शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

रमा शंकर शुक्ल का आलेख - फ़ेसबुक पर नग्नतावाद की आहट

नग्नतावाद की आहट
यही कोई डेढ़ साल पहले तक मुझे नेट संसार का ककहरा भी नहीं पता था. हमारे पास संसाधन भी न थे कि हम नेट चलते और वहां की इंसानों द्वारा निर्मित नए लोक का लुत्फ़ उठाते. पढ़ाई के दिनों में हमारे परिवार और गुरुजनों ने इतनी नैतिकता और संस्कार भर दिया था कि कहीं पर किसी स्त्री की तस्वीर तक देखना हमारे लिए शर्म का विषय था. हम बारातों में जाते तो महफ़िल में न बैठते. खासकर तब जब वहां तवायफों का नृत्य होना हो. लेकिन अब पिता और पुत्र साथ बैठकर नृत्य देख नहीं रहे हैं, बल्कि अदा पर साथ-साथ फ़िदा हो रहे हैं और प्रपोज कर रहे हैं.


फेसबुक एक दुधारी तलवार है. यह संपर्कों और विचारों के सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है. कहते हैं कि चेहरा देख कर व्यक्ति के व्यक्तित्व का अंदाज लगाया जा सकता है. या फिर किसी के घर में जाकर उसके निवासियों की सोच का अंदाज लगाया जा सकता है. यदि घर के लोग लापरवाह होंगे तो हर चीज बिखरी मिलेगी और सामानों पर धुल की परते. किताबों की सूची देख कर व्यक्ति के स्तर महसूस किया जा सकता है. कुछ ऐसा ही है फेसबुक की वाल. वहां के सामग्रियों को देखकर समझा जा सकता है कि उस फेस्बुकिया मित्र की सोच कैसी है.


आश्चर्यजनक है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कई मित्र ऐसे भी बने, जिन्होंने सरेआम गोपनीय क्रिया-कलापों की तस्वीरें पोस्ट कर दीं. मैंने ऐसे लोगों की मूल वाल को देखा तो हैरत में रह गया. मिर्ज़ापुर जैसे छोटे से शहर में भी ऐय्याशी की पराकाष्ठा? पूरी की पूरी वाल ही सेक्सुअल दृश्यों से अंटी पड़ी है. मैंने मजबूरी में उन मित्रों को अन्फ्रेंड कर दिया. और तो और इस प्रवाह में महिला या युवती मित्र भी बराबर की भागीदार हैं. मेरे पास ऐसे मित्रों के लिए सिर्फ एक शब्द है, कामुक बन्दर प्रजाति. लेकिन शायद यह बंदरों का अपमान हो. क्योंकि सभी प्रजातियों में बन्दर सर्वाधिक कामुक माने जाते हैं. लेकिन वे भी संयम में अक्सर नजर आते हैं. हमारे इन मित्रों में इतनी कामुकता है कि वे बन्दर भी नहीं कहे जा सकते. कुछ मित्र यह कह कर पल्ला झाड़ सकते हैं कि आप पुरातन पंथी हैं. जी नहीं. मै नवीन पंथी ही हूँ. कैसे यह मेरे विचारों और मेरी पुस्तकों को देखकर समझ में आ सकता है. नवीनता केवल सेक्स प्रदर्शन से नहीं आ जाएगी. नवीनता तो विचारों से आएगी. यदि आप नग्नता को इतना ही नवीन पंथ मानते हैं तो एक दिन बिना कपड़े के घूम कर दिखाइये.


हर पिता और माता को पता है कि विवाह हुआ है तो बंद कमरे में नव-दम्पति इस समय क्या कर रहा होगा. लेकिन वह काम खुले कमरे में तो नहीं किया जा सकता न. ठीक इसी प्रकार, सेक्सुअल तस्वीरों की भी है. सबको पता है कि आप जवान हो तो आपको सबसे अधिक क्या पसंद होगा. लेकिन एक नौजवान की पसंदगी में इसके अलावा भी बहुत कुछ आता है. जैसे किसी समय कहा जाता था कि "बारह बरस लौ कुक्कुर जीवे, तेरह बरिस लौ जिए सियार. बरस अठारह क्षत्रिय जीवे, आगे जीवे को धिक्कार." यानी १८ साल तक के भीतर एक नौजवान के भीतर इतनी राष्ट्रभक्ति आ जाती थी कि वह देश के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर देता था. क्या यह पौरुष आज की जवानी में है! दर-असल हमारी युवा पीढ़ी ऐसे तस्वीरों के माध्यम से अपने विजातीय सेक्स पार्टनर की तलाश करते हैं. और इसी में कोई न कोई मिल ही जाता है. ठीक है यह सब करने की इच्छा है, कीजिये, लेकिन फेसबुक को बेश्यालय न बनाइये. जिस तरह का नेट, खासकर फेसबुक का मंजर चल रहा है, उससे एक भावी गंभीर नग्नतावाद की आहट मिल रही है. संभव है कि ये युवा कल की तारीख में खुलेआम सेक्स-कर्म करते नजर आयें. इनको और इनके माता-पिता धन्य हैं और उन्हें धिक्कार है.


डा० रमा शंकर शुक्ल

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