मोतीलाल की कविता - गर्भ से बाहर

मैं आंसू गिराती हूँ 
एक सीलन भरी खोली में
और घुटती रहती हूँ
ठेहुने के बीच सर रखकर ।

मैं मशीन बन जाती हूँ
घर में रसोई की तरह
आफिस में कम्प्यूटर की तरह
बच्चों में नाखूनों की तरह
जो समय बचा पाती हूँ
पलंग के सिलवटो में गुम हो जाती है ।

न जाने कितने वर्ष गुजर गये
उन कविताओं को छुए हुए
होंठों पर के गीत
कहीं भीतर दम तोड़ चुका है
न जाने मन का सुग्गा कहाँ उड़ चला है ।

मैं लागातार बहती रहती हूँ
हस्ती की लय भोगते हुए इसी जमीन में
चेहरे के गरजते सागर में
कोई फूल नहीं उगा है
मैं बेचैन चहलकदमी करती
गमले बन जाने की पीड़ा में
उकड़ू बैठी उस आँच को निहारती हूँ
जहाँ समय की परिधी में कोई रस्सी
लताएं बनकर सामने नहीं आती हैं ।

कभी-कभी मुझे लगता है
इन आंसुओं के पार
इस सीलन से दूर
किसी पेड़ की छांह में जा बैठूं
और निहारुं उन लाल-नीली चिड़ियों को
जो गाते नहीं थकते मधुर गीत
फुनगी के पार फैले अनंत आकाश को
भर लूं अपनी बाहों में
और बन जाऊं एक चिड़िया
डैनों को खोल
उड़ता फिरु अनंत हवाओं में ।

* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

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