शनिवार, 24 नवंबर 2012

अर्जुन प्रसाद की कहानी - भविष्य वाणी

भविष्य वाणी

फागुन का महीना था। खेतों में चारों ओर पीले रंग की मखमली चादर सी बिछी हुई थी  किसान अपनी लहलहाती फसल देखकर मन ही मन मुग्ध हो रहा था। होली निकट थी। रंगों का सुहाना मौसम। जमींदारी खत्म होने के बाद मंत्रीगण राजा बन गए तो एम.पी.और एम.एल.ए. धनाढ्य तथा रईस। जैतपुर के ठाकुर सविन्द्र सिंह एम.एल.ए.चुने गए। इससे पूर्व गोरखपुर विश्व विद्यालय के छात्रों की अध्यक्षता करते थे। वहाँ विद्यार्थी उनका बड़ा सम्मान करते। वहाँ खूब दबदबा था। गाँव में भी उनका अच्छा रूतवा था। गोरा रंग, नाटा कद,मजबूत शरीर। अनुपम मुख मंडल पर बड़ी-बड़ी मूछें और लाल नशीली आँखें। उम्र करीब 32 के आस-पास।

बाबू साहब की चारों ओर धाक फैली हुई थी। घर धन्य-धान्य से परिपूर्ण था। घर में खुशियों का भण्डार था। खेती बाड़ी उनके पिताजी और भाई मिलकर संभालते। पर, सविन्द्र राजनीति ही करते। उनकी पत्नी सुमन बहुत ही सुशीला और पति परायण थी। सुबह शाम ईश्वर की उपासना करती। ठाकुर साहब अंध-विश्वास और सामाजिक कुरीतियों से बहुत दूर रहते। बड़े सज्जन पुरूष थे। कभी किसी को सताते न थे। इसलिए चुनाव बड़ी सरलता से जीत गए। चुनाव क्या था, बस एक औपचारिकता निभानी थी।

जनता पार्टी में सब एक दूसरे की टांग खींचने लगे। इससे उनकी सरकार बहुमत खोकर अल्पमत में आ गई। इनका आपस में लड़ना देखकर जनता को अच्छा न लगा। जनता कांग्रेस की ओर झुक गई। सविन्द्र सिंह कांग्रेस से चुनाव लड़े और भारी बहुमत से विजयी हुए। एम.एल.ए.बनने के बाद उनका जगह-जगह स्वागत समारोह आयोजित हुआ। विश्वविद्यालय प्रांगण में भी उनका स्वागत हुआ।

वहाँ से छूटने के बाद ठाकुर सविन्द्र सिंह अपने लाव-लश्कर के साथ गेट से बाहर निकल कर विशाल वट वृक्ष के पास जाकर रूक गए। शाम के पाँच बजे का समय था। सूर्य देवता अपनी स्वर्णिम आभा बिखेर कर सागर की लहरों को स्वर्णमय बना दिए। पक्षी गण अपने-अपने घोंसलों में जाने की तैयारी में थे। उनके कलरव से वातावरण की शांति भंग हो रही थी।

वट वृक्ष के नीचे बैठे फक्क्ड़ बाबा के पास भीड़ कम होने लगी। तभी एक विचित्र घटना घटी। सविन्द्र सिंह यूनिवर्सिटी में अध्ययनरत रहने के समय भूलकर भी कभी वहाँ न रूकते थे। पर,आज न जाने क्या सोचकर बाबा के पास आकर बैठ गए। बाबा का असली नाम क्या है, वे कहाँ रहते थे? कोई कुछ नहीं जानता। उनकी कुटिया कही थी भी या नहीं, यह कहना बहुत मुश्किल है। सुबह से शाम तक वहीं बैठे रहते। सर्दी हो या गर्मी, कोई भी मौसम हो। उनके लिए तो बस, करतल भिक्षा, तरू तल वास। पर,वह भिक्षा तो मांगते ही न थे। वास जरूर करते। कुछ खाते पीते भी या नहीं। किसी को कुछ न मालूम।

