गुरुवार, 15 नवंबर 2012

ज्योति सिन्हा का आलेख - मानसिक विकार-विकृतियों के निदान में संगीत के विशिष्ट तत्वों का चिकित्सकीय विश्लेषण

मानसिक विकार-विकृतियों के निदान में संगीत के विशिष्ट तत्त्वों का चिकित्सकीय विश्लेषण

( विशेष सन्दर्भ- संगीत चिकित्सा )

डॉ0 ज्योति सिन्हा

प्रवक्ता-संगीत

भारती महिला पी0जी0 कालेज, जौनपुर एवं रिसर्च एसोसियेट

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान

राष्ट्रपति निवास शिमला, हिमांचल प्रदेश

कलायें जो मानव मन की संवेदनाओं, अनुभूतियों को अभिव्यक्त करती हैं, जीवन की सार्थकता को बयां करती हैं, जीवन जीने की कला सिखाती है, तथा साथ ही हमारे अतीत का दर्पण होती हैं। समस्त कलाओं में संगीत विद्या सर्वोपरि है।

भारतीय संगीत केवल स्वरों का ताना-बाना नहीं है और ना ही केवल मनोविनोद का साधन है बल्कि समस्त मानव जाति के मन को संस्कार, शरीर को प्राण एवं लोक कल्याण की भावना की प्रेरणास्रोत बनकर मनुष्यता का निर्माण करने में सक्षम है।

संगीत की सुमधुर स्वर लहरियों से विकार-विकृतियों का उपचार ही संगीत चिकित्सा अथवा Music Therapy है। इन स्वर लहरियों से जहां तन मन जाग्रत होता है, वहीं स्वस्थ वातावरण का निर्माण होता है। जहाँ अन्य औषधिय प्रणालियां निदान के साथ-साथ किसी न किसी रूप में अपने दुष्परिणाम भी देती है। ऐसे में संगीत चिकित्सा अवश्य ही सिर्फ और सिर्फ निदान करती है। संगीत यद्यपि अपने विविध रूपों में मानव जीवन के लिये रक्तिदायक एवं मुक्तिदायक रहा है परन्तु इसके साथ ही जन सामान्य के लिये, इसके चिकित्सा रूपी उपयोगी पक्ष को जीवन के विविध आयामों में उतारकर चिकित्सा का प्रारूप दिया गया। संगीत एक ऐसा पोषक तत्व है जो मन और आत्मा के लिये औषधि का कार्य करता है। इसके सफल परिणामों को देखकर आज विषाद ग्रस्त समाज इस चिकित्सा पद्धति की ओर आशाभरी निगाहों से देख रहा है।

'नाद' और गति संगीत के ये दो मुख्य तत्व हमें प्रकृति से ही प्राप्त हुये हैं। विशेषता यह है कि प्रकृति में समाविष्ट नाद और गति को मानव ने अपनी बुद्धि से परिष्कृत किया तथा उसे परिमार्जित रूप प्रदान किया। नाद तथा गति के ही परिमार्जित रूप स्वर और लय के रूप में प्रस्फुटित हुये। इस विशिष्ट विशिष्टता के कारण ही ललित कलाओं में संगीत अपना एक अनूठा, चमत्कारिक और सम्मानपूर्ण स्थान बनाये हुये है। मनुष्य के साथ-साथ जीव-जन्तु भी संगीत के जादुई प्रभाव से वंचित नहीं है। बीन की धुन पर सर्प का झूमना इसी प्रभाव को स्पष्ट करती है। नाद की प्रशंसा में वृद्धद्देशी में उल्लिखित है कि-

''नाद रूपः स्मृतो ब्रह्मा नाद रूपो जनार्दनः

नाद रूपा पराशक्तिनाद रूपो महेश्वरः।

वही संगीत की प्रशंसा में संगीत रत्नाकर में

इस प्रकार उल्लेख मिलता है-

''सामगीतिरतो ब्रह्मा, वीणासक्ता सरस्वती।

किमन्ये यक्षगन्धर्व देव दानव मानवाः।।

तस्य गीतस्य महात्म्यंके के प्रशंसितुमीशते।

धर्मार्थकाममोक्षाणामिदमेवैक साधनम्।।

संगीत का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव-मनोभावों का। मानव प्रयत्नों द्वारा संगीत कला विभिन्न युगों में उत्तरोत्तर विकसित होती गयी। वास्तव में प्राचीनता व नवीनता का सम्मिश्रण ही संगीत को सहज, सुन्दर, जनरूचि के अनुरूप एवं लोकप्रिय बनाता है। अतः भारतीय संगीत की सांस्कृतिक प्रक्रिया जितनी प्राची है, उतनी नवीन है।

