रविवार, 25 नवंबर 2012

सुरेश सर्वेद की कहानी - मनहरन भइया

कहानी -

मनहरन भइया

सुरेश सर्वेद

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खेत के मेढ़ म पांव धरते ही मनहरण के गुस्सा सातवां आसमान म चढ़गे  खेत के धान फसल उनला बैरी जइसन लगे लगीस। खेत म जिहां - जिहां ओकर नजर दउड़िस, ओकर गुस्सा बाढ़ते गीस। ओहर बखुलागे - सब ल जला देहूं। साले मोला बिजरावत हवै।

सच म कहे जाय त मनहरन ये सब्द गुस्सा के कारन कही दीस। मनहरन किसान रिहीस अउ ओकर मुख्य काम खेती - किसानी के रिहीस। खेती ओकर जीये खाये के साधन रिहीस अउ कोई अपन रोजी - रोटी बर गुस्साही ? पर मनहरन ल गुस्सा आगे रिहीस। क्षीन भर बाद ओकर सोच म बदलाव अइस। ओहर खुदे ल कोसे लगीस - मंय कतेक मूरख आंव। खेत के फसल के ऐमा का दोस। जब पानी च नई रहही त फसल कहां ले हरियाही ? मनहरन अपन मन के भड़ास ल निकाले बर बिधायक - संसद अउ मंत्री मन ल बड़बड़ा के गारी दे डारिस - भिखमंगा मन जइसन आथे साले मन चुनाव के बेरा म ? किसीम - किसीम के लालच देथे। कहिथे - नरवा बनवाबो, तरिया बनवाबो, बांध - बंधिया बनवाबो ... सड़क बनवाबो, स्कूल खोलवाबो, अस्पताल खोलवाबो पर चुनाव जीतिस नई के बिसर जाथे सब के सब बोल बचन ल। परपंची बन गेहे साले मन। माटी ले भी सस्ती होगे हे इंकर मन के जुबान ....।

मनहरन के सोच करवट ले ले रिहीस। जेन फसल मन म ओला गुस्सा आवत रिहीस। अब उंकर ऊपर ओला तरस - दया आय लगे रिहीस। ओकर मन गदगद होगे। ओकर मन रो परिस। अउ आंखी डहर ले आंसू निकले लगीस। दू - तीन आंसू के बूंद उही मेर टपकगे। आंखी के कोर ल गला म डारे पंछा म पोंछ लिस। ओहर खेत भीतर ल देखिस - भुइयां म दरार पर गे रिहीस। धान के फसल अब फसल नइ रही गे रिहीस। फसल पिंवरा होके सुखाय लगे रिहीस। फसल के दुदर्सा देख के ओकर अंतस छटपटागे। अब ओकर से खेत मेढ़ म ठाड़े रहना संभव नइ हो पाइस। ओहर अपन घर डहर लहुट गे।

आषाढ़ के महीना, पानी - बरसात के दिन, पर एकदम उल्टा। पानी के एक बूंद गिरे के नाव नइ लेत रिहीस। मनहरन अपन घर अइस। आते सांठ अपन बाई मालती पर भड़किस, फेर लइका मन ऊपर बरसिस अउ आखिरी म अपने आप पर। मनहरन के बखुलइ ल घर वाले मन समझ गे रिहीन। घर वाले मन के खेर इही म रिहीस के ओमन कलेचुप रहै। ओमन कलेचुप अपन - अपन काम बूता म लग गे। लइका मन किताब कापी निकाल के पढ़े लगिन। मालती चाउंर निमारे लगिस। मनहरन देवाल म संट के रखे खटिया ल धम्म ले जमीन म बिछइस अउ ओमा चीत्ता सुत गे। घर के पूरा वातावरन शांत होगे। अइसन शांति जइसे सूजी गिरे अउ सूना जाये। ओ शांति म कोनो खलल पइदा करत रिहीस त ओहर सूपा के धाप आये जेमा मालती चाउंर निमारत रिहीस।

धरती के लइका मनहरन वइसे तो शांतिप्रिय आदमी रिहीस। ओहर कभू च कभार अशांत हो जावै। जे दिन ओहर अशांत होवै ओ दिन ओकर ले बात करना तो दूरिहा के बात रहय ओकर संग आंखी मिलाय के कोनो हिम्मत नइ कर पावै। ओहर सहय भी बड़ मगर ओतकी सहै जतका सोभा देवय। जहां ओकर सहे के सबर खतम होवै फेर बइहाय मनहरन। ओकर सहनसक्ति ओ बांधा के समान रिहीस जेन अपन पूरा ताकत भर पानी ल थामथे अउ जब सहनसक्ति जवाब दे जाथे तब फूट के तबाही मचा देथे ...।

