शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

शैलेन्द्र चौहान का आलेख - लोकधर्मी संवेदना के कवि : बाबू केदारनाथ अग्रवाल

लोकधर्मी संवेदना के कवि : बाबू केदारनाथ अग्रवाल

शैलेन्द्र चौहान

मैंने कविता रची और कविता ने मुझे, बकौल खुद -
मैने जीवन में सबसे अधिक प्यार यदि किसी को किया तो वह कविता है   यह प्यार इकतरफा नहीं था, कविता ने भी बदले में मुझे प्यार किया   मैंने कविता को पाया, जिया और पूरी तरह अपनाया। कविता धीरे धीरे मेरे अन्तर में स्थायी होती गई। मैं तो यह मानता हूं कि उसी ने मुझे आदमी बनाया। सोचता हूं कि यदि कवि न होता तो क्या होता। समझ में साफ तौर पर आ जाता है कि तब व्यवसायी होता, सुविधाभोगी होता या उसी तरह कुछ और भी। कविता मेरे लिए एक ऐसी प्रक्रिया बनी जिससे चेतना का विकास संभव हुआ। उसी चेतना ने कविता रची और मुझे। यदि मैंने कुछ पाया, आदमी हुआ तो कविता से। जिन्दगी जीने के लिए मैने तो जीवन दर्शन चुना, यर्थाथ से साक्षात्कार कराने में जिसने सहायता की, वह मार्क्सवाद है। इसे जीवन जीने का वैज्ञानिक तरीका मानता हूं मैं। यही ठीक ढंग से आदमी को सुधारता हे। मैं भी इससे सुधरा। यह दर्शन शोषण विहीन समाज का स्वप्न देता है, सबकी खुशी और समृद्धि का जीता जागता प्रमाण।


मैं पेशे से वकील हूं। फौजदारी तथा सम्पति के तरह तरह के मुकदमों से रोज गुजरता हूं। कितने प्रकार के लोगों से मिलता हूं। सरकारी वकील भी रहा, इसलिये सरकारी पक्ष भी देखा। मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि समाज और किसी तरीके से नहीं सुधर सकता। चाहे कितने कानून बन जाएं, जमीन का वितरण कर दिया जाय तो भी। जमींदारी उन्मूलन कानून बना तो था, उसका क्या हुआ, कालक्रम में सारे आकलन गलत सिद्ध हो गये। एक शोषक वर्ग बदला, दूसरा आ गया। पहले अकाल पड़ने पर थोड़ी बहुत रियायतें मिलती थीं, सरकार हाथ में आ जाने से और बाधाये आने लगी। आंख से देखकर जाना कि स्वाभाव से कोई डाकू या कातिल नहीं पैदा होता। देखने और पढ़ने से मालूम हुआ कि जमीन, जायदाद और जोरू के कारण झगड़े होते हैं और उन्हीं के कारण आपसी विभाजन। लोगों में अपने जीने के लिये दूसरे को खतरे में पड़ जाने की चिन्ता नहीं। इस तरह सारा सुपर स्ट्क्चर झगड़े में फसा हुआ है। सहज मानवीयता और एक नागरिक की हैसियत से ही मन में नतीजा बना कि सम्पति के सम्बन्ध टूठने चाहिये। इच्छा हुई कि उसके लिये राजनीति में जाकर काम करूं, पर घर को लोगों ने उधर नहीं जाने दिया। मेरे लिये एक मात्र तरीका बचा साहित्य का, कविता का। मैंने कविता की मानसिकता इसी तरह की बनायी और दूसरों की मानसिकता बदलने का लक्ष्य निर्धारित किया। मेरे साथी जानते हैं कि कविता के प्रति मेरा लगाव, सम्मान, यश, स्वागत, पुरूस्कार के लिए नहीं हुआ। एक ही बात थी- अच्छा इंसान बनने और बनाने की बात।


मेरे उस जमाने में पन्त, रसाल, निराला जैसे लोग थे। एक कवि सम्मेलन में हरिऔध अध्यक्षता कर रहे थे और रसाली संचालन। पन्त और निराला भी थे। पन्त मे महिला जैसा सौन्दर्य दिखता था। उनकी कविता की ओर मैं शारिरीक सौन्दर्य के कारण झुका। उस समय मेरा संम्पर्क निराला से नहीं हुआ था। प्राकृतिक सौंदर्य अथवा नारी के सौन्दर्य को जानने समझने की शक्ति मुझे दूसरों की कविताओं से मिली। रामकृष्ण शिलीमुख के द्वारा मुझे काव्य के बारे में काफी जानकारी मिली। उन्होंने मुझे प्रसाद की कविताएं समझायी। मुझे दुनिया के सौन्दर्य से साहित्य का सौन्दर्य अच्छा लगा, उनकी वजह से। मुझमें मानवीय सौन्दर्यपरक आदमी बनने की शुरूआत हुई। मैंने माना कि गांव की औरत में नाजुकता का नहीं बलिष्ठता का सौन्दर्य होता है। इस प्रकार का अपार सौन्दर्य मेरे सामने था। मेरे पिता जी का ऐन्द्रयबोध काफी विकसित था। मेरे इलाके में मथुरा की रास मंडली आती तो पिताजी गाने में मग्न हो जाते। वे रास मण्डली के साथ जाना चाहते थे। तो उन्हें रोकने के लिये मेरे बाबा जी ने रामलीली की शुरूआत करायी। रामलीला में पिताजी बहुत सक्रिय रहते थे। अभिनय में भी। मैं यह सब देखता रहा। मुझे लगा कि ये साहित्य की चीजें हैं, अच्छी लगी। पिताजी के एक दोस्त थे। वे उनके पास आकर रामचिन्द्रका और रामायण पढ़ते थे। मुझे रामयण के फेलवारी ओर धुनषयज्ञ प्रसंग बहुत सुन्दर लगते थे। रामलीला में परशुराम का संवाद अच्छा लगता था । अपढ़ जनता भी उसे देखते दंग हो जाती थी। मुझे उस समय राम बुद्धू लगते थे और सोचता था कि लक्ष्मण को हीरो होना चाहिए। इस सबके आमने सामने मुझे भाषा की शक्ति की प्रेरणा मिली। सोचता कि यही शक्ति आये तो मेरी कविता ताकवर होगी। कचहरी की दुनियां ने असली यथार्थ से सम्पर्क कराया। मैं शब्दों लगातार द्वंद किया करता ।