भारतीय संगीत के सन्दर्भ में जब हम संगीत चिकित्सा की बात करते हैं, तो पाते हैं कि भारतीय संगीत का इतिहास ऐसे कथाओं में भरा है जो इस बात का द्योतक है कि संगीत में रोग निवारक की क्षमता है। अतीत से ही संगीत का उपयोग मानव की भौतिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक दुर्बलताओं से मुक्त होने के लिये किया जाता रहा है। प्राचीन भारत के आर्य ऋषि लोगों की संगीत के विषय में यह धारणा रही है कि संगीत द्वारा मानव के मस्तिष्क को शान्ति मिलती है और वह अपनी शान्तिपूर्ण जीवन यात्रा समाप्त कर मोक्ष को प्राप्त होता है। उनके विचार से संगीत प्रेम, करूणा, दया और उदारता के भाव उत्पन्न करने का साधन है। वे इस बात पर विश्वास करते थे कि मानव शरीर स्वयं एक संगीत वाद्य है और संगत स्वर उसकी आत्मा है।

संगीत के चिकित्सकीय प्रयोग का उल्लेख ताम्र युग में मिलता है। ऐतिहासिक ग्रंथों से यह प्रमाण मिलता है कि- ''उस काल में जब कोई बीमार पड़ जाता था तो यह लोग उसे दवा नहीं देते थे, बल्कि संगीत द्वारा उसका उपचार करते थे और इस संगीतिक उपचार से अनेक व्यक्ति स्वस्थ और सुन्दर बन जाते थे।'' इसी प्रकार द्रविड़ों को भी संगीत के वैज्ञानिक रूप का पता था और उन्होंने इसका प्रयोग चिकित्सा के रूप में किया इसका उल्लेख 'डास्कीयोलो ने अपनी पुस्तक "The History of Human Race" में किया है।

वेदो में सामवेद की गरिमा ''वेदानांसामवेदोऽस्मि'' से ही स्पष्ट हो जाती है। अभिव्यक्ति के तीन माध्यमों गद्य, पद्य एवं गायन में, गायन को भावविद्या में सबसे अग्रणी देखकर उसे विशेष महत्व दिया गया। भावतरंगों के रहस्यमय दिव्य प्रयोगों को सम्पन्न करने वाले गान के मंत्रों को अपेक्षाकृत कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना गया।

विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए साम गायन का प्रयोग विविध तरीकों से किया जाता था। कामनाओं में मनुष्य की सबसे बड़ी कामना ''आयुष्य'' की होती है। कुछ सामों के समुदाय को ''अरिस्ट'' संज्ञा दी गयी। इस अरिष्ट वर्ग के एक या अनेक सामों का गान करने से मनुष्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। 'पिबा सोमं' (साम 398) से उत्पन्न दो सामों का गान करने से मनुष्य दीर्घायु होता है।

सुख, समृद्धि, पुष्टि आदि के लिये जो कर्म किया जाता है उनको पौष्टिक कर्म तथा रोग की निवृत्ति के लिये जो कर्म किये जाते हैं उन्हें शान्तिक कर्म कहते हैं। इन दोनों प्रकार के कर्मों के लिये सामो के प्रयोग का विधान है। जैसे देवव्रत साम का (5.5, 212-214) सहस्रबार गान करके अग्नि में आहुति डालने से कल्याण की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार रोगादि के निवारण के लिये भी साम गानों का विधान मिलता है। रोग शान्ति की कामना करने वाले महारोगी की रोग के शान्ति के साम गानों का विधान मिलता है। रोग शान्ति की कामना करने वाले महारोगी की रोग के शान्ति के लिये- 'विश्वापृतनाः' (साम 370) इस साम का गान करें। क्षुद्र रोग की शान्ति के लिये 'शन्नो देवी' (1,2,23) इस साम के गान तथा 'क्षयरोग' की शान्ति के लिये अचोदस' इस साम का विधान मिलता है।

इसी प्रकार अश्विनी कुमारो के 'भैषज मंत्र' में हर रोग के लिये चार प्रकार के भैषज कहे गये हैं। पावनौकष, जलौकष, बनौकष और शाब्दिक। क्रौंचमुनि के ग्रन्थ 'कुर्णक प्रभा' के प्रथम प्रकरण में शब्द की व्युत्पत्ति, शब्द और शरीर का सम्बन्ध, शब्द समय में राग मान और शब्द विकृति के प्रकार दिये गये हैं। मैंद ऋषि ने अपने ग्रन्थ 'शब्द-कौतुहल' में चार हजार श्लोकों को तीस प्रकरणों के अन्तर्गत विभाजित किया है। पहले प्रकरण में रोगी के शब्द से निदान शाब्दिक औषधि-वीणा तंत्री, प्रणव, शंख, भेरी, मृदंग, मजीरा, बंशी आदि बाजे भेषज से ही बनाने और उसे सुनाकर रोगाहरण का विवरण है। हर रोग के लिये पृथक-पृथक बाजों के शब्द और कौन किसके लिये प्रधान है, तथा तीसरे प्रकरण में अमूक प्रकार के श्रवण-मनन और कीर्तन से रोग हरण का विवरण है।