संझा बेरा रिहीस। चिरई - चुरगुन मन दाना चुग के अपन खोंदरा डहर लहुटे लगिन, दुधारु गाय मन रंभाये लगिन। बछरू मन अपन महतारी लें मिलय बर हड़बड़ाय लगिन। मंदिर म घंटा- घंटी बजे लगिस आरती पूजा होय लगिस। संझा धीरे- धीरे रात के रूप धरे लगिस। जेवन बनगे रिहीस। मालती मनहरण ल खाय बर किहिस। मनहरण खाये बर बइठगे। मनहरण जइसे निवाला खाये बर करिस कि कोटवार के हांक ओकर कान मन सुनाई दीस। मुंह तक पहुंचे निवाला ला रोक ओहर कोटवार के हांक ल सुने लगिस। कोटवार रात म पंचायत जुड़े के हांका लगात राहय।

रात म गांव वाले किसान- वसुंधरा पंचायत के ठउर में सकलागे।

गांव ले दूरिहा मसानघाट रिहीस। उहां गांव के अवारा कुकुर मन भुके लगिन। उंकर आवाज रिकिम- रिकिम के रिहिस हे। एक दूसर के सूर ल दबाय बर ओमन अपन पूरा ताकत ल झोकत रहै। उंकर भुके के लहर गांव तक पहुंचे लगिस।

मनहरण के गांव के रिवाज उटपुटांग रिहिस। जब जब इहां पंचायत जुड़िस। तब तब असली मुद्दा खतम हो जावै। बहस छिड़ै अउ गांव वाले आपस मं झींकातानी करै। गांव बंइसका म ओ दिन अउ जादा गांव वाले मन जुरियाय जब कोई मजेदार बइसका होवै। उंहा गाड़े मनखे ल उखारे। फबति कस के ओकर हंसी उड़ाय जेकर खिलाप पंचायत जुड़े।

पंचायत लगभग जुड़ गे रिहिस। काबर बइसका बलाय गेहे ये ल कोनो नई जानत रिहिस अतका सब जानत रिहिन- बइसका सरपंच बलाय हे। सब जानना चाहत रिहिन कि काबर बलाय हे। सरपंच अइस, अपन अपन बाह कहे लगिस- गांव के भाई हो, आज बइसका ऐकर सेती बलाय गे हे के हमर गांव म पानी के बड़ समसिया हे पानी के। जब- जब पानी नई गिरय हमला खेती करे म बड़ तकलीफ होथे। धान ठाड़े- ठाड़ सूखा जाथे। पैरा तक हमला नई मिल पावय। हम चाहत हन हमरों गांव म पानी के भरपूर बयवस्ता होवै। परोस के गांव मं बांध बने हवै पर हमर गांव के खार म नहर नाली नई होय के कारन हमर खेती ल पानी नई मिल पावय। हम नहर बनवाना चाहत हन। पर नहर बने म कतको के जमीन डूबही। अगर तुम मन अपन डुबान के जमीन दे बर अनाकानी नई करहू त हमला नहर बनाये म अड़चन नई आही।

गांव वाले मन सोचे- विचारे लगिन- ओमन ल सरपंच के बात म अपन हित दिखिस। ओमन सहमत होंगे। सरपंच किहिस- अगर तुम सब सहमत हो त इही बइसका म परस्ताव बना देथन....। परस्ताव बनिस। नहर कते डहर ले निकालना हे एकर निरनय विभाग के रिहीस गांव वाले मन मानगे। गांव वाले के संग पंच मन घलोक सहमत होगे। बइसका उसलगे। गांव वाले मन अपन अपन घर द्वार चल दीन।

ओ परस्ताव के बाद म गांव वाले मन रद्दा जोहन लगिन कि अब का होही। नहर कब ले बनना शुरु होही। एक दिन गांव म खबर फइलगे - जेन डहर ले विभाग नहर बनाये के बिचार राखे रहीस ओ दिसा म उलट फेर कर दे हे। ओहर जेन डहर ले नहर बनाना चाहत रिहीस ओहर डहर ले गांव के मात्र बीस परतिस खेती ल पानी मिलतिस ऊपर ले कई किसान मन के खेती डूबान म आये ले नई बचतिस। गांव मं कानाफूंसी होय लगीस। जेन डहर ले नहर बनाये के उदिम रचे गे रिहीस ओ डहर सिरिफ सरपंच भर ल लाभ रिहीस। खबर मनहरन के कान तक घलोक पहुंचिस। ओहर सरपंच मेर गिस। किहीस - सुने हंव, विभाग नहर बनाये के दिसा ल बदल देहे ...।

- तंय ठउंका सुने हस ...।

- पर अइसन काबर ?

