बुधवार, 14 नवंबर 2012

मधु संधु की कहानी - दीपावली@अस्‍पताल.कॉम

कहानी

दीपावली@अस्‍पताल.कॉम

डॉ मधु संधु

सात साल हो गए घर की मरम्‍मत हुए। सब दीवारें, छतें, फर्श अलमारियां रिपेयर मांग रही हैं। इस वर्ष हिम्‍मत करके पापा ने उसारी लगा ही ली गई। एक तरफ बिरला व्‍हाइट भरी जा रही है, एक तरफ सारे घर में लगने के लिए ऑफ व्‍हाइट टाइलें पहुँच गई हैं। तरखान एक नई अलमारी और बैड बनाने के लिए अपने अड्‌डे की सैटिंग कर रहा है। दरवाजों-खिड़कियों का रंग फाइनल हो चुका है। सिर्फ पंद्रह दिनों में सारा काम निपटाने का सोचा गया है।

कालेज में परीक्षाएं चल रही हैं। आज ड्‌यूटी नहीं थी। इसलिए मिनटों में ही लौट आई। मेरा धूप में बैठने को मन कर रहा है। यह नवम्‍बर का प्रथम सप्‍ताह है। बर्फीली हवाओं की शुरूआत हो चुकी है। गुनगुनी धूप में बैठे अभी आध घंटा ही हुआ होगा कि बेल हुई और बेहाल से पापा अंदर आ सीधे बैडरूम की ओर लपके। कुछ बोले नहीं। कभी वाशरूम में जाते, कभी आकर लेट जाते। चैन नहीं पड़ रहा था। पर कहते जा रहे थे, बस बेचैनी है, सिर दुख रहा है, छाती में जकड़न है, आज वहां फंक्‍शन था। शायद फूड प्‍वायजनिंग होगी, शायद कुछ गलत खाया गया होगा। अभी ठीक हो जाता है। बाहर लॉबी में आकर मैंने फेमिली डॉक्‍टर से बात की। मिनटों में ही वह उपस्‍थित था। अपनी इंवेस्‍टिगेशन के बाद उसने पापा को पड़ने वाला दूसरा हार्ट अटैक कन्‍फर्म किया और आनन-फानन में उन्‍हें शहर के सबसे अच्‍छे अस्‍पताल ले जाया गया। बीस हजार एडमिशन फीस देकर पापा एडमिट कर लिए गए। उन्‍होंने एक टीका लगाया और पापा की हालात सुधरनी शुरू हो गई। जल्‍दी ही उन्‍हें अपना आप नार्मल लगने लगा। घर लौटने को मन होने लगा। कैसे मान लिया जाए कि यह मेजर हार्ट अटैक ही था ? पर कुछ भी इतना आसान नहीं था। यह कोई क्‍लिनिक नहीं था कि दवा ली और लौट आए, अस्‍पताल था, एक पूरी इंडस्‍ट्री, एक जंत्र मंत्र, जहां प्रविष्‍ट होना सहज और निकलना दुष्‍कर होता है।

अस्‍पताल में दो तरह के कौंसलर थे। एक तो डाक्‍टर- जो बता रहे थे कि एंजिओग्राफी और स्‍टेंट पडेंगे, इसके बिना मरीज की जान बच ही नहीं सकती और उसकी जान से खेलने का खतरा हम किसी को नहीं उठाने देंगें। पिछली बार आप ने स्‍टेंट नहीं डलवाया था, इसी लिए इतनी ब्‍लाकेज हुई। दूसरी बार ऐसा नहीं कर सकते। अंदाज उनका पुलसिया था। मुर्गे के फंसने जैसी स्‍थिति थी। उनके बस पड़े थे। दूसरे कौंसलर छोटे छोटे केबिन में अलग अलग बैठे युवक युवतियां थे, जो अटेंडेंट को खर्च, पैकेज वगैरह समझाने की काउंसलिंग कर रहे थे। यहां हर पेकेज लगभग तीन दिन का था और इनके मिनीमम रेट दो अढ़ाई लाख बताए जाते, जब कि मरीजों का कम से कम बिल चार लाख के आसपास ही रहता। जो अस्‍पताल के बस पड़ा, ऐसे नहीं तो वैसे मरा। मुझे बीस मील दूर घर आना पड़ा। घर के काया कल्‍प के लिए रखे सारे पैसे सहेजने पड़े और सौ-सौ, हजार-हजार रूपए करके जोड़े, एफ. डी. वगैरह में सहेजे अपने सारे पैसे बैंक से तुरंत निकलवाने पड़े। अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति अतिरिक्‍त आश्‍वस्‍त पापा ने बार बार कहने के बावजूद मेडिक्‍लेम नहीं करवाया। शुरू से ही मनमर्जी की है। आज कैशलेस पालिसी होती तो कितनी सहूलियत होती।

