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December 2012
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दूर बर्फ के पेड़ों पर ढकी हुई बर्फ यूँ लग रही थी मानों आसमान से कहीं से महीन पतली चाँदी की चमकती हुई चादर बिछा दी हो और जिस पर चाँद की किरणें एक दूजे को ढूँढ़ते हुए चारों ओर चांदनी की खूबसूरती की शोभा में चार चाँद लगा रही हो I रात के सन्नाटे में डूबी हुई चुप्पी में सारा शहर जब नींद के आगोश में सोया हुआ था तो एक बूढ़ा अपनी झुकी हुई कमर के साथ अपनी एकमात्र पुरानी लाठी के सहारे धीमे धीमे आगे बढ़ रहा था I शरीर के मैले हो चुके कपड़ों को देखकर साफ़ पता चल रहा था कि ना जाने कितने दिनों से ना तो उसने नहाया था और ना ही कपड़े बदले थे I फटे हुए पैरों से हल्का सा खून भी रिस रहा था और बिना चप्पल के चलते हुए बार बार उसे जब कोई ठोकर लग जाती थी और उसके पैरों मैं कोई कंकड़ या काँटा चुभ जाता था जिसे वो बड़े ही इत्मीनान से चेहरे पर बिना कोई दर्द या उपेक्षा का भाव लाये निकाल देता था I

रात सोच रही थी,  यह मुझे क्यों तंग कर रहा है चुपचाप अपने घर में सोता क्यों नहीं I चाँद सितारों से पूछ रहा था कि मुसाफिर को कहाँ तक जाना था ताकि वो थोड़ा सा ओर तेज चमके जिससे उसे आगे बढ़ने में परेशानी न हो पर किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था सब निःशब्द और स्तब्ध थे I पर बूढ़ा था जो बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने आगे बढ़ा ही जा रहा था I अचानक पता नहीं क्या हुआ कि वो सड़क के किनारे पड़े एक बड़े पत्थर पर बैठ गया जिसके आस पास हल्की बारिश के कारण छोटी छोटी घास उग आई थी I उसके खुरदुरे और सूजे हुए पैरों को नर्म मुलायम घास का स्पर्श बहुत भला लगा और उसने आसमान की तरफ अपने हाथ फैलाकर ईश्वर की तरफ कृतज्ञ भाव से देखते हुए कहा -" परमात्मा तेरा लाख लाख शुक्र है कि तूने मुझे ये जगह थोड़ी देर के लिए सुस्ताने को दी जिससे मुझे ये असीम सुख मिला वरना पता नहीं मैं अपनी मर्जी से कहाँ जाकर बैठता I

घास मुस्कुराकर इतरा उठी और उसने गर्व से उन गगनचुम्बी पेड़ों की ओर देखा जो हमेशा उसका मजाक उड़ाया करते थे और वो हमेशा नज़रे नीचे करके वापस उसी बड़े से पत्थर के पीछे छुपने की नाकाम कोशिश करती थी I पर आज इस ख़ामोशी में जैसे उसके जीवन को फिर से झूमने का नया आयाम मिल गया था और बार बार वो अपनी ख़ुशी जताने के लिए बूढ़े के पैरो के पास भरसक प्रयत्न करती हुई उन्हें चूमने को बेताब हो रही थी I

पेड़ों ने जैसे एक प्रकार का निर्विकार भाव ओढ़ लिया था जिसमें उनको जैसे घास की उफ़नती ख़ुशी से कोई लेना देना नहीं था पर मन ही मन उनके साथ घास भी जानती थी कि ईश्वर की रची हुई कोई भी रचना कभी व्यर्थ नहीं होती , चाहे उसकी एहमियत कोई देर सबेर ही समझे तभी बूढ़ा उठा और फिर अपनी झुकी हुई कमर को सीधे करने की कोशिश करते अपनी लाठी मजबूती से पकड़ कर चल दिया I

घास ने खुद को धन्य माना कि अब पेड़ उससे ऐंठ कर बात नहीं करते थे I  पेड़ों ने मन ही मन बूढ़े का धन्यवाद दिया कि वो उनको अहंकार की गहरी अँधेरी सुरंग से बाहर खींच लाया था I चाँद और सितारे सोच रहे थे ..आखिर उनके जाने की भी बेला हो गई और बूढ़ा निर्विकार भाव से चला जा रहा है I.आज उनका दर्प चूर चूर होकर चांदनी कि शक्ल में चारों ओर बिखर गया था I सितारों ने चाँद की ओर शर्मिंदगी से देखा और चाँद धीमे स्वर में बोला -'आज के बाद अब हम कभी नहीं कहेंगे कि रात भर केवल हम ही बिना थके चलते हैं....."......

नया वर्ष मंगलमय हो
               -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

परम पिता से यही प्रार्थना हमारी आज
नया साल आया, आप सबका मंगल हो ,
परिजन, पुरजन सबहीं प्रसन्न रहें
राजनीति गलियों में भले दंगल हो।

चाहे मॉल खूब बने, इन सारे शहरों में
पर्यावरण शुद्ध रहे, खूब जंगल हो
योजना सिंचाई की न द्रौपदी का चीर बने
हर एक राज्य में ही, भाखरा नंगल हो।

बीता है पुराना साल दिल दहलाने वाला
खुशियाँ उमंग लिए नया साल आया है
देते हैं बधाई आज सब एक दूसरे को
प्रेम का माहौल यह सब को ही भाया है।

लगता विषाद की है निशा अब बीत गयी
हर्ष का वितान आज चारों ओर छाया है
हिंसा,अशांति उठ जाये इस धरती से
नर नारी कह उठे नया साल आया है।

जमशेदपुर
झारखण्ड

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नव वर्ष पर एक ग़ज़ल 

इक साल फिर ... (ग़ज़ल)

                   -- मनोज 'आजिज़'

इक साल फिर बीत गया उम्र भी ढली 

फिसल गए इतने दिन कर आँख मिचौली 

 

न साथ दे पाया काफ़िले-ख़्वाब को हमने 

सोचता हूँ कब हुई ख्वाहिशात भली 

 

ये भी सच जो बीत गया बात गयी 

पर रहते हैं ज़ेहन में यादें खट्टी मखमली 

 

आशनाई, फ़र्जो रहम क़त्ल हुए देखे गए 

कोई बताये क्या होनी कभी टली 

 

इक साल फिर आ गया नेमत इसे समझ 

छोड़ ज़िन्दगी की 'आजिज़' वो सँकरी गली 

  ---

नज़्म

           बस इसलिए ...

             

दीवारें फीकी पड़ रही थी 

झरोखों में पसरी थी धुंध 

नज़रों से ओझल था आसमान 

हवा भी दुबक बैठी थी 

                 दूर ऊँचे पहाड़ों पर।

मौजूद सिर्फ एक सिसक 

बरबस आहें 

अनकही पुकार 

और कुछ बेबस यादें।

ये हालत बस इसलिए 

कि हम बसे थे --

उम्मीदों के शहर में

 

--

जमशेदपुर 

झारखण्ड 


दिल्ली रेप काण्ड
सुनकर ही लगता है जैसे शून्य हो गया हो ब्रम्हाण्ड,
सोचा नहीं जाता कुछ सुना नहीं जाता मूकबधिर सा हो गया है सारा ब्रम्हाण्ड

भारतीय संस्कृति
डूब गई है संस्कृति भारत की
मिट गई है शान सारी मानवता की
हद पार हो गई है अमानुषिक प्रवृत्ति की
खत्म हो चुकी है मर्यादा इस जहान की

जानवरों से भी बदतर हो गई है हवस जहां की
हवस नहीं गर ईर्ष्या थी तो हद पार हो गई उसकी
जलाते हो पुतला हर वर्ष रावण का
याद रखो कभी चीर हरण नहीं किया उसने सीता का

तुमने तो समाप्त कर दी एक भाई की आत्मा
खत्म कर दिया सारे जहां में जमीर पिता का
न तुम लायक हो पति बनने के
न तुम बन सकते हो पुत्र किसी के

न सम्मान माँ का तुम्हारी नजर में
न कलेजा भाई का तुम्हारे हृद्य में
न हीर रांझा सा प्यार तुम कर सकते
न कभी पिता सा धैर्य तुम रख सकते

शुम्भ निशुम्भ के लालच से गिरी नहीं देवी
चण्ड मुण्ड का संहार करने में पीछे नहीं रही यह देवी

बच्चियां सारी उन्ही देवीं का रुप है
गर बनोगे राक्षस बच नहीं पाओगे
लूट कर इज्जत बच्ची किसी की
क्या मिली शान्ति तुम्हें दिल की

 

बच्ची को कहा जाता है देवी
देवी ने बक्शा नहीं कभी राक्षसों को
चण्डिका कब बन जायेगी यह नारी
समझ नहीं पाओगे यह तुम सच्चाई।

 

                                                       प्रेम मंगल
                                                       कार्यालय अधीक्षक
                                                   स्वामी विवेकानन्द इंजीनियरिंग कॉलेज
                                                       इन्दौर म़.प्र.

