌ठे में शामिल होते हुए, कमरे बराम्‍दे में टहलते, मोबाइल पर ज़ोर ज़ोर से बात करते अपने पति को सहज रूप से अनदेखा करती रही...

अपनी ज़िन्‍दगी के हर सच को सहज समेट पाने की ताकत उसने जुटा ली है, यह उसका व्‍यवहार साफ तौर से बता रहा था।

बीच मेें मौका चुरा कर कोकिला मुझे बाँह से पकड़ कर चुपके से अपने कमरे में ले गई. मेज पर पड़े उपन्‍यास कालाहाँड़ी को अनदेखा करते हुए कोकिला ने अल्‍मारी से कागज़ का एक पुलिन्‍दा निकाला...

‘इस उपन्‍यास का अनुवाद हो रहा है. फाइनल होने के पहले एक एक चैप्‍टर मैं भी देखती हूँ, और यह तीन चैप्‍टर तो मैंने ही...'

अब चौंकने की मेरी बारी थी।

‘चौंकने की क्‍या बात है, दीदी... मेरा एम. फिल. तो अंग्रेजी में ही है...'

अब मैं कोकिला को क्‍या बताती कि मेरे चौंकने का कारण तो कुछ और ही है, वरना कोकिला की फाइल अब तक मैंने देखी नहीं है क्‍या ?...

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साभार - साक्षात्कार - जनवरी 08

प्रधान संपादक - देवेन्द्र दीपक

संपादक - हरि भटनागर

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