- तंय तो जानत हस। हम मन ह रक्सेल ले भंडार नहर बनाये के परस्ताव भेजे रेहेन। उड़ती - बूड़ती गांव होय के कारन हम नहर ये दिशा म नई चहत रेहेन पर विभाग के कहना हे - रक्सेल ले भंडार नहर बनाये म जंगल के करोड़ों रुपिया के लकड़ी काटे ल परही। जंगल के जमीन नहर के चपेट म आ जाही। ये सुरक्षित जंगल ये। सुरक्षित जंगल ले लकड़ी नई काटे जा सके। दू विभाग म विवाद होही अउ नहर बन नई पाही ...।

- अब का होही सरपंच ... ? मनहरन के मुंहु ले उदास शब्द निकलिस।

- मंय खुद समझ नई पावत हो मनहरन, ऐकरे सेती आज रात म अउ बइसका बलाय हंव ...।

मनहरन सरपंच के घर ले निकल अपन घर आ गे। रात म फेर पंचायत जुरिस।

सरपंच किहीस - तुम सब ला पता चल ही गेहे। विभाग हर नहर बनाये के दिसा बदल देहे मंय जानना चाहत हवं कि अब का करना हे ? का हम मन ल विभाग जइसे जेने दिसा ले चाहे नहर बना ले ऐकर बर हम तियार हो जान। तुमन अपन - अपन बात ल राखव ...।

सरपंच के आगू म मुंहू खोले के हिम्मत गांव वाले का ओमन भी नई कर पात रिहीन जेन पंच मन के भरोसा सरपंच कुर्सी म डंटे रिहीस। ऐही कारन रिहीस के गांव म उही होवै जउन सरपंच चाहे। पर आज तो कोई न कोई ल अपन बात रखना रिहीस काबर के जेन दिसा ले विभाग नहर बनाना चाहत रिहीस ओ दिसा ले गांव वाले के हित तो रिहीस नई उपर ले खेती डूबान म जाना रिहीस। मगर बोले त बोले कोन ? मनहरन देखिस कोनो बोलत नई हे त खुद उठगे। कहिस - गांव वाले भाई, तुमन अगर आज्ञा देवव त मंय अपन बात रखवं।

गांव वाले मन चुप रहिके मनहरन ल बोले के आज्ञा दीन। मनहरन कहे लगीस - आज से दस बरस पहिली के घटना ल कोनों नई बिसरे होही। ओ बरिस घलो अंकाल परे रिहीस। हम तराही - तराही होगे रेहेन। पानी नई मिले के कारन खेत म फसल सुखागे - भुंजागे। हम अपन जानवर ल घलोक नई बचा पायेन। पानी के मोल हमला अपन जमीन ल बेचे ल परिस। रोजी - रोटी के चक्कर म गांव छोड़ना परिस। हम मन तब नहर के मांग करे रेहेन। अउ रक्सेल ले भंडार दिसा म ही नहर बनाये के मांग करे रेहेन जेन ल विभाग मान गे रिहीस। इहां तक ले नहर बने के स्वीकृति घलोक मिलगे रिहीस पर अब उही विभाग सुरक्षित जंगल होय के अटघा लगात हे।

बइसका म सन्नाटा छा गे। पूरा गांव मनहरन के बात ल सुरलगा के कान धरे लगिन। मनहरन आगू किहिस - तुम सब जानत हव जेन दिसा ले हम मन नहर मांगे रेहेन ओ डहर ले नहर बनना शुरु हो गे रिहीस। कुछ दिन बाद नहर बनना बंद होगे अउ बरसात के दिन आगे फेर ओ डहर ककरो धियान नई गिस। बीच म काम काबर रोके गिस गांव वाले तुम मन जानथौ ... तुम मन कोनो नई जानवौ, मंय जानथवं ....।

गांव वाले मन ल कुछू समझ नई आवत रिहीस। पर सरपंच के समझ म सब आगे रिहीस। मनहरन आगू कहे लगीस त सरपंच किहीस - अब बिसरे बात ल करे म का फायदा मनहरन ... ?

- बिसरे बात ल करे म ही फायदा हे सरपंच .... अब आपे बतावव ओ समे भी आप सरपंच रेहेव ...।

- हव ...।

- अब आपे बतावव, नहर बनत - बनत रोक काबर दे गिस .... पहली उही दिसा म नहर बने के सहमति हो गे रिहीस। अब अड़ंगा काबर ?