कविता

(संदर्भ - दिल्ली में हालिया बलात्कार व हत्या कांड)

क़ैस जौनपुरी

कोई दे जवाब

 

फूल जैसी थी मैं किसी के लिए

किसी के अरमानों का सबूत भी थी

किसी की दुआ किसी की मन्‍नत

किसी का न टूटे उसूल थी मैं

हो रही है बहस अब मेरे हाल पे

 

छिन गया क्‍या आएगा अब लौटके

कोई दे जवाब बता दे मुझे

कुछ घाव हैं जिस्मों पे मेरे

कुछ दाग हैं चेहरे पे मेरे

 

हो सकूंगी किसी की न मैं अब कभी

हो सकेगा न मेरा कोई अब कभी

एक अहसास था कितना प्यारा सा जो

हो गया है ज़हर जबरन पिला के मुझे

हक़ तो मेरा भी था खुल के जी लेती मैं

 

कोई दे जवाब बता दे मुझे

क्‍या मैं देखूंगी सपने सुनहरे कभी

खिलखिलाके हसूंगी क्‍या सबमें कभी

दोष मेरा क्‍या था मैं तो नाज़ुक सी थी

क्‍यूं था मसला गया मेरे ज़ज़्बात को

क्‍यूं था कुचला गया मेरे अहसास को

 

कोई दे जवाब बता दे मुझे

मुझसे पूछो अगर चाहती हूं मैं क्‍या

फूल जैसी हूं मैं बस जरा प्यार दो

हूं मैं मरती हुई बस जिला दो मुझे

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

-हिमकर श्याम

व्यथित मन में मधु रस घोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

झोली में लेके ख्वाब नया

देखो आया है साल नया

अरमानों की गठरी खोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

जो बीत गया सो बीत गया

वो दुःख का गागर रीत गया

उम्मीदों का दर फिर खोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

दूर नहीं खुशियों का प्याला

उस पार खड़ा है उजियाला

संग ज़माने के अब हो लो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

राह नयी है, लक्ष्य नया है

जीवन में संकल्प नया है

पहले अपने पर तो तोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

क्या खोया, क्या पाया हमने

खूब हिसाब लगाया हमने

जख्म पुराने सारे धोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

छंद नया है, राग नया है

होठों पे फिर गीत नया है

सरगम के नव सुर पे डोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

 

पीड़ा- ताप मिटे जीवन की

पूरी हो इच्छा हर मन की

अंतर्मन के बंधन खोलो

शुभ-मंगल सब मिलकर बोलो

अंतिम सप्ताह दिसंबर का चल रहा है। चार दिन की केजुअल बाकी है। यदि जेब में मनीराम होते तो मजा आ जाता। दोस्तों की ओर से भी तरह-तरह के प्रस्ताव मिल रहे थे। परंतु सभी को कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता हूं, बिना पैसों के किया भी क्या जा सकता था। अतः आफिस से चिपके रहकर समय पास करना ही श्रेयस्कर लगा।

31 दिसम्बर का दिन, पहाड़ जैसा कट तो गया पर शाम एवं रात्रि कैसे कटेगी यह सोचकर दिल घबराने-सा लगा। उड़ने को घायल पंछी जैसी मेरी हालत हो रही थी। अनमना जानकर पत्नी ने कुछ पूछने की हिम्मत की, पर ठीक नहीं लग रहा है, कहकर मैं उसे टाल गया।

खाना खाने बैठा तो खाया नहीं गया। थाली सरका कर हाथ धोया। मुंह में सुपारी का कतरा डाला। थोड़ा घूम कर आता हूं, कहकर घर के बाहर निकल गया।

ठंड अपने शबाब पर थी। दोनों हाथ पतलून की जेब में कुनकुना कर रहे थे। तभी उंगलियों के पोर से कुछ सिक्के टकराए। अंदर ही अंदर उन्हें गिनने का प्रयास करता हूं एक सिक्का और दो चवन्नियां भर जेब में पड़ी थीं। सोचा एक पान और एक सिगरेट का सेजा जम जायेगा। पान के ठेले पर चिर-परिचितों को पाकर आगे बढ़ जाता हूं। दूसरे पान के ठेले पर भी यही नजारा था। एक के बाद एक पान के ठेलों को पीछे छोड़ता हुआ काफी दूर चला आया था।

उद्विग्न मन लिये, मैं सड़क के किनारे-किनारे चला जा रहा था। तभी मैंने महसूस किया कि कोई व्हीकल मेरे पीछे आ रही है। तनिक पलट कर देखा। एक चमचमाती जेन ठीक मेरे पीछे रेंग रही थी। मैं और थोड़ा हटकर चलने लगता हूं कि वह आगे निकल जाए, पर अब वह मुझसे सटकर चलने लगी।

सहसा गाड़ी में से एक हाथ निकलता है और मेरी कलाई को मजबूती से थाम लेता है। इस अप्रत्याशित घटना से मैं हड़बड़ा जाता हूं। मेरी पेशानी पर पसीना चू उठता है। मैं कुछ समझूं इससे पूर्व ही वह दरवाजा खोलकर मेरे सामने खड़ा हो गया। उसका इस तरह ऐंठकर खड़ा हो जाना मुझे ड्रेकुला की तरह लगा। मैं अंदर ही अंदर बुरी तरह से कांप उठा। उसने बड़ी बेतकल्लुफी से मेरे कंधे पर अपने भारी भरकम हाथ की धौंस जमाते हुए कहा, ‘क्यों... क्या हालचाल हैं।’ उसकी कड़कदार आवाज सुनकर मेरी तो जैसे घिग्गी ही बंध गई थी। कुछ कहना चाह भी रहा था, परंतु जीभ जैसे तालू से चिपक गई थी और शब्द आकर गले में फंस गए थे। मेरी आंखें बराबर देख रही थीं। वह मंद-मंद मुस्करा रहा था। उसकी यह मुस्कान मुझे बड़ी वीभत्स सी लग रही थी।

प्रत्युत्तर न पाकर, उसने फिर वही प्रश्न दागा। कड़ाके की ठंड में मैं पसीना-पसीना हुआ जा रहा था। आंखें पथरा-सी गई थीं और सोचने- समझने की शक्ति एकदम गायब हो गई थी। मैं बुत बना उसके सामने खड़ा था।

‘अरे यार, तेरा तो नर्वस ब्रेक डाउन हो गया लगता है, मैं कोई भूत-वूत नहीं बल्कि तेरे बचपन का दोस्त हूं। बरसों-बरस बाद तू मुझे दिखाई दिया सो सोचा कि कुछ सरप्राईज दूंगा, गौर से मेरी तरफ देख तो सही।’

उसके शब्दों में अब आत्मीयता की खुश्बू आ रही थी, जिसने संजीवनी का काम किया। मैं अब होश में आने लगा था, बल्कि अब नॉर्मल हो गया था। मैंने उसके चेहरे को पहचानने की कोशिश की पर असफलता ही हाथ लगी। पहचान लायक कोई भी अवशेष उसके चेहरे पर नजर नहीं आ रहे थे। एक हारे हुए जुआरी की तरह मेरी हालत हो गई थी।

‘वेरी सॉरी यार, मैं तुझे सचमुच नहीं पहचान पाया।’ मैंने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी असमर्थता उस पर प्रकट कर दी।

‘हां यार मुझे बड़ी हैरानी हो रही है कि तू मुझे पहचान नहीं पाया। सुन, तेरे बारे में मैं सब कुछ बताता हूं। तेरा नाम गोवर्धन यादव है न? तू मुकनाई का रहने वाला है न? तुम डाक विभाग में कार्य करते हो न? तुमने छिन्दवाड़ा में अपना मकान बना लिया है न?’ उसने और भी ढेरों बातें मेरे बारे में बतलाईं।