इस अस्‍पताल के खुलने के बाद शहर के कुछ अस्‍पताल बंद हो गए हैं। कुशल प्रबंधकों ने नामी अस्‍पतालों के डाक्‍टरों को दुगुने वेतन +कमीशन पर खरीद लिया है। रिसेप्‍शन वाले बड़े हाल में अस्‍पताल बनाने वाले की खूब प्रभावशाली पेंटिंग लगी है। लगता है पेंटर को फोटो देकर बनवाई गई है। आठ दस एकड़ में बना यह मल्‍टी स्‍टोरी अस्‍पताल पांच सितारा होटल से भी अधिक खूबसूरत है। बहुत खुली पार्किंग, सड़कों का जाल, सब ओर फैले छोटे-छोटे उपवन, काशनी रंग के हैज वाले पत्‍तों से बनाया गया अस्‍पताल का नाम, फूलों से लदी क्‍यारियां, आकर्षक श्रब उसके बाह्याकार को एक आभिजात्‍य दे रहे थे। आसमान पर आते जाते हवाई जहाज बताते हैं कि कहीं आस पास ही हवाई अड्‌डा होगा। अंदर भी सफाई कर्मचारी कभी रैम्‍बो और कभी मशीन से लगातार सफाई करते रहते । मच्‍छरों के लिए स्प्रे होता रहता । दूसरी मंजिल पर सिर्फ आपरेशन थियेटर और आपातकाल था। तीसरी, चौथी और पांचवीं मंजिल प्राइवेट सिंगल और टि्‌वन कमरों की थी। जब कमरे में शिफ्‌ट किया गया तो वह शायद अस्‍पताल का पिछवाड़ा था और वहां बड़ी बड़ी पाइपें और दूसरी मशीनरी दिख रही थी। कमरे के शीशे साउंड प्रूफ होने से कोई आवाज नहीं आ रही थी। दूर चारदीवारी और उसके अंदर तरतीबवार कटी हुई सड़कें थी। बिजली के खम्‍भे, टयूबें और पार्कनुमा कटिंग्‍ज कह रहे थे कि किसी प्रापर्टी डीलर ने शायद कोई कालोनी काटी हो।

रिसेप्‍शन बहुत साफ है। सफाई कर्मचारी इसे हर समय चमचमाते रहते हैं। यहां पंद्रह के आसपास थ्री सीटर सोफे पड़े हैं, जो दिन में बैठने और रात को सोने के काम आते हैं। रात दस बजे तक काफी बत्तियां बुझा दी जाती हैं और प्रातः छह बजे टी.वी. पर ऊँची आवाज में धार्मिक चैनल लगा दिया जाता है। सभी लोग अपने बिस्‍तर तहा कर बाहर बैंचों पर या गाड़ियों में रख आते हैं। गाड़ियां मल्‍टी परपज सैल बनी पड़ी हैं। उनमें स्‍टोर की तरह कपड़े बिस्‍तर और किचनेट की तरह ताजा या बासी खाना रखा जा रहा है। बहुत से लोग रात को पिछली सीट पर बिस्‍तर बिछा उनसे बेड रूम का काम भी ले रहे हैं।

यहां मेरा नाम सिर्फ अटैंडेंट है। जब कभी पापा को मुझे बुलाना होता है, तो माइक पर घोषणा होती है कि हार्ट कमांड में फलां रोगी का अटैंडेंट पहुँच जाए। अगर अटैंडेंट न सुन पाए तो उसके मोबाइल पर सूचना दे दी जाती है।

हर तरफ दुख है, उच्‍छवास हैं, कराहें हैं, आंसुओं के सैलाब हैं।........

बड़ी तकलीफ है, उसने लंबी सांस खींचते कहा और बाहर के पार्क में चादर बिछाते हुए ठुड्‌डी पर अंगुली रखते बैठ गई।.............

