शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

मनोज कुमार पाठक की कविताएँ

कविता
    क्या फायदा
               -- मनोज कुमार पाठक

मधु दूर हो, बहुत दूर तो क्या फायदा
पाने का आस क्षीण हो तो क्या फायदा
तुम मधुमय, मधु सागर , मधु रंजित
प्रिये, कर मुझे भी मधु सिंचित
मधुसिक्त कोमल अधरों में धरो
चित्त, ह्रदय में सदा वास करो
उत्सुक ह्रदय, तन-मन को मेरे
व्याकुलता से भर कर क्या फायदा ।
तुम मधुकुंड, मधुदेश, मधुपूर्ण
प्रिये, न करो तुम प्रेम चूर्ण
मधु विह्वल तन में प्रेम रस भरो
मुझे भी सहर्ष मधुप्लावित करो
मधु आस में उत्सुक मन को
नैराश्य से भर कर क्या फायदा ।
तुम मधुतंद्रित, मधुश्यामल, मधु राज
प्रिये, करो प्रेम में मधु साज
अवचेतन में आकर चेतन भरो
प्रेम पुष्प से स्वागत करो
मधुसंचय को बढे हाथ को
मधुहीन जीर्ण कर क्या फायदा।


व्यक्त-अव्यक्त
-              -- मनोज कुमार पाठक

उस तन्द्रा की बात क्या करूँ
प्रिये, उस स्वप्न की बात क्या करूँ
जिसमे लौकिक कुछ न था !
उस स्मृति की बात क्या करूँ
जिसमे तन्द्रा भी है
स्वप्न भी है !
बस, इतना ही कह पाऊं
उस तन्द्रा में था
एक आशापूर्ण स्वप्न
और स्वप्न में
कुछ शांति और आशा
और प्रिये, उद्वेगी पिपासा


(कवि युवा साहित्यकार-संपादक हैं और अंग्रेजी के व्याख्याता हैं)
पता-- आदित्यपुर, जमशेदपुर
        झारखण्ड

मेल-- mkp4ujsr@gmail.com

6 blogger-facebook:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 10/11/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. मनोज जी ,आपकी रचना मधुर और आशापूर्ण लगी |

    उत्तर देंहटाएं
  3. दोनों रचनाएँ बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. उम्दा ...

    दीवाली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. anju ji aapko bhi prakash parv ki subh kamanayen aur meri kavitaen pasand ayin, dhanyavad!

      हटाएं
  5. sabhi tippanikaron ko mera pranam, dipawali ki subhkamanayen!
    meri kavitayen aapki drishti me ayi, dhanyavad.
    manoj
    09973680146/mkp4ujsr@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं

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