'सिद्ध योग'- में अनाहतनाद के नौ गुण बताये गये हैं। जिनमें सबसे पहले 'धोषात्मक' नाद प्रगट होता है, जो आत्म शुद्धि का उत्कृष्ट साधन है। वह उत्तम नाद सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत करके अपनी ओर खींचने वाला है।

गायत्री महामंत्र की महाशक्ति से हमारे पूर्वज भलिभाँति परिचित थे। गायत्री महामंत्र के चौबीस चमत्कारिक महत्व, प्रभाव बताये गये हैं। जिससे पन्द्रहवें प्रभाव में यह वर्णित है कि गायत्री मंत्रों के सस्वर जाप से कायिक कष्टों से मुक्ति, निवृत्ति मिलती है। गायत्री साधना से असाध्य रोग के रोगी को मौत के मुँह से वापस लौटते देखा गया है। मंत्र एक ऐसी रामबाण औषधि है, जिसके सामने चिकित्सा शास्त्र मूक प्रतीत होता है।

पाश्चात्य मनीषी भारतीय स्वर संगीत को अति प्राचीन एवं समृद्ध मानते हैं। इस सन्दर्भ में मैकडानल ने 'ए वैदिक ग्रामर फर स्टूडेन्ट' नामक पुस्तक में वैदिक स्वर को संगीतमय कहा है क्योंकि यह मुख्यतः स्वर की तारतम्यता पर अवलम्बित है। इसी तथ्य को 'म्यूजिक ऑफ हिन्दुस्तान' में उल्लेख करते हैं कि वेदों में संगीत की अद्भुत तकनीके विद्यमान हैं ऋषि इसके विशेषज्ञ थे और इसका प्रयोग करते थे। फुर्ट शैक ने 'द राइज ऑफ म्यूजिक इन द एन्शियेन्ट वर्ल्ड' में तो वैदिक स्वर और संगीत को मानव जीवन का प्राण बताया है।

महर्षि नारद ने संगीत मकरंद में लिखा है कि यश, लाभ, संतान, आयु इत्यादि के लिए पूर्ण जाति के रागों का प्रयोग करना चाहिये। संग्राम, रूप लावण्य, विरह और किसी के गुण कीर्तन की दशाओं में षौडव रागों का प्रयोग करना चाहिए किसी व्याधि को दूर करने, शत्रु का नाश करने और भय-शोक में व्याधि या दारिद्रय के संताप या विषय ग्रह मोचन के लिए शारीरिक स्वस्थ और मंगल के लिए आडव रागों का प्रयोग करना चाहिए -

आयु धर्म यशोबुद्धि धन-धान्य फलंलभेत्।

रागाभिबुद्धिसंतान पूर्ण रागाः प्रगीयते्।।

संग्राम रूप लावण्यमं विरहं गुण कीर्तनम्।

षॉडवेन प्रगातव्यं लक्षण गदितं यथा।।

व्याधिनाशे, शत्रु नाशे भयशोक विनाशनें।

व्याधिदरिद्रय संतापे विषम ग्रहमोचनें।।

कायाडाम्बर नासे च मंगल विष संहते।

ऑडवेन प्रगातव्यं ग्राम शान्त्यथं कर्मणि।।

हमारा भारतीय संगीत वैदिक है, सनातन है, और वैज्ञानिक है। प्राचीन ऋषियों, मुनियों और महर्षियों ने इसकी महत्ता को भली भांति जाना एवं अनेक सिद्धियों को प्राप्त किया। इसी प्रकार सामाजिक जीवन में भी श्रम करते समय गीत गाना अथवा अलापना प्राचीन काल से रहा। मिट्टी के बर्तन बनाते वक्त, जाता पिसते वक्त, हल चलाते, खेतों में बुआई-निराई करते, ओखली अथवा ढ़ेका में अन्न कूटते, मछली पकड़ते, शिकार करते तथा बच्चों को झूला झूलाते व सुलाते वक्त इन सभी कार्यों को करते समय श्रम का परिहार एवं इन्हें करने की प्रेरणा भी स्वरों से मिली।