उसने सचमुच ही मेरा सारा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया था। निश्चित ही वह मेरा पूर्व परिचित रहा होगा। तभी तो उसने इतनी सारी बातें मेरे बारे में बतलाईं। इतना सब कुछ घटित होने के बाद भी मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था। मेरी नजरें झुक आईं और निराशा का भाव मेरे चेहरे पर उतर आया था। उसने मुझे भरपूर नजरों से घूरा और जोरदार ठहाका लगाया। और मुझ से कहने लगा, ‘अरे यार, इसमें इतना परेशान होने कि क्या बात है। अब तुम पूरे समय मेरे साथ रहोगे। तुम खुद-ब-खुद मुझे जान जाओगे। फिर भी यदि नहीं पहचान पाओगे तो मैं तुम्हें खुद ही अपने बारे में बता दूंगा। चल आ बैठ।’ उसने शालीनता से कार का दरवाजा खोला। मैं यंत्रवत् गाड़ी में जा धंसा। गाड़ी का स्टेयरिंग सम्हालते हुए अपने जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला और मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं एक सिगरेट ले लेता हूं। उसने भी एक सिगरेट अपने ओठों से दबाते हुए लाईटर जलाया। लाईटर के जलते ही एक जल-तरंग की आवाज थिरकने लगती है। सिगरेट जलाते हुए मैंने एक लंबा कश खींचा। तब तक वह गाड़ी स्टार्ट कर चुका था।

गाड़ी अब एक आलशीन बगीचे में से होते हुए गुजर रही थी। जगह-जगह फव्वारे रंग-बिरंगी रोशनी में थिरक रहे थे। बगीचे में लाईटिंग भी बड़े करीने से की गई थी। तभी कार एक आलीशान महल के सामने जाकर रुकती है। वह हार्न बजाता है। एक सूटेड-बूटेड वाचमैन आकर कार का दरवाजा खोलता है। वह कार के बाहर आ जाता है। उसके बाहर आते ही वाचमैन ने जोरदार सैल्यूट मारा। अब वह आगे बढ़ने लगता है। वाचमैन ने आगे बढ़कर कांच का आदमकद दरवाजा खोला। अब वह अन्दर प्रवेश करने लगता है। मैं यंत्रवत् उसके पीछे हो लेता हूं।

अंदर पहुंचते ही मुझे ऐसा लगा कि मैं जन्नत में आ गया हूं, जगह-जगह कलात्मक पेंटिंग्स लगी हुई थीं। झाड़-फानूसों से रोशनी बिखर रही थी। दीवारों से सटकर आदमकद अप्सराओं की नग्न-अर्धनग्न मूर्तियां मादकता बिखेर रही थी पूरे फर्श पर बेशकीमती कालीन बिछा हुआ था। हॉल में हल्की गुलाबी-सी रोशनी छाई थी। हर एक टेबल पर प्रेमी-प्रेमिकाएं अस्त-व्यस्त मुद्राओं में बैठे चियर्स कर रहे थे। हल्की धीमी आवाज में कोई इंगलिश-टयूनिंग माहौल में उत्तेजना भर रही थी। कई जोड़े डांसिंग फ्लोर पर एक दूसरे की कमर में हाथ डाले थिरक रहे थे। एक जवान बाला थिरकती जाती थी और खाली होते पैमानों को भरती जा रही थी।

अब वह इठलाती, बलखाती मेरी ओर बढ़ी चली आ रही थी। आगे बढ़कर उसने गिलास मेरे ओठों से लगा दिया। उसके अपने चेहरे पर चिपकी मुस्कुराहट, अस्त-व्यस्त कपड़ों से झांकते गदराए यौवन ने मेरे अंदर एक सनसनी सी पैदा कर दी। मैंने उसके नाजुक हाथों से गिलास ले लिया और एक ही सांस में पूरा उतार लिया। वह एक के बाद एक गिलास मेरी ओर बढ़ाती चली गई। मुझे बिल्कुल ही नहीं मालूम कि मैं कितने गिलास चढ़ा चुका होऊंगा। अब उसने मेरा हाथ थाम लिया और अब वह डांसिंग फ्लोर की ओर बढ़ने लग जाती है। डांसिंग फ्लोर पर मैं न जाने कब तक डांस करता रहा। मुझे याद नहीं और न ही वह कथित मित्र मुझे याद आया।

सहसा माईक पर एक स्वर उभरता है। ‘लेडीज़ एण्ड जेन्टलमैन,’ थिरकते हुए जोड़े थम जाते हैं। प्रायः सभी की निगाहें डायस की ओर मुड़ जाती हैं। वह कोई और नहीं मेरा अपना कथित मित्र था। फ्लैश लाइट में वह हीरे का सा जगमगा रहा था। उसने मौन भंग करते हुए मेरा नाम लेकर पुकारा और कहा कि मैं डायस पर पहुंच जाऊं। बहके हुए कदमों से मैं वहां पहुंच जाता हूं।

बड़े मनोहारिक तरीके से उसने मेरा परिचय दिया। कहा, ‘दोस्तों... आप इन्हें नहीं जानते। ये एक अच्छे गीतकार हैं, तथा गायक भी हैं। इनके अंदर एक से बढ़कर एक अनमोल खजाने छुपे हुए हैं और जब ये गाते हैं तो लगता है कि कोई झरना आकाश से उतर रहा हो और मीठी स्वर लहरी बिखेर रहा हो पर... ?’ अचानक उसकी सूई ‘पर’ पर अटक जाती है। लोग अपनी सांसों को रोककर आगे कुछ सुनना चाह रहे हैं। पर वह एक लंबी चुप्पी साध लेता है। थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने कहा, ‘हां तो दोस्तों मैं तो इनके बारे में एक चीज बतलाना तो भूल ही गया। जानते हैं, इनकी जेब में अब भी एक सिक्का और दो चवन्नियां पड़ी हैं। वर्ष के अंतिम दिन, ये बेचारे जश्न नहीं मना पा रहे थे। रास्ते में इनसे अनायास ही मुलाकात हो गई और मैं इन्हें यहां उठा लाया। शायद मैंने ठीक किया वरना आज महफिल बिना गीत-संगीत के सूनी-सूनी सी लगती।’

उसके उद्बोधन को सुनकर मेरा सारा नशा जाता रहा। मुझे ऐसा लगा जैसे स्वर्ग से उठा कर धरती पर फेंक दिया गया होऊं। अपने आप को संयत करते हुए मैंने माईक सम्हाला और कहा, ‘मित्रों, मैं अभी तक इस व्यक्ति को नहीं जान पाया जो मुझे उठाकर यहां लाया। इन्होंने अपनी ओर से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। और मैंने इन्हें एक विश्वास के साथ गले लगाया था। यह घटना ज्यादा पुरानी नहीं है अपितु चंद घंटों पहले की है। इन्होंने दोस्ती को ऐसे झटक दिया जैसे धूल पड़ने पर आदमी अपने कपड़े झाड़ने लगता है। अब मैं इन्हें दोस्त कहूं या दुश्मन। खैर जो भी हो, इन्होंने एक विश्वास तोड़ा है, एक दिल तोड़ा है और जब दिल टूटता है तो एक दर्द भरा गीत मुखरित होता है-

तुम कहते हो गीत सुनाओ ‘तो’ कैसे गाऊं और गवाऊं रे।

मेरे हिरदा पीर जगी है कैसे गाऊं और गवाऊं रे।

आशाओं की पी पी कर खाली प्याली, मैं बूंद-बूंद को तरसा हूं,

उम्मीदों का सेहरा बांधे, मैं द्वार-द्वार भटका हूं ,

तुम कहते हो राह बताऊँ तो कैसे राह दिखाऊं रे।

मन एक व्यथा जागी है। कैसे हमराही बन जाऊं रे।

रंग-रंगों में रंगी नियति नटी क्या-क्या दृश्य दिखाती है,

पांतो की हर थिरकन पर मदमाती-मस्ताती है,

तुम कहते हो नाच दिखाऊं तो कैसे नाचू और नचाऊं रे।

मनमयूर विरहा रंजित है, कैसे नांचू और नचाऊं रे।

दिन दूनी सांस बांटता सपन रात दे आया हूं,

तन में थोड़ी सांस बची है, मन में थोड़ी आस बची है,

तिस पर तुमने सुरभि मांगी तो कैसे-कैसे मैं बिखराऊं रे।

तुम कहते हो गीत सुनाओ तो कैसे गाऊं और गवाऊं रे।

गीत गाते-गाते मैं लगभग रुआंसा हो गया था। अब फफक कर रो पड़ता हूं, तमाम लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा, मैं नहीं जानता और न ही जानना उपयुक्त समझा। जिस मजबूती के साथ उसने मेरी कलाई थामी थी, उससे कहीं दूनी ताकत से मैंने उसका हाथ पकड़ा और लगभग घसीटता हुआ उसे बाहर ले आया। बाहर आते ही मैं वाक्युद्ध पर उतर आया था।

