शनिवार, 17 नवंबर 2012

श्याम गुप्त की ग़ज़ल

ग़ज़ल
क्या करें भ्रम से घिरे हैं  लोग ,
अपने साये से डरे हैं  लोग


माना कि यह है अन्धेरों का शहर,
पर यहां भी कुछ खरे हैं लोग।


लिप्त तेरे मेरे मैं  वे हैं सदा ,
स्वार्थ से भी कुछ परे हैं लोग ।


ढह गई दीवार जो थी रेत की ,
क्या पता कितने मरे हैं लोग ।


कर रहे हैं मिलावट प्रभु भोग मैं.
धर्म से क्यों यूं गिरे हैं लोग।


टिकट ले तत्काल दर्शन हो रहे ,
श्याम कैसे सिर फ़िरे हैं लोग॥
                                          ------डा श्याम गुप्त, के-३४८, आशियाना, लखनऊ

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  1. kafi sahaj-saral shabdon se jo apne ghazal taiaar ki hain, be-shak kabile-gour hai aur ye ghazal ko nayi disha degi. sadhuvad!
    Manoj'Aajiz'
    mkp4ujsr@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. sahaj-saral lafjon se hi apne kamal kar diya. sadhuvad! ghazal ko nayi disha milegi.
    Manoj'Aajiz'
    mkp4ujsr@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. ढह गई दीवार जो थी रेत की ,
    क्या पता कितने मरे हैं लोग ।
    बहुत अच्छी लगी पूरी गज़ल, उपर के शेर के लिये बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं

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