इस प्रकार किसी न किसी रूप में संगीत चिकित्सा सदैव ही रहा है।

यदि हम मध्यकालीन संगीत की चर्चा करें तो इस बात स्पष्ट होती है कि भारतीय संगीत का जो रूप वैदिक काल में रहा, यह काल में उससे भिन्न हो गया। संगीत की वन्दनीय पवित्र रूप अपने स्तर से हटकर मनोरंजनात्मक प्रभावों से अधिक प्रभावित हुआ। जो संगीत यज्ञ के अवसरों पर देवताओं को प्रसन्न करते थे। अब मध्य काल में राजदरबारों में आकर प्रतिष्ठित हुआ। फिर भी कुछ महान संगीतज्ञों द्वारा संगीत के प्रभाव से चमात्कारिक घटनायें उत्पन्न करने के उदाहरण प्राप्त होेते हैं। तानसेन द्वारा दीपक राग गाकर अग्नि प्रज्जवलित करन, मृगों को बुला लेना, मल्हार राग से वर्षा करा देना इत्यादि अनेकों घटनाओं की चर्चा विभिन्न ग्रन्थों में मिलती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि संगीत के प्रभावों से सर्वसाधरण भलि-भांति परिचित थे। सूरदास, मीराबाई, कबीर जैसे संत संगीत की अपूर्व शक्ति से परिचित थे तभी उन्होंने संगीत को अपनी भक्ति का माध्यम बनाया।

मध्यकाल में ही आचार्य शारंगदेव ने अपने ग्रन्थ संगीत रत्नाकर में, 'स्वराध्याय' अध्याय में स्वरों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए विभिन्न स्वरों से सम्बन्धित स्नायुवों, चक्रों और शारीरिक अंगों का विवरण दिया है।

यद्यपि मध्यकाल संगीत के विकास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण रहा परन्तु इसके विज्ञान पक्ष की ओर उस स्तर से विचार नहीं हुआ जो वैदिक काल में रहा। दइसकी अपेक्षा संगीत के कलापक्ष व भावपक्ष पर विशेष ध्यान दिया गया।

बीसवीं सदी जो विज्ञान के साथ आरम्भ हुआ तो फिर से संगीत पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार किया जाने लगा। इस क्षेत्र में संगीत के चिकित्सकीय प्रभाव को सिद्ध करने का महत्वपूर्ण कार्य संगीत मार्तण्ड पं0 ओंकार नाथ ठाकुर ने किया। इटली के शासक जो अनिद्रा रोग से पीड़ित थे, पं0 जी ने आपने गायन से इस रोग को दूर किया। इसी तरह अपने गायन से खूंखार शेर को शांत कर वश में किया।

यद्यिपि संगीत-चिकित्सा का मूल भारतीय संगीत में प्राचीनकाल से मिलता है परन्तु बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में जितना व्यापक अनसंधान, शोध, प्रयोग, श्रवण एवं मनन, चिन्तन, पाश्चात्य देशों में हुआ उतना अपेक्षित कार्य हमारे देश में भी नहीं हुआ। पाश्चात्य देश भी भारतीय प्रेरणा से ही अनुप्राणित थे। अरस्तू, प्लेटो, पायथागोरस आदि सभी संगीत चिकित्सा के व्यापक प्रभाव से परिचित थे। अरस्तू का कहना है कि- बांसूरी की तानों में भावनाओं को पुष्ट करने की अद्भुत क्षमता है। पायथागोरस के अनुसार संगीत में आश्चर्यजनक हीलींग विशेषता विद्यमान है।

बीसवीं सदी में यूरोप में यह चिकित्सा प्रतिष्ठित हो चुकी थी। उन दिनों डिप्रेशन आदि मनोविकारों को दूर करने के लिये इस चिकित्सा की सहायता ली जाती थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात घायल सैनिकों को राहत प्रदान करने के लिये संगगीत का सहारा लिया गया जिसका सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुआ। इसके फलस्वरूप 1944 ई0 में ''मिशिगन विश्वविद्यालय'' द्वारा संगीत चिकित्सा का पाठ्यक्रम तैयार किया गया और 1946 ई0 में ''कन्यास विश्वविद्यालय'' में प्रारम्भ किया गया सन् 1950 में ''नेशनल एसोसियेशन फार म्यूजिक थेरेपी'' (NAMT) के स्थापित होने के पश्चात इस क्षेत्र में अनुसंधान एवं अन्वेषण के कार्यों का विस्तार हुआ। करीब 5000 लोग इससे जुड़े हैं। वहां स्वतंत्र व्यवसाय के रूप में संगीत चिकित्सा को प्रचारित किया जा रहा है। अनेक विद्धानों ने अपनी पुस्तकों के माध्यम से संगीत चिकित्सा की विशद् चर्चा प्रस्तुत की है। जैसे डोरोथी एम0 शुलियन द्वारा संकलित- ''म्यूजिक एण्ड मेडीसीन'' डॉ0 एडवर्ड पॉडीलास्की का- ''म्यूजिक फॉर हेल्थ'' डोवास्की द्वारा रचित ''द इनचैन्टिंग पावर ऑफ म्यूजिक'' तथा नेजफौक्स की लिखित पुस्तक ''द हेल्थ एण्ड म्यूजिक'' विशेष उल्लेखनीय है। सबसे प्राचीन अंग्रेजी पुस्तक ''मेडिसिना म्यूजिका'' है जो रिचर्ड ब्राउन द्वारा सन् 1729 में लिखी गई।