पहले रोमानी कवितायें लिखता था, जिन्दें बाद में छोड़ने की इच्छा होने लगी। भावुकता से मुक्ति कैसे मिली, जिन्दगी की भयानका देखने से। देखा कि लोगों को जहां बहादुर होना चाहिए - वहां कायर हो रहे हैं। धूंस और भ्रष्टाचार के दृश्य देखे। मुझे मेर जीवन दशन, माक्र्सवाद ने बौद्धिक बनाया -अमूर्त बौद्धिक नहीं। मैंने जीवन और साहित्स से भाषा की ताकत लगातार ली। संस्कृत की ‘शब्दावली से काम नहीं चला। इससे लिखने में दिक्कत होती। कुछ लिखना चाहता और कुछ लिख जाता। बुद्ध की तरह अपने लिखे हुए पर हंसता। विद्वता और मानसिकता का सम्बंध नहीं जमा। छंदों का पांडित्य अच्छा नही लगा। मैं चाहता था कि जो लिखूं, उसमें मेरी जमीन और मेरा व्यक्तित्व बोले। मैं अपने अंह में समाहित नहीं हुआ। आध्यात्म कीओर जाना मुझे कभी नहीं रूचा । मैंने एक लेख लिखाथा, `साहित्य में रहस्यवाद´, उसे रूपनाराण पाण्डेय ने माधुरी में छापा। उस समय रामविलास जी से दोस्ती हो गयी थी। उन्होंने पढ़ा। निराला ने भी पढ़ा, मैंने उसे रहस्यवादी नहीं माना था। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उल्टे उन्होंने मुझे काफी स्नेह दिया। मैंने उस लेख में कहा था कि विश्लेषण न करें, कोई रास्ता न देंखे और रहस्यावाद र्षोर्षो जब ज्ञान उपलब्ध है तो हम गूंगे क्यों रहे ? कृष्ण का उंगली से पहाड़ उठाना परिकल्पनात्मक रहस्यवाद है, उस समय ठीक था, पर अब क्यों मुझे अच्छा नहीं लगता था कि दो मील की सीमा में गोपियां रोती रहीं। इसमें अपने समय के आदमी का सत्य नहीं होता था। आम आदमी की जरूरत की खोजें इनमें नहीं थीं। मैंने उस लेख में यह सोचा था कि चोट करे और गुदगुदाओं भी - सहला के मारो।मैंने रीतिकाल पर कटाक्ष किये।


मेरा विश्वास रहा है कि कविता विवेकशील, संयमी तथा पे्रमी बनाती है। उस जमाने में कविता से जुड़े हुए बहुत से बोद्धिक लोग पित्न धर्म से गिरते थे। पित्नयां बदलते थे, प्रेमिकाएं रखते थे, ऐसा कई कम्युनिष्ट कवियों ने भी किया। मैंने इसे अच्छा नहीं माना। मैंने अपनी पत्नी को हमेशा साथ रखा। इस तरह की नैतिकता कवि के लिए जरूरी है। मेरा विवाह 1927 में हो गया था, पर मैंने 1938 में पत्नी पर कविता लिखी। उसे चांद सितारों से सुन्दर कहा। सुन्दर न होने पर भी। कारण था कि इतने दिनों बाद मैं खुल सका। उसे गांव ले जाकर दिखा सका। मैंने यह भ्रम इसलिये पैदा किया क्योंकि सामाजिक दायित्व से बंधा था।


मेरे जमाने में जोरों की बौद्धिकता आई थी। प्रगतिशीलों के खिलाफ काफी कहा-सुना ओर सीखा जाता था। हम लोगों के छपने के लिए केवल ‘हंस’ था। जबसे अमृतराय उसके संपादक हुए, उसमें खूब छपा। जैसा लिखा, सब छपा। आवाज काफी बुलन्द होने लगी। हंस में अज्ञेय की भी रचनाएं छपती थी। इसमें हमें एतराज हो सकता था पर हमने संघर्ष की रचनायें लिखी। उसी दौरान `प्रगतिशील लेखक संघ´ बन चुका था। उसके सम्मेलन लगातार होते थे। उससे लेखकों में मेल मिलाप बढ़ा, सामुहिक सोच विकसित हुआ, हम लोग समूह में जीने लगे। विश्वसाहित्य के सम्पर्क में आये। दुनिया की बौद्धिकता देखी। पहचाना कि शुद्ध कला क्या चीज है, उसमें निजत्व ही भरा होता था। उनकी रचनाओं में सही मायने में न उनका दर्द था और न समाज का। ऐसे लोगों ने व्क्तिस्वातंत्र्य का नारा दिया `कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम´। इन लेखकों कवियों ने ऐसे मनोचित्र बनाये कि लगा कि उन्हें डाक्टरों से इलाज कराना चाहिए। इनकी मानसिकता आदमियत बनाने के लिए थी ही नहीं। ये किसी भी तरह विशिष्ट बन जाने के चक्कर में होते हैं।


