शनिवार, 17 नवंबर 2012

मिथिलेश दीक्षित के हाइकु

यादें

डॉ. मिथिलेश दीक्षित


यादों के पंख
और ऊँचा आकाश
श्वासों का पाश


आ जाती है
सपनों में भी याद
पुरानी बात ।


नहीं भूलते
मीठी-मीठी यादों में
मन के रिश्ते ।


जीवन खिला
स्मृतियों का वैभव
हमको मिला ।


माँगी दुआएँ
यादों के मोतियों की
गूँथी मालाएँ ।


किया बसेरा
जीवन की संध्या को
यादों ने घेरा ।


आने लगी है
यादों की धूप-छाँव
मन के गाँव ।


एक किरण
कौंधी मन के नभ
याद आ गयी ।


सदाबहार
सूखते कभी नहीं
यादों के घाव ।


ढल न जाये
पत्थरों के बुत में
अपनी याद ।

बड़े विचित्र
यादों के कैमरे से
खींचे हैं चित्र ।


जीवन पाया
स्मृति के सुमनों से
पूरा सजाया ।


मैंने बसाये
मन के नगर में
यादों के घर ।


विषैली कील
अटक जाती मेरी
यादों की रील ।


हे भगवान
न आने पाये कभी
बुरों की याद ।


सखी-सहेली
सावन वाले झूले
कभी न भूलें ।


यादों का गांव
रूनझुन पायल'
कोमल पाँव ।


अश्रु नहीं ये
बूढ़े नयनों की हैं
धुँधली यादें ।


नयन मूँद
बचपन में झाँका
खुद को आँका ।


दूर देश में
बूढ़ी आँखों का तारा
फोन सहारा ।

उतनी यादें
जितना विस्मृत था
अतीत वह ।


एक ही पल
दृश्यों से भर जाता
स्मृति-पटल ।


पूरी-कहानी
एक धागे में बँधी
यादें पुरानी ।


बिन्दु से बिन्दु
जोड़-जोड़ बनता
स्मृति का सिन्धु ।


चलती आगे
खींच रही हैं पीछे
कितनी यादें ।


चित्र उभरा
चित्त में गहरी जो
उतरी याद ।


तीव्र आतप
फिर भी हरे-भरे
स्मृति-पादप ।


जीवन लाये
यादों के घहराये
बादल आये ।


बनते गीत
स्मृति को जन्म देता
मेरा अतीत ।


याद बसाऊँ
इस उर में प्रमु
तेरी ही तेरी ।

डॉ.मिथिलेश दीक्षित
संजयगांधीपुरम
लखनऊ

2 blogger-facebook:

  1. चलती आगे
    खींच रही हैं पीछे
    कितनी यादें ।

    सभी हाइकु बहुत अच्छे लगे...सादर बधाई|

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूबसूरत यादों के रूप !:)
    "यादें पखेरू,
    दिल है आसमान,
    आँखें बसेरा..."
    ~सादर

    उत्तर देंहटाएं

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