‘मित्र, तुमने मुझे जिगरी यार कहा; दोस्त कहा, मेरे गले में हाथ डाला और चिकनी-चुपड़ी बातें बनाकर यहां ले आए। तुमने मेरा स्वागत बड़ी गर्मजोशी के साथ किया। तुमने सबकी नजरों में मेरा मान बढ़ाया तो दूसरी ओर, तुमने मेरे साथ बड़ा ही भद्दा मजाक भी कर डाला। तुमने मुझे जलील किया। आखिर क्यों?’ मैं एक सांस में न जाने कितना कुछ बोल गया। परंतु वह न जाने किस मिट्टी का बना था कि उस पर कोई असर ही नहीं हो रहा था। बल्कि मेरे द्वारा अपमानित किए जाने के बावजूद उसके चेहरे पर पूर्व की तरह मंद-मंद मुस्कान खेल रही थी। उसने न तो अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की और न ही प्रयास किया। बल्कि मेरे आंखों में आंखें डालकर उसने कहा, ‘अच्छा मित्र तो तुम मेरा नाम जानना चाहते हो! तो सुनो मेरा नाम वक्त है। लोग मुझे समय के नाम से भी जानते हैं। मैं सन् ’????-?? का मिला-जुला रूप तुम्हारे सामने खड़ा हूं। बस कुछ ही मिनटों के बाद मैं तुमसे विदाई ले लूंगा और फिर तुम्हारे सामने एक नूतन वर्ष के रूप में-एक नई सदी के रूप में प्रकट हो जाऊंगा। सारी दुनिया एक नई सदी का बेसब्री से इंतजार कर रही है। पर मित्र जाते-जाते मैं तुमसे एक पते की बात कहे जा रहा हूं। सच कहूं तुम मेरे अब भी मित्र हो। मैंने तुम्हें हकीकत के दर्शन कराए हैं। एक वास्तविकता से परिचित कराया है। और तुम हो कि बुरा मान गए। मेरी एक बात हमेशा ध्यान में रखना, जिस तरह तुम अपने गीतों में नये-नए रंग भरते हो-ठीक उसी की तरह अपने जीवन में ऐश्वर्य का भी रंग भरो। जी तोड़-ईमानदारी से मेहनत करो और उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ चलो। खूब धन कमाओ। बलशाली बनो, ताकि तुम कंचन और कामिनी का जी भरके उपभोग कर सको। धन एक ऐसी शक्ति है जिससे तुम अध्यात्म के शिखर पर भी जा सकते हो। सिद्धार्थ किसी भिखारी के घर नहीं जन्मे थे बल्कि वे राजा के बेटे थे, राजकुमार थे। धन बल से तृप्त होने के बाद ही वे बुद्ध कहला पाए। मैं भी उन्हीं का साथ देने को तत्पर रहता हूं जो सचमुच में कुछ बनना चाहते हैं। अच्छा दोस्त अब मैं विदा ले रहा हूं सारी दुनिया मेरी बाट जोह रही है।’’

सारा शहर पटाखों की गूंज से थिरक उठा। एक आतिशबाजी रंग-बिरंगी फुलझड़ियां बिखेरती हुई आसमान की तरफ उठती है। सहसा मेरा ध्यान उस ओर बंध जाता है तभी एक जोरदार धमाका होता है। काली अंधेरी रात में, नीले आकाश के बोर्ड पर एक-एक शब्द क्रमशः उभरते चले जाते हैं-‘हेप्पी न्यू ईयर’, ‘वेलकम न्यू ईअर’, ‘स्वागतम् नई शताब्दी।’

नजरें झुका कर देखता हूं वह गायब हो चुका था

--

उस राह पर आज तक

निःशब्द असहाय और अकेली

बैठी हुई पथ के कांटे चुन रही हूँ मैं

जिस पर त्याग गए थे महर्षि गौतम

सदिओं पहले अहिल्या को ...

श्राप देकर पाषाण की प्रतिमा

बनाकर मुहँ फेरकर चल दिए

और वो बैठी रही मूर्त रूप में

अपने राम की राह देखती

निश्छल अविचल तटस्थ होकर...

पर मेरी विडंबना देखो

मैं भी वही अहिल्या हूँ

पर हाड़- मांस की चलती फिरती

जिसकी केवल नियति पाषाण की हुई हैं

जिसकी साँसों से उसके

जीवित होने का भ्रम होता हैं

धमनियों में बहता लहूँ प्रमाण देता हैं

कि सभी अंग सुचारू रूप से

अपना -अपना कार्य संपन्न कर रहे है...

पर किसी राम का मुझे इंतज़ार नहीं हैं

क्योंकि तुम्हारे सिवा मेरे मन के

उस रीते, सीले और अँधेरे कोने को कोई कभी

नहीं छू सकेगा ..

तुम कब आओगे मेरे राम ....

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~ ~ ~ ~ ~ ~

देँ नव ब्रितानी वर्ष पर हम क्या बधाइयाँ !

गिरती ही जा रही हैँ नीचे ऊँचाइयाँ ॥

 

जाएँ कहाँ इधर खाई, उधर है कुआँ ;

गुमराह हो गईँ खुद ही अगुआइयाँ ॥

 

हैँ ओहदोँ पर काबिज़ ख़ुदगर्ज़ ताक़तेँ ;

सम्मान हथिया रही हैँ अब गद्दारियाँ ॥

 

शुभकामनाएँ फलीभूत अब होती नहीँ ;

होँ शातिरोँ को हासिल कामयाबियाँ ॥

 

माँ बहन बेटियोँ की चीखो पुकार पर ;

दी अश्रुमग्न आँखोँ को अश्रुगैस लाठियाँ ॥

 

मर्दोँ के ग़ुनाहोँ को ढोती हैँ औरतेँ ;

क्योँ औरत के नाम पर 'महरूम' गालियाँ ॥

 

devendra.mahroom@gmail.com

वक्त सुनामी

रक्तबीज-से बढे दरिन्दे
कैसे-कैसे रिश्तों के फंदे
रिश्तों में भी कालनेमि है
क्या करेंगे हनुमान परिंदे।

कही पे भाई कही पिता हैं
विश्वासों का आधार मिटा है
किनको-किनको फांसी दे दूं
रिश्तों की गरमाहट में धंधे।

कहाँ सुरक्षित अस्मत मेरी
जातियां मेरी हों या तेरी
खूनी आँखे घूर रही हैं
शैतानों से मठ के बन्दे।

हक्का-बक्का हर चेहरा है
साए पर भी खुद का पहरा है
वक्त सुनामी बनकर आया
रोने को न बचे हैं कंधे।

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ग़ज़ल


माई की आँख में न हो आंसुओं का सैलाब
दूध के साथ बेटी में खंजर भी उतारिये।

वर्जनाओं की चादर उढ़ाकर न घेरिये उसे
पूरी कायनात में उड़ने का तरीका भी बताइये।

ये हालात तो हमने-आपने ही पैदा किये हैं
हो सके तो बेटियों से लाज का पहरा हटाइये।

घोसलों में रात दिन दुबकाए ही रह गए हम
वक्त है अब तो उड़ानों में तूफ़ान ले आइये।

बहुत हो चुका बेटी-बेटी पुकारते हुए हमें
फासले हटाकर जरा बेटा भी बुलाइये

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पुलिस अस्पताल के पीछे,
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश,

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मोहसिना जीलानी

फटी चादर

वो सफ़ेद बुर्के में लिपटी हुई पाँच वर्षीय फज़लू का हाथ थामें तेज़ी से चल रही थी। फज़लू के पैर, फिलिप फ्‍लॉप चप्‍पलों में जो उसकी साइज से बड़ी थी धूल में अँट रहे थे। खुले गरेबान की बड़ी-सी शर्ट और घुटनों तक लटकी हुई नेकर- वो माँ का हाथ मज़बूती से थामे उसके तेज़ तेज़ क़दमों का साथ देने की अनथक कोशिश कर रहा था। छोटे-छोटे ख़तरों ने उस नन्‍हें मस्‍तिष्‍क को घेर रखा था। अगर कहीं माँ का हाथ छूट गया तो वो खो जायेगा और फिर उसे घर का रास्‍ता भी नहीं मालूम। सीधी सड़क से निकल कर वो एक गली में प्रवेश कर गई। गर्मियों की सुनसान दोपहर, एक गली से दूसरी गली पार करते-करते वो पसीने में चूर हो चुकी थी। गर्म हवा की उलझी-उलझी साँसें उसके चेहरे को छू रही थीं। हर तरफ़ सन्‍नाटा था। और गली सुनसान थी। लेकिन ख़दीजा एक ऐसी भीड़ में खो जाना चाहती थी जहाँ उसे कोई पहचानता न हो, चलते-चलते वो इतनी निढाल हो गई कि उसे दम लेने के लिये रुकना पड़ा। फ़ज़लू इस बात से अनजान था कि आख़िर वे कहाँ जा रहे हैं। शायद माँ को बहुत ज़रूरी काम है। जब वो किसी ज़रूरी काम से निकलती है तभी उसके पैरों में इतनी तेज़ी आती है।