लोग तो कहते हैं, कि उन्हें भूख-प्यास लगती ही नहीं। फिर भी 60 वर्ष की उम्र में भी तीस के ही लगते। दमकता हुआ कांतिमय चेहरा और कसी हुई बदन देखकर ऐसा लगता मानो, कोई दिब्य देवता हो। उनके चेहरे पर लम्बी दाढ़ी और सिर पर जटा सुशोभित थी। सारे अंग पर भभूति और माथे पर चंदन की छाप-तिलक उनकी छवि में चार चांद लगाए रहते।

कुछ लोगों के मतानुसार वह एक पहुँचे हुए ब्रहम झानी संत थे। लेकिन, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो उन्हें मात्र एक ढोंगी या पाखंडी ही समझते। तिस पर भी, उनकी ख्याति चारों ओर फैली हुई थी। उनके आस-पास लोगों का जमघट लगा रहता। हर उम्र के लोग वहाँ भीड़ लगाए रहते। अमीर-गरीब सभी बड़ी उत्सुकता से बाबा को अपना मस्तक दिखाते। सबको अपना भविष्य जानने की जल्दी रहती। अपना उज्ज्वल भविष्य जानकर सब उसका लाभ उठाना चाहते। खराब भविष्य से सतर्क हो जाते।

बाबा इतने समदर्शी कि जाति-पाँति के ढोंगों से दूर रहते। उनके लिए सब एक समान। न कोई ऊँचा और न कोई नीचा। मानव केवल मानव है। मान सम्मान को सदा एक समझते। बाबा बीस वर्ष पहले भी ऐेसे ही थे और अब भी। इसलिए किसी से लेशमात्र भी भेदभाव न करते। बिना किसी दान-दक्षिणा के मुफ्त में सबका भविष्य बताते। किसी से कुछ लेना मानव धर्म के विपरीत मानते। ऐसा करना पाप समझते।

प्रेमी-प्रेमिका का मिलन हो या बहू-दामाद की तलाश। रूठे हुए को मनाने की बात हो या खोए हुए व्यक्ति को पाने की। वह सबका भविष्य बताते। बीमारी का चक्कर हो या मुकदमों का दलदल। सारा मामला शीघ्र ही समझ लेते। व्यापार और करोबार में नफा-नुकसान जानने की इच्छा प्रायः सबको रहती है। उनके पास भीड़ देखकर ऐसा लगता,जैसे सभी दुखी हों। सुखी कोई नहीं।

उन पर लोगों का अटूट विश्वास था। अवस्था और समय के साथ - साथ अनुमानों का मेल हीज्योतिष है। प्रश्नकर्ता से बातचीत करने पर कुछ अकाट्य सूत्र झात हो जाते हैं।इन्हीं सूत्रों के आधार पर भविष्य फल निश्चित किया जाता है। यद्यपि बाबा कोई ज्योतिषी न थे और भाग्य को जाना भी नहीं जा सकता है। फिर भी वह मस्तक की लकीरों को पढ़कर सब स्पष्ट कर देते।

उनकी भविष्य वाणी में बहुत गूढ़ रहस्य छिपा रहता। उनकी भाग्य गणनाएं बिलकुल अटल होती थी। उनकी भविष्य वाणी में भाग्य रेखाओं से अधिक जटिलता होती थी। जबकि, भाग्य रेखाएं उम्र और कर्म के साथ-साथ बदलती रहती हैं। आज का शिक्षित वर्ग ज्योतिषियों पर भले ही विश्वास न करता हो, पर बाबा का विचार सभी जानने को उत्सुक रहते। जिज्ञासानुसार मंगलकारी भविष्य वालों का दिल बाग-बाग हो जाता। वे सुनकर प्रसन्न हो जाते। अमंगल भविष्य सुनने वाला भयभीत होकर रोता। उस पर वज्रपात से हो जाता। इस पर भी बाबा के उपासकों की कोई कमी न थी। श्रद्धालुओं की इतनी भीड़ जमा होती कि वहाँ तिल रखने की भी जगह न रहती।

एक-एक कर जब सब लोग चले गए, तब बाबा से ठाकुर सविन्द्र सिंह बोले-बाबा!आप शायद मुझे जानते हों पर, सच कहता हूँ। मैं आपको तनिक भी नहीं जानता। बस, इतना ही मालूम है कि यहाँ एक बाबा हैं,जो हस्त रेखा के बजाय मस्तक रेखा पढ़कर बताते हैं। इससे अधिक एक शब्द भी नहीं मालूम।