मैं बहुत विद्रोही आदमी नहीं रहा। मैंने खतरे उठाने का साहस नहीं किया। मैंने जो किया कविता के जरिये किया। जितनी मेहनत कविता में कर सकता था, की। यह ख्याल रहता था कि मुझे जो कहना है उसे अच्छी तरह से कहूं। मैं प्रगतीशील कवियों से कहता हूं कि कभी कभी हमारे विरोधी और रूपवादी लोग कविता में ज्यादा मेहनत करते हैं। हम उस मेहनत से कतराते हैं। हमारे लिये जरूरी चुनौती है कि हम उनका कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियो से मुकाबला करें। मैंने यही प्रयास किया। मैंने जिस विषय पर भी लिखा, उस खेमे से संघर्ष के लिये लिखा चाहे नदी, हंसिया, किसान जो भी हो। मैंने चट्टान की तरह लिखा स्पर्धा की भावना के साथ। मैं लगातार कृति को बनाने में लगा रहा। अज्ञेय ने दूसरे सप्तक में मुझे लेना चाहा अपेक्षाकृत कमजोर कविताओं के जरिये। मैंने कहा कि `अभियुक्त´ कविता ले लें। वे उसे क्यों लेते। अन्तत: हम लोगा शमिल नहीं हुये, बाबा को भी रोका।


मेरा विश्वास है कि कथ्य और शिल्प अलग नहीं है। दोनों की सांघातिक इकाई है। उसे तोड़ा नहीं जा सकता। कालिदास और बाल्मकि को पढ़ते हुए भी मुझे यह बात महसूस हुई है। इन कवियों ने यह भी सिखाया कि छोटे छोटे बंधों में कितनी बंधी हुई, धारदार बातें कही जा सकती है। मैंने ऐसी कविताएं लिखने की सोची कि दुश्मन भी एक बार प्रशंसा करें। रामविलास मेरे मित्र रहे है, उनसे बातें होती थी। वे कविता पर बात करते हुए कटु आलोचक हो जाते थे। निराला मुझे बेहद प्रिय थे। वे न होते तो खड़ी बोली कविता क्या होती। मैंने मिल्टन और कीट्स की कविताएं भी पसंद की है। मेरी शिकायत आलोचकों से रही है। उन्होंने मेरी कविता को समझने की कोशिश नहीं की, प्रगतिशील आलोचकों ने भी। नामवर ने भी जाने किस किस को उठाया, हमारी ओर उनका ध्यान नहीं गया। किसी खेमे ने मुझे महत्व नहीं दिया। मैंने पार्टी की सदस्यता कभी ग्रहण नहीं की, अपनी मजबूरियों के कारण।


मैंने सोचा कि नारे की कविताएं हमेशा नहीं लिखी जानी चाहिये। जब सामूहिक आन्दोलन जोरों पर हो, तब की बात छोड़कर। उस समय हमने भी लिखा और आगे लिखेंगे। अभी हमें हिन्दी साहित्य को प्रगतिशील कविताओं से भरना है और उसकी प्रतिष्ठा बढ़ानी है। हमें दुश्मन को बौद्धिक जवाब देना है। जवाब देने से पूर्व एक बात अच्छी तरह से समझ लेने की है कि संसार में यदि जिन्दा रहना, तो प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। यथास्थिति में परिवर्तन आया तो अलंदे और मुक्तिबोध मरते ही रहेंगे। हम लेखकों को प्रतिबद्ध रचनाएं लिखनी चाहिये- खतरे के बावजूद। कबीर, रैदास छोटे तबके के लोग थे, चिंतक जागरूक। उन्होने भण्डाफोड़ किया व्यवस्था का। निराला ने यही किया।हमें कला का उपयोग व्यवस्था बदलने, लोगों की मानसिकता बदलने के लिए करना है। हमारे जवाब का यही रास्ता है। मैं सोचता हूं कि जब तक जिन्दा रहूं जब तक मौत न आए, जब तक जिऊं, उसका उपयोग करूं। मैं अपना विकास पाने के लिए बैचेन हूं। मुझे जीने का अर्थ, वेद में, उपनिषद में, कहीं नहीं मिला, मिला तो प्रतिबद्धता में। इससे घबराने की जरूरत नहीं। पैब्लो नैरूदा, मॉयकोब्सकी, नाजिम हिकमत की तरह जीने की जरूरत है। यही जिन्दगी का राज है और इसी से कविता बनती है।

अतः उपरोक्त कथन के संदर्भ में हम यह देख सकते हैं कि सामान्यतया, समकालीन कविता अपने पाठक को साथ लेकर नहीं चल पाती। अपने पाठक से वह दिल से ज्यादा दिमाग का रिश्ता बनाने का प्रयास करती है किन्तु केदार जी ने कविता को अपने पाठक के हृदय के जितना नजदीक किया है, उतना शायद ही कोई अन्य कवि कर पाया हो।

