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विजेंद्र शर्मा का आलेख - कविता करे गुहार...

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कविता करे गुहार ............. कविता क्या है ? यह सवाल दिखने में तो छोटा सा मालूम पड़ता है मगर इसका कोई एक मख़सूस जवाब सही अर्थों में नहीं है...

कविता करे गुहार .............

कविता क्या है ? यह सवाल दिखने में तो छोटा सा मालूम पड़ता है मगर इसका कोई एक मख़सूस जवाब सही अर्थों में नहीं है। कविता की परिभाषा का फैलाव भी किसी समंदर के अनंत क्षेत्रफल से कम नहीं है। कविता का अपना एक गौरवशाली इतिहास है। मेरा मकसद आपको कविता के माज़ी से रु ब रु करवाना नहीं बल्कि सिर्फ़ ये बताना है कि कविता साहित्य की एक नाज़ुक विधा है और बड़े – बड़े नक़क़ाद ( आलोचक ) इसे सिर्फ़ अपनी मौजूदगी जताने के लिए जटिल / पेचीदा बनाने पे तुले हुए हैं।

जय शंकर प्रसाद ने कहा था कि “सत्य की अनुभूति ही कविता है “ मगर ये भी तो सच है कि सिर्फ़ सच को कागज़ पर उकेर देना ही तो कविता नहीं है , प्रसाद जी की परिभाषा के अनुसार तो वो “रचना” “कविता” नहीं है जो कवि अपनी कल्पनाओं में , अपने तसव्वुर में अपने ख़यालात को सैर करवाकर रचता है। प्रसाद जी ने स्वयं “कामायनी “में जिस महाप्रलय का चित्रण किया है वह सौ फ़ीसदी काल्पनिक है।

संस्कृत के विद्वान् आचार्य भामह ने कहा “ शब्दार्थो सहितो काव्यम “ अर्थात कविता शब्द और अर्थ का एक उचित मेल है।यहाँ भी बात अधूरी लगती है क्यूंकि केवल शब्द और उसका अर्थ कविता नहीं हो सकते।

आचार्य विश्वनाथ ने कहा कि “रस की अनुभूति जिस वाणी में हो वही काव्य है “ इस परिभाषा की चादर भी कविता के बदन को पूरी तरह नहीं ढक पाती।

आचार्य रामचंद्र ने कविता पे बहुत शोध किया और अपनी एक वाक्य की परिभाषा दी कि कविता “ जीबन की अनुभूति हैं “ और महादेवी वर्मा ने कहा कि “ कविता किसी कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण है “ महादेवी वर्मा का कथन काफी हद तक कविता की परिभाषा को सर से पाँव तक का लिबास पहनाता है।

मैंने जिन साहित्यकारों का ज़िक्र यहाँ किया उन्होंने कविता की व्याख्या अपने – अपने ढंग से की है , इन सब ने कविता नाम की चद्दर को ओढ़ा और इसी चद्दर को अपना बिछौना भी बनाया मगर हमारे अहद( दौर )में ऐसे तनक़ीद कार (आलोचक ) प्रकट हो गए हैं जिन्होंने ना तो कभी कविता रची है ना ही दिल से कभी पढ़ी है। इन बेरहम नक़कादों ने कविता को उस दुर्लभ जड़ी बूंटी की संज्ञा दे दी है जो कभी आम आदमी की दस्तरस में आ ही नहीं सकती। जो काव्य अनुरागी कविता से जुड़ने की सोचता है वो इन आलोचकों की उलझी - उलझी बातें सुनकर कविता की तरफ एक अजीब सा खौफ़ अपने ज़हन पे तारी कर लेता है।

एक रचनाकार अपने अहसास को , अपने अनुभव को या उसने जो महसूस किया उसे अपने अंदाज़ में लफ़्ज़ों के ज़रिये कागज़ पे उतार देता है बस यही कविता है। अब ये सवाल उठना वाजिब है कि उसका ख़याल ताक़तवर है या नहीं, लफ़्ज़ों का इन्तेख़ाब (चयन) कैसा है ? और तख़लीककार ने जो रचना लिखी है वो अपने मकसद में कामयाब हुई है या नहीं , कहीं उसने कागज़ और सियाही को यूँ ही तो ज़ाया नहीं कर दिया।

आज के हमारे नामचीन आलोचक एक तितली की तरह नाज़ुक रचना को भी अपनी हज़ारों पेचो-ख़म वाली राह भटकी हुई समीक्षा से किसी जाल में उलझी हुई मकडी जैसा बना देते हैं।