तेज़-तेज़ क़दमों से चलते-चलते एक बार फिर वो सपनों की दुनिया में लौट गई थी। पिछली रात शरफू की दी हुई गुलाबी साड़ी का ख़याल उसकी खुरदरी उँगलियों में अजीब- सी सन्‍तुष्‍टि का एहसास पैदा कर रहा था। सुलगते हुए गुलाबी रंग ने उसके शरीर में आँच सी लगा दी थी- और शरफू का प्‍यार छतनार बन कर उसके जलते तन को ठण्‍डक पहुँचा रहा था। लेकिन शादी की ये कैसी कड़ी शर्त थी, “अपने बच्‍चे को कहीं ठिकाने लगा दे जब तक ये तेरे साथ हैं मेरा तेरा निबाह नहीं।” उसने साफ़-साफ़ कह दिया था। ख़दीजा को अचानक फ़ज़लू के पिता का ख़याल आ गया। मज़दूरी करने एक दिन ऐसा निकला कि फिर वापस ही नहीं आया। कुछ दिनों बाद ख़बर मिली कि शहर में बच्‍चा ट्रक के नीचे आकर कुचल गया है। उस बस्‍ती में न जाने कितने लोग थे जो ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार होते रहते हैं। उनके लिये ये अनहोनी बात न थी कि खदीजा इस ग़म को सीने से लगा कर बैठ जाती, रो धोकर संतोष कर लिया। वो इस बस्‍ती में अकेली न थी। मुसीबतों ने जैसे उसका घर भी देख लिया था। वो सोचा करती, ‘जब से फ�ज़लू पैदा हुआ था उस पर एक न एक मुसीबत टूटती रहती। ये बच्‍चा उसके लिये भाग्‍यवान साबित नहीं हुआ था।' मगर फिर भी अपना ख़ून था। गोद में लिये, सीने से चिपटाये वो घरों में बरतन धोती फिरती। पाँव-पाँंव चलने लगा तब भी उसका आँचल पकड़े साये की तरह साथ-साथ था। अगर उसे अच्‍छा घर मिल जाये, अच्‍छे लोग मिल जायें तो क्‍या अच्‍छा हो और अगर शरफ़ू मेरा हो गया तो उस जैसे चार बेटे और पैदा कर लूँगी अब तो मैं उसे पेट भर खाना भी नहीं दे सकती मगर... मगर इसे लेगा आिख़र कौन?

यतीमख़ाना या फिर चौधरी साहब जिनके घर वो बरतन धोती है। पर यूँ तो वो हर समय उसके सामने रहेगा। उसने घबरा कर सर ‘ना' में हिलाया... और ठंडी साँस भर कर सोचा... फिर मैं क्‍या करूँ आिख़र...

वो बहुत देर तक सोचती रही, और अपने अन्‍दर उठने वाले तूफ़ान से लड़ती रही। मुहब्‍बत और ममता... दोनों टकरा रही थीं। सामने नुक्‍कड़ पर उसे नल नज़र आ गया। वो बहुत प्‍यासी थी। सड़क पार करते-करते और नल तक पहुँचते उसने फ़ैसला कर लिया था। उसका सर झुका हुआ था और मुहब्‍बत जीत गई थी। वो बड़े पीर के मज़ार पर जा रही थी जहाँ गुरुवार का मेला लगा था। उसने नल से ओक लगा कर पानी पिया, ये नल कब से टूटा पड़ा था। पानी हर वक़्‍त रिसता रहता था। किसी ने सफ़ेद कपड़े की एक चिंदी उसमें बाँध दी थी। पानी टप-टप बहता रहता- जैसे नलका न हो, चीखता चिल्‍लाता शोर मचाता नासूर।

“तू भी पानी पी ले... अभी दूर जाना है। कितनी गरमी है।” उसने फ़ज़लू को पुकारा। वो पानी तक आया, छोटे-छोटे हाथों की ओक बनाकर... उनमें लबालब पानी भरा और बड़े मज़े में मुँह पर पानी से छींटे डालने लगा। चप्‍पलों में फँसे हुए पैरों पर पानी के छीटें पड़ने लगे और पैरों में लगी रेत साफ होने लगी।

“जल्‍दी कर”, ख़दीजा बोली। फिर उसने अपने मैले बुर्के के कोने से उसके मुँह-हाथ पोंछे और उसका हाथ पकड़कर फिर से सड़क पर निकल आई...। उसके पास इतना वक़्‍त कहाँ था जो मुँह धोने जैसी बेकार हरकतों पर बर्बाद करती। अंधेरा होने से पहले उसे फज़लू को ठिकाने लगा कर घर वापस आना था। चलते-चलते शाम के साये लम्‍बे होने लगे थे। न सूरज की तपिश कम हो रही थी, न ही शरीर को सुकून का एहसास हो रहा था। फिर दूर ही से शोर-शराबे की आवाज़ सुनाई देने लगी। बडे़ पीर का मज़ार करीब आ रहा था। पीर साहब की करामात की बातें सारे गाँव में मशहूर थीं। हर गुरुवार को लोग झुण्‍ड के झुण्‍ड में दूर-दूर से मज़ार पर आते। फूल बताशें क़ब्र पर चढ़ाते और मुरादें माँगते और मुरादें पूरी हो जाती तो मज़ार पर खाने पकाते। देगें चढ़तीं, क़व्‍वालियाँ होतीं और कान पड़ी आवाज़ सुनाई न देती। सालों से ऐसा होता आया था, मगर ख़दीजा पहली मरतबा यहाँ आई थी। उसे मेले में कोई रुचि नहीं थी, वो तो यहाँ भीड़ में कुछ खोने आई थी।

मज़ार के आसपास लाचार अंधे, लूले, लँगडे़ और गूंगे फ़कीरों ने अपनी फटी हुई दरियाँ और मैली गोनिया बिछा दी थीं। अपने सामने खाने के बरतन फैलाये वे विचित्र-विचित्र आवाज़ें निकाल रहे थे। इतने सारे लोगों के हाथ-पैर कटे हुए देखकर ख़दीजा को लगा जैसे पूरी कौम लँगड़ी और गूंगी हो गई हो। उसने अपने आप को लम्‍बे सफ़ेद बुर्के़ में अच्‍छी तरह से टाँक लिया। उसकी घबराहट ख़त्‍म हो रही थी। वो सब उस जैसे थे, उससे भिन्‍न नहीं थे। वो उनमें से एक थी। मोतिया के गजरों, अगरबत्तियों और बिरयानी की मिल-जुली सुगंध उसकी नाक में घुसी तो उसकी भूख चमक उठी। यहीं उन लोगों की लाइन में लग जाये, खाना बँटने ही वाला है- वो फ़कीरों की लाइन में उकड़ूं होकर बैठ गई। फ़ज़लू भी झट से माँ के कंधे से लटक कर बैठ गया। उसने माँ को याद दिलाया- “मगर हमारे पास प्‍याला नहीं है- बिरयानी कैसे खायेंगे?” कुछ खाने के लिये प्‍याला भी कितना ज़रूरी है। उसने चारों तरफ़ देखा, पास बैठे हुए एक टाँग वाले फ़क़ीर ने अपना तांबे का प्‍याला उनके आगे बढ़ा दिया।

“ये ले लो, खाना खाकर वापस कर देना। मेरे पास एक और भी है।” फ़ज़लू ने फ़कीर को प्‍यार से देखा- “कितना अच्‍छा है ये!”