आजादी की लड़ाई के उन उथल-पुथल भरे बरसों में उनकी कविता में सामंतवाद के विरूद्ध भारतीय किसान के संघर्ष का उद्घोष भी है और ब्रिटिश पूंजीवादी हितों के साथ नाभिनालबद्ध राष्ट्रीय नेताओं पर व्यंग्य भी। केदारनाथ अग्रवाल की राजनीतिक दूरदर्शिता यहां देखी जा सकती है कि 1947 की आजादी को सत्ता हस्तांतरण मानने की जो समझ प्रलेसं की एक दशक बाद बनी उसकी और संकेत उन्होंने 46 में ही कर दिया था- लन्दन गए-लौट आए/बोलो,आजादी लाए?/नकली मिली है की असली मिली है?/कितनी दलाली में कितनी मिली है ? आजादी के बाद अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद का नवस्वाधीन देशों पर मंडराता कर्ज का मायाजाल हो, प्रशासकों- पूंजीपतियों- नेताओं का गठजोड़ हो या देश में घटित राजनीतिक मोड़- उदाहरणार्थ आपातकाल, हो, केदार की कलम सभी मुद्दों पर चली। यूं तो केदारनाथ अग्रवाल ने 1946 के नौसैनिक विद्रोह, अमेरीकी साम्राज्यवाद के विरूद्ध वियतनाम की जनता के संघर्ष, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से लेकर डॉलर के बढ़ते वर्चस्व तक सभी वैश्विक मुद्दों पर कविताएं लिखीं किन्तु मूलत: और अंतत: उनकी कविता बुंदेलखंड के किसान का जयगान है। अपनी जमीन से गहरे जुड़ाव के चलते उन्होंने बुन्देलखंडी किसान की अटूट संघर्ष क्षमता का रेखांकन भी किया और उसके वर्गीय हितों की रक्षा के लिए उठ खड़े होने और संगठित होने का आह्वान भी-काटो काटो काटो कर्बी/मारो मारो मारो हंसिया /हिंसा और अहिंसा क्या है/जीवन से बढ़ हिंसा क्या है। शमशेर ने केदारनाथ अग्रवाल के लिए लिखा था कि केदार बुनियादी तौर पर एक नार्मल रोमानी कवि हैं, छायावादी रोमानी नहीं। संभवत: यह उनकी कविता के बारे में सर्वाधिक सटीक टिप्पणी है। सबसे पहले कही बात से इसे जोड़ें तो -छायावाद का अंत रूमानियत का अंत नहीं था, हां यह जरूर था की छायावादी रूमानियत जिस स्व के दायरे में जकड़ी हुई थी उसे इस वायवीयता से मुक्त करके केदारनाथ अग्रवाल ने उसमें सचेत और सायास वर्गीय चेतना का समावेश किया। केदारजी की प्रकृति केन्द्रित कविताओं में सदा ही प्रतीकों को निर्बल के पक्ष में प्रस्तुत कर कविता को वर्गीय धार दे देने की समझदारी रही है ,मसलन- एक बित्ते के बराबर /यह हरा ठिगना चना/बांधे मुरैठा शीश पर/छोटे गुलाबी फूल का/सजाकर खड़ा है, या फिर - तेज धार का कर्मठ पानी/चट्टानों के ऊपर चढ़कर मार रहा है घूंसे कसकर /तोड़ रहा है तट चट्टानी।


डॉ जीवन सिंह के अनुसार केदार जी का सारा जीवन बुन्देलखण्ड जनपद के बांदा कस्बे में व्यतीत हुआ। यहीं का लोकजीवन एवं प्रकृति का सौंदर्य उनकी कविता का विषय रहे। स्थानीयता उनकी काव्य रचना की आधारभूमि रही किन्तु उसे रचना में बदला उनकी विश्वदृष्टि ने। विश्वदृष्टि और स्थानीयता का अद्भुत सामंजस्य उनको सृजन की जितनी निजता, मौलिकता, प्रामाणिकता, गहराई और विस्तार देता है, उतनी ही ऊंचाई, उदात्तता और व्यापकता भी।

केदार जी की भाषा हिंदी के उस प्रचलित रूप के आस-पास चलती है जिसे भारत का आम़ हिंदी भाषी बोलता और समझता है. उन्होने अपनी काव्य-भाषा के माध्यम से भी कबीर, तुलसी, प्रेमचंद और निराला की लोकवादी परंपरा को आगे बढ़ाया है. उनकी भाषा लोक प्रचलित जन भाषा है. केदार ने तत्सम, तद्भव, देशज एवं विदेशी-अंग्रेजी, अरबी, फ़ारसी शब्दों का प्रयोग किया है. अतः भाषा के शिल्प का जहाँ तक तात्पर्य है- तो शब्द चयन के स्तर पर वे किसी वाद के आग्रही नहीं हैं. वे उन शब्दों का चयन करते हैं जो लोक संवेदना को प्रकट करने में सहजतः सक्षम हैं. काव्य शिल्प मुक्त छंद है. परंतु लय, गीत और बिंब विधान की बहुलता पायी जाती है. पूरी कविता में एक ऐसी सरिता का मंथर प्रवाह देखने को मिलता है जो पूरे काव्य को गीला किए हुए दोनों तटों से बांधे रहता है.


केदार की भाषा कभी एकदम सीधी-सहज, तो कभी बिंबधर्मी हो उठती है. किंतु शब्दों के चयन की कुशलता आर्थात कम से कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात कह देने में वे निराला या शमशेर की तरह निपुण हैं. केदार की कविता की पंक्तियों में एक एहसास भरा होता है. शमशेर पर लिखा एक कभी न भूला पाने वाला शब्द-चित्र देखें-

शमशेर - मेरा दोस्त
चलता चला जा रहा है अकेला
कंधे पर लिए नदी
मूंड पर धरे नाव।
केदार ने कविता को उस चरम लय तक पहुँचाने का सपना देखा था जिसमें कवि स्वयं लय हो जाय-
जैसा कोई सितारिया द्रुत सितारा को बजाए
लय में पहुँच कर वह स्वयं लय हो जाय
फिर न वह सितारा को बजाय
चलता हाथ ही बजाय।
केदार बाबू के काव्य की भाषा बिंबात्मक गतिशीलता लिए हुए है, इस ‘संवेगीय-चित्र-भाष- क्षमता’ के कारण पूरा कविता-विधान ‘जीती हुई जिंद़गी’ ज़ान पड़ती है-
दिन हिरण सा चौकसी भर के चला
धूप की चादर सिमटकर खो गई,
खेत घर वन गाँव का
दर्पन किसी मोड़ डाला
शाम की सोना चिरैया
निड़ में जा सो गई।