“आलोचक” नाम की प्रजाति हमारे यहाँ अदब के हर हिस्से में पायी जाती है। प्राय यह देखने में आया है कि इन आलोचकों का अपना कोई ख़ास रचनाकर्म नहीं होता मगर ये दूसरे की तख़लीक (रचना ) की परतें एक प्याज के छिलके की तरह उतार देते हैं साहित्य के इन स्वयम्भू मठाधीशों का हमेशा एक सूत्री कार्यक्रम रहता है कि ऐसा कहो जो सब से हट कर हो चाहें उस कथन का यथार्थ से कोई सरोकार हो या ना हो। किसी जीवंत रचना का ये लोग ऐसा पोस्टमार्टम करते है कि इनके आलोचना कर्म से त्रस्त हो रचना स्वयं ख़ुदकुशी करने पे आमादा हो जाती है और बेचारा रचनाकार अपने क़लमकार होने पर स्वयं प्रश्न चिन्ह लगा देता है। अदब के इन माफ़ियाओं ने अपनी भारी – भरकम तनक़ीद (समीक्षा ) की आंधी से ना जाने कितने कवि रुपी चराग बुझाए हैं।

किसी रचनाकार की किताब का विमोचन हो , किसी काव्य –संग्रह पे परिचर्चा हो या कविता से सम्बंधित कोई कार्यशाला हो ये तनक़ीद के सौदागर रचना धर्मिता और श्रोताओं के कानों पर ज़रा भी तरस नहीं खाते। हर कार्यक्रम में वही दो – चार रटे – रटाये जुमले अपने भाषण में सुना देते हैं।

किसी कवि की कवितायें चाहें प्रेम की हों या श्रृंगार रस से ओत –प्रोत हो उस की समीक्षा में कुछ इस तरह के जुमले इन आलोचकों के श्री मुख से सुनने को मिल जाते हैं कि “ मित्रों ....फलां साहब की रचनाओं में भीतर की बेचैनी झलकती है “ ये जुमला भी अक्सर सुनने को मिलता है “इनकी कवितायें इनके अन्दर का तूफ़ान है “ साहित्य के इन ठेकेदारों से कोई पूछे , श्रृंगार की रचना में कौनसी भीतर की बेचैनी है ? कौनसा अंदर का तूफ़ान है ?

एक सु-विख्यात आलोचक किसी साहित्यिक कार्यक्रम में कहते हैं कि कविता कोई अभिव्यक्ति नहीं है ये तो एक तलाश है ..मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि ये किस की तलाश है। मैंने उनके किसी अज़ीज़ से पूछा तो पता चला कि हुज़ूर की नज़र में स्वयं की स्वयं में तलाश ही कविता है और ये तलाश कभी समाप्त नहीं होती... यही कविता है। उन महान आलोचक की इस टिपण्णी पर इस से ज़ियादा और क्या कहूँ ---

कविता तो अभिव्यक्ति है , कविता नहीं तलाश।

ख़ुद में ख़ुद को ढूंढना , तो जाओ कैलाश।!

दुनिया से अलग नज़र आने की रौ में अदब के ये क़द्दावर मुहाफ़िज़ ऐसी अजीबो गरीब सी परिभाषाएं क्यूँ गढ़ देते हैं। इनकी इस तरह की व्याख्याएं सुनकर मेरे जैसा आम पाठक कविता से राब्ता (सम्बन्ध ) क़ायम करने की बजाय दूरी बना लेता है।

सच्चाई तो ये कि इस तरह के खूंखार आलोचक पाठकों को साहित्य से दूर कर रहे है। नई नस्ल को ठीक से क़लम का इस्तेमाल सिखाना इनका फ़र्ज़ है मगर ये लोग अपने वज़नी जुमलों से उन्हें इतना डरा देते हैं कि नए क़लमकार क़लम से ही खौफ़ खाने लगते हैं ।