पर, आज मैं आप से कुछ पूछना चाहता हूँ। बाबा ने गौर से देखा कि आज का प्रश्नकर्ता कोई आम आदमी नहीं, बल्कि क्षेत्र का जननायक विधायक ठाकुर सविन्द्र है। बाबा उनके बारे में पहले से जानते तो थे। पर, विधायक जी ने उनसे कभी कोई सवाल न किया था। आज न जाने मन में क्या आया कि बाबा के पास सवाली बनकर आ गए। वह भी वास्तव में अपना भविष्य ही जानना चाहते थे या बाबा का उपहास उड़ाने का विचार था। कुछ कहा नहीं जा सकता। बाबा ने कहा-बत्स!इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम दोनों एक दूसरे को नहीं जानते। आवश्यकता पड़ने पर ही मनुष्य किसी के पास जाता है। पूछो-पुत्र!क्या पूछना है? बे-झिझक कहो।

सविन्द्र सिंह बोले - बाबा !आपने आज तक बहुत से लोगों का भविष्य बताया। आपके आशीर्वाद से बहुत से लोग चंगा भी हुए। पर, बहुतों को रोना भी पड़ा। चंगा होने वाले का चेहरा मुस्कराया तो चंगा न होने वाले का मुरझा भी गया। कृपा करके आप मेरा भी भविष्य देखकर बताइए कि मेरी उम्र कितनी है। यानी मैं अभी और कितने दिन जीवित रहूँगा ?

बाबा मंगल और अमंगल बताने में अभ्यस्त थे। उन्होंने और किसी अमंगल का ध्यान न करके सविन्द्र सिंह के चेहरे और मस्तक की ओर एक तीव्र दृष्टि से देखकर निर्भयता से कहा - बेटा ! तुम्हारी उम्र तो बहुत ही कम है। तुम अब अधिकतम छः माह और इस दुनिया को देख सकते हो। तुम्हारे मस्तक की भाग्य रेखाएं बड़े अनिष्ट का दर्शन दे रही हैं। तब सविन्द्र बोले - बाबा कृपया आप अपनी बात का खुलासा कीजिए। जरा साफ-साफ बताइए।

बाबा ने कहा - बेटा! तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा संकट आने वाला है। सब कुछ बर्बाद होने के आसार नजर आ रहे हैं। तुम्हारी युवा सुहागिन पत्नी अभागन बनने वाली है। तुम्हारी दिन दहाड़े हत्या कर दी जाएगी। बीवी बच्चे दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हो जाएंगे।

इतना सुनते ही ठाकुर साहब आग-बबूला हो गए। क्रोध में बोले- आप झूठ बोल रहे हैं। मेरे भाग्य का सितारा उदय हुए अभी छः महीने ही हुए हैं कि आप उसे डूबने की बात कर रहे हैं। वह भी मात्र छः महीने में। एक भूखा-नंगा फकीर मेरा भविष्य वक्ता नहीं हो सकता । यह ठीक है कि भाग्य लेख को कोई नहीं मिटा सकता। होगा वही जो किस्मत में लिखा है। लेकिन, फिलहाल अभी तो मैं दूसरों का भाग्य विधाता हूँ। लोगों को ठेके दिलवाता हूँ। उनकी परमिटें बनवाता हूँ। आपको कुछ आता जाता तो है नहीं। चल दिए भविष्य बताने। विधायक बनने के बाद मेरी शत्रुता के बारे में कहीं सुन लिए और उसे घुमा फिराकर बयान कर दिए। तुम्हारे जैसे फक्कड़ी का क्या भरोसा। चाहूँ तो तुम्हारे पाखण्ड का भांडा मैं अभी फोड़ दूँ। तुम्हारा सारा पोल खुल जाएगा कि तुम कितने सत्यवादी हो।

सत्य सुनकर उसे सहन करना मनुष्य के लिए बड़ा कठिन होता है। ठाकुर साहब ने बाबा से फिर कहा - जी मैं आता है, कि इस रिवाल्वर से तुम्हारी खोपड़ी उड़ा दूँ। उन्होंने अपनी भरी हुई विदेशी पिस्तौल बाबा के माथे पर टिकाकर कहा - बाबा, अब सच-सच बताना कम उम्र तुम्हारी है या मेरी ? बताइये, पहले कौन मरेगा ? मैंने दो-चार नहीं, तुम्हारे जैसे छत्तीस पाखंडी देखें हैं। तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिर पर ही खड़ी है। ट्रिगर दबा दूँ, तो पलक झपकते ही तुम्हारा काम तमाम हो जाएगा। बोलने से पहले कुछ सोच तो लेते।