उसने जीवन में पहली बार इतनी स्‍वादिष्‍ट और इतनी ज़्‍यादा बिरयानी खाई थी। उसने चारों तरफ देखा तो हर कोई खाने पर टूटा पड़ा था जैसे वे सब ज़िन्‍दगी भर के अभावों का बदला ले रहे हों। आखिर माँ हर दिन यहाँ क्‍यों नहीं आ जाती? उसने सोचा कैसी अच्‍छी जगह है, और ये कैसे अच्‍छे लोग हैं जो माँ से बिना काम कराये यूँ मुफ़्‍त में ख़ाना दे देते हैं। मेले के साथ-साथ उसका सर भी भारी हो रहा था और उसे बड़े ज़ोरों की नींद आ रही थी। माँ से लगकर वो ऊँघने लगा-मगर आँखें मूँदे-मूँदे माँ को छूकर देख लेता, मौजूद है या कहीं चली तो नहीं गई। चंद पलों में वो बेख़बर सो रहा था। ख़दीजा ने उसे ज़मीन पर लिटा दिया- खाने की एक पोटली बनाकर उसके पास रखी और खुद ... अपने आपसे बोली, जैसे पास वाले फ�कीर को सुनाना चाहती हो। “ज़रा पीर साहेब से मुराद माँग लूँ- अभी आई।” फ़ज़लू ने कसमसा कर आँखें खोलीं तो वह बोली-“आराम से सो जा मैं अभी आई।”

“जल्‍दी आना अम्‍माँ”- वो नींद में बड़बड़ाया।

ख़दीजा का दिल एलार्म बन कर चीख़ रहा था जैसे अभी सीने की दीवार चीरकर बाहर निकल पड़ेगा। वो तेज़ तेज़ क़दमों से मेले से बाहर निकली और फिर तकरीबन वो भागने लगी। कहीं फ़ज़लू जाग न जाये- बाजे ताशे की आवाज़ उसका पीछा कर रही थी। वो पीछे मुड़ मुड़कर देख रही थी। एक गली से दूसरी गली में छिपती-छिपाती वो शरफू के पास जा रही थी। आखिरी बार उसने मुड़कर पीछे देखा और मुँह में बड़बड़ाई।

“पीर साहेब, मियाँ साहेब, मेरे फ़ज़लू की देखभाल करना।” बड़े-बड़े आँंसू आँखों के पोर भिगो गये- उसने हाथों से आँंखों को मला।

चारपाई पर पड़ी हुई गुलाबी गोट के किनारे वाली साड़ी, चाँदी का जेवर और आईना उसका इंतज़ार कर रहे थे। शरफ़ू ने उसे अपनी बाहों में समेट लिया। एक सप्‍ताह कितना अच्‍छा लगा। खुशियाँ ही खुशियाँ, कोई फ़ज़लू को पूछता तो झट से कह देती- अपनी मौसी के गाँव गया है। बस आ जायेगा। और फ़ज़लू... दिन में न जाने कितनी बार चला आता, आईने में अपना मुँह देखते, रोटियाँ बेलते, झाडू़ देते और गायों को भूसा डालने वो चुपके से चला आता...।

“माँ-माँ, तू मुझे क्‍यों छोड़ आई? माँ, मुझे अकेले डर लगता है... माँ..” वो सर झटक-झटक कर इस ख़याल से पीछा छुड़ाती। दिन में जाने कितनी बार... दिल में छुपी हुई फाँसों की तेज़ी उसका जिगर काट काट देती। हाथ काम करते-करते रुक जाते- वो रोहाँसी हो जाती। लेकिन उस रात सारी की सारी फाँसें दिल के आर पार हो गइर्ं। जिस रात उसने शरफू के साथ एक नई लड़की को देखा- वो उससे ज़्‍यादा कमसिन और उससे ज़्‍यादा सुन्‍दर थी। माँ-बाप ने उसे शरफू के हाथ बेच दिया था। या वो खुद चली आई थी उसे कुछ नहीं मालूम था।

वो नई नवेली दुल्‍हन की तरह लजाती लाल कपड़े पहने, होंठों पर गुलाबी गहरा रंग लिये,आरसी, कंगन और चाँदी के गहनों से लदाफदी उसे यूँ देख रही थी जैसे कह रही हो, “अब तुम्‍हारा यहाँ क्‍या काम भला...।” और शरफू ने इस ख�ुशी में इतनी पी ली थी कि वो अपने होश हवास में नहीं था। “ये मेरी बीवी है... इससे ... मैंने निकाह कर लिया है।” वो टूटे फूटे शब्‍द जोड़ रहा था। “अब तू अपने फ़ज़लू के पास चली जा... वो बहुत याद... आता था ना .... तुझे।” वो कह रहा था।

ख़दीजा के तन का सारा ख़ून सर-सर करता उसके सर में चढ़ गया.. “तू.. तू अपने होश हवास में नहीं है। तेरे लिये मैंने अपने बच्‍चे को खो दिया।” वो अटक-अटक कर कह रही थी। “मैं तेरा क़तल कर दूँगी। तेरा खून पी जाऊँगी, कमीने ज़लील।”

जवाब में शरफू के कहकहे उसके कान फाड़ने लगे। वो जितना चिल्‍लाती चीखती, शरफू उतना ही अधिक ज़ोरों से कहकहे लगाता। कहकहे बढ़ते रहे और नई नवेली दुल्‍हन मुस्‍कुराये जा रही थी। कोठरी में उसका दम घुटने लगा तो वो घबरा कर बाहर निकल आई। जब भ्रम टूट जाये तो क्‍या रह जाता है? उसे यूँ लगा जैसे वो मिट्टी की गुजरिया है, जिसकी सुनहरी मिट्टी जगह-जगह से झड़ गई है और उसे मोखल (ताक़) से उठाकर घूरे पर फेंक दिया गया है और उसकी जगह नई गुजरिया ने ले ली है। लोग ठीक कहते थे कि शरफू किसका हुआ जो तेरा होगा- इतना जल्‍दी न कर लेकिन ज़िन्‍दगी भर का अभाव और कच्‍ची उम्र की नातजु़र्बेकारियाँ उसका आँचल कस कर पकड़े थीं- शरफू उसके मस्‍तिष्‍क पर आंधी तूफान बनकर छा रहा था।

कहकहे रुक गये थे और हर तरफ� दम घोंटने वाला सन्‍नाटा छा गया था। केवल सुहाग की चूड़ियों की छनक और पायल की दबी-दबी चीखें उसका दिल मसोस रही थीं। वो बाहर खुले आसमान तले गाय के खूंटे के पास चुपचाप बैठ गई। हवा दम साधे थी और घने पीपल के पत्ते ख़ामोश थे। गहरे काले आकाश में दूर एक कोने में टंगा हुआ एक तारा उसके साथ रो रहा था। क्‍या उस आसमान पर ईश्‍वर रहता है? क्‍या वो किसी के साथ इंसाफ करता है- क्‍या बड़े पीर ने मेरे फ़ज़लू की देखभाल की होगी? वो न जाने कहाँ होगा। मैं उसे किधर ढूँढूँ अब? गाय ने जुगाली करते करते सर उठाकर ख़दीजा को हसरत से देखा, और उसके गले में पड़ी घण्‍टियाँ बज उठीं- दोनों में कितनी समानता थी। दोनों बेजु़बान थीं और दोनों को ही विरोध करना नहीं आता है। दुख की एक गम्‍भीर चादर उनके सरों पर तनी हुई थी। दोनों बंधी हुई थीं और बगैर आँसुओं के रो रही थीं। दो सप्‍ताह के बिछड़े को माँ से दूर शरफू ने सिर्फ इसलिये बाँध दिया था कि वो माँ का सारा दूध न पी सके और... माँ उसे बड़ी हसरत से मुँह उठाकर उठाकर देखती और हृदय विदारक आवाजें निकलती रहती मगर उस घर में सब बहरे थे, कौन सुनता? सारी रात वो गाय के खूंटे से लगी बैठी रही, जैसे पत्‍थर की हो गई हो। सुबह की पहली अज़ान कान में पड़ी तो उसने झट आँगन में बने चूल्‍हे के ऊपर खूंटी पर टंगे बुर्कें को उतारा और सर पर डालकर तेज़ी से बाहर निकल आई। वो तेज़ी से पीर साहब के मज़ार की तरफ़ जा रही थी। उसकी टाँगों में बला की शक्‍ति आ गई थी। फ़ज़लू को ढूँढने निकली थी।

पीर साहब की सुरक्षा में जो देकर आई थी, वहीं कहीं होगा, जायेगा कहाँ? आख़िर मिल जायेगा, ज़रूर मिल जायेगा। वो उससे बहुत नाराज़ होगा। वो उसे मना लेगी, “मेरे बेटे, मेरे लाल, मैं तुझे अब अपने से कभी अलग नहीं करूँगी।”

मज़ार तक पहुँचने वाले पल सदियों पर ठहर गये थे- सुबह आते आते कितनी देर लगी थी। उसके दिमाग़ में आंधियाँ चल रही थीं। दिल जैसे फटा जा रहा था। मज़ार पर पहुँचकर वो बेदम सी हो गई।