पिछले दिनों कविता से सम्बंधित एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला मैंने सोचा शायद कविता को और बेहतर जान पाऊँगा मगर यह कार्यशाला भी शब्द के धुरंदरों की उबाऊ और निरर्थक बहस की भेंट चढ़ गयी। राष्ट्रीय राजधानी से तशरीफ़ फरमा कविता के एक जाने-माने आलोचक ने कहा कि “आज की परिस्थितियाँ कविता के लिए विपरीत हैं , इसके कारण रचना करना मुश्किल हो रहा है “ अब इन हज़रत को कौन समझाए कि जब ज़हन में ख़याल समंदर की लहरों की तरह हिलोरें लेने लगते हैं और अहसास की बांहों में लफ्ज़ ख़ुद ब ख़ुद समाने लगते हैं तो फिर चाहें हालात अनुकूल हो या प्रतिकूल “रचना” जन्म लेकर ही रहती है। एक कविता जब जन्म लेती है तो वह कभी यह नहीं देखती की बाहर परिस्थितियाँ कैसी हैं। महोदय आगे फरमाते हैं कि कविता को केवल दो हिस्सों में बांटा जा सकता है एक तो ट्रेजड़ी और दूसरा कोमेडी , कोमेडी तो साहित्य में दोयम दर्जे की समझी जाती है सो कविता सिर्फ़ ट्रेजेडी से ही पनपती है। हुज़ूर आगे कहते हैं कि कविता की जनक केवल “निराशा” है। अगर इनकी बात को माने तो कविता का एक बहुत बड़ा दौर “छायावाद” कविता की तारीख़ के मंज़र से गायब हो जाता है। कैसे अजीब हैं ये साहित्य मनीषी जो सूर्यकान्त “निराला” जी को भी क़ब्र में भी सुकून से सोने नहीं देते। ये बात समझ से परे है कि साहित्य के ये तथाकथित स्तम्भ ऐसी बे-सर पैर की बातें क्यूँ करते है। मुझे नहीं लगता इस तरह के विचार काव्य प्रेमियों को कविता के और क़रीब ला सकते हैं। कई बार लगता है कि “कविता” को ऐसे आलोचक चूने की डिब्बी में बंद कर अपनी अचकन की अन्दरवाली जेब में क़ैद करके रखना चाहते हैं जैसे ये सिर्फ़ इन्ही की बपौती हो।

भाई प्रमोद कुमार शर्मा की एक कविता मैं यहाँ हवाले के तौर पे कोट कर रहा हूँ :-

घने ऊंचे दरख्त हों ..

चोटियाँ हो पहाड़ की ...

बहते हुए झरने हों ...

यह सब ज़रूरी नहीं है प्रेम के लिए ...

उसके लिए तो पर्याप्त है....

सिर्फ़ तुम्हारा होना।!!

जिस तरह प्रेम के लिए पर्याप्त है ..सिर्फ़ तुम्हारा होना ठीक उसी तरह कविता के लिए भी पर्याप्त है रचने वाले के अन्दर केवल “संवेदना” का होना। कविता किसी भी परिस्थिति ..किसी भी मौसम , किसी भी जगह हो सकती है मगर “संवेदनहीन” व्यक्ति ना तो कविता रच सकता है ना ही कविता समझने का शउर उसमें कभी आ सकता है।

“कविता के बुनियादी सवाल और कविता की तलाश “ पर बड़े – बड़े आलोचक घंटो बोलते है मगर कविता की सबसे बुनियादी ज़रूरत “संवेदना” से शब्द के ये जादूगर यूँ परहेज़ करते हैं जैसे कोई ह्रदय रोगी तेलीय भोजन से करता है। अपनी घुमावदार भाषा के प्रवाह से ये नामचीन आलोचक कविता को ऐसा एकमुखी रुद्राक्ष बना देते है जो पाठक और नए कवियों की पहुँच से कोसों दूर नज़र आता है।

जहां तक कविता का सवाल है मैं कोई आलोचक /समीक्षक नहीं हूँ मगर ब-हैसीयत पाठक इतना ज़रूर कह सकता हूँ की कविता के लिए सबसे बुनियादी कोई चीज़ है तो वो है “संवेदना” , उसके बाद एक सशक्त विचार और फिर आता है सही शब्दों का चयन इन तीनों का बेहतरीन इस्तेमाल जों रचनाकार करना जानता है वो एक अच्छी और सार्थक कविता गढ़ सकता है।

अपने ख़याल को सलीक़े से काग़ज़ पे उकेरना एक दिन में नहीं आता ,हाँ इसके लिए साधना की ज़रूरत होती है और कुछ लोगों को ये सब जानने में वक़्त लगता है कुछ भाई संजय आचार्य “वरुण “ जैसे बिरले भी हैं जो अपनी मुख़्तसर सी काव्य यात्रा में वहाँ तक पहुँच गए हैं जहां तक पहुँचने में अमूमन एक लंबा अरसा लग जाता है। संवेदना की चाशनी में घुल कर जब शब्द काग़ज़ पर उतरते है तो उस कविता का जन्म होता है जिसे बड़े – बड़े आलोचक ना तो समझ पाते हैं ना वे कभी ऐसी कविता लिख सकते हैं। भाई संजय “ वरुण “ की एक कविता की कुछ पंक्तिया मिसाल के तौर पर :---

उलझे – उलझे बालों वाली माँ

कैसे कर लेती हो

इतनी सुलझी – सुलझी बातें

कि कई बार

निरुत्तर हो जाने के बाद भी

कितना सुकून से भरा - भरा

दिखाई देता है

बाबू जी का चेहरा ...

