शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

-अजय कुमार मिश्र‘अजय श्री‘ की कविता - आशा

आशा

उड़ती थी वो खुले आकाश में,

अपनी आकांक्षाओं के साथ में,

खुश थी अपनी छोटी-छोटी आशाओं के साथ,

अपने घेांसले में रहती थी,अपने जोड़े के साथ,

पतझड़ आते ही खुश होती बसंत आयेगा,

नई कलियों,नये कपोलों का मौसम आयेगा,

बीत गये कितने बसंत ,पर चाह थी जिसकी,

चहचहाये,चिल्‍लाये,कुछ आवाजें आये उसके घोंसले से,

पर उसकी बात थी निराली,

चाह कर भी न बन पायी,इन आवाजों वाली,

क्‍या-क्‍या न जतन किये अपने साथ,

छोड़ दिया खुद को चलती हवाओं के साथ,

उडी़ं,उड़ती रही जैसे हवावों ने उड़ाया,

जब रूकी हवायें ,तब उसे अपना वजूद नजर नहीं आया,

बहुत दूर थी अपने धरातल से,

आस-पास थे कुछ परिंदे,

जिसे जानती थी वो,पहचानती नहीं,

हां एक रिश्‍ता था,उन सबके साथ,

उड़ी थी कुछ दूर हर एक के साथ,

हर परिंदा उड़ता था कुछ दूर,फिर राह में छोड़ जाता था,

वह चाहती थी लौटना, अपने घोंसले में,

पर तिनका-तिनका बिखर गया था,

बरसात हो रही थी तेज हवाओं के साथ,

पड़ा था उसका जोडा अपनी वफाओं के साथ,

दूर देखा था ,उसने उसको,

पास आते ही फड़फड़ाया ,नयी आशाओं के साथ।

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अटल सत्‍य

सत्‍य सुना है बहुत आपने,

एक सत्‍य और सुनाता हूँ,

ब्रह्मा,विष्‍णु और महेश आप है,

ये अटल सत्‍य समझाता हूँ।

�किया गर्भ जब धारण मां ने

तब तुम ब्रह्मा कहलाये,

पाकर मानव का शरीर तब,

तुम धरती पर आये,

बन कर पालन हार तुम्‍हारा

पग-पग तुम्‍हें संभाला,

अच्‍छे बुरे का फर्क बताकर,

बनाकर विष्‍णु भव सागर (सांसारिक जीवन) में डाला।

डूब के भव सागर में जब तुम,

जीवन विष (सुख-दुख) पी बाहर आये,

वर्षो का अनुभव ले तुम,

खुद को शिव मूरत में पाये।

अब रहा भेद न सत्‍य असत्‍य का,

और रहा भेद न जीवन मृत्‍यु का,

पंचतत्‍व में हुआ विलीन जो,

वो कैसी काया,

मानव शरीर में ही मैंने,

बह्मा विष्‍णु और महेश को पाया।

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-अजय कुमार मिश्र‘अजय श्री‘

लखनउ उप्र

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