- जतका के स्वीकृति मिले रिहीस, ओतका के काम कराये गिस, अउ फेर दिसा ल मंय थोरे बदले हंव, वो तो विभाग के काम आवै।

- अउ कतका लबारी मारहू सरपंच साहेब। तुम गांव वाले मन के नई अपन हित देखत हव। गांव वाले मन के जमीन डूबान म जावै अउ तुम्हर खेती ल पानी मिलय एकरे सेती दिसा ल बदले के बात करत हव। पहिली स्वीकृति के अनुसार नहर बनवाये के काबर नई सोचत हव। अउ तुम कहिथौ न कि पइसा खतम होये के कारन काम रोक दे रिहीस। मनहरन गांव वाले मन डहर देख के किहिस - सरपंच के एको बात भरोसा लाइक नई हे मंय आज तुम मन ल सच बतावत हंव, ओ समे भरपूर पइसा नहर बनाये दे रिहीस पर फरजी मस्टररोल म फर्जी दस्तखत करके पइसा खतम कर दे गिस। अउ तुम मन भरोसा नई करहू पर ये सच हे जेन दिसा ले हम नहर बनाये के मांग करे हन ओ दिसा म पहिले ले नहर बनगे हे ...।

गांव वाले मन सकते म आगे। किहिन - तंय कइसे गोठियाथस मनहरन। ओ दिसा म तो नहर नई बने हे ...।

- तुहर कहना गलत नई भई मगर ये लबारी नई हे कि जेन दिसा म हम नहर के मांग करत हन ओ दिसा म नहर कागद म बन गे हे ...।

सरपंच के मुड़ी नविस त नवते चले गिस। ओकर पोल खुलते गिस। गांव वाले मन सरपंच ल घेरे लगीन। कानाफंसी सुरु होगे। गांव वाले मन ल अब सुरता आय लगीस, ओ दिन के बात। पंच मन घलोक सरपंच के खिलाफ होगे। मनहरन किहिस - ये सरपंच कभू हमर हित के नई सोचिस। हम इंन ला पढ़े लिखे हे गांव के उद्धार करही सोचे रेहेन मगर ये सिरफ अउ सिरफ अपने हित देखिस। का हम अब भी ये ला सहिबो ... ?

पूरा गांव सरपंच के बिरोध म आ गे। नारा लगे लगीस - सरपंच मुर्दाबाद ... सरपंच धोखाबाज ... सरपंच ल हटावव ....।

सरपंच उंहा ले खिसके के फिराक म रिहीस पर गांव वाले मन ओला खिसकन नई दीन। सचिव घलोक बइसका म रिहीस। सब पंच तो ओकर विरोध म आ ही गे रिहीन। बइसका म ही परस्ताव तियार होगे - सरपंच ल हटाये के ... सबो पंच मन दस्तखत कर दीन अउ परस्ताव शासन ल भेज दीन ....।

कुछ दिन बाद गांव म एक नारा अउ गूंजे लगीस - मनहरन भइया ...।

- जिन्दाबाद ...।

- गांव के नेता कइसन हो ...।

- मनहरन भइया जइसन हो ...।

एकरे संग गांव जाग गे।

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लेखक परिचय

सुरेश सर्वेद

जन्म - 07- 02 - 1966 ( सात फरवरी उन्नीस सौ छैंसठ )

पिता - श्री नूतन प्रसाद शर्मा

माता - श्रीमती हीरा शर्मा

पत्नी - श्रीमती माया शर्मा

जन्म स्थान - भंडारपुर ( करेला ), पोष्ट - ढारा

व्हाया - डोंगरगढ़,

जिला - राजनांदगांव छत्तीसगढ़

वर्तमान पता - सांई मंदिर के पीछे, वार्ड नं. - 16

तुलसीपुर, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़)

मोबाईल - 94241 - 11060

संपादक - साहित्यिक पत्रिका “विचार वीथी”

प्रकाशन - देश के विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में अनेक कहानियों का प्रकाशन एवं काशवाणी रायपुर सेअनेक कहानियों का प्रसारण।

प्रकाशित कृतियाँ - मेरी चौबीस कहानियाँ”, छन्नू और मन्नू”

प्रकाशक - छत्तीसगढ़ी "गरीबा” महाकाव्य लेखक

श्री नूतन प्रसाद शर्मा

सपने देखिये” व्यंग्य संग्रह

लेखक श्री नूतन प्रसाद शर्मा।

आगामी प्रकाशन - छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह”।

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