रचनाकार के भीतर हस्सास (संवेदना ) का होना रचना कर्म के लिए प्रथम सोपान है। ये तख़लीकार के अन्दर की संवेदना ही है कि एक बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी के मालिक मुनव्वर राना इस तरह के शे’र कहते हैं :---

सो जाते हैं फुटपाथ पे अख़बार बिछा कर

मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते

***

भटकती है हवस दिन रात सोने की दुकानों में

ग़रीबी कान छिद्वाती है तिनका डाल देती है

साहित्य की कोई भी विधा हो उसका अपना मनोविज्ञान ,अपना व्याकरण होता है मगर व्याकरण उस विधा की आत्मा से बढ़कर नहीं हो सकता। कविता का भी एक बड़ा विस्तृत व्याकरण है। कविता के भी दो पक्ष होते हैं भाव और कला। कविता को संवारने के लिए बहुत से अव्यव है जैसे शब्द शक्तियां , अलंकार , शब्द गुण , कविता में लयात्मकता , विनिन्न रस और छंद। अध्ययन के साथ –साथ ये सब चीज़ें एक कवि के अन्दर समा जाती हैं मगर ऐसा नहीं है की कोई रचनाकार पहले इन तमाम बिम्बों को ज़हन में रखे फिर किसी रचना का सृजन करे। तुलसी ,कबीर , मीरा ,सूर और रसखान ने कौनसा व्याकरण पढ़ा था पर व्याकरण का एक – एक अव्यव उनके कलाम में साफ़ साफ़ दिखाई देता है। कविता रचने के लिए कोई अनिवार्य नहीं है कि क़लम कार भाषा का विद्वान् हो। नज़्म कहने वाला उर्दू का फ़ाज़िल हो या कविता लिखने वाला हिंदी का विद्यार्थी हो या रहा हो ऐसी पाबंदी भी तख़लीक को गवारा नहीं है। जीव-विज्ञान पढ़ाने वाली सुमन गौड़ अपने भीतर की टूट –फूट को बेजान लफ़्ज़ों से रंग बनाकर जब अहसास के कैनवास पर उड़ेलती है तो स्वतः ही कविता की तस्वीर प्रस्फुटित हो जाती है :--

प्रकट होते हो ..

जब तुम मेरे भीतर

पिघल कर ढलने लगती हूँ

तुम्हारे इच्छित सांचे में

गढ़ दिए हैं तुमने मेरे कितने रूप

बना दिया है

अनन्त सा

क्यूँ नहीं स्वीकारते मुझे

एक ही रूप में तुम.....।

यहाँ कवयित्री ना तो छंद अलंकार जानती है ना वो तमाम माप-दंड जिन पर आलोचक कविता को परखते हैं पर मुझे लगता है अहसास और ख़ूबसूरत ख़याल के दम पर एक कविता के जन्म की प्रसव पीड़ा आसानी से सहन की जा सकती है।

भाषा और उसके व्याकरण का अपना महत्व है। भाषा अपने अस्तित्व को जीवित रखने के लिए साहित्य की मोहताज है ना कि साहित्य भाषा का मोहताज। कुछ आलोचकनुमा भाषाविद भाषा को कविता पे लादने की कोशिश कर रहें है और बहुत सी कवितायें सिर्फ़ इसी अवांछनीय बोझ से परेशान होकर डायरियों की क़ब्र में दफ़न हो चुकी हैं। शब्द-कोष में से पहले कोई कलिष्ट सा शब्द तलाश कर उससे कविता की माला पिरोने वाले ये शब्दों के खिलाड़ी कविता में अहसास की अहमियत जानते ही नहीं हैं। ये लोग जब कविता की तफ़सील करते हैं तो शब्दों का भी दम घुटने लगता है क्यूंकि शब्द के ये तथाकथित महारथी संवेदना की खिड़कियाँ हमेशा बंद रखते है। किसी भी लफ्ज़ की जान उस लफ्ज़ के साथ गुंथा हुआ एहसास ही है। मेरी ये पंक्तियाँ भी इसी मर्म से उपजी हैं :---

शब्दों में भी प्राण है , समझ शब्द का मर्म।

दम घुटता हो शब्द का , कैसा रचना कर्म।!

