शनिवार, 24 नवंबर 2012

अर्जुन प्रसाद की कहानी - भैंस की दलाली

भैंस की दलाली

हरी नगर के रामानुज वैसे तो ब्राहमण थे। पर, वह न तो ब्रहम को ही जानते थे और न उनमें कोई ब्राहमणत्व ही था। चुगलखोरी करना और झूठ बोलना उनकी आदत थी तो दूसरों के मामले में व्यर्थ ही दखल देना उनका विशेष गुण । बेचारे अपने इन्हीं कर्मों के कारण एक बड़े काश्तकार से भिखारी हो गए। रामानुज दो भाई थे। उनके छोटे भाई रामाझा मुम्बई (बम्बई) में सरकारी नौकरी करते थे। माता पिता की मृत्यु के बाद वह गॉव से नाता तोड़कर वहीं रहने लगे। बड़े विनयशील और सदाचारी थे। दयालु और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। फिर भी न जाने कैसे बम्बई जैसे शोरगुल और भीड़ भाड़ वाले शहर में अकेले बड़े चैन से रहते थे। वह इकलौते पुत्र के पिता थे।

पर, रामानुज निःसंतान थे। पुत्र का जन्म होते ही रामाझा बड़ी आत्मीयता से रामानुज से बोले - भाई साहब ! राजीव आपका ही पुत्र है, मेरा नहीं। इसे आप अपने पास ही रखिए। मुझे एकाकी जीवन बिताने की अब आदत हो गई है। आप लोग जानते ही हैं कि बम्बई का समुद्री खारा पानी मुझे सूट नहीं किया। अब तो मेरी पाचन क्रिया बिल्कुल शिथिल हो गई है। वहॉ मुझे कोई देखने वाला भी तो न था। मैं युवावस्था में ही बार-बार बीमार पड़ने से रोगी हो गया। इसलिए आप मेरी चिन्ता बिल्कुल न करें। दवा का असर इसी प्रकार उलटा होता रहा तो असमय ही किसी दिन दुनिया से भी चला जाऊंगा।

धीरे-धीरे वक्त ने करवट बदला और एक बार वह ऐसे बीमार पड़े कि फिर ठीक ही न हुए। अपनी युवा पत्नी मनोरमा और पुत्र राजीव को अपने भाई-भाभी के सहारे छोड़कर एक दिन संसार से चल बसे। मनोरमा को वैधव्य का मॅुह देखना पड़ा। उस पर मानो, पहाड़ ही टूट पड़ा हो। जवान भाई की मृत्यु से रामानुज को बड़ा आघात पहुँचा। घर में आय का एक साधन खत्म हो गया।

रामानुज और उनकी पंडिताइन भांग के गोले का सेवन करने के ऐसे शौकीन थे कि बिना भोजन के तो रह जाते लेकिन, भांग के बिना उनका जीना मुश्किल हो जाता। बिना पानी के जैसे मछली तड़पती है, वैसे ही पति-पत्नी व्याकुल हो जाते। रामाझा की मृत्यु के पश्चात बिरादरी को तेरहवीं का भोज देने के बाद एक दिन रामाझा की पत्नी मनोरमा ने रामानुज से कहा - जेठ जी, अब राजीव के बाबूजी तो रहे नहीं और आप दोनों नशे के बिना जी नहीं रह सकते। जब भी देखो हमेशा नशे में ही चूर रहते हैं। इस मॅहगाई में घर का खर्च चलाना वैसे भी मुश्किल है। ऐसे दौर में मनुष्य को ऐसा नशा करना शोभा नहीं देता। जानबूझ कर पागल बनना जरा भी ठीक नहीं है। अतः आप लोग इस बुरी लत को अब छोड़ ही दीजिए। इसी में हम सभी की भलाई है।

