शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

राजीव आनंद की कविताएँ

बस्‍ते का बोझ


चार साल का गोलू मेरा
नाम रखा है ओज
पढ़ने जाता सुबह-सुबह
लेकर भारी बस्‍ता का बोझ
   दब गयी है कहीं ओज की
   मासूमियत बस्‍ते के बोझ तले
   पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई का तनाव
   ओज क्‍या करे चाह के भी कैसे खेले
ओज रात में रोता है
पीठ और गर्दन में दर्द होता है
माँ तेल मलती फिर दवाई खिलाती
फिर भी ओज कहां चैन से सोता है
   डाक्‍टर को कई बार दिखलाया
   पेन किलर देने के बाद कुछ उपाय बतलाया
   बस्‍ता कमर के नीचे न लटके
   ओज को वाच करें चले नहीं देके झटके
   बस्‍ते के साथ ओज का दौड़ना बिल्‍कुल मना है
   समय-समय पर बस्‍ते लादे कंधे का मुआयना करना
   अगर कंधा लाल हो तो ये गोली खाने को देना
फिर भी अगर कंधे की लालिमा कम न हो
तो बस्‍ते के बोझ को कम करने की कोशिश करना
फिर भी अगर न आए अराम
तो फिर ओज का अल्‍लाह निगेहवान
   बस्‍ते का बोझ अगर कम करे तो
   बढ़ जाता है ओज का मानसिक तनाव
   बस्‍ते का बोझ अगर नहीं कम करे तो
   बढ़ जाता है ओज के मांसपेशियों में तनाव
कुबड़ा सा हो गया है ओज
बस्‍ते का बोझ उठाते-उठाते
हंसना, खेलना सब भूल गया है
निजी स्‍कूल जाते-जाते
   तय किया है हमलोगों ने कि
   ओज अब निजी स्‍कूल नहीं जाएगा
   कूबड़ा होकर जिंदगी ओज नहीं बितायेगा
   पढ़ने के लिए आइन्‍दा विद्यापीठ जाएगा
बोरे पर बैठाकर गुरूजी पाठ पढ़ायेगें
गंगा, यमुना, हिमालय से ओज को भेंट कराएगें
बाबा ब्‍लैक शीप से अच्‍छा है
ठेले में हिमालय को पढ़ना
अंग्रेजी में ‘इंडिया' को पढ़ने से
कहीं बेहतर है हिन्‍दी में ‘भारत' को पढ़ना !

खुदकुशी करते किसान


लाखों किसानों ने कर ली खुदकुशी
व्‍यवस्‍था के माथे पर शिकन तक नहीं
  उधार लेकर सोचा था करेगें ऐश
  जुटा नहीं पाए बैंकों को देने थे कैश
वर्त्‍तन-वासन, जर-जेवर बेच के भी देख लिया
कर्ज वसूली के मुकदमें ने चैन से जीने न दिया
  मांगा कर्ज कर्जों को तोड़ने के लिए
  रिश्‍तेदारों ने पहचाने से इंकार कर दिए
बाजार ने निचोड़ ली सारी खुशी
क्‍या करूं अगर न करूं खुदकुशी

शिक्षा का कर्ज


पढ़ाने के लिए लिया था कर्ज
पिता ने समझा इसे अपना फर्ज
   व्‍यवस्‍था ने दिलाया था कर्ज
   बाजार ने निभाया अपना फर्ज
लड़का लेकर कर्ज पढ़ गया
बाजार के बनाए सूली पर चढ़ गया
   कार और घर के लिए लड़के का लेना पड़ा कर्ज
   विवाह से पहले करना ऐसा लड़के का था फर्ज
नौकरी के उम्‍मीदवारों में नाम न था लड़के का दर्ज
जर-जोरू, घर-कार जुटाना हो गया लड़के का मरज
   व्‍यवस्‍था-बाजार का बस इतना ही था फर्ज
   कैसे चुकाएगा कर्ज ये अब है लड़के का मरज
पिता सोच रहा था कैसे तोड़ पाएगा इतना बड़ा कर्ज
जीतेजी तो नहीं दुर्घटनावश मृत्‍यु से चुक जाएगा कर्ज

ईरोम चान्‍हू शर्मिला


न जाने क्‍यों बारह वर्षों से
तिल-तिल कर खूद को फूंक रही हो
मुर्दों की इस बस्‍ती में
  अद्‌भुत हो तुम बापू की तरह
  स्‍वार्थियों के इस दुनिया में
  निस्‍वार्थ भाव से खूद को
  खत्‍म कर रही हो
उठो बदलो दिशा और दशा
तुम दिल्‍ली गयी पर दिल्‍ली दूर ही रही
दिल्‍ली अभी भी दूर ही है
तुमने खुदकुशी की पर बचा ली गयी
और बचे रहने को अभिशप्‍त बना दी गयी
उठो बदलो दिशा और दशा
नहीं रहने पर तुम्‍हारे क्‍या हो सकेगा पूरा
बारह वर्षों से जो तुमने करने को ठानी है
खामोश चीत्‍कार तुम्‍हारे खामोश हाहाकार को
कौन सुनेगा इन बहरों के बस्‍ती में
उठो बदलो दिशा और दशा
बदलते जमाने के साथ
तुम्‍हें भी बदलना होगा
तुम चाहती हो जो करना
उसके लिए फकत पैतरा बदलना होगा
उठो बदलो दिशा और दशा

दीवारें अगर आइना होते


दीवारें अगर आइना होते
तो मेरे तड़पने का राज खोल देते ।
आवाजें अगर मिट न जाती
तो मेरे कराहों को दुहरा देती ।
शम्‍मा पर अगर रात भारी न होती
तो मेरे जख्‍मों को दिखा दी होती ।
गमों को चबाना गर नहीं आता
तो आफतों ने खाई में गिरा दिया होता ।

शीर्ष पर ठहरना कठिन
शीर्ष पर प्रकृति का
आक्रमण
अधिक वेग से होता है
धूप ज्‍यादा जलाएगा
आंधी जड़ तक हिलाएगा
पानी पूर्णरूपेण भिंगाएगा
इसलिए
शीर्ष पर पहुंचना तो आसान है
ठहरना कठिन

 


राजीव आनंद
मो.9471765417
rajivanand71@gmail.com

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