शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

अमरीक सिंह कंडा की लघुकथाएं

कंडे का कंडा 

आज का सच

‘‘वीर ,डैडी कहां गए हैं?’’ नवविवाहित भाई को मायके आई बहन ने पूछा।

‘‘वे तो... हजूर साहब... गए हैं... 10-12 दिनों के लिए।’’ भाई ने आंखें नीची करके कहा।

‘‘भैया मेरे सिर की कसम खा कर कहो।’’ बहन ने भाई का हाथ अपने सिर पर रखते हुए कहा। भाई ने सिर से हाथ हटा दिया और नजरें नीची करके अंदर कमरे में चला गया।

बहन अपने भाई की नीची नजरें देख कर समझ गई थी कि कलियुगी राम ने दशरथ को हमेशा के लिए वनवास भेज दिया था।

००


एक चित्र दो पहलू

श्मशान में पड़ी सज-धज कर आई सोने-चांदी की तारों, गुब्बारों तथा मखमली शालों में लिपटी किसी अमीर वृद्ध की अर्थी और साथ ही कारों, स्कूटरों, मोटरसाइकिलों तथा पैदल लोगों की भीड़, फूल-बताशों की वर्षा, बैंड-बाजों का शोर। चारों ओर फैली चंदन तथा कपूर की सुगंध। वृद्ध लाश अनेकों कीमती शालों तथा लोइयों से दब गई।?थोड़ी देर बाद वह चमचमाती अर्थी आग की लपटों में भस्म हो गई।

दूसरी अर्थी आई, चीथड़ों में लिपटी हुई, दोस्तों-रिश्तेदारों की भीड़ भी नहीं थी, रोने की आवाजें भी नहीं थी। यह एक लावारिश लाश?थी। कुछ क्षणों में आग की लपटों में सब कुछ भस्म हो गया। दोनों स्थानों पर अब बस राख के ढेर ही थे।
००


झूठ-सच

‘‘देखो, मेरी कितनी कद्र है, किताबों में मेरी कद्र्र, ग्रंथों में मेरी कद्र, तेरी तरह नहीं कि चारों तरफ अपमान ही अपमान।’’ सच ने छाती चौड़ी करके कहा।

‘‘तुम्हारी तो किताबों-ग्रंथों में ही कद्र है, रही कद्र की बात तो जो चीज कम होती है, उसकी कद्र होती ही है। अब तो मेरा राज है। मैं तो घर-घर में घर कर चुका हूं, अमीर से गरीब, नेता से अभिनेता, संतरी से मंत्री, स्कूलों, कालेजों से लेकर संत-महंत तक सब मेरा नाम जपते हैं। वास्तव में सब मेरे आदी हो गए हैं।’’ झूठ ने एक ही सांस में कहा।

अब सच चुप था।

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