तब बाबा ने शांत भाव से कहा- नाराज क्यों होते हैं, ठाकुर। सत्य सदा कड़वा ही होता है। आपसे मेरा कोई बैर भी तो नहीं। आप धैर्य रखें। ऐसी जल्दबाजी किस काम की। मुझे मालूम था कि यह सुनकर आपका खून खौलने लगेगा। आप मरने-मारने पर उतारू हो जाएंगे। लेकिन बेटा ! मेरी मौत एक तो अभी बहुत दूर है। दूसरे वह तुम्हारे हाथ में नहीं। तुम गोली जरूर मार सकते हो पर, मुझे मार नहीं सकते। मेरा प्राण लेना कोई बच्चों का खेल नहीं।

कोई बात सुनकर तैश में आना उचित नहीं है। उस पर बिचार करना चाहिए। आप में सहनशींलता का अभाव है तो मुझसे ऐेसा प्रश्न ही न पूछना था। मैंने तो वही बताया जो आपके ललाट में लिखा है। बेटा ! तुम्हारे भाग्योदय से मुझे कुछ भी न मिला और न दुर्भाग्य से मेरा कुछ जाने वाला है। मैं भी तुम्हारे जैसा एक इंसान हूँ, कोई देव नहीं। पर, तुम्हारे साथ किसी अप्रिय बात को सुनकर दुःख अवश्य होगा। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है। तुमने अभी देखा ही क्या है। शांत मन से घर जाओे और अपने शत्रुओें से सतर्कता बरतो। सजग रहना ही अक्लमंदी है। लापरवाही से काम बिगड़ता है। देर सबेर इधर-उधर जाना बन्द कर दो। यदि, फिर भी तुम्हारा संदेह दूर न हुआ हो तो गोली चलाकर देख लो। दूध का दूध और पानी का पानी सब अभी साफ हो जाएगा।

इतना सुनते ही ठाकुर साहब का उबलता खून ठंडा पड़ गया। उनकी उंगली ट्रिगर पर ही रखी रह गई। बाबा की दृढ़ता और साहस देखकर वह थर - थर कांपने लगे और बोले- बस, बाबा बस, मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ, मुझे और लज्जित न करें । आप इंसान नहीं साक्षात देव हैं। मैं गुस्से में न जाने आपको क्या - क्या कह गया। सच बताऊं मैं होश मे न था। आपे से बाहर होकर आपको बहुत भला बुरा कहा। मुझे माफ कर दीजिए।

ठाकुर साहब की क्रोधमय बातें सुनकर बाबा जरा भी बिचलित न हुए। शांत भाव किन्तु, दृढ़ता से विधायक जी का गुस्सा शांत कर दिए और बोले- बेटा, प्रश्नानुसार ही उत्तर देना बुद्धिमानी है। तुम्हारी उम्र अब कम है। यह अटल सत्य है। पहले काल का ग्रास तुम्हें ही बनना लिखा है, मुझे नहीं। इसलिए, मुझे तुम्हारी गोली बन्दूक नहीं मार सकती। सच्चाई जानने की जिझासा बड़ी प्रबल होती है। लेकिन, उसे जानकर विचलित हो जाना बड़ा कष्टदायक है। यह सुनकर ठाकुर का अन्तस्तल हिल गया। हृदय में तूफान उठने लगा। मन-मस्तिष्क में ज्वार आने लगे।

पहले उन्हें बाबा पर जरा भी यकीन न था। अपने पौरूष के घमण्ड में चूर थे। लेकिन, बाबा की मधुर वाणी ने जादू सा असर किया। उनका सारा नशा पलभर में छू मंतर हो गया। उन्होंने अपने आपको आज एक बड़ा अनिष्ट होने से रोक लिया।