 

कहा जा सकता है कि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं न केवल अपने कथ्य में अनूठी है, वरन भाषा और शिल्प-रचना में भी अनूठी हैं. कथ्य और भाषा व शिल्प के स्तर पर केदारनाथ अग्रवाल लोकधर्मी-संवेदना के कवि हैं एवं उनके काव्य में लोक-संवेदना व्यक्त हुई है. केदार जी की मान्यता रही है कि किसी कवि के हृदय में कविता, पहले से रची हुई कृति नहीं होती। रचना के लिए कवि को अपना इंद्रिय जगत खुला एवं सजग रखना पड़ता है। इंद्रियबोध से वह बहिर्जगत का ज्ञान प्राप्त करता है और यही ज्ञान जब कवि को संवेदित करते हुए अपने समय के प्रति सजग करता है, तो कविता का सृजन संभव होता है। केदार जी की कविता के बारे में उनके मित्र कवि शमशेर बहादुर सिंह की राय रही है कि 'उनकी कविताओं में किसी तरह का उलझाव नहीं होता, बनावट नहीं होती और अभिव्यक्ति में हिचक या कमजोरी नहीं होती।' उनकी आरंभिक कविताओं का पहला संकलन मार्च 1947 ई. में मुंबई से 'युग की गंगा' शीर्षक से प्रकाशित हुआ, जिसमें उस समय के गरीब किसान, मजदूर और नौजवान न केवल अपने जीवन की त्रासदियों से अपने पाठक को परिचित कराते है बल्कि उनके भीतर का साहस, संघर्ष-क्षमता और दुख-दर्दो को जीतने वाली अदम्य शक्ति से भी यहां हमारा परिचय होता है। केदार जी के यहां नदी ने केंद्रीय स्थान प्राप्त कर जीवन के समानान्तर उसके महारूपक रचे है। उन्होंने अपने युग को गंगा के प्रवाह के रूप में देखा। कदाचित इसीलिए पहले संग्रह का नाम दिया- 'युग की गंगा'। जिसे मानवीकृत करते हुए उसका केंद्रीय बिम्ब चट्टानों को तोड़ने वाली नदी के रूप में लाते है। यह उनका अपनी केन नदी के प्रवाह का अनुभव है, जो पाषाणों के बीच में बहती है।

युग की गंगा/ पाषाणों पर दौड़ेगी ही;

लम्बी, ऊंची/ सब प्राचीन डुबायेगी ही;

नयी बस्तियां/ शान्ति-निकेतन/ नव संसार बसायेगी ही।

केदार जी ने बाह्य सौंदर्य के स्थान पर उस आंतरिक गतिकी को पकड़ा है, जो 'दौड़ेगी', 'तोड़ेगी', 'डुबोयेगी' और 'बसायेगी' जैसी बहुआयामी जीवन-क्रियाओं से एक कालजयी रूपक को रचती है। यह वह समय था, जब देश की जनता साम्राज्यवादी औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध आजादी की लड़ाई लड़ रही थी। केदार का कवि उस लड़ाई में सामान्य जन के साथ था। कहना न होगा कि वह जीवन-पर्यन्त उसी सामान्य जन की भावनाओं, आकांक्षाओं और उसके संघर्ष एवं साहस को वाणी देता रहा। उनके कई साथी कवियों ने अपना मार्ग और उसकी दिशा बदल ली होगी, लेकिन केदार जी अपने नागार्जुन, त्रिलोचन सरीखे कवि-मित्रों के साथ अपने उसी किसानी मार्ग पर अडिग भाव से चलते रहे। 1947 में उनकी कविताओं का दूसरा संग्रह 'नींद के बादल' मुम्बई से ही प्रकाशित हुआ। तीसरा संग्रह 1957 में 'लोक और आलोक' शीर्षक से इलाहाबाद से छपा, जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा- ''कवितायी न मैंने पायी, न चुरायी। इसे मैंने जीवन जोतकर, किसान की तरह बोया और काटा है। यह मेरी अपनी है और मुझे प्राण से अधिक प्यारी है।'' उन्होंने अपने मन की बात को व्यक्त करते हुए लिखा है कि यदि वे काव्यसृजन और पठन के रास्ते पर नहीं चलते, तो ''लक्ष्मी के वाहन बनकर कम पढ़े मूढ़ महाजन होते, जो अपने जीवन का एकमात्र ध्येय कागज के नोटों का संचय करने को बना लेता है।'' यह कविता ही थी, जिसने ''मुझे इस योग्य बनाया कि मैं जीवन-निर्वाह के लिए उसी हद तक अर्थार्जन करूं, जिस हद तक आदमी बना रह सकता हूं।'' इतना ही नहीं, उन्होंने इस तथ्य को भी स्वीकार किया है कि वे दूसरों की कविताएं पढ़ते-पढ़ते और उनसे सीखते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचे है। इस मामले में उनकी समझ बहुत साफ रही है कि काव्य-सृजन में न तो वे आत्मद्रष्टा है, न दिव्यद्रष्टा। उन्होंने सबसे पहले इस संसार के संबंधों के रहस्य को दूसरों की आंखों से देख-देखकर ही समझा-बूझा है। वे अपनी इसी समझ से प्रयोगवादी अभिव्यंजना के उस अलाव से दूर रहे, जो कवि को आत्मकेंद्रित कर केवल अवचेतन की आग में झोंक देता है। यह सही है कि सृजनकारी व्यक्तित्व का निर्माण रचनाकार की आत्मपरकता के बिना संभव नहीं होता, किन्तु केदार जी सरीखे कवि का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि बिना वस्तुपरक दृष्टि और जीवनानुभवों के, सर्जक की आत्मपरकता एक अंधे चक्रव्यूह में भटकते रहने को अभिशप्त होती है।