यह सुनते ही रामानुज बोले - लगता है भाई के मरते ही अब चींटी के भी पर निकल आए हैं। मेरी एक बात सुन लो मनोरमा, मुझे तुम्हारे भाषण की जरूरत नहीं है। अपना अच्छा-बुरा मैं खूब समझता हॅू। मेरे पास इतनी खेती-बाड़ी है। वह किस दिन काम आएगी? मेरी पड़ाइन न तो अपनी अमल छोडेंगी और न ही नशा। तुम्हें जो भी करना है, कर लो। मनोरमा बोली - अच्छा तो अब खेत बेचकर अमल मिटेगी। आप अपनी लत नहीं छोड़ना चाहते तो ठीक है। पर एक बात मेरी भी कान खोलकर सुन लीजिए। मैं ऐसा कभी न होने दूँगी।

यह सुनकर रामानुज बोले- तो क्या करोगी तुम? मनोरमा ने कहा मैं अपने बेटे के साथ आपसे अलग रहूँगी। रामानुज ने कहा- अरे तो जाकर रहो न। कौन रोकता है?

तब मनोरमा बोली-मेरे पति के हिस्से की आधी खेती मेरे पुत्र राजीव के नाम कर दीजिए। बस, रामानुज यही तो चाहते थे। अंधा क्या चाहे, बस दो आंखें। जो बिना मांगे ही मिल गईं। रोगी जो मांगे, वैद्य वही बताए। उन्हें मुँह माँगी मुराद मिल गई। लेकिन राजीव से अलग रहना सुनकर रामानुज और उनकी पत्नी बड़े दुखी हो गए।

इसलिए नरम रूख अपनाकर बोले - मनोरमा इतना गजब मत करो। हम दोनों राजीव से बिछुड़कर नहीं जी सकते। जायदाद ले लो मगर उसे मत छीनों वह हमारी आंखों का तारा है। हम पर तरस खाओ। मेरे जीने का सहारा मत छीनो। मेरे कलेजे के टुकड़े को हमारे पास ही रहने दो। हमने उसे बचपन से पाला हे। इतना पत्थर दिल मत बनो। जरा सोचो ! एक बार आदत पड़ जाय तो कोई भी लत सरलता से नहीं छूटती। इंसान को अपना गुलाम बना लेती है।

रामानुज अगले दिन तहसील में जाकर पटवारी से मिले और आधी जमीन नाबालिग भतीजे के नाम लिख दिए। बँटवारा होने के कुछ दिन बाद मनोरमा ने जेठ-जेठानी से कहा - देखिए यहाँ राजीव पढ़ लिख नहीं पाएगा। इसलिए कुछ दिन के लिए उसे अपने भाई के पास भेज देती हूँ। बालिग होने पर उसे यहाँ फिर बुला लेंगे। पति-पत्नी अपने प्रिय भतीजे को किसी भी तरह त्यागने को तैयार न थे। उन्होंने बड़ी शालीनता के साथ मनोरमा से कहा - पशु के साथ भी कुछ दिन बिताने के बाद उससे विछड़ना असहनीय होता है। फिर राजीव तो अपना ही खून है। वह यहाँ भी पढ़ लिख सकता है।

यह सुनकर मनोरमा बोली - आपका लाड़ प्यार उसे बिगाड़ देगा। तब रामानुज बोले - बच्चे तो बच्चे हैं। उनके साथ अधिक कठोरता भी तो उचित नहीं। बच्चों के साथ शासन जैसा व्यवहार करना गलत है। उन्हें स्नेह से ही पालना ठीक है। पाण्डेय जी कोई काम धंधा करने के योग्य तो थे नहीं। आलसी और बने हुए अपाहिज जो थे। दूसरी बात, बिन बुलाए मेहमान की तरह दूसरों के मामले में कूद पड़ते थे। इसलिए मनोरमा ने सहर्ष हाती भर दी।

वह बोली- ठीक है, जैसी आप दोनों की मर्जी और सब कुछ पूर्ववत चलने लगा। अपनी आदत के अनुसार एक बार पाण्डे जी अपने एक पड़ोसी के निजी मामले में टपक पड़े। उससे व्यर्थ ही बैर मोल ले लिए। हीरा यादव को अपनी एक भैंस बेचनी थी। पाण्डेय जी भैंस के बारे में सुने तो व्याकुल हो उठे। यादव की भैंस बिक जाय और वह चुप बैठे रहें, हरगिज नहीं।

