गुरुवार, 22 नवंबर 2012

ज्योतिर्मयी पन्त की कहानी - अपराधी कौन?

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अपराधी कौन ?
गोपाल लगभग ११ साल बाद विदेश से लौटा तो सीधे अपने मित्रों से मिलने उनके घर गया  मिलने की ख़ुशी में वह यह भी भूल गया कि इस लम्बे अन्तराल में उसके दोस्त भी तो अलग -अलग जगह चले गए होंगे पास में ही रवीश के घर जाकर उसे अपनी गलती का आभास हो गया ,लेकिन कई दोस्तों के पते -ठिकाने मालूम हो गए। लौट ही रहा था कि पड़ोस की सुमेधा याद हो आई। बचपन में साथ खेले- झगड़े। साथ- साथ बड़े हुए। सोचा चलो उसका भी हाल पता करूँ। अब तक तो शादी भी हो गई होगी और बच्चे भी होंगे। उसकी अम्मा जो जगत चाची कहलाती, वो तो मिल ही जाएँगी।


दरवाज़े की साँकल खटखटकाने को हाथ बढ़ाया ही था कि देखा वहाँ ताला लटका हुआ है। बेमन से वह मुड़ा। चलो घर ही चला जाय। घर के लोग भी तो उससे मिलने को उत्सुक होंगे। देर रात तक घर में सभी भाई -बहन ,माता -पिता बीते समय की यादों को दोहराते रहे ,नयी बातें, घटनाएँ सुनते-सुनाते   रहे। बात की बात में ही पता चला सुमेधा के बारे में। लगभग छह साल पहले उसका विवाह हुआ था। लड़का किसी कंपनी में अच्छे पद पर कार्य करता था। परिवार संपन्न था। सुमेधा भी बहुत खुश थी। पर किस्मत को शायद यह मंज़ूर नहीं था। बाज़ी ऐसी पलटी कि वह बेघर हो गयी।


पर पूरी बात नहीं हो पाई क्योंकि देर हो चुकी थी सभी उनींदे हो रहे थे अतः सोने चले गए ,परन्तु गोपाल की नींद उचट गई। इतनी सुन्दर ,सौम्य लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ ?


अगले दिन जब उसने जानना चाहा तो किसी ने ढंग से कुछ बताया नहीं। वह इतना ही अनुमान लगा पाया कि उसके चाल-चलन की वज़ह से उसे ये सही सजा मिली ,उसका मन ये मानने को तैयार न था। अगले दिन अचानक ही चाची रास्ते में मिल गई। बहुत ही बूढ़ी और कमज़ोर लग रही थी। वह भी उनके साथ हो लिया ताकि सारी बातें मालूम हो सकें। चाची रोने लगी और बोली ``बेटे कभी घर आना तो आराम से बातें होंगी ``। ``गोपाल ने कहा अभी चलता हूँ ``उसने चाची के हाथ से सामान ले लिया। घर पहुँच कर पहले की तरह उससे चाय -नाश्ते। का आग्रह किया। सुमेधा की बात रोते हुए बयां की। सुमेधा विवाह के बाद बहुत खुश थी दो साल बाद जब वह गर्भवती हुई तो सारा परिवार उसके इर्द-गिर्द घूमता। सुन्दर बेटा हुआ। उसका पति उसे कुछ दिनों के लिए परिवार के साथ छोड़ कर किसी कार्य वश विदेश चला गया। सुमेधा न जाने कैसे अस्वस्थ रहने लगी। एक दिन बेहोशी के कारण गिर पड़ी। सर पर गहरी चोट से बहुत खून बह गया। उसे ४-५ बोतल खून चढ़ाया गया।

कुछ दिनों बाद वह ठीक होकर घर भी वापस आ गयी। उसके पति रोमेश ने इलाज के लिए खर्च तो उठाया पर वह आ नहीं सका। उसका काम बढ़ गया था तो वह बेटे और सुमेधा को अपने साथ ले जाने की तैयारी में था। इसी बीच सुमेधा की तबीयत फिर ख़राब रहने लगी। काफी जाँच और इलाज से भी फर्क नहीं पड़ रहा था। सभी बड़े अस्पतालों में जाँच करायी गयी तो बताया गया वह वज्रपात से कम न था। उसके टेस्ट से ये आशंका जताई गयी कि वह एच. आइ. वी. पोजिटिव है। अगर तुरंत रोकथाम के लिए इलाज न हुआ तो इसतरह   एड्स की शुरुआत हो सकती है है और बीमारी तेज़ी से बढ़ सकती है। डाक्टरों ने जो परहेज़ और इलाज बताये , शुरू में तो घरवालों ने ख्याल रखा पर धीरे-धीरे वह एक बेकार की वस्तु मानी जाने लगी कि जिससे जितनी जल्दी छुटकारा हो उतना ही अच्छा। पहले खाने - पीने के बर्तन फिर साथ उठना-बैठना अलग हुआ फिर तो जैसे उसे देखने भर से लोग किनारा करने लगे। हद तो तब ओ गयी जब घरवालों ने उसकी बीमारी का कारण ही बदल दिया और सारा दोष उसके चरित्र पर लगा दिया। रोमेश भी घरवालों के कहने में आ गया