केदारनाथ अग्रवाल ग्रामीण परिवेश एवं लोक संवेदना के कवि हैं. उनके मन में सामान्य जन के मंगल की भावना निद्यमान है. उनकी रचना का केंद्र-बिंदु सर्वहारा, किसान और मज़दूर है. उसे क्रांति के लिए जगाना और प्रेरित करना कवि का उद्देश्य रहा है. बूर्ज्वा धारणओं, पाखंडी और कर्मकांडीय विश्वासों, अंधभक्ति व अंधविश्वासों एवं अतार्किक धारणाओं आदि से लोगों को मुक्त करना अनिवार्य है अन्यथा गाँवों का विकास तथा ग्रामीणों में सचेतना व संवेग आना संभव नहीं है. सचेतना व संवेग के बिना गाँव एवं लोक का विकास संभव नहीं है. इस लिए कवि स्वयं मोर्चे पर खड़ा हो कर कहता है-
मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ मोर्चे पर
मैं अचेतन और चेतन सभी पर
वार करता जा रहा हूँ व्यक्तिवादी
सभ्यता को ध्वंस बिल्कुल कर रह हूँ।
केदार जी की कविता ग्रामीण परिवेश और लोक जीवन में गहराई से धंसी हुई है. उनकी कविता उसे जगाने के लिए लिखी गई है, जिसे हम रोज देखते हैं, जो खूब जाना-पहचाना है- वह हमसफर, दोस्त, भाई, भाई का भाई, पड़ोसी है जो खेत, खलिहान और दुकान में काम करता है. उसी को जगाना चाहता हैं. क्योंकि वही इस देश की असली सभ्यता एवं संस्कृति की संवेदना का आजतक वाहक बना हुआ है. केदारनाथ लोकधर्मी कवि है और ग्रामीण परिवेश एवं लोक संवेदना उनके काव्यगीतों में रचा-बसा पड़ा है-
हम लेखक हैं कथाकार हैं
हम जीवन के भाष्यकार हैं
हम कवि हैं जनवादी।
हम सृष्टा हैं
श्रम साधन के
मुदमंगल के उत्पादन के
हम द्रष्टा हितवादी हैं।


केदारनाथ अग्रवाल स्वंय को बड़ा भाग्यवान मानते हुए देश की चिरकालिक लोकधर्मी परंपरा से जोड़ते हुए कहते हैं-
चाँद, सूर, तुलसी, कबीर के
संतों के हरिचंद वीर के
हम वंशज बड़भागी।


शयद इसी बड़ी परंपरा से जुड़े होने का बड़प्पन ‘समय की धार में धंसकर खड़े’ इस कवि से सहज ही कहलवा देता है-
मैं हूँ अनास्था पर लिखा
आस्था का शिलालेख

...... मृत्यु पर जीवन के जय की घोषणा।


कवि किसानों की साधनहीनता, विवशता और शोषण से मुक्ति के लिए संघर्ष की चेतना को किसान की लहलहाती फसलों के द्वारा प्रकट करता है-


आर-पार चौड़े खेतों में चारों ओर दिशाएं घेरे
लाखों की अगणित संख्या में
ऊँचा गेहूँ डटा खड़ा है।


वास्तव में कवि केदारनाथ की रचनाएं गाँव के जीवन और गाँव में रहनेवालों की संवेदना को बुलंद करती हैं.
केदार जी ने प्रकृति और उसके सौंदर्य को अपनी कविता में प्रमुख स्थान दिया है। लेकिन उनका प्रकृति-चित्रण, केवल परम्परा-निर्वाह के रूप में न होकर अपने समय की दृष्टि से सृजित किया हुआ है। वह उनके अपने समय का प्रकृति-चित्रण है। इस तरह, वे इस क्षेत्र में भी परम्परा को नवीनता प्रदान करते है। उनके लिए केन नदी का सौंदर्य एक परम्परा भी है और नवीनता भी। युग-सापेक्षता उनकी काव्य-दृष्टि का महत्वपूर्ण आयाम रहा है, किन्तु उसकी नींव में, मनुष्यता का वह सबसे निचला सोपान है, जो युग-युगों तक उसकी कड़ी को विस्तार देता रहेगा। वह अपने युग की कविता लिखकर भी केवल अपने समय की सीमा में नहीं बंधे रहते। वे उसका अतिक्रमण करते है और उसके उस मूल को पकड़ते है, जो भावी युगों तक कविता और मनुष्यता दोनों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बना रहेगा।

उनकी काव्य-यात्रा में एक महवपूर्ण पड़ाव उनके 1965 ई. में प्रकाशित 'फूल नहीं, रंग बोलते है' संग्रह की कविताओं का है। इसी संग्रह से उनके व्यक्तित्व की सृजनात्मक मौलिकता की छाप हिन्दी-जगत में कायम हुई। साहित्य में जब कि परकीया प्रेम को काफी जगह मिली, तब उन्होंने स्वकीया प्रेम की कविताओं का सृजन कर प्रेम को सच्चा गार्हस्थिक रूप प्रदान किया। राजनीति पर भी उन्होंने 'कहे केदार खरी-खरी' के रूप में कविताएं लिखीं। वे आजीवन 2000 ई. तक काव्य-सृजन करते रहे और हिन्दी कविता और मनुष्यता दोनों को वाणी देते रहे।