दूसरी बार आए है। इतनी जल्‍दी तो खेत भी नहीं बिकता।.......वह पास की दीवार का सहारा ले चिन्‍तन मुद्रा में वही रुक गई।

यह कोई हार्ट अटैक तो है नहीं, परैलिसिस है। वे न बोल पाते हैं, न नित्‍यकर्म करने के काबिल है। बड़ी मुश्‍किल है।.......पता नहीं वह हाल पूछने वाले से कह रहा था या अपने से ही बतिया रहा था।

हमें तो अपने डाक्‍टर ने ही गलत रास्‍ते पर डाल दिया। यहां न कोई लेडी डाक्‍टर है और न गाइनेकोलोजी का स्‍पेशलिस्‍ट। मेरी बहू सुबह से तड़प रही है।........... उनसे आंसू पिए नहीं जा रहे थे।

तीन दिन से वेंटीलेटर लगा रखा है। छुट्‌टी ही नहीं कर रहे।....... आवाज में अपने को खोने और पैसे के लुटने का दोहरा दुख था।

हर अटैंडेंट के अंदर बवंडर हैं, उदासी और वेदना है, तड़प और बेचैनी है।

इंजेक्‍शन लगने के अड़तालीस घण्‍टे बाद पापा को एंजीओग्राफी के लिए ले जाया गया और हमें भी बुला लिया गया। पापा बड़े से एंजीओग्राफी/एंजीओस्‍लास्‍टी थियेटर में लेटे हर हलचल के प्रति सतर्क से लग रहे थे। हमें शीशे की दीवार के इस पार बने कम्‍प्‍यूटर रूम में बिठा डॉ. ने माउस घुमाते हुए स्‍थिति की नजाकत समझानी शुरू की...... कि दो स्‍टेंट डलेंगे.... एक इतना बड़ा और दूसरा कुछ छोटा। एक स्‍टेंट का रेट एक लाख सत्‍ताइस हजार है, दूसरे का एक लाख बीस हजार। हम बैलूनिंग भी कर देंगें। कोई चारा तो था ही नहीं, हां करनी ही थी... सो कर दी। दो घण्‍टे पोस्‍ट आपरेशन केयर में रखने के बाद उन्‍हें फिर हार्ट कमांड यानी एमरजेंसी में स्‍थानांतरित कर दिया गया।

क्‍योंकि पैकेज था, इसलिए तीन दिन का पैकेज दो दिन में ही खत्‍म कर दिया गया। पापा ठीक थे। व्‍यापारिक तेजस्‍विता भी इसी का समर्थन करती है। हमें भी खास महसूस नहीं हुआ और नोटों की गडि्‌डयां देकर, डायटीशियन से खाने पीने का चार्ट लेकर, डाक्‍टर से हिदायतों के उपदेश और कैमिस्‍ट से दवाइयों के पैकेटों से भरा बैग लेकर हम लौट आए। पापा लगातार सोच रहे थे कि अगर एंजिओग्राफी ही करवाई जाती, तो भी यही परहेज और यही दवाइयां थी और अब जब कि लाखों का खर्च हो चुका है, तो भी वही परहेज और दवाईयां हैं। अंतर क्‍या है ?

यह दीवाली के आसपास के दिन थे। ठसाठस भरी दुकानें और बाजारों में कंधे से कंधा भिड़ाने वाली भीड़। कोई रेट नहीं करता। दुकानदार जरा से डिजाइनदार डिब्‍बे में डेढ़ दो सौ का ड्राई फ्रूट डाल साढ़े चार सौ में बेच रहे थे और अस्‍पताल में डॉक्‍टर मरीजों के गैर जरूरी आपरेशन कर, स्‍टेंट डाल, मरे हुओं को वेंटीलेटर में रख दीपावली मना रहे थे।

अब घर में मुर्दनी सा ही माहौल है। कंस्‍ट्रक्‍शन के लिए आया सारा सामान मजदूर से पिछली डक्‍ट में रखवा हम सब अपने अपने कमरे में चुपचाप निसंग से बैठे हैं। दीपावली की कोई हलचल नहीं है। पहले संवाद की एक विशेष स्‍थिति थी- रेनोवेशन..... और अब सब ठप्‍प होने की संवाद हीनता, ,मुर्दनी।

madhu_sd19@yahoo.co.in

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