बाजार भाव बिना मालूम किए ही हीरा ने उसके नौ हजार की जगह पाँच हजार ही माँगे। मान न मान मैं तेरा मेहमान, पाण्डेय जी बिचौलिया बनकर भैंस सात हजार रूपए में बिकवा दिए। हीरा को दो हजार रूपये का नफा हुआ। मुंशी को बुलाकर रवन्ना लिख दिया गया और भैंस यादव जी के घर से अपने नए मालिक के घर चली गई। कुछ वक्त बाद यादव जी के एक अन्य पड़ोसी राधेश्याम उनसे पूछ पड़े- यादव जी ! कितने में बिकी? यादव जी बोले-बस, सात हजार में।

यह सुनते ही पड़ोसी सज्जन बोले -अरे भैय्या ! आपने यह क्या किया ? ग्यारह की मुर्रा इतने सस्ते में दे दिये। आपका दिमाग तो नहीं फिर गया था? आप ठगे गए। यदि मैं होता तो आठ से कम में न देता। यह सुनकर यादव जी को अपने ठगे जाने का काफी अफसोस हुआ। राधेश्याम उनकी बुद्धि को नकारकर उन्हें बेवकूफ साबित कर दिए। विनाश काले-विपरीत बुद्धि, इस हानि लाभ की गणना को समझते ही हीरा यादव, रामानुज के पास जाकर बोले -पाण्डे जी !आज आप हमारे साथ अच्छा नहीं किए। मेरी भैंस की दलाली खाकर आप हमारा भारी नुकसान कर दिए। आपको क्या हक था, बीच में बोलने का। आपकी वजह से मेरी भैंस आज औने-पौने में चली गई।

यह सुनकर रामानुज तपाक से बोले - भैय्या ! दो हजार अधिक भी तो दिलाए। आप तो पाँच हजार में ही देने को तैयार थे। घाटा तो तब होता जब इससे कम में सौदा होता। आप मुझ पर नाहक ही शक कर रहे हैं। तब हीरा बोले - देखिए, अफीमचियों और नशेड़ियों की बातों पर कोई पागल ही यकीन कर सकता है, मैं नहीं। जितनी दलाली खाए हो, चुपचाप दे दो। वरना, हड्डी पसली बराबर कर दूँगा। यह सुनते ही रामानुज जी की जान मुसीबत में फँस गई। उन्होंने तरह-तरह के बहाने बनाकर बड़ी सफाई देने की कोशिश किया कि वे बिल्कुल बे-कसूर हैं। जनेऊ और ब्राह्मणत्व की दुहाई भी दिए।

पर, हीरा यादव ने उनकी एक न सुनी और आव देखे न ताव, फटाफट एक जोरदार लाठी निकालकर उनके पैरों पर जड़ दिए। लाठी के तीव्र प्रहार से पाण्डेय जी तुरन्त जमीन पकड़ लिए। उनका दायां पाँव सदा के लिए बेकार हो गया। उनके घुटने का निचला भाग मानो सावन का झूला बन गया। मालूम नहीं, बेचारे को दलाली में कुछ मिला भी या नहीं। आजीवन अपाहिज बनकर रह गए। हीरा यादव के पास भैंस वाले रूपये तो थे ही। वह तुरन्त लोगों की नजरें बचाकर पाण्डेय जी के गिरते ही वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गए और जिले के पुलिस मुख्यालय जाकर आत्म समर्पण कर दिए।

पुलिस अधीक्षक महोदय कानून के रक्षक जो थे, शरणागत को पूरा संरक्षण प्रदान किए। फायदेमंद अच्छा अवसर देखकर वह कानून को ताक पर रख दिए। चांदी के जूतों की चमक ने उन्हें रिश्वतम् शरणम् गच्छामि बना दिया। हीरा से वह गुपचुप समझौता कर लिए। यह सच है, चाँदी के जूते में बड़ा दम होता है। क्योंकि शरण में आने वाले को बचाना हमारा धर्म है। यह सोचकर कप्तान महोदय, थानेदार को तत्काल टेलीफोनिक आदेश देकर रामानुज को सीधे अपने कार्यालय बुलवा लिए। पुलिस ने त्वरित ऐक्शन लेते हुए घायल पाण्डेय जी को अपनी जीप से वहाँ पहुँचा दिया।