वर्तमान में भारत में भी इस चिकित्सा पद्धति को लेकर चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, संगत मर्मज्ञ इत्यादि जागरूक हुये हैं तथा अनेक अनुसंधान एवं शोध, इस दिशा में हो रहे हैं।

चेन्नई में राग रिसर्च सेन्टर की स्थापना की गई। इसके द्वारा शास्त्रीय रागों पर रोगोपचार की पद्धति विकसित की गई जिसके अनुसार विभिन्न रागों का प्रभाव भिन्न-भिन्न रूपों में प्रभावकारी है।

सन् 1965 में रोगहारी संगीत का अध्ययन एवं उस पर अनुसंधान कर रहे श्री बालाजी ताम्बे ने एक अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की एवं उसका नाम 'आत्मसंतुलन ग्राम' रखा। आयुर्वेद के साथ-साथ वे रोगियों को राग चिकित्सा द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर रहे हैं। उनका मानना है कि संगीत का प्रभाव हमारे हार्मोनों पर पड़ता है, जिससे रोग का उपचार हो जाता है। विखण्डित मानसिकता (सिजोफ्रेनिया) में राग भैरवी, याददाश्त बढ़ानें में राग-शिवरंजनी, रक्तचाप में राग तोड़ी व राग भूपाली तथा क्रोध में मल्हार का लाभदायक असर देखा गया।

जबलपुर के डॉ0 भास्कर खांडेकर इस क्षेत्र में विगत 10 वर्षों से अनुसंधान कर रहे हैं तथा अनेक मानसिक रोगियों को उन्होंने इस चिकित्सा पद्धति से स्वास्थ्य लाभ प्रदान किया। उनका मानना है कि ''किसी भी एक रोग के लिये किसी एक राग का निर्धारण नहीं किया जा सकता। रोग निवारण हेतु रोगी का व्यक्तित्व परीक्षण करने के बाद उसका इलाज संगीत चिकित्सक के निर्देशानुसार करना चाहिए।

मुम्बई के संगीत चिकित्सक पं0 शंशाक कट्टी जी भी संगीत-चिकित्सा के क्षेत्र में कई वर्षों से सक्रिय हैं। इसके द्वारा स्थापित 'सूर संजीवन' अनुसंधान केन्द्र है। जहाँ रागों के द्वारा उपचार की पद्धति पर अनुसंधान एवं प्रयोग हो रहा है।

अमेरिका की कम्प्लीमेन्टरी एण्ड अलटरनेटिव मेडीसनी की प्रमुख कम्पनी अमेरिकन होल हेल्थ नेटवर्क, अमेरिकन म्यूजिक थेरेपी एसोसियेशन के सहयोग से संगीत चिकित्सा किसी भी चिकित्सा की तुलना में अधिक कारगर एवं तत्काल प्रभावी सिद्ध हो रही है। संगीतवेत्ता एन्ड्रयू नील (Andrew Neel) के अनुसार भारतीय संगीत मानसिक रिलेक्शेसनके लिये अधिक लाभदायक एवं उपयोगी हो रहे हैं।

आधुनिक दौर में भाग दौड़ ने मानव को तनावग्रस्त कर दिया है। देखा जाये तो समस्त बीमारियों में अस्सी फीसदी बीमारियाँ मानसिक हैं। मानसिक विसंगतियों ने रोग का रूप ले लिया है, जिसका कारण है- आज की तनावपूर्ण जीवन शैली। ऐसे असंतुलन को ठीक करने में सबसे अधिक प्रभावशाली एवं सशक्त माध्यम संगीत है। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है-

"Music has sweet tremendous power over the human mind. It bring it to concentration in a moment, You will find the dull ignorant love brut like human being who never steady their minds for a moment at other, times, when they here at alternative music, immediately become charmed and concentrated"

