शनिवार, 24 नवंबर 2012

राजीव आनंद की दो लघुकथाएँ - मशीन बनता मानव, अमानुष

मशीन बनता मानव

चंद्रप्रकाश को लोक सेवक बने तकरीबन बीस वर्ष गुजर चुके थे। पूरा नौकरशाह बन गया था वह। बड़ी जद्‌दोजहद के बाद चंद्रप्रकाश से उसका एक कवि मित्र मिलने में कामयाब हो सका, शाम का वक्‍त था दिन का गुरूर टूट चुका था, दूसरे दिन मंत्रीजी के सर्किट हाउस आगमन के इंतजामात का मुआयना करने आया हुआ था चंद्रप्रकाश।

ये समझते हुए कि उसे देखते ही चंद्रप्रकाश पहचान लेगा, खोजखबर लेगा, हालचाल पूछेगा, कवि मित्र आगे बढ़ा और दोस्‍ताना अंदाज में बोला, कहिए आइएएस अफसर चंद्रप्रकाश, पहचाना मुझे ?

चंद्रप्रकाश एक आम जनता को देखनी वाली हिकारत भरी नजरों से देखा और जवाब दिया, मेरे पास समय नहीं है, जो कहना है जल्‍दी कहो।

स्‍वाभिमानी कवि मित्र समझ गया कि चंद्रप्रकाश उसे भूल चुका है, फिर भी स्‍कूल-कॉलेज के दिनों की याद दिलाने के लहजे में बोला, सर, चाँद डूब रहा है !

यह कवि मित्र के द्वारा लिखी गयी कॉलेज के दिनों की कविता की प्रथम पंक्‍ति थी जिससे चंद्रप्रकाश कभी भलीभांति परिचित हुआ करता था।

चंद्रप्रकाश निहायत संजीदगी से जवाब दिया, देखिए ये देखना मेरा काम नहीं है, आप इसकी शिकायत संबंधित विभाग से कर सकते है। कवि मित्र को अब मजा आने लगा था अपने मशीन बने मित्र से बात करने में, वो फिर कहा, देखिए सर, आप एक जिम्‍मेदार लोक सेवक है और मैं एक अदना सा आदमी आपको बता रहा है कि आपके शहर में चाँद डूब रहा है, उसने बात को आगे बढ़ाने के लिए अपनी कविता के प्रथम पंक्‍ति में शहर शब्‍द को जोड़ा।

चंद्रप्रकाश जल्‍द से जल्‍द इस आम आदमी से पीछा छूड़ाना चाहता था, इसलिए कहा, देखो मैं अपने कानों से कुछ सुनता नहीं हॅूं, तुम एक आवेदन के जरिए अपनी शिकायत दर्ज करवा दो, अगर तुमको लगता है कि चाँद डूब रहा है मेरे क्षेत्राधिकार के अंदर तो,

और हाँ आवेदन को गोपनीय शाखा में जमा करा देना। मैं किसी अधिकारी से इसकी जांच करवा लूंगा। इतनी आश्‍वासन देने के बाद चंद्रप्रकाश को लगा कि अब यह आदमी यहां से चला जायेगा।

कवि मित्र थोड़ा रूमानी होते हुए आखिरी बार कातर दृष्‍टि से अपने यांत्रिक मित्र को देखा और बोला, सर आप एक बार नजर उठा कर आसमान की तरफ देखें तो सही कि रोटी की तरह गोल, दूध की तरह सफेद जिसपर थोड़ा सा जला होने का निशान लिए चांद डूब रहा है। अपनी कविता को पूरी तरह से पंक्‍ति-पंक्‍ति अलग कर दिया था वह कवि मित्र अपने मित्र को समझाने में कि वे दोनों कभी प्रगाढ़ मित्र हुआ करते थे।

चंद्रप्रकाश झुंझलाते हुए तुम से आप पर आ गये और कहा देखिए महोदय, देखना दिखाना मेरा काम नहीं है, आप आवेदन दीजिए, मैं वादा करता हूं कि इसकी मैं जांच करवा लूंगा और आपकी बात सच पायी गयी तो मैं व्‍यक्‍तिगत तौर पर संज्ञान ले लूंगा। अभी आप मेरे कार्य में बाधा न डालें वरना मैं आपको सरकारी कामकाज में रूकावट डालने के जुर्म में भारतीय दंड़ संहिता के तहत जेल भिजवा दूंगा।

चंद्रप्रकाश का कवि मित्र मशीन में परिवर्तित हो चुका अपने मित्र को, अपनी पहचान बता कर जाना चाहता था। कवि मित्र ने कॉलेज के दिनों में इस्‍तेमाल किये जाने वाले लहजे में कहा, अरे चंद्रु तुम तो भूल गये, मैं रूपेश, तुम्‍हारे बचपन से जवानी तक साथ पढ़ा हुआ तुम्‍हारा मित्र हॅूं मैं !

