शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

समीक्षा - भीतर की टूट - फूट का चित्रण है .... “ माँ कहती थी ”

भीतर की टूट - फूट का चित्रण है .... “ माँ कहती थी ”

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कविता संग्रह

मां कहती थी

कवयित्री - सुमन गौड़

प्रकाशक - बोधि प्रकाशन जयपुर

समीक्षक - विजेंद्र शर्मा

( समीक्षा )

जब भी किसी रचना का जन्म होता है उसके पीछे एक मख़सूस वज़ह ज़रूर होती है। ये ख़ास वज़ह पहले ख़याल में तब्दील होती है और जैसे ही इसे मुनासिब अल्फ़ाज़ मिलते हैं ये वज़ह रचनाकार को उकसाने लगती है कि वो क़लम उठाये।

ऐसी ही कोई ख़ास वज़ह ज़रूर रही होगी जो जीव विज्ञान पढ़ाने वाली सुमन गौड़ अपने भीतर की तमाम टूट – फूट को संवेदना की तूलिका से अहसास के कैनवास पे आड़ी-तिरछी लक़ीरें खींच तस्वीरें बनाने लगी।

लफ़्ज़ों को बरतने की जादूगीरी से कोसों दूर सिर्फ अपने जज़्बात के बूते पे रचनाएं गढ़ने वाली कवयित्री सुमन गौड़ की अदब की दुनिया में पहली दस्तक है उनका काव्य संग्रह “माँ कहती थी”...

जैसे ही ये काव्य संग्रह हाथ में आता है तो सबसे पहले कपिल भारद्वाज का बनाया इसका ख़ूबसूरत आवरण पृष्ठ मुतास्सिर करता है। काव्य संग्रह के नाम “माँ कहती थी” .. से ही ज़ाहिर होता है कि इसमें एक बेटी को दी जाने वाली माँ की नसीहतें शामिल हैं। माँ की नसीहतों के मोतियों से कविता की ख़ूबसूरत माला कुछ इस तरह से पिरोती है सुमन गौड़ :---

माँ कहती थी ...

ख़्वाबों को हमेशा

खुली आँखों से देखना

ज़रूर पूरे होंगे

बंद आँखों में कहीं

उन को हासिल करने का

रास्ता न खो जाए।...

इस काव्य संग्रह में तक़रीबन 85 कवितायें है। सुमन गौड़ काग़ज़ को बेवज़ह बर्बाद नहीं करती हैं। अपनी कविताओं को आकार देने में शब्दों को वे बड़ी मितव्यता से ख़र्च करती हैं और इसी से पाठक मजबूर हो जाता कि वो इस पूरे संग्रह को एक साथ पढ़ जाए। इस काव्य संग्रह में “माँ” की नसीहतों के बाद प्रेम का रंग मुखर होता है और प्रेम की कुछ ऐसी परिभाषाएं कवयित्री गढ़ती है जिन्हें सुनकर प्रेम स्वयं सोच में पड़ जाता है :--

प्रेम क्या है ?

दो शब्दों का मिलन

दो आत्माओं का मिलन

दो देह का मिलन

या

लौकिकता से परे

विशवास का एक मूर्त रूप ।.....

सुमन गौड़ जब “प्रेम” से ही यह प्रश्न पूछ बैठती हैं तो “प्रेम” निशब्द हो जाता है ,निरुत्तर हो जाता है :--

कहते हैं ..

प्रेम इश्वर है ,प्रेम साधना है

प्रेम इबादत है ,प्रेम भक्ति है

प्रेम आस्था है ..

प्रेम में है ये सब

तो ..

क्यों प्रेम अलग हो जाता है

प्रेम से .!

इस काव्य संग्रह की प्रेम कवितायें प्रेम के तमाम ज़ावियों ( कोणों ) की ज्यामिती अहसास की सतह पर उतार देती हैं जिससे पाठक को प्रेम कभी एक सरल रेखा , कभी बिन्दु , कभी त्रिभुज तो कभी अपनी ही वर्तुल-गति में घूर्णन करने वाला वृत नज़र आता है।

सुमन गौड़ कविता के व्याकरण से वाकिफ़ नहीं है पर उनकी रचनाएं पढने के बाद ऐसा लगता है कि अगर ख़याल हस्सास ( संवेदना ) से लिपटा हुआ हो तो लफ़्ज़ों को मजबूरन ऐसे सांचे में ढलना पड़ता जिसके पैकर में कविता के नए व्याकरण दिखाई देते हैं :--

प्रकट होते हो ..