मनोवैज्ञानिकों ने संगीत को मानसिक रोगों की अचूक मनोवैज्ञानिक दवा माना गया है। संगीत द्वारा मन का निग्रह और नियोजन सदा से किया जाता रहा है। आयुर्वेद में भी माना गया है कि शरीर के रोग ग्रस्त होने का कारण त्रिदोषों में विषमता से है तथा विषमता का मुख्य कारण है, मन की चिन्ता, भय, शोक, अवसाद, क्रोध इत्यादि। संगीत मन को आनन्द, शान्ति, स्फूर्ति प्रदान करता है। संगीत के प्रभाव से काम, क्रोध, शोक आदि आवेग शान्त हो जाते हैं और मन में जब आनन्द और शान्ति आती है तो वात्, पित्त, कफ सम्बन्धी विषमतायें भी दूर हो जाती हैं। मनुष्य स्वस्थ और दीर्घायु होता है। विद्वानों, कवियों, संतों तथा सूफियों ने विश्व का सबसे प्रबल दुःख मानसिक दुःख माना है, जो प्रत्येक गतिविधि में बाधा उत्पन्न करके कई प्रकार के विकारों को जन्म देता है। हताशा, निराशा, वेदना, पीड़ा, अवसाद, जैसे रोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, क्लेश, चिन्ता आदि से ही मिलते हैं। मानसिक अस्थिरता किसी भी प्रकार की हो, संगीत मन को संतुलित करते हुये शरीर में उत्पन्न होने वाले तनावों के विकारों से रक्षा करता है। संगीत जो कि गायन, वादन, नृत्य की त्रिवेणी है, मानव मन में संवेग उत्पन्न करता है। ये संवेग प्रत्येक दृष्टि से सुखद अनुभूति कराते हुए मन का ध्यान व्यर्थ की बातों से हटाकर एक निश्चित बिन्दु पर केन्द्रि त कर देते हें, मन को तनावमुक्त कर, संगीत, चिकित्सा के क्षेत्र में अपूर्व योगदान देता है।

संगीत की उत्पत्ति एवं उसके विकास का क्रमबद्ध अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि मनुष्य ने संगीत का उपयोग मनोरंजन के अतिरिक्त भी विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये प्राचीन काल से ही करता आ रहा है। संगीत उपयोग चिकित्सा हेतु करना भी उन विभिन्न उद्देश्यपूर्ण उपयोगों में से एक है।

कला व विज्ञान के समन्वय से संगीत चिकित्सा का प्रचलन आरम्भ होता है। संगीत एक कला है और चिकित्सा एक विज्ञान है। यह एक सहायक अथवा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें किसी भी व्यक्ति के रोगों की चिकित्सा संगीत के माध्यम से की जाती है।

मन व मस्तिष्क जब अशान्त रहता है तो व्याधियां ज्यादा होती हैं। अधिकतर व्याधियां मन से अशान्ति एवं विकार के पनपने से होती है। संगीत का सम्बन्ध भी मन एवं हृदय से है। संगीत का प्रभाव मुख्य रूप से मानसिक अथवा मस्तिष्क पर ही होता है। अतः यह मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगियों के उपचार हेतु काफी प्रभावी सिद्ध हुआ है। संगीत मनुष्य की मानसिक स्थिति को बदलने, मानसिक विकारों को ठीक करने, स्वभाव परिवर्तन करने के अतिरिक्त मानसिक रोगियों विशेषकर पागलपन के शिकार रोगियों के उपचार में भी काफी मददगार साबित हुआ। संगीतिक स्वर मनुष्य के हार्मोन्स को नियंत्रित रखते हैं तथा शरीर को संतुलित बनाकर रोगाणुओं से मुक्त करने में सक्षम हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य शरीर में संगीत का सकारात्मक प्रभाव मुख्य रूप से मस्तिष्क पर होता है। जिससे मस्तिष्क व नाड़ी तंत्र दोनो ही प्रभावित होते हैं। चुँकि मानव शरीर में समस्त अंग इन्हीं मस्तिष्क व नाड़ी तंत्र द्वारा संचालित व नियंत्रित होते हैं अतः रोगों के निवारण में स्वस्थ मस्तिष्क की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है।

मानसिक रोगी को संगीत सुनाने से मस्तिष्क तो प्रभावी होता ही है साथ ही साथ नलिका विहिन ग्रंथियां आदि भी प्रभावित होती हैं, जिससे इनसे स्रावित हार्मोंन व्यवस्थित होने लगते हैं। चिन्ता, अवसाद तथा क्रोध जैसे नकरात्मक मनोभावों से शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। तनाव से शरीर में कई प्रकार के रासायनिक व शारीरिक परिवर्तन होते हैं जिससे कार्टीसोल नामक हार्मोन उत्पन्न होने लगता है जो मस्तिष्क की क्षमता को धीरे-धीरे कम करता रहता है। इस हर्मोन की बढ़ोत्तरी बौद्धिक क्षमता को अत्यंत कम कर देती है और व्यक्ति असामान्य, मन्द बुद्धि या समय से पहले वृद्धों सा व्यवहार करने लगता है। संगीत शारीरिक व मानसिक परिवर्तन तो करता ही है साथ ही शरीर में स्थित पदार्थों पर रासायनिक परिवर्तन भी करता है।