पुलिस अधीक्षक अगली जांच पड़ताल के लिए मामला एक इन्सपेक्टर को सौंप दिए और उसे उसका कर्तव्य पालन भी समझा दिए कि उसे कैसी रिपोर्ट देनी है। इन्सपेक्टर ने पाण्डेय जी से हमदर्दी जताते हुए कहा - पाण्डे जी !आप मेरी बात जरा ध्यान से सुनें। कानून का उलंघन करना बड़ा गंभीर अपराध है। आप कानून तोड़कर कुछ अच्छा नहीं किए। कानून को अपने हाथ में लेना जुर्म है। आप ही बताइए, हीरा की भैंस बेचने वाले आप कौन होते हैं? आपको ऐसा हरगिज न करना था।

यह सुनते ही रामानुज की बोलती बंद हो गई। वह कराहते हुए बोले - हुजूर ! भैंस तो उन्होंने अपनी मर्जी से बेची है। वह कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं कि मेरी बातों में आ जाते। मैंने तो उन्हें फायदा ही दिलाया है। तब इन्सपेक्टर नत्थू सिंह आंख तरेरते हुए गरजकर बोले -अच्छा ! तो अब मेरे सामने कानून बघार रहे हो। मेरी एक बात कान खोलकर सुन लो, खरीददारों से मोटा कमीशन खाकर अपनी टांग तुड़वाने के जिम्मेदार तुम खुद हो। उस गरीब का तुम इतना नुकसान कर दिए। अब हवालात की हवा भी खानी पड़ेगी तो अक्ल ठिकाने आ जाएगी। शुक्र है यादव ने आपके विरूद्ध पड़ोसी होने के नाते अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। वरना, अब तक पुलिस को कायदे-कानून सिखाने का मजा मिल जाता। जल्दी सोचकर कोई हल ढूँढ़ लीजिए। अन्यथा इन्डियन पैनल कोड की ऐसी-ऐसी धाराएं लगाऊंगा कि सारी उम्र जेल में चक्की घिसते ही गुजर जाएगी। कुछ खोकर कुछ पा लेना ही अक्लमंदी है।

थानेदार के वाक्य व्यूह में फँसे रामानुज गिड़गिड़ाते हुए बोले - अरे साहब, उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। आप तो हमें ही डरा रहे हैं। पुलिस और कानून जनता की रक्षक हैं। कृपया आप इतनी बेरहमी न करें। आप उस पाजी को बड़े घर की हवा खिला ही दीजिए, बस। वरना, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।

तब इन्सपेक्टर बोला - मिस्टर पाण्डेय जी ! वकील मुखतार के चक्कर में पड़ना नुकसानदेय है। एक शरीफ आदमी के खिलाफ केस मुकदमा करने पर उसमें भी हार जाएंगे। तारीखों पर तारीखें पड़ेंगी तो आप थक जाएंगे और अंत में जीत यादव की ही होगी । देखिए,आपका पैर सदा के लिए साथ छोड़ चुका है। मेरी बात मानिए- उससे सुलह कर लीजिए। इसी में दोनों पड़ोसियों की भलाई है। यदि आप चाहें तो हम आपके पैर के इलाज का खर्च हीरा से दिलवा देते हैं। लोग सही कहते हें - जान है तो जहान है। आगे आपकी मर्जी, जैसी करनी वैसी भरनी।

मरता क्या न करता? मक्कार इन्सपेक्टर की बुद्धि ने जादू सा फौरन असर किया। उसकी मीठी-मीठी बातें सुनकर पाण्डे जी उसके झाँसे में आ गए। वह इंस्पेक्टर से बोले-ठीक है साहब, पुलिस जो भी करेगी, मेरी भलाई के लिए ही तो करेगी। फिफटी-फिफटी के हिसाब से इस कड़की में दो चार हजार मुझे दिला दें और बाकी आप जानें आपका काम जाने।