“पीर साहेब! बडे़ पीर साहेब!!” वो कलेजा फाड़ कर चिल्‍लाई- “ मेरा फ़ज़लू कहां है?” वातावरण में ख़ामोशी के सिवा कुछ न था। “फ़ज़लू, फ़ज़लू तू कहाँ है? फ़ज़लू, फ़ज़लू तू कहाँ है रे?” उसने अपना सर क़ब्र पर ज़ोर से टकराया। सर लहूलुहान हो गया- “बता, बता मेरा फ़ज़लू कहाँ है? मैं सब कुछ तेरी भेंट चढ़ा दूँगी, मेरे बच्‍चे को मुझे वापस दिलवा दे।” उसने अपने हाथों से काँच की लाल चूड़ियाँ उतारीं और बड़ी श्रद्धा से कब्र पर डाल दीं- फिर उसने अपना बारीक गुलाबी दोपट्टा गले से खींचकर मज़ार पर फेंका- फिर अपनी शलवार, अपनी कमीज़ उतार फेंकी और छोटे-छोटे सारे कपड़े एक-एक करके कब्र पर ढेर लगा दिये- “ ये सब तेरी भेंट सब कुछ ले ले। मेरा फ़ज़लू मुझे वापस दे दे। तेरे लिये कुछ मुश्‍किल नहीं।” वो पागल अन्‍दाज़ में इतने ज़ोर से चिल्‍लाकर रोई कि पीपल के नीचे सोया हुआ मुजबिर (पुजारी) जाग पड़ा और दौड़ा चला आया।

“क्‍या हुआ? तू किस को तलाश कर रही है? अरे... अरे ये तू क्‍या कर रही है?” उसने अपनी आँखें मलमल कर देखा हवा के तेज़ झोकों ने सारे पत्ते झाड़ दिये थे और चन्‍दन की लुन्‍जमुन्‍ज डाली की तरह उसका जिस्‍म सुबह की हवा में कँपकँपा रहा था। उसने जल्‍दी से अपने काँधों की फटी चादर उतारकर ख़दीजा के बदन पर डाल दी।

“मुझे नहीं मालूम तुझे क्‍या दुख है, तुझ पर क्‍या गुज़री है? मगर ... मगर ये न कर बहन, कपड़े पहन ले, हिम्‍मत से काम ले... मैं... मैं तेरे हाथ जोड़ता हूँ। दो वक़्‍त की रोटी मिल जाती है... वो भी छिन जायेगी।”

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बाद दुआ के मालूम हो

नजमा उस्‍मान

इमरान की उंगलियाँ बड़ी तेज़ी से की बोर्ड पर चल रही थी और वो उसकी उंगिलयों के साथ स्‍क्रीन पर उभरते हुए शब्‍दों को बड़े ध्‍यान और आश्‍चर्य चकित नज़रों से देख रही थी

दादी ः- “ऐ बेटा, वो सब कुछ लिख दिया है ना जो हमने कहाँ”

“कहा है?”

“जी दादी जाना! सारा मैसेज लिख दिया है”परे सफ़ाई से न चाहते हुए झूट बोल गया अब दादी जान भी तो न जाने क्‍या-क्‍या लिखवा रही थी। बहुत से वाक्‍य, बहुत सी बातें वो हज़ार कोशिश के बावजूद अंग्रेजी में ट्रान्‍सलेशन नहीं कर पा रहा था इधर दादी के ताबड़ तोड प्रश्‍न जारी थे।

दादी ः- ये मशीन भला कितनी देर से पत्र हमारी फ़िसा तक पहुँचा देगी और हाँ! ये कैसे पता चलेगा कि हमने उसे पत्र भेजा है? इमरान ने नये सिरे से उन्‍हे इन्‍टरनेट और ई-मेल के विषय में आसान भाषा में समझाया।

इमरान ः- देखे दादी जान, यहाँ जो कुछ मैंने लिखा है वो बिल्‍कुल उसी तरह नफ़ीसा फूफू के कम्‍प्‍यूटर तक पहुँच जायेगा ये देखें मैंने बटन दबाया और यहाँ पर ये बाक्‍स आ गया कि हमारा खत फूफू के कम्‍प्‍यूटर तक पहुँच गया अब वो इसे अपने स्‍क्रीन पर पढ़ लेगी।

दादी जान अब भी चिंति थीः

दादी और अगर किसी कारण से नफीसा ने अपनी मशीन को न ही खोला तो हमारा ख़त तो उन मशीनों के पुरज़ों में खो गया कभी न मिलने के लिये अब देखो डाक वाले भी गड़बड़ कर देते है तो ख़तवापस आ जाता है इन, निगोड़ी मशीनों का क्‍या भरोसा पूरे-पूरे पत्र निगल जायेंगी और हम कुछ नहीं कर सकेंगे।

वो सांस लेने को रुकी तो इमरान जल्‍दी से बोल पड़ा

इमरान डल क्‍मंत क्‍ंकप रंंद अगर उन्‍हे ख़त नहीं मिला तो इसका मैसेज भी यहाँ आ जायेगा।

दादी तुम जानो बेटा! मुझे तो ये टाइप राइटर जैसी मशीन पर टिप-टिप और टी.वी. पर भागते दौड़ते, निशान और शब्‍दों का खेल अजीब सा लगता है इंसान के अपने हाथ में कागज क़लम हो तो और ही बात होती है लिखने और पढ़ने वाले दोनों को शान्‍ति मिलती है दिली सुकून मिलता है। भावनाओं की ज़बान ये मशीन क्‍या समझेगी? और वो निगोड़ी अंग्रेज़ी में कितनी बाते हम अपनी नफ़ीसा को लिख़वाना चाह रहे थे, मगर तुम हर वाक्‍य पर टोक देते थे कि रुकें पहले टिप-टिप कर लूँ... फिर सोच में पड़ जाते थे कि उसे अंग्रेजी में कैसे लिखूँ इस रोका-रोका में हमार दिमाग़ से कई ज़रूरी बाते निकल गई।

इमरान ने उन्‍हें दिलासा देना चाहा

इमरना कोई बात नहीं, आप अगले ख़त में लिखवा दी जियेगा। दादी जान की नज़रे अब भी स्‍क्रीन पर टिकी हुई थी...।

इमरान अब कम्‍प्‍यूटर आफ़ कर दूँ।

दादी “अभी से?” दादी जान की अभी भी संकोच में थी।

इमरान यहाँ लन्‍दन में रात के नौ बजे रहे है तो कराची में एक बजा होगा सब सो रहे होंगे कल कॉलेज से आकर चेक कर लूँगा।

दादी “बेटा” तुम्‍हारी मशीन ने हमें सशंय और भ्रम में डाल दिया हो सकता है नफ़ीसा को नींद न आ रही हो और वो कम्‍प्‍यूटर खोल कर बैठ जाये। वो अक्‍सर देर रात तक लिखती पढ़ती रहती है आख़िर स्‍कूल की हेड मास्‍टर जी है बहुत काम करना पड़ता है हमारी बिटिया को क्‍या पता जवाब अभी लिख दे

दादी अगर हम डाक से ख़त भेजते, तो कम से कम दो सप्‍ताह बाद जवाब की उम्‍मीद तो रहती और इतना समय सुकून चैन से गुज़र जाता ये झटपट की डाक तो हमारे लिये तो परेशानियों का कारण बन गई ख़ैर तुम जा कर सो जाओ, सुबह कॉलेज जाना है। दादी जान ये कहते हुए उठ खड़ी हुई। उन्‍हे उठता देखकर इमरान की जान में जान आई बेचारी दादी जान नफीसा फूफू को कितना याद करती थीं इसीलिये वे पिछले तीन महीनों से पाबंदी से हर महीने उनकी ओर से फूफू को ख़त लिखा करता था इस तरह उसकी उर्दू लिखने की प्रैक्‍टिस भी हो जाती थी। वो इस वर्ष दूसरे विषयो के साथ उर्दू में भी एन्‍लेवल कर रहा था बचपन से अब तक वो कई बार पाकिस्‍तान जा चुका था घर में मम्‍मी-पापा उर्दु में बात करते थे, इसलिये ज़बान समझने की कोई समस्‍या नहीं थी वो तो जब दादी जान अपने पत्रों में नफ़ीसा फूफू को विचित्र प्रकार के निर्देश लिखवातीं तब इमरान के उर्दू शब्‍दों को भण्‍डार कम पड़ जाता एक बार उन्‍होंन लिखवाया “मेरे निवाड़ के पलंग को अच्‍छी तरह कसकर धूप दे देना और मचा न पर रखी हुई हरे गोटे वाली रज़ाई में रुई धुनवा कर भरवा लेना” उसने अपने ढंग से ये शब्‍द ज्‍यूँ के त्‍यूँ लिख कर भेज दिय मगर इमले की ग़ल्‍तियों तो होना ही थी फिर नफ़ीस फूफू ने मज़े ले लेकर उन सारी ग़ल्‍तियों की तरफ़ ढके छिपे शब्‍दों में इशारा करते हुए जवाब दिया था कि माशा अल्‍लाह बहुत अच्‍छी उर्दू लिखने लगे हो पै्रक्‍टिस करते रहो।

