सोमवार, 26 नवंबर 2012

राकेश कुमार मालवीय की कविता - हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी!

हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी!
सदियों से मैं मजदूर हूं
चलाता रहा हूं चरखा
कभी खोदता रहा हूं गडढा
बनाता रहा हूं इमारत 

बहाता रहा हूं पसीना
सदियों से मेरे पसीने पर
मेरे खून पर
तुम करते रहे हो मौज
मैं देखता हूं, समझता हूं
पर खामोशी से चलाता हूं कुल्हाड़ी
मुझे पता है मेरे बिना नहीं अस्तित्व तुम्हारा
जिस दिन चाहूंगा हिला दूंगा बुनियाद तुम्हारी
लेकिन खामोशी में ही मेरी है खुशी
पसीना बहाए बिना मुझे नींद नहीं आती।
राकेश कुमार मालवीय

--
Rakesh Kumar Malviya
Journalist

www.patiyebaji.blogspot.com

http://www.bhaskar.com/

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