कविता क्या है ? कविता के बुनियादी सवाल क्या है ? कविता की तलाश जैसे मौज़ुआत पे बहस कर के हम लोग कविता पे कोई एहसान नहीं कर रहें हैं और ना ही कविता के लिए कोई सुकून का सामान मुहैया करवा रहें हैं। हमारे कुछ प्रख्यात आलोचक कविता पे होने वाली कार्यशाला में वक़्त तो बर्बाद कर ही रहें है साथ –साथ कविता की ख़ुशबू को फैलने से भी रोक रहें हैं।

इन आलोचकों की भी कई किस्में हैं एक तो वे है जो कविता को भी अपने शब्द ज्ञान से भयभीत कर देतें है। उन्हें अपने सिवाय कोई दूसरा रचना धर्मी लगता ही नहीं है। आलोचकों की एक किस्म ऐसी भी है जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ कसीदा पढ़ना आता है। ऐसे एक महोदय को एक पुस्तक के विमोचन में ये कहते हुए सुना कि इन ...... की कवितायों में कोई घुमाव नहीं है ..ये बात को साफ़ साफ़ कहते हैं ..पहेलियाँ नहीं बुझाते ..ये अपनी रचनाओं में अभिधा शब्द शक्ति का प्रयोग करते है ...यही कविता है जो सीधे – सीधे पाठक तक पहुँच जाए। कुछ समय बाद एक और विमोचन कार्यक्रम हुआ .इन्ही आलोचक महोदय को फिर सुनने का अवसर मिला इसबार रचनाकार कोई और था ,इन्होने अपनी तनक़ीद में कहा कि ...इनकी रचनाएं अपनी बात प्रतीकों के हवाले से कहती हैं ...ये अपनी रचना में व्यंजना शक्ति का इस्तेमाल करते हैं , यही हुनर है ...सीधे सीधे बात कह देना कोई बड़ी बात नहीं है ..अभिधा कोई शक्ति है ...कविता में तो व्यंजना ही होनी चाहिए। एक ही शख्स के दो अलग –अलग मौकों पर अलग – अलग बयान कई बार लगता है ऐसे लोग साहित्यकार कम और सियासतदाँ ज़ियादा है। सब को ख़ुश करने की ये प्रवृति भी रचना के लिए घातक है।

समझ नहीं आता किसी रचना या रचनाकार की तारीफ़ करने के लिए आप कैसे अपना वक्तव्य और अपने मौलिक विचारों तक को दांव पे लगा देते हैं। ईश्वर कविता और कविता रचने वालों को ऐसे आलोचकों से भी बचाए।

“आलोचना” साहित्य की किसी भी विधा के लिए एक दर्पण है। बिना सेहतमंद आलोचना के रचनाएं मेहंदी की बे-तरतीब बाड़ की तरह फैलने लग जाती है। मैं आलोचकों का कोई विरोधी नहीं हूँ मगर कुछ प्रख्यात आलोचकों ने आलोचना को सिर्फ़ आलू-चना बना के रख दिया है।

हिंदी और उर्दू दोनों के तनक़ीदकारों से गुज़ारिश है कि आलोचना / समीक्षा ऐसी हो जिससे कविता और ज़ियादा ख़ूबसूरत नज़र आये ,कविता का कुछ भला हो । आलोचना अगर ऋणात्मक और पूर्वाग्रहों से ग्रसित होगी तो नुक्सान सिर्फ़ और सिर्फ़ कविता का होगा।

आख़िर में एक बार फिर विख्यात आलोचकों से “कविता” की तरफ़ से यही निवेदन करता हूँ कि वे “संवेदना” के चश्में से हर रचना को देखें और “कविता” को बस “कविता” ही रहने दें ......।

रहम करो आलोचकों , थोंपो नहीं विचार।

कविता बस कविता रहे ,कविता करे गुहार।!

--

विजेंद्र शर्मा

बी.एस.ऍफ़ मुख्यालय ,बीकानेर

Vijendra.vijen@gmail.com

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रचनाकार: विजेंद्र शर्मा का आलेख - कविता करे गुहार...
विजेंद्र शर्मा का आलेख - कविता करे गुहार...
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