जब तुम मेरे भीतर

पिघल कर ढलने लगती हूँ

तुम्हारे इच्छित सांचे में

गढ़ दिए हैं तुमने मेरे कितने रूप

बना दिया है

अनन्त सा

क्यूँ नहीं स्वीकारते मुझे

एक ही रूप में तुम.....।

“माँ कहती थी” ..काव्य संग्रह की रचनाएं रिश्तों के दरमियान आयी खटास की चिलचिलाती तेज़ धूप में सफ़र करती हैं और अपनी थकन मिटाने के लिए जब कहीं बैठती हैं तो इन्हें छाया भी उदासी की ही नसीब होती है। इसमें कोई शक नहीं की इस पूरे मज्मुआए क़लाम की फ़िज़ां ने उदासी की रिदा (चादर ) ओढ़ रखी है। इस काव्य संग्रह की कुछ कविताओं में लगता है कि ये कवयित्री के ज़ाती तजुर्बात हैं। अपने व्यक्तिगत अनुभव को इतनी साफ़गोई से कह देना आसान नहीं है। इस काव्य संग्रह में कवयित्री ने अपने ज़ख्मों को नुमाया करने के ख़तरात उठाये हैं। मेरी इस बात की ज़मानत ये पंक्तियाँ दे सकतीं हैं :-

आरोप ,प्रत्यारोप के बीच

दी मैंने कितनी ही अग्नि परीक्षाएं

हाँ नहीं थी अग्नि –परीक्षा सीता की तरह

पर उससे कुछ कम भी नहीं ...

पुरुषोचित राम ने सूना दी थी मुझे सज़ा

जन्मों –जन्मों की विरह वेदना के साथ

मेरे चरित्र मेरे वजूद पे उठी उंगली

दे दी तुमने मुझे असहनीय पीड़ा

जिसे सहन कर जी रही हूँ

एक ही प्रश्न के साथ

क्या सचमुच में

कुसूरवार थी ?

मेरे राम।.....

कविता भीतर की बैचेनी को सुकून की मंज़िल तक ले जाने के सफ़र का दूसरा नाम है। सुमन गौड़ ने अपने अन्दर के ज्वार को अपनी रचनाओं के ज़रिये शांत किया है। उन की कुछ रचनाएं ऐसा आभास दिलाती हैं कि कविता में उन्होंने सुकून को तलाश लिया है इसीलिए अपने भीतर बसी यादों के जंगल से वे बाहर नहीं निकलना चाहती। तभी तो वे लिखती हैं :--

बसंत दस्तक देता है

हर सुबह मेरे द्वार पर

डरती हूँ

कहीं मेरे भीतर यादों के दरख्तों से

पत्ते न झड़ जाएँ

यहाँ का मौसम न बदल जाए।....

आसान और मामूली सी दिखाई देने वाली इन रचनाओं में ऐसी कौन सी बात है जो हर सुनने / पढ़ने वाले को अपने पास से गुजरने वाली हवाओं की सांय- सांय सी महसूस होती है। इस काव्य संग्रह को तन्मयता से पढ़ने के बाद मुझे यही लगा कि इसमें सुमन गौड़ ने आम आदमी का दर्द , आम आदमी के मसाइल , आम आदमी के भीतर की उथल – पुथल को आम आदमी की ज़बान में ही लिखा है तभी इसकी साधारण सी पंक्तियाँ भी पाठक के ह्रदय के द्वार की सांकल खोलकर ख़ुद –ब- ख़ुद दाख़िल हो जाती हैं।

इसी संग्रह में इस मिज़ाज की रचना देखकर हैरत में आ जाना लाज़िम है :--

रख दिए है मैंने

तुम्हारे कितने ही नाम

गढ़ दिए हैं अनगिनत रूप

हर रूप में भाति हो तुम

पर मुझे बेहद पसंद है

तुम्हारा छुईमुई होना

जिसमें सिमट जाती हो तुम

मेरे स्पर्श से।.....

“माँ कहती थी” ..काव्य संग्रह में कविता के मुख्तलिफ़- मुख्तलिफ़ रंगों से मुखातिब हुआ जा सकता है मगर एक रंग मुझे ज़ाती तौर पे अखरा वो ये कि एक कवयित्री अपने औरतपन से दामन छुड़ा मर्दाना ख़यालात को अपने ज़हन में क़याम क्यूँ करने देती हैं। मिसाल के तौर पे इनकी ये पंक्तियाँ :---

जब पहली बार

मिली थी तुम

ख़ामोश निगाहों ने

कह दिया था वो सब

जिसे कहने में आज भी

तुम्हारे अधर कांपते हैं।...