 
जो पति कल तक उसे अपने साथ बुलाने के लिए पासपोर्ट -वीजा आदि बनाने की बात कर रहा था उसी ने तलाक के कागज़ तैयार करा लिए। घर आकर अपनी पत्नी को संवेदना के बजाय तलाक देने की धमकी थी। बेटे से दूर कर दिया गया और एक दिन उसे यहाँ छोड़ गया। अचानक बेटी को घर आया देख कर और सारी बातें जानकर चाची तो जैसे अधमरी ही हो गयी। पर फिर हिम्मत बाँधी बेटी को सहारा और प्यार दिया.... हालांकि यहाँ भी लोगों ने चैन से रहने नहीं दिया। अपनी सारी ज़मीन बेच कर इलाज करवाया बेटी लाइलाज बीमारी से ग्रसित तो थी पर अभी प्राण त्याग तो नहीं कर सकती। जितना जिए खुश रह कर जिए इसके लिए उसे प्रेरित करना था। अतः अब सुमेधा शहर में किसी ऑफिस में काम करती है और दुनिया और अपने दुखों का सामना भी कर रही है। लोगों को इस रोग के प्रति जागरूक भी कर रही है। यह अनियंत्रित यौन सम्बन्ध से ,। प्रयोग की गई सुई से , प्रदूषित रक्त या अंगदान से फ़ैलता है। । एच. आइ. वी. ग्रस्त माँ से गर्भ में पल रहे शिशु को ,या दुग्धपान कराने से बच्चों में हो सकता है। परन्तु वास्तविक कारण का निर्णय करना कठिन हो जाता है। यह रोग साथ उठने बैठने से ,स्पर्श करने से नहीं फैलता... चाची की बातों से ही लगा कि वे दोनों कितनी जागरूक और जीवंत हैं।


दो दिन बाद ही गोपाल उससे मिलने उसके ऑफिस जा पहुँचा। उसे चाची की बातों पर विश्वास नहीं हुआ था। बचपन की जिस सुमेधा को वह जानता था उससे लगता था कि वह बेहद संवेदनशील है। घरवालों के अमानवीय व्यवहार और रोग की विभीषिका से तो वह जड़ ,संवेदनशून्य प्रस्तर सी हो गयी होगी। पर जब वह उसके सामने पहुँचा तो देख कर खुद ही पत्थर की मूर्ति सा हो गया। सुमेधा ने उसे पहचान लिया था और स्वागत करने उठ खड़ी हुई थी। बातों का सिलसिला बचपन से शुरू होकर वर्तमान तक आ पहुँचा। न जाने कितना वक्त बीत गया था। कि और लोग घर जाने की तैयारी कर रहे थे।


वह भी चलने को तैयार हुआ तो सुमेधा बोली क्या घर नहीं चलोगे। खाना तो साथ खाओगे न?वह बिना कुछ बोले उसके साथ- साथ चलता रहा। खाना खाने के बाद विदा लेते हुए वह सोचने लगा। एक गलत फ़हमी ने इसका जीवन बेकार किया या आगामी बीमारी के भय से इसके घरवालों नें इसका निष्कासन किया ?क्या सुमेधा के ससुराल में किसी सदस्य को यह हुआ होता या उसके पति को होता तो क्या वह हमेशा सेवारत न रहती या उसे भी घर से निकला जाता ?रोग की पीड़ा तो फिर भी सह्य है पर तिरस्कार और अपमान की पीड़ा का क्या ?जिसके घाव सुमेधा के दिल को लगे हैं?सुमेधा को किस अपराध की सजा मिली ?

 
सुमेधा शायद उसके मन की बातें भाँप गयी बोली -`देखो तुम उदास लग रहे हो। कुछ कहना भी चाहते हो मुझ से। । । है न ?पर मुझे अब आदत हो गयी है। लोगों के तिरस्कारपूर्ण तानों की। मुझे सहानुभूति की ज़रुरत नहीं। बिना जाने -सुनें दूसरों को दोष देना जग की रीत है। इसके कारण मै अपना जीवन समय से पहले ही नष्ट क्यों करूँ... आज तुमनें बचपन की दोस्ती निभाई है। बरसों के बाद कोई अपना मिला
लौटते हुए गोपाल के मन में प्रश्न उठ रहा था क्या वह उसका साथ सच में दे सकेगा ?
                       

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ज्योतिर्मयी पन्त

जन्मस्थान -नैनीताल

शिक्षा-एम ए ,एम फिल (संस्कृत)

पूर्वी अफ्रीका ;शिमला .शिलौंग   व देहली  के स्कूलों में अध्यापन के बाद   सम्प्रति गृहिणी .

शौक-लिखना -पढ़ना

कई पत्रिकाओं में कहानियाँ व लेख प्रकाशित.

`ओ माँ `नामक एक संग्रह प्रकाशित

२०१०-११ में  उद्भव मानव सेवा  सम्मान प्राप्त.

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संपर्क:

ई-मेल pant.jyotirmai@gmail.com

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