चंद्रप्रकाश अब क्रोधित हो चुका था, उसने बहुत ही तल्‍ख लहजे में पूछा, कोई सबूत है आपके पास कि आप ही मेरे मित्र रूपेश हैं, जाइए हलफनामा लिख कर कार्मिक विभाग में जमा करा दीजिए, मैं देख लूंगा।

‘‘एक सफल और लोकप्रिय लोक सेवक के रोज नये-नये आप जैसे लोग पुराने मित्र होने का दावा करते चले आते है।''

स्‍वाभिमानी कवि ह्‌दय रूपेश अपने बचपन के मित्र को खो देने का गम लिए अभी भी इस उम्‍मीद पर धीरे-धीरे मुड़ कर जाने लगा कि शायद पीछे से उसका चंद्रु उसे पुकारेगा !

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अमानुष

सखुआ की दातुन लेकर वह छोटी लड़की जब डौली की मां को एक मुट्ठी भी दातुन खरीदने की जिद करने लगी, तो भी डौली की मां का दिल नहीं पसीजा कि आखिर ये छोटी सी बच्‍ची क्‍यों दातुन बेचने की जिद पर अड़ी है। डौली की मां के यह समझ से बाहर था कि पिछले सप्‍ताह भर से सिर्फ एकाध शाम खाकर जीवनयापन काने वाली ये छोटी सी लड़की कितनी स्‍वाभिमानी है कि भीख तो नहीं मांग रही है। दो कोस दूर घर से सखूआ की दातुन लाकर शहर के गली मोहल्‍ले में जा जा कर बेचारी दातुन बेचकर अपने गरीब मां बाप को कुछ तो मदद कर सकेगी। ब्रश और टूथपेस्‍ट के जमाने में कौन खरीदता उसके दातुन। सुबह से दोपहर बीत गया एक भी दातुन की मुट्ठी नहीं बेच पायी थी वो छोटी सी बच्‍ची। सोच कर उसे रोना आ रहा था कि अगर एक भी दातुन की मुट्ठी नहीं बेच पायी तो आज रात को फिर भूखे ही सोना पड़ेगा।

लेकिन डौली की मां को कहां समझ में आता यह सब कुछ, वह तो अपने बाप के कमाए दो नंबर के काले धन के बदौलत पली बढ़ी थी, उसे क्‍या मालूम की भूख क्‍या होती है। सूखे फलों को खाती, फेंकती, कुतिया के साथ खेलती, उसको चूमती बड़ी हुयी थी, वो क्‍या जाने गरीब इंसान के बच्‍चों के बारे में। काले धन के अहंकार ने ममत्‍व को खत्‍म कर दिया था डौली की मां में। वह भी एक मां थी और जो गिड़गिड़ा रही थी वह भी किसी मां की ही बेटी थी, फर्क इतना था कि वह गरीब मां की बेटी थी।

बहुत जिद करते देख डौली की मां ने क्रोधित होकर चिल्‍लाया उस दातुन बेचने वाली मासूम छोटी लड़की पर कि ‘‘चल दफा हो जा यहां से नहीं तो लूसी से कटवा दूंगी।'' मारे भय के वह मासूम छोटी लड़की अपना दातुन का बंडल छोड़कर भाग खड़ी हुयी। डौली के मां के चेहरे पर बच्‍ची को डांट कर भगा देने का अहंकार फैल गया था पूरे चेहरे पर, लूसी दूध और बिस्‍कुट खा रही थी। यह सत्‍य कहा गया है कि धन की गर्मी इंसान को इंसान नहीं रहने देता अपितु अमानुष बना देता है डौली की माँ की तरह।

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा, गिरिडीह, झारखंड़,

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