शनिवार, 24 नवंबर 2012

मनोज 'आजिज़' की नज़्म

नावाकिफ
-- मनोज 'आजिज़'

सब कुछ कायदे से चल रहा था
लबों पर मखमली हंसी थी
हर एक इशारा
अपनी बात को रवां करने में
कामयाब ।
रिश्ते  पर नाज
और कभी गुरुर भी
पर
एकाएक
कोई बात नागवार गुजरी
और बात बढ़ गयी
रिश्ते की मिठास में
घुल गयी कड़वाहट की जहर
हर लम्हा नफरत की बू
को दे रहा था दस्तक ।
बंद कमरे में कोसने  का सिलसिला
एक सच्चाई से नावाकिफ--
कि --
रिश्ते को नजर लगा है
' बे -इन्तिहाँ उम्मीद' की

--
संपर्क- जमशेदपुर, झारखण्ड

mkp4ujsr@gmail.com

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