बड़ी सतर्कता से मन के भावों को छिपाकर वह बोले - अच्छा बाबा, अब आज्ञा दीजिए। यदि बच गया, तो अब छः माह बाद ही मुलाकात होगी। लेकिन ध्यान रहे तब रिवाल्वर में छः की छः गोलियां आपके भेजे को पार करेंगी और यदि मारा गया, तो आपकी वाणी सत्य सिद्ध होगी। लोग आपको देवता मान लेंगे। लेकिन मैं यही प्रार्थना करूँगा, कि आपकी वाणी असत्य साबित हो। आप झूठा कहलाएं, क्योंकि इसी में मेरा हित है।

सविन्द्र सिंह को बाबा की बात पर भरोसा तो था नहीं लेकिन, मृत्युभय ने उनका कलेजा दहला दिया। अंग रक्षकों की संख्या बढ़ा दी गई। देर से घर आना-जाना बन्द हो गया। चौकसी बढ़ा देने से घर एकदम छावनी में बदल गया। धीरे-धीरे छः माह बीत गए।

सावन का महीना आ गया। चारों ओर हरियाली ही हरियाली। पेड़ों की डाल पर झूले लटक रहे थे। खेतों में स्त्रियां सावन के गीत गा रहीं थीं। मौसम खूब सुहावना था। कभी-कभी बादलों की हलकी फुहार आकर तन को भिगो देती थी। वायु के सुखद झोंके मन को हर्षित कर देते। वातावरण को सुखमय बना देते। मन में उमंगों की लहरें उमड़ रहीं थीं। सविन्द्र सिंह को एक आवश्यक बैठक में भाग लेने के लिए विधान सभा भवन लखनऊ जाना था।

इसलिए, भोर में चार बजे ही उठे और अपने ड्राइवर को जगाकर कहा - राम !गाड़ी तैयार करो। मुझे लखनऊ जाना है। स्टेशन पहुँचा दो।

राम झटपट तैयार हो गया और कहने लगा - ठाकुर साहब ! पहले आप कभी-कभी अचानक कहीं आते-जाते थे। पर, मैं देख रहा हूँ कि पिछले छः महीनों से आपका हर जगह जाने का प्रोग्राम यकायक ही बनता है। पहले से खबर रहती, तो मैं स्वयं तैयार रहता। मालिक ! ऐसा परिवर्तन क्यों ? क्या, मुझ पर भरोसा नहीं ? या तो आप मुझे पराया समझते हैं।

ठाकुर साहब बोले - अरे, नहीं रामू। ऐसी कोई बात नहीं। हम तुम्हें उतना ही चाहते हैं जितना पहले। लेकिन ऐसी स्थिति में तुम्हें भ्रम होना स्वाभाविक है। परिस्थिति ही ऐसी आ गई है कि तुम्हारे स्थान पर दूसरा कोई होता तो वह भी शक करता। सच यह है कि मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं। शत्रुओं की बढ़ती संख्या के कारण मेरा हर काम जरा गोपनीय बन गया है। तुम्हें याद है कि नहीं? आज से छः माह पहले फक्कड़ बाबा ने वट वृक्ष के नीचे मुझसे क्या कहा था ?

रामू बोला - हाँ, मालिक याद है। फिर, तो मुझे माफ कीजिए। ठाकुर साहब ने कहा - अरे, नहीं पगले, तू तो मेरी जान से बढ़कर है। बाबा की बात याद करके रामू की आंखों में आँसू छलक आए।

चलने से पहले ठाकुर साहब ने सोचा, कि पत्नी के हाथ की एक कप चाय पी लूँ। इसलिए उसे जगाने उसके कमरे में चले गए। वह सुमन को आवाज देते कि उससे पहले ही वह जोर-जोर से चीख पड़ी। ठाकुर साहब ने जब देखा कि उनकी पत्नी पसीने से तर है। उसका हृदय तेजी से धड़क रहा है।

उन्होंने जगाते हुए उससे पूछा - क्या बात है सुमन ! तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न ? नींद से जागते ही सुमन पति के सीने से चिपट गई और सिसक-सिसक कर रोने लगी।

सविन्द्र के पुनः पूछने पर बोली - स्वामी ! मेरी तबीयत तो ठीक है। तब सविन्द्र ने पूछा - प्रिये, तुम चीख क्यों रहीं थी। क्या कोई बुरा सपना देख लिया ?