केदार की कवितों में संघर्ष, क्षोभ, मेहनतकश आदमी का संकल्प और पसीना इस संवेग के साथ व्यक्त हुआ है कि बड़े-बड़े सिद्धांत, आदर्श और दर्शन बेचारे पड़ जाते हैं. शायद इसी लिए केदार यह कहते हैं- या यौं कहें कि डंके की चोट पर कह पाते हैं कि यह धरती न राम की है, न कृष्ण की, न भीम की है, न सहदेव की और न राव की है, न रंक की ! – यह धरती तो सिर्फ़ किसान की है-


जो बैलों के कंधों पर
बरसात घाम में
जुआ भाग्य का रख देता है
खून चाटती हुई वायु में
पैनी कसी खेत के भीतर
दूर कलेजे तक ले जाकर
जोत डालता है मिट्टी को.......


केदार जी का आशावाद सघन है कि उसकी सबसे अच्छी झलक इस कविता में मिलती है- जिसमें मज़दूर के घर एक बच्चे को जन्म लेने को केदार अपनी ही भाषा व्याख्यायित करते हैं. इतनी तेज प्रभाव छोड़ने वाली शक्तिमयी कविताएं समूचे प्रगतिवादी काव्य में बहुत कम मिलती हैं. जिसमें समाज में संवेग पैदा करने की शक्ति निहित है-


एक हथौड़े वाला घर में और हुआ !
माता रही विचार
अंधेरा हरने वाला और हुआ !
दादा रहे निहार :
सबेरा करने वाला और हुआ !

केदार जी की कविता यथार्थ की कठोर जमीन पर चलती है, यथार्थ के बीच से जन्म लेती है. उनकी कविता में शोषण, शोषित और विषमता के उस दुश्चक्र का उद्घाटन होता है जिसमें सदियों से आम़ लोग (लोक-जगत) फ़से-क़से, पीसे-कुटे चक्कर काट रहे हैं. यद्यपि विषमता का कारण केदार जी पूँजीवादी सभ्यता और संस्कृति की शोषण आधारित अर्थव्यवस्था को मानते हैं. किंतु वे लोग भी उतने ही दोषी हैं जो छोटे-छोटे सुख- स्वार्थों के कारण ‘विचार’ से रिश्ता काट लिए हैं या ‘विचार’ का धरातल सुखा दिया गया है?


गुड़गुड़ गुड़गुड़ हुक़्का पकड़े
खूब धड़ाके धुआँ उड़ाते,
फूहड़ बातों की चर्चा के
फौबारे फैलाते जाते।
या
फिर-घंटो आल्हा सुनते-सुनते
सो जाते हैं मुरद़ा जैसे।


केदार जी ने ग्रामीण जीवन के वैषम्य की वास्तविक अनुभूति का जीवंत चित्रण ‘मज़दूर’ कविता में किया है-


रोटी के टूकड़ों को दाँत से काटते
माँजते हैं बरतन,
नंगी ही धरती पर सोते हैं
काँखते-हाँफ़ते,
रोज की बद़बू में सड़ते है दुनिया की।


कुछ आलोचक केदार जी की सीधी और सपट कविताओं में अति- सरलता का आरोप लगाते हैं परंतु यह भूल जाते हैं कि केदार जी लोक-चेतना के कवि हैं और उन्होंने सरलता व निर्भयता अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया है ताकि उसका परिणाम लोकगामी व दूरगामी हो सके. अतः उसमें काव्य-कौशल की परछाहीं ढूढ़ना संगत नहीं है.


केदारनाथ अग्रवाल की सौंदर्य-दृष्टि ग्रामीण परिवेश में लोक-संवेदना के माध्यम से सामने आयी है. वास्तव में उनकी प्रगतिशील मार्क्सवादी सौंदर्य-दृष्टि जीवन की समस्त अभिव्यक्ति में सौंदर्य के कण खोजती है. केदार जी के अनुसार कलागत सौंदर्य का मूल्यांकन करते समय हमारी दृष्टि मूल रूप से इस पर टिकती है कि क्या हमारी अवधारणा के अनुसार जैसा जीवन होना चाहिए, वैसा जीवन कलाकृति में चित्रित हुआ है ? प्रकृति के चित्र उनकी सभी काव्य-कृतियों में देखने को मिल जाते हैं. ‘नींद के बादल’ में प्रकृति-चित्रण के विविध रूप देखने को मिलते हैं -


“नीरव नभ की ओ मनोरम तारिका प्रिय प्राण!
वेदना की यह कहनी है मधुर वरदान”.


इतना ही नहीं, प्रभात का चित्रण करते समय भी वह छायावादी चेतना से अलग यथार्थवादी पद्धति पर खड़ा होकर अपनी अभिव्यक्ति को प्रस्तुत करता है. यही करण है कि वे यह लिखते हैं-


यह उदास-सा नीम खड़ा है मन को बिल्कुल डाले
डाल-डाल पर छाँह बिछी है सोते निर्मम छाले
नहीं झूमता एवरग्रीन ले लाल कुसुम के प्याले
खड़ा हुआ है जैसे-तैसे अपनी साँस संभाले
मेरा छोटा-सा कनेर प्यारा चुपचाप खड़ा है।


केदार के प्रकृति-चित्रण में एकदम भावनाओं का उन्मुक्त प्रवाह और मस्ती है. उनकी कृति “बासंती हवा” में जीवन का संगीत बावला और मस्तमौला होकर बोलता है-