बिना एफ आई आर और मुकदमें के पाण्डेय जी, यादव जी से समझौता कर लिये। उन्होंने सोचा - अब तो ऊँट पहाड़ के नीचे आ ही गया। एक टांग चली गई तो क्या हुआ? हीरा को सबक देने का मौका तो अच्छा है। उसकी भैंस तो पानी में नही गयी पर, उसका पैसा अवश्य पानी में ही जाएगा। अब सारे रूपये बिना कुछ किए ही मेरी जेब में आ जाएंगे। मेरी पंडिताइन बड़े चैन से खूब पान और भंगोले चबाएंगी। लेकिन पाण्डेय जी को क्या पता था कि पुलिस की कथनी और करनी में बड़ा अन्तर होता है।

समझौते की लिखा-पढ़ी के बाद पुलिस ने पाण्डेय जी को सदर अस्पताल में भर्ती करा दिया। जैसे-तैसे उनके पैर पर प्लास्टर चढ़ाकर मामला रफा-दफा किया गया। इसी बीच बेचारे यादव जी माल-मुद्रा उस धूर्त इन्सपेक्टर के हवाले करके खाली हाथ घर लौट आए। अपनी हलकी जेब भारी करके इन्सपेक्टर नत्थू सिंह ने पाण्डे जी को ठेंगा दिखा दिया। प्लास्टर कटने का वक्त आने पर वह खोल दिया गया। लेकिन पाण्डेय जी का पैर मुड़ने का नाम ही न लेता। वह मानो एक सीधा लट्ठा बन गया। पाँव फैलाकर बैठना तो दूर, चलना फिरना और भी कष्टप्रद था। विवश होकर पाण्डेय जी एक डंडे को वैशाखी रूपी सहारा बना लिए।

भाई ने साथ छोड़ ही दिया था। वह उसे खोये ही थे। उनकी टंाग ने भी उनका साथ छोड़ दी। भाई की बेवा ने जमीन का बँटवारा करा ही दिया था। ऐसे दुर्दिन में भांग का खर्च बढ़ जाने से रामानुज के हिस्से की सारी खेती आखिर धीरे-धीरे बिक गई। बाग बगीचे बिके ही, गाय-बैल भी बदहाली की भेंट चढ़ गए। लेकिन पंडिताइन का भंगोला और पान-पत्ता बन्द न हुआ।

इतना बदलाव जरूर आया कि जो स्त्री हरिजनों के मुहल्ले से गुजरते वक्त अपने आंचल से अपनी नाक बंद करके निकलती थी। वह अब अपना मुँह खोलकर चलने लगी। तब उसे शायद यह भय था कि गरीबों के गरीबी की बदबू उसकी नाक में चली जाएगी। यह सच है कि दीनता की दशा में नियम पालन करना अत्यंत कठिन हो जाता है। घर में जब रोटियों के लाले पड़ने लगे और आए दिन उपवास होने लगा तो उनके होश ठिकाने आ गए। नशा पानी की पूर्ति के लिए पाण्डे जी स्टेट बैंक से दो वर्ष पहले लोन लिए थे। वक्त पर ऋण वापस न कर सके तो बैंक ने वसूली के लिए कोर्ट का रास्ता अखतियार कर लिया।

सरकारी कर्ज अदा न करने का मामला न्यायालय में जाने पर पाण्डे जी के नाम सम्मन आने लगे। आखिर मुकदमें की सुनवाई के बाद कुर्की का आदेश हो गया। एक दो बार तो जैसे तैसे कुछ ले देकर मामला कुछ दिनों के लिए टल गया। लेकिन फिर दुबारा कुर्की आ गई। तब रामानुज एक दिन पत्नी से बोले- संजना ! तुम्हारे पास कुछ रूपए हों तो दे दो। बैंक का कुछ कर्ज अदा कर दूँ तो मामला फिलहाल टल जाएगा और इस बुढ़ापे में जेल नहीं जाना पड़ेगा। पैसों का नाम सुनते ही पंडिताइन बोलीं- बड़े अजीब आदमी हैं। अजी, मेरे पास पैसे कहाँ हैं? ऐसा कीजिए, खेत बेच दीजिए। यह सुनते ही पाण्डे जी घायल पक्षी की तरह छटपटाने लगे। वह मन में सोचने लगे- भला यह अर्धांगिनी है या कोई राक्षसी? पास में रूपए होते हुए भी देने का नाम ही नहीं लेती। मुझे इस उम्र में काल कोठरी में भेजना चाहती है।

