शनिवार, 17 नवंबर 2012

एस. के. पाण्डेय के दोहे

दोहे(११)


जग कहता देखा सुना जग में दुख सब ठोर  
यसकेपी केहि न छुअत बात बहै सब ओर ।।

सुख खोजन को जग चला सुख नहि हाट बिकात ।
यसकेपी परहित किए बिनु माँगे मिलि जात ।।

जनमि-जनमि दर-दर फिरे हुआ न सुख परभात ।
यसकेपी दुख की रजनि परहित रवि से नसात ।।

यसकेपी जग जानता भला किए भल होत ।
तदपि चला संसार चढ़ि पर अनहित के पोत ।।

परहित हित यह तन मिला हुआ नहीं जो भाय ।
यसकेपी सच जानिए जनम अकारथ जाय ।।

परहित जो कर सो तरे यसकेपी सच बात ।
साधु संत अरु वेद मत तदपि न काहु सुहात ।।


परहित से संसार है देखो आप बिचारि ।
यसकेपी रवि-शशि अगिन धरा गगन रितु धारि ।।

पवन मेघ गिरि तरु सरी परहित लगि सुख पाय  ।
यसकेपी इनके बिना यह संसार नसाय  ।।

परहित कर जग सो सुखी यहि सम धर्म न आहि ।
यसकेपी करि देखिए सब अवरेब नसाहिं

भला गैर को कीजिए भला किये भल होय ।
दूजे को अनभल तके सुखी रहै न कोय ।।

यसकेपी देखे बढ़त करत पाप आचार ।
मन मलान मत कीजिए तजिए नहीं बिचार ।।

पाप निरत सुख जानिए पूरब करम प्रधान ।
यसकेपी ताके मिटत दिन नहि जात समान ।।

सकल करम को फल मिलै अटल नियम लो जान ।
आज नहीं तो कल सही पर नहि मिटै निसान ।।

यसकेपी परहित करो जग जीवन सुख मूल ।
परपीड़ा को जानिए साच कहौं सम सूल ।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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