मोहसिन खान की बाल-दिवस विशेष कविता

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ग़ज़ल

14 नवम्बर बाल-दिवस पर विशेष



काश हमको भी माँ-बाप ने यूँ पाला होता,

उनके हाथों का मुँह में निवाला होता ।

 

होकर तैयार रोज़ जाते बैठकर बस में,

किसी ने हमको स्कूल में डाला होता ।

 

सड़कों, गलियों की अँधेरी रात की ज़िंदगी,

हमारी दुनिया में भी रेशमी उजाला होता ।

 

यूँ न गिरते अपनी नज़र में आज हम,

गर हमें भी किसी ने सँभाला होता ।

डॉ. मोहसिन ख़ान

अलीबाग़ (महाराष्ट्र)

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