पत्नी का कठोर वचन सुनकर वह बोले- भाग्यवान ! तुम्हें मालूम ही है कि हमारे सारे खेत तो पहले ही बिक चुके हैं। बैंक का कर्ज लेकर किसी प्रकार गृह खर्च चलाया और भाई का इलाज कराने से लेकर उसका दाह संस्कार पूरा किया। उसकी तेरहवीं पर पूरी बिरादरी को मृत्यु भोज भी दिया। पिछले साल अपने पास कुल डेढ़ बीघा जमीन ही खेती के योग्य बची थी। भूखमरी और तंगी में उसे भी मुंशी राम लाल के नाम लिख दिया। तब कुर्की कुछ दिन के लिए स्थगित हुई थी। उसमें से ही कुछ मुखिया जी को पारिश्रमिक भी दिया था। कुछ बैंक कर्मियों और पुलिस को चढ़ावा चढ़ा दिया। तब जाकर कहीं जान बची थी।

वरना, पुलिस तो पंजे झाड़कर मेरे पीछे ही पड़ गई थी। अब जो बाकी बचा खुचा था, उसे हीरा यादव के चक्कर में पुलिस को नजराना दे दिया। अन्यथा उसे मेरी टूटी टांग की कोई चिंता न थी। पुलिस वाले उलटे मुझे ही बार-बार धमकी दे रहे थे। क्या तुमने देखा नहीं ? कितना शातिर था वह इंस्पेक्टर नत्थू सिंह। हीरा से जो लिया सो लिया ही। दिलाने के नाम पर उलटे मुझसे ही दो हजार वसूल लिए। कहता था मुझे सारी उम्र जेल में सड़ा देगा। संजना !अब तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूँ?

तब आव देखीं न ताव, पंडिताइन तुरंत बोलीं- तब फिर कोई दूसरा उपाय ही कीजिए। ब्राह्मण हैं, भिक्षा मांगने का धंधा ही कर लीजिए। पुरूष होने का आखिर कुछ तो धर्म निभाइए। ऐसे कब तक चलेगा? आप खुद ही सोचिए कि अब अपने पास बचा ही क्या हे? दाने-दाने को तरसना पड़ता हे। अमल पानी को कौन कहे? अब तो रूखी सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती। आप कैसे आदमी हें? मेरी कुछ सुनते और समझते ही नहीं कि भूख की आग बड़ी भयानक होती है जो सब कुछ जलाकर राख कर देती है। अपने माँ बाप की लाडली बेटी हूँ न, इसलिए अब मुझसे सहन नहीं होता। देखिए, आप मेरे पति परमेश्वर हैं, बुरा मत मानिए। मेरी बात को ठंडे मन से समझने की कोशिश कीजिए। लूले - लंगड़े पर लोग रहम जल्दी करते हैं। आज कल भीख मांगना एक अच्छा व्यवसाय है। काम करने मे लाज किस बात की? शर्म करने पर तो भूखों ही मरना पड़ेगा।

प्राणप्रिया पत्नी की बेगैरत भरी सलाह सुनकर पाण्डे जी पहले तो ना नुकर करते हुए मना किए। अपने किए पर उन्हें बड़ा अफसोस हुआ। हृदय आत्मग्लानि से भर उठा। वह बार-बार यही सोचते कि दूसरों के मामलों में बिना बुलाए मेहमान की तरह हाथ डालना वाकई बड़ा घातक है। लेकिन जब उसने अधिक विवश किया तो वह सहमति में अपना सिर हिलाकर भीख मांगने की हामी भर दिए। इस प्रकार अंत में वह सुबह से शाम तक लोगों को अपनी टूटी टांग दिखाकर उनकी सहानुभूति बटोरने की कड़ी मेहनत करते हुए भिक्षामि देहि के उच्चारण के साथ दर-दर भटकने लगे।

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