राजीव आनंद की कविताएँ - नफ़ा-नुक़सान

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दीपावली दिल से मनाया


दीपावली कुछ इस तरह हमने मनाया
कुछ अंधेरे आंगनों में रौशनी फैलाया
कुछ अंधेरे घरों में दीप जलाया
बच्‍चों को कुछ फूलझड़ियां थमाया
बूढ़ों को अपने गले से लगाया
बच्‍चों औ' बूढ़ों के संग मिठाईयां खाया
दीपावली मनाने में आत्‍मिक सुख पाया
इस बार दीपावली हमने दिल से मनाया

ठीक है बेटा फिर मत आना


ठीक है बेटा
मत आना लौटकर तुम अपने घर
जहां तुम्‍हारी मूर्ख माँ की
आँखें पथरा गयी है
राह तकते-तकते
सून भी नहीं सकती
कहता हूँ बेटा आने से मना करता है
फिर भी आस लगायी
राहों को तकती है
जैसे तकती राहें तुम तक पहुंचती हों
अब कौन समझाए तुम्‍हारी माँ को
बेटे का भी अपना घर-परिवार है
परिवार में अब कहाँ है
हमारी जगह
नहीं समझ पाती है तुम्‍हारी
पुरानी ख्‍यालातों वाली माँ
सुनती नहीं है सिर्फ कहती है
नजर नहीं आते हमारे आँसू
अब कौन समझाए उसे बेटा
आँखों से टपके आँसू
नहीं भीगा सकते
तुम तक पहुंचने वाली राहों को
इस बार और शायद
आखिरी बार
लौट आओ बेटा
भेंट हो जाएगी
फिर आने की जरूरत
तुम्‍हें नहीं पड़ेगी
हम ले रहे है साथ खाने में
धीमी जहर
वक्‍त लगता है खत्‍म करने में
जहर तो है पर है धीमा
अनुमानत तुमसे यह मुलाकात
आखिरी ही हो
ठीक है बेटा
फिर मत आना !

नफा-नुकसान


सोते है आप डनलप पर
जमीन पर सोते है हम
सपने जो देखे है आपने
कहां है उनसे मेरे सपने कम
  सोते-सोते हो गए टेढ़े
  डनलप पर मेरूदंड़
  नफा हुआ सोने के जमीन पर
  आगए सम पर शरीर के अंग-अंग
चार सदस्‍यों के लिए भी आपके
है आलीशान बंगलों कम
एक कमरे के झोपड़ी में हम
दस लोग सो जाते है संग-संग
   फेंक देते है खाना आप जितना रोज
   जूठा-बासी और समझ कर बोझ
   एक भाग भी उसका अगर मिल जाए
   मना लेगा मेरा परिवार उससे भोज

परिवार


दाम्‍पत्‍य में सब कुछ
साझा है
सुख आधा है तो
दुख भी आधा है
इतना समझ जाने पर
पारिवारिक जीवन
बिल्‍कुल सीधा-साधा है

भ्रष्‍टाचार खत्‍म हो जावेगा
भ्रष्‍टाचार को उजागर करने
का यह मौजूदा दौर
धरना औ नारेबाजी का
यह रोज-रोज का शोर
जब थम जावेगा
तो क्‍या भ्रष्‍टाचार
खत्‍म हो जावेगा ?

मध्‍यवर्गीय लोग
इनकी बस इतनी सी कहानी है
न चादर कभी लंबी कर पाए
न पैरों को सिकोड़ पाए
जीवन इसी खींचातानी में बीत जाए


राजीव आनंद

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