इस काव्य संग्रह की भूमिका लिखते वक़्त ख्यातनाम शाइर मुनव्वर राना ने भी सुमन गौड़ साहिबा से सवाल किया था कि आपने कुछ रचनाएं मर्द किरदार की जानिब से लिखीं हैं इसकी कोई ख़ास वज़ह ...इस सवाल का क्या जवाब उन्होंने मुनव्वर साहब को दिया ये तो वे स्वयं जानती है। मुझे लगता है कि जिस किरदार ने दर्द दिया हो , जिस किरदार ने एतबार जैसी चीज़ को आहत किया हो उस किरदार में अपने आप को ढालकर लिखना कहीं न कहीं कवयित्री का क़लम के ज़रिये प्रतिशोध लेने का अपना तरीका है। मुझे लगता है कि एक औरत की तख़लीक (रचना ) में औरतपन होना चाहिए , ख़यालात की ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो लिखने वाली एक खातून को मर्द बनकर लिखना पड़े। इस काव्य संग्रह में एक नहीं पांच – छ कवितायें ऐसी हैं जिनमे कवयित्री ने पुरूष चरित्र निभाया है। मुझे उम्मीद है मेरे इस मशविरे को मुस्तक़बिल में वे अमल में लायेंगी यह सिर्फ़ एक गुज़ारिशनामा है।

इस संग्रह में ढाबे पे काम करने वाले बच्चे के प्रति कहीं संवेदना कविता बनती है ,कहीं महबूब से बिछड़ने का ग़म , कहीं प्रियतम के साथ ढलते सूरज को देखते हुए छत की मुंडेर पे चाय की चुस्कियों की याद ,कहीं उससे शिकायत जिससे शिकायत वाकई जायज़ है और समय जैसी अनियंत्रित शै भी इसी संग्रह में कविता की शक्ल में दिखाई पड़ती है।

पहाड़ जैसी ज़िंदगी पे अकेले बिना किसी सहारे के चढ़ाई कर रही सुमन गौड़ जब थक जाती है तो ....उन्हें अपनी माँ की बरसों पहले सुनाई लोरियां याद आती है। उन्हें लगता है इसकी मिठास में उनके तमाम ग़मों की पोटलियाँ घुल सकती हैं तभी तो वे लिखती हैं :--

जब भी परेशाँ होती हूँ

ज़िंदगी से हताश

घेर लेती हैं , आ के मुझे उदासियाँ

माँ।

मैं तुम्हारी गोद में आना चाहती हूँ।

यह काव्य संग्रह “बोधि प्रकाशन” , जयपुर से प्रकाशित हुआ है। इस काव्य संग्रह का राजस्थानी भाषा में बहुत ख़ूबसूरत अनुवाद जाने–माने क़लमकार रवि पुरोहित ने किया है। इसका राजस्थानी अनुवाद “कैवती ही माँ “ बहुत जल्द मंज़रे-आम पर आने वाला है। इसी काव्य संग्रह का पंजाबी में अनुवाद पंजाबी साहित्य और पंजाबी फिल्मों के सुप्रसिद्ध गीतकार अमरदीप गिल कर रहें है।

“माँ कहती थी ... एक औरत के संघर्ष की ख़ुद क़लामी है। अपनी आत्मा के घावों के इलाज़ के लिए कवयित्री ने कविता रचने की जो राह चुनी है वो सच में क़ाबिले तारीफ़ है। हो सकता है कविता के बड़े – बड़े जानकार ,बड़े – बड़े तनक़ीद कार इन कविताओं को किसी और पैमाने पे परखें मगर जब दिल से लिखी बात दिल तक पहुँच जाए तो कविता अपना धर्म तो निभा ही देती है।

“माँ कहती थी” सुमन गौड़ की तूलिका से बनी पहली तस्वीर है। अदब को इनसे और भी ख़ूबसूरत तस्वीरों की उम्मीद है। मैं भी यही आशा करता हूँ कि इनकी कविताओं का अगला मज्मुआ जब आये तो उसमे किताब के सफ़्हों (पन्नों ) पे उदासी के हर्फ़ ना के बराबर हों ....

अल्लाह करे ज़ोरे क़लम और ज़ियादा।..आमीन।

--

विजेंद्र शर्मा

सैक्टर मुख्यालय ,सीमा सुरक्षा बल ,

बीकानेर (राज.)

Vijendra.vijen@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. इतनी सुन्दर कविताओं से परिचय करने के लिए धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर प्रस्तुति विजेंद्र जी, बधाई।
    एक नज़र मेरे ब्लॉग पर भी डालें।
    - अनुराग तिवारी

    उत्तर देंहटाएं

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