शनिवार, 17 नवंबर 2012

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथा - मनोरंजन मेला

कंडे का कंडा       

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मनोरंजन मेला                                                                                     

सारे शहर में मुनादी हो रही थी,‘‘ देखिए मनोरंजन मेला, मनोरंजन मेला।’’

शहर की दाना मंडी में बड़े-बड़े तंबू लगे हुए हैं। वहां सरेआम जुआ तथा नाच-गाना हो रहा है। कुछ सियासी लोगों ने पूछा,‘‘ भई, यह क्या हो रहा है।’’

‘‘जनाब, यह मनोरंजन मेला है। यह देखिए हमारे पास डी.सी. साहब की अनुमति भी है।’’ उसने एक कागज दिखाते हुए कहा।

बात मंत्री तक पहुंच गई। अगले ही दिन मंत्री जी ने डी.सी. से पूछा,‘‘ भई, यह मनोरंजन मेला क्या है?’’

डी.सी. ने सफेद रंग का एक लिफाफा पकड़ाते हुए कहा,‘‘सर, यह लीजिए पार्टी?फंड, मनोरंजन मेले वालों ने भेजा है।’’

‘‘भई, मैं लोगों से क्या कहूंगा? लोग कहते हैं कि वहां तो भोले-भाले लोगों को फंसा कर लूटा जाता है और लड़कियां अधनंगी होकर डांस करती हैं। मैंने लोगों से वोटें भी तो लेनी हैं।’’ मंत्री जी बोले।

‘‘सर, इन्हें पांच-सात दिन तो हो गए हैं।... और पांच-सात दिन आप लोगों को आश्वासन देकर निकलवा दें।’’ डी.सी. साहब ने कहा।

मंत्री जी लोगों को आश्वासन देने की योजना बनाने लगे

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