गंगा प्रसाद शर्मा 'गुंशेखर' की दीवाली विशेष कविता - घर घर हो आली दीवाली

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घर-घर हो आली दीवाली ..
फूटें और भरें घर-आँगन
घर-घर मस्ती की फुलझड़ियाँ
बालकनी,छज्जों ,दीवारों पर
जगमग हों नन्हीं लड़ियाँ
द्वार-द्वार हो सजी रँगोली
रंग-रँगीले रूपों वाली


आए ऎसी ऋतु मतवाली .
घर-घर हो आली दीवाली ..
कितने बच्चे फुटपाथों पर
रैपर बीन रहे
उनमें से कुछ कुत्तों से हैं
दोने छीन रहे
इनके दर पर क्योंकर रख दी
हँस -हँस खाली प्याली?


आए ऎसी ऋतु मतवाली .
घर-घर हो आली दीवाली ..
एक राम के आने भर से
खुशी अयोध्या सारी
हाथ-हाथ ने दीपक लेकर
स्नेह -आरती वारी
पीछे प्यार मिला,लंका -
जब त्यागी सोने वाली।


आए ऎसी ऋतु मतवाली .
घर-घर हो आली दीवाली ..
जितने के हम फोड़ पटाखे
करें प्रदूषण भारी
उतने में ही हो सकती है
दूर कोई बीमारी
जीत उसी की जग में
जिसने नई परंपरा डाली .
आए ऎसी ऋतु मतवाली .

घर-घर दीप जलें खुशियों के
बच्चे-बूढ़े गायें गीत
मन का मैल मिले माटी में
बैर भाव सब जाएं रीत .
आए ऎसी ऋतु मतवाली .
घर-घर हो आली दीवाली ..


-डॉ॰गंगा प्रसाद शर्मा 'गुंशेखर'

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