मानसिक अशान्ति, अस्थिरता एवं तनाव के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक व्याधियों ने आज समस्त मानव समुदाय को ग्रसित कर रखा है। संगीत मन को शांत, स्थिर व तनावमुक्त करने में सक्षम है तथा अपनी संगीतात्मक चिकित्सकीय प्रभाव के कारण मानसिक संतुलन स्थापित कर कई रोगों को उत्पन्न करने वाले कारणों को ही समाप्त कर देता है। अनुसंधानकर्ताओं ने यह पाया है कि मनोरोगों में जो कार्य बड़ी से बड़ी औषधि नहीं कर पाती वही कार्य संगीत द्वारा सुगमता से किया जा सकता है। संगीत में रोगी का ध्यान उसकी बीमारी से हटाकर उसके मन को उत्साहित करने, उसके दर्द को भूला देने, उसे उल्लासित व प्रसन्नचित्त करने तथा मन को एकाग्र रखने की अद्भुत क्षमता है।

सन् 1962 में बर्लिन में अर्न्तराष्ट्रीय चिकित्सा परिषद सम्मेलन में यह स्पष्ट किया गया कि संगीत के प्रभाव से निष्क्रिय मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं, जिससे मानसिक तनाव कम हो जाता है और उसको लाभ पहुँचाता है। अनेक चिकित्साशास्त्री इस मत से सहमत है कि संगीत उद्विरन रोगियों को शान्ति प्रदान करता है। संगीत विशेषज्ञों, मनोचिकित्सकों व शोधकर्ताओं ने संगीत को मानसिक विकार-विकृतियों की अचूक औषधि बतलाया है। मनोवैज्ञानिकों का भी मानना है कि संगीत मन की तीनों अवस्थाओं चेतन, अवचेतन तथा अचेतन पर प्रभाव डालता है। मधुर उत्तेजनापूर्ण संगीत सुनने से कई पुरानी स्मृतियाँ व संवेग पुर्नजीवित हो जाते हैं। संगीत का सम्बन्ध वस्तुतः मनोभावों से है और मनुष्य की समस्त क्रियायें मन से जुड़ी हैं। संगीत अपने प्रभाव से मन को आनन्दित करता है जिसके फलस्वरूप मस्तिष्क द्वारा संचालित समस्त प्रणालियां एवं उनके द्वारा संचालित अंगों की कार्य क्षमता में परिवर्तन आता है। डाक्टरों के अनुसार- "Various brain centers, viz. hypothalamus thalamus, cerebellum, in addition to the cerebral hemispheres, the master brain, take part not only in metamorphosing tone and rhythm into music but in giving it an emotional and mental content."

आधुनिक समय में भाग दौड़ भरी जीवनशैली के कारण मानव मस्तिष्क तथा शरीर पर आवश्यकता से अधिक दबाव है जो मनुष्य को कई प्रकार की व्याधियों से ग्रसित कर देता है साथ ही प्रदुषित वातावरण व अव्यवस्थित खान-पान भी अनेक प्रकार के विकारों का कारण बनता है। अव्यवस्थित जीवनशैली अनेक मानसिक रोगों व समस्याओं को जन्म देती है जिसका पूर्ण निदान चिकित्सा विज्ञान में सम्भव नहीं है। जैसे कि तनाव अनेक मानसिक रोगों का कारण है। तनाव का निदान सिर्फ औषधियों से सम्भव नहीं है। ऐसे में संगीत के माध्यम से तनाव को कम करके रोगी को मानसिक विकार-विकृतियों से निदान करने की कोशिश की जा रही है। वास्तव में संगीत हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करता है जो शरीर की समस्त ऐच्छिक, अनैच्छिक क्रियाओं का संचालक है। इच्छा के अनुरूप संगीत सुनने से हृदयगति नियमित होती है और रक्तचाप भी संतुलित होता है। अमेरिका के शोधकर्ताओं ने अपने शोध के माध्यम से बताया है कि ''रूचि के अनुसार संगीत सुनने से रक्त वाहिनियां 26 प्रतिशत तक फैल जाती है और रक्त संचरण सुचारू होता है। फलस्वरूप हृदयघात की समस्यायें कम हो जाती हैं। रक्त वाहिनियों में लचीलापन आता है जिससे 'एन्थ्रोस्केलेरेसिस' नामक रोग की सम्भावनायें कम होती हैं।''