सुमन बोली - स्वामी ! आज आप घर छोड़कर कहीं न जाएं। मैंने अभी-अभी बड़ा भयंकर और अनिष्टकारी स्वप्न देखा है। प्रातः काल का सपना प्रायः सच होता है। बाबा की बात को भी आज छः माह पूरे हो जाएंगे।

तब सविन्द्र बोले - अच्छा, जरा मुझे भी तो बताओ कि तुमने सपने में क्या देखा?

सुमन ने रूँधे हुए गले से कहना शुरू किया - नाथ ! मैंने देखा कि आप एक सागर पार करके उस पार जाना चाहते हैं। इसलिए आप अपनी जीप से उतर कर एक जहाज में सवार होने जा रहे थे। आपका एक पैर जीप पर तो दूसरा धरती पर था कि समुद्र में अचानक तूफान आ गया। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। जहाज के टुकड़े-टुकड़े होकर तहस नहस हो गया। लोगों में हाहाकार मच गया। आप लहरों में डूबने उतराने लगे। इतने में तीन चार भयंकर मगरमच्छ आप पर टूट पड़े। ऐसा लगा मानो, आप डूब ही जाएंगे। आप को ऐसी स्थिति में देखकर मेरे मुँह से अनायास ही चीख निकल गई।

पत्नी को धैर्य बंधाते हुए सविन्द्र बोले - प्रिये ! स्वप्न तो स्वप्न ही है। वह पूरा कभी नहीं होता है। सपना सच भी होता। यह एक कोरी कल्पना है। तुम इतना दुखी मत हो। सोने से पहले तुमने कुछ सोच बिचार किया होगा। इसलिए ऐसा सपना आया । कभी-कभी मनुष्य चिंतन उसके सपनों में साकार होता दिखाई देता है।

तब सुमन बोली - नहीं, स्वामी नहीं। सपने कभी-कभी हमारे सामने उसी रूप में हूबहू साकार हो जाते हैं। आप मुझ पर तरस खाइए। घर छोड़कर कहीं न जाएं। होनी का कोई ठिकाना नहीं। मेरा हृदय बहुत बेचैन हो रहा है। इस समय मुझ पर क्या गुजर रही है?आप समझने की कोशिश करें। आप मेरे प्राणाधार हैं। आपके चले जाने पर मेरा तो जीना ही दुश्वार हो जाएगा।

तब सविन्द्र बोले- सुनो सुमन, मान लो बाबा की बात सच है तो भी अभी समय लगेगा। इतना भयभीत होने की जरूरत नहीं। हमारा सुरक्षा कवच देख रही हो तब भी साहसहीन हो रही हो। पत्नी तो पति को साहस देती है। तुम मेरा साहस मत कम करो। मुझे जाने दो। शाम तक वापस लौट आऊंगा।

पत्नी अपने पति को अपना ईष्टदेव मानती है। उसे पसन्न रखना अपना कर्तव्य समझती है। इसलिए सुमन पति को बार-बार समझाती रही। उसे रोकने की जी भर चेष्टा करती रही। पर, होनहार के आगे अपना कोई वश नहीं चलता।

आखिर सविन्द्र सिंह अपनी पत्नी को भाँति-भाँति की सांत्वना देकर घर से निकल गए और बोले-देखना ! मैं भला-चंगा वापस आउंगा। इतना कहकर वह लाव-लश्कर के साथ रेलवे स्टेशन पहुँच गए।

सुबह के 8 बजे थे। उनकी जीप स्टेशन के अहाते में जाकर रूक गई। सविन्द्र सिंह एक पैर निकाल कर जमीन पर टिकाए। अभी दूसरा पैर जीप में ही था कि न जाने किधर से 2-3 मोटर साइकिल सवार हवा की तरह वहाँ आए और अंधाधुंध गोलियों की फायरिंग करने लगे। गोलियों की बौछार से ठाकुर साहब बिल्कुल जख्मी हो गए। उनका सीना छलनी हो गया। वह तुरन्त नीचे गिर पड़े और हत्यारे देखते ही देखते फरार हो गए।

सविन्द्र सिंह अकाल के मुँह में समा गए। माली के दूर जाते ही सारा चमन उजड़ गया। पत्नी का सपना सच साबित हो गया और बाबा की वाणी भी सत्य सिद्ध हुई। काश, ऐसा न होता । पुलिस कार्रवाई होने के बाद निर्जीव शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------