पथिक आ रहा था
उसी पर ढकेला
लगी जा हृदय से
कमर से चिपक कर
हँसी ज़ोर से मैं
हँसी सब दिशाएं
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी
बसंती हँसी में
हँसी सृष्टि सीरी।


केदार जी के बिंब सहज और सटीक, प्रकृति द्वारा जिंदगी की गथा गाते हैं-


और सरसों की न पूछो हो गई सबसे सयानी
हाथ पिले कर लिए हैं ब्याह मंडप में पधारी।
या
चोली फटी सरस सरसों की
लहंगा गिरा फागुनी नीचे
चूनर उड़ी अकासी नीली
नंगी हुई पहीड़ी देखो।


छायावाद में प्रकृति और सुन्दरता की एक रसता थी, उसे केदार जी अपनी तरह से आगे बढ़ते हैं. छायावादी सूक्ष्म अर्थभंगिमाओं से इंकार न करते हुए, उसे रहस्य के कुहराजाल में नहीं धसने देते. रेत में आधे धंस कर सुंदरता को निहारती यह नज़र देखिए-


चंपई आकाश तुम हो.....
हम जिसे पाते नहीं
बस देखते हैं;
रेत में आधे गड़े।


केदार जी के यहाँ सौंदर्य की इतनी बारीक, कोमल भंगिमाएं हैं कि गीतिकाव्य और सौंदर्य-बोधी कहा जाने वाला छायावाद में भी ऐसा उदाहरण कम मिलते हैं. दर्पण के आगे केश संवारती रूपमुग्धा की यह छवि एकदम ताजगी भरी है-


दर्पण में खड़ी हो तुम
वसंतोत्सव की मुद्रा में
फेंकर पीछे
शीशे से उतर कर पीछे जाता अंधकार
देख कर मुझे हो रहा है तुमसे प्यार।


केदार की कविताओं में गृहस्त जीवन का सुख छलक पड़ा है, छोटे-छोटे चित्रों में भारत का लोक दांपत्य जीवन, अपनी विविधता और खूबियों के साथ चित्रित हुआ है. दांपत्य जीवन की आंतरिक आभा सजी केदार की कविताओं का मूल्यांकन होना बाकि है.
केदार जी लोकधर्मी संवेदना के कवि हैं- अर्थात आम़ जनता की संवेदना के प्रति जो कर्तव्य होता है जैसे- जनता में जागृति पैदा करना; उन्हें शिक्षा व विकास के लिए सचेत करना; प्रगति मार्ग में पड़ी बाधाओं को दूर कर, मार्ग प्रशस्त करना. शोषण के चक्र-चंगुल से जनता को मुक्त होने का संवेग पैदा करना. अंधविश्वासों, कर्मकांडों, यथास्थितिवाद के विरुध तार्किकता पैदा करना. अर्थ, विकास और समाज को समझने की वैज्ञानिक सोच पैदा करना ही लोकधर्मिता है. लोक नायक इसी लोकधर्मी संवेदना का नेतृत्व करते है. कि “लोग ऐतिहासिक द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को समझ कर, अपनी जीवन दृष्टि विकसित करें”.


केदारनाथ अग्रवाल को दूसरा सप्तक में सम्मिलित होने का निमंत्रण मिला था जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। प्रयोगवाद के साथ आई आधुनिकता में व्यक्तिकेंद्रितता जिस कुंठा को ला रही थी उसे केदारजी अस्वीकार करते थे। आस्था उनकी कविता का मुख्य स्वर थी। उनकी कविता का सौंदर्य बोध श्रम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा था। श्रम के साथ गतिशीलता अभिन्न रूप से जुड़ी है और केदारजी की लयात्मकता ने उसके सौंदर्य का असीम विस्तार किया। स्वातं˜योत्तर भारत की उमंग के साथ गुनगुनाने योग्य सर्वाधिक पंक्तियां केदारनाथ अग्रवाल के खाते में हैं, उदाहरण के लिए- हवा हूं हवा मैं बसन्ती हवा हूं, या फिर- दिन हिरन सा चौकड़ी भरता चला। प्रकृति केन्द्रित ये कविताएं किसी निविड़ एकांत की और नहीं ले जातीं बल्कि प्रकृति और मानव के सघन रिश्ते को ही मजबूत करती हैं। वहीं, केदार जी की इन कविताओं में गहरी ऎन्द्रिक चेतना है। हिन्दी में पत्नी को संबोधित सर्वाधिक कविताएं भी केदार जी ने ही लिखी हैं और यह बात भी रेखांकित की जानी चाहिए कि व्यास बढ़ने के साथ इन कविताओं की ऎंद्रिकता और सघन होती गई। जहां एक और आरोपित नैतिकता से घिरे लेखकों के यहां अशरीरी प्रेम की और बढ़ना आदर्श के रूप में चित्रित हुआ वहीं केदारजी की अकुंठ प्रेम भावना ने उनके ऎन्द्रियबोध को और प्रखर बनाया

बाबा नागार्जुन द्वारा केदार जी के लिए लिखी ये पंक्तियां कितनी सटीक हैं- केन कूल की काली मिट्टी, वह भी तुम हो! / कालिंजर का चौड़ा सीना, वह भी तुम हो! ग्राम वधू की दबी हुई कजरारी चितवन, वह भी तुम हो! कुपित कृषक की टेढ़ी भौहें, वह भी तुम हो!

शैलेन्द्र चौहान, 34/242, प्रतापनगर, सेक्टर-3, जयपुर, (राजस्थान)-303033, मो.-09419173960, EMail : shailendrachau@gmail.com

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