अनुसंधानकर्ताओं का यह भी मानना है कि संगीत स्नावयिक-मानसिक तनाव के निराकरण की अचूक औषधि है। संगीत के अभ्यास व श्रवणकाल दोनों से मन को विश्रान्ति ही नहीं, आनन्द भी प्राप्त होता है। संगीत के इसी उपचारात्मक प्रभाव से प्रेरित होकर हमारे ऋषिमुनियों ने इसे मानसिक शान्ति तथा ध्यान आदि के लिये उपयोग करने की बात कही थी। आज वर्तमान में शोधकर्ताओं ने भी इसे मानसिक रोगियों के लिये लाभप्रद बताया है। डा0 आल्टभूलर ने अपने प्रयोग में जो मानसिक विकार से ग्रसित रोगियों पर किया गया, यह निष्कर्ष पाया कि संगीत में चयापचय क्रिया, श्वसन, रक्तचाप, नाड़ी तथा अन्तःस्रावी व मांशपेशियों की उर्जा में परिवर्तन करने की क्षमता है। साथ ही ध्यान को नियंत्रित व एकाग्रचित्त भी करता है। चित्त को सुधारने की क्षमता है। विनोद तथा स्थानापन की शक्ति है। इन्होंने यह भी पाया कि इन रोगियों के रोग लक्षणोें में तो कमी आती ही है साथ ही चारित्रिक परिवर्तन भी होने लगते हैं जैसे हिंसक वृत्ति आदि कम होने लगती है।''

मानसिक विकारों एवं रोगों पर संगीत के चिकित्सकीय एवं स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव को स्वीकारते हुए डा0 एस0 श्रीनिवासन ने अपने शोध-पत्र में लिखा है कि - "Anxiety, depression, schizophrenia, Mental retardation, Autism, Psychosomatise, disorders of various descriptions insomnia, behavioural disorders pertaining to aggression, phobias, sexual deviations, drug abuse and the like ase amenable to supplementary therapy with music."

पाश्चात्य देशों में संगीत चिकित्सा का प्रयोग, व्यवहार, परीक्षण, अध्ययन निश्चित रूप से अधिक हुआ है। इस चिकित्सा पद्धति का प्रयोग वहाँ आज व्यापक पैमाने पर हो रहा है। संगीत के मन-मस्तिष्क व शरीर पर होने वाले चिकित्सकीय व उपचारी प्रभाव के विषय में शोधकर्ताओं ने बताया कि शरीर का कोई भी शारीरिक व मानसिक रोग ऐसा नहीं है जिसकी चिकित्सा संगीत से न की जा सकती है। ''पाश्चात्य देशों के प्रायः सभी मानसिक रोगों के अस्पतालों में इस प्रकार का प्रबन्ध है कि विभिन्न स्तर के पागलों एवं सनकियों को विशेष प्रकार की संगीत ध्वनियों से भावविभोर कर दिया जाये तो इससे उनका उन्माद घटता है और मनःस्थिति में आशाजनक सुधार होता है।''

निष्कर्षतः संगीत का प्रभाव शरीर की अपेक्षा मनुष्य की मानसिक स्थिति पर बहुत जल्द व अधिक होता है। मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को प्रभावित करके मानसिक तनाव, चिंता, दुःख आदि से मुक्ति दिलाकर उपचारात्मक प्रभाव डालता है।

संगीत-चिकित्सा का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। एक स्वतंत्र विषय है। भविष्य में इस क्षेत्र में विपुल संभावनायें हैं। आवश्यकता है इस पद्धति की उपचारात्मक क्षमता को जानने समझने की।

किसी चिकित्सा पद्धति में, औषधियों द्वारा जो कार्य शरीर में जैव रासायनिक परिवर्तनों के माध्यम से होता है, संगीत-चिकित्सा में वही कार्य स्वर लहरियों द्वारा होता है। सामवेद से निःसृत सांगीतिक परम्परा के काल प्रवाह में सामगायन जाति गायन एवं वर्तमान राग गायन की परम्परा स्थापित हुयी। प्रत्येक स्वरूप में संगीत का शास्वत प्रभाव विशुद्ध आनन्द ही रहा जिसे ब्रह्म स्वरूप भी कहा गया है। संगीत की यही गुणधर्मिता संगीत चिकित्सा के प्रभावी विस्तार का आधार सिद्ध हुयी। भारतीय संगीत में निहित नाद उर्जा मानव शरीर में संजीवनी शक्ति को जाग्रत एवं सक्रिय कर देती है। यही संगीत चिकित्सा का मूल तत्त्व है।

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