हर बार वो निश्‍चय करता था आ इन्‍दा दादी जान के लिये पत्र नहीं लिखूँगा मम्‍मी-पापा भी तो हैं उनसे लिखवा लिया करें मगर दादी जान जब उसे आवाज़ देकर अपनेकमरे में बुलातीऋ और सिहाने की तरफ़ रखी टेबल पर से अपने काले बैंग के अगले पाकिट से मुड़ा तुड़ा ऐरोग्राम निकालकर उसे देते हुए कहती

दादी मेरा बच्‍चा, मेरा चाँद जब भी फुर्सत मिले ज़रा दो लाइने तो लिख दे अपनी फूफू को कुशलता की “...हफ़्‍तो से कोई ख़बर नहीं मिली उसकी”।

एक तो दादी जान का जब जी चाहता किसी भी बात को अनायास बढ़ा-चढ़ा कर या घटा कर प्रस्‍तुत करतीं उनकी दो लाइनें दो पृष्‍ठों के बराबर होती और एक दिन पहले मिली हुई ख़बर महीनो पुरानी हो जाती। वो उन्‍हे याद दिलाता,

इमराना “अभी पिछले हफ़्‍ते जो पत्र भेजा है, उसका जवाब तो आने दें और पिछले हफ़्‍ते फ़ोन पर भी तो बात हुई”।

दादी “लो बेटा, ये फ़ोन पर बात करना भी कोई बात थी। ठीक से आवाज़ भी नहीं सुन पाये कि लाइन कट गई और ख़त तो शायद ही मिला हो वहाँ पाकिस्‍तान में आये दिन डाकिये हड़ताल पर रहते हैं”। तब वो हार कर कहाता “अच्‍छा दादी जान कल छुट्‌टी है जरूर लिख दूँगा”।

दादी (दुआए देती) “जीते रहो मेरे बच्‍चे, दीन दुनिया की खुशियाँ मिले माँ-बाप का कलेजा ठण्‍डा है” वो उनकी दुआ ये समेटता कॉलेज रवाना हो जाता।

कम्‍प्‍यूटर का ज़माना आया, फ़िर इन्‍टरनेट, और ई-मेल का सब से ज़्‍यादा खुशी इमरान को इस बात से हुई कि नफ़ीसा फूफू ने भी इन्‍टरनेट ले लिया। अब उसे लम्‍बे चौड़े उर्दू के ख़त नहीं लिखना पडेंगे उर्दू लिखने की प्रैक्‍टिस तो कई और तरीकों से भी की जा सकती थी। मगर दादी जान के ख़त तो उर्दू डिक्‍शनरी की मदद से भी मुश्‍किल से लिखे जाते थे फिर हर ख़त में लम्‍बों-चौड़े शब्‍दावली जैसे जान से प्‍यारी बेटी आँखों का नूर सलामत रहो बाद दुआ के मालूम हो कि वगैरा क्‍या मालूम हो ये पत्र की अन्‍तिम लाईन तक पता नहीं चलता था कभी-कभी तो ख़त पूरा हो जाता और उसमें जानकारियाँ देने वाली कोई बात नहीं होती हाँ सवालों की भरमार होती कभी-कभी दादी जान लन्‍दन की ज़िन्‍दगी के बारे में छोटी से छोटी बात इतने विस्‍तार से लिखवाती कि इमरान को मानना पड़ता कि उसकी दादी कितनी बारी की से चीज़ो का अध्‍यन करती हैं-

आज ई-मेल पर दादी जान का पहला ख़त भेजकर उसे बहुत खुशी हो रही थी- कितने शार्ट-कट मारे थे बहुत सी बातें कम कर दी थीं और कुछ तो सिरे से ग़ायब।

इधर दादी जान की सोच के धारे किसी और तरफ़ बह रहे थे कहीं ऐसा तो नहीं कि नफ़ीसा के पति कम्‍प्‍यूटर खोल ले और उनका ख़त पढ़ले बहुत से बाते ऐसी थी जो वो माँ के तौर पर बेटी को लिख देती थी नफ़ीसा के पति उनकी नज़रों में निखट्‌टी कामचोर और एक बेकार कि�स्‍म के इंसान थे नफ़ीसा के पति या बच्‍चे अगर उनका ये ख़त पढ़ लें तो क्‍या होगा? तीन बार लाहौल पढ़ कर उन्‍होंने तस्‍बीह के दाने फिराना शुरू कर दिया-

दूसरे दिन इमरान कॉलेज से आया तो दादी जान सर से पैरों तक इन्‍तिज़ार बनी बैठी थीः हालाँकि उन्‍हे अपनी बहू के साथ कहीं जाना था।

इमरान अरे दादी जान आप मम्‍मी के साथ नहीं गई? वो चिंतित होकर पूछने लगा।

दादी नहीं बेटा “दुल्‍हन ने बहुत कहा, मगर मेरा दिल नही चाह रहा था”। वो हँसते हुए बोला-

इमरान “मैं समझ गया आप को नफ़ीसा फूफू की ई-मेल का इंतजार है”। दादी जान के चेहरे पर रौनक़ दौड़ गई बोली

दादी बेटा तुम कुछ खा पी लो, आ राम कर लो फिर जरा मेरा बच्‍चा अपनी वो मशीन खोल कर तो देखो शायद नफ़ीसा ने जवाब लिखा हो। इमरान कपड़े बदलकर और कुछ खा पीकर अपने कमरे में आया तो दादी जान को कम्‍प्‍यूटर के सामने कु�र्सी डाले बैठी और स्‍क्रीन को तकते हुए पाया उसने मशीन आन की और फिर इन्‍टरनेट लोड करने के बाद नाराल गया।

“ये लीजिये नफ़ीसा फूफू का जवाब आ गया”

स्‍क्रीन पर अक्षर चमके और वो मज़े ले लेकर उन्‍हे ट्रान्‍सलेटकर के सुनाने लगा लिखती है यहाँ सब कुशल मंगल है और जो काम आपने बताये थे सब हो जायेंगे... ओर विस्‍तार से बात फिर करेंगी इस समय जल्‍दी में हैं स्‍कूल जा रही हैं फूफा सलाम लिखवाते हैं फरह और सलमान दोनों आपको बहुत याद करते हैं दादी जान खाली नज़रो से स्‍क्रीन की ओर देख रही थी “बस यही लिखा है?”

“जी हाँ आप ख़ुश नहीं हुई दादी जान? हैरानी से इमरान ने पूछा वा कुर्सी से उठीं और स्‍क्रीन के पास जाकर उसके चमकते हुए अक्षरों पर धीमे-धीमे हाथ फेरने लगीं वो अक्षर जो काग़ज़ पर उगिलयाँ लिखती हैं, उनकी चमक दमक जज़्‍बो की गहराई पर आधारित होती हैं कटे-फटे पुराने काग़ज़ लिखे हुए मिटे-मिटे से शब्‍दों में वो चमक और गरमी होती है कि तन और आत्‍मा तृप्‍त हो जायें- अभी पिछले दिनों नफ़ीसा का पत्र दो भागों में बंटा हुआ था आधार ख़त लिखने के बाद बच्‍चों के किसी काम के लिये उठकर चली गई फिर आकर लिखना शुरू किया तो कलम भी दूसरा था और स्‍याही का रंग भी अलग था उन रंगों में एक रूपता का न होना उन को शादी शुदा ज़िन्‍दगी को व्‍यवस्‍थ और बच्‍चों के हर कार्य को प्राथमिकता देने का जज़्‍बा ज़हिर था दादी ने एक माँ के रूप में इस दो रंगे ख़त से बेटी की खुशहाल ज़िन्‍दगी को देखा और महसूस किया, और उन रंगो की ठन्‍डी-ठन्‍डी फुहार से उनका बूढ़ा तन भीगकर ताकत महसूस करने लगा और उस दिन शायद नफ़ीसा की पति से कुछ खटपट हो गई थी ख़त लिखने बैठीं तो शब्‍द जैसे आँसूओं से लथपथ थे डब-डबाई हुई आँखो लिखे हुए शब्‍दों को काग़ज़ तक के रास्‍तों का सफ़र धुँधला-धुँधला था, तभी तो वाक्‍य एक रूप नही थे और बात छुपाते-छुपाते भी सब प्रकर ज़ाहिर हो गई थी।”

पहले मशीनों पर बोलते थे, अब लिखने भी लगे ये दूरियाँ, ये मजबूरियाँ भी तो मानव को बेबस बना देती हैं अरे हज़ारों मील दूर ला फेंका हमें अपनी बिटिया से बस बेटे की मुहब्‍बत में आ गये... अब हम अपनी नफ़ीसा को कैसे देखेंगे कैसे महसूस करेंगे।

“दादी जान, आप कहाँ खो गई?” इमरान पूछ रहा था। “अरे! हम कहाँ जायेंगे? बस बेटा ख़ुशी का साघन तो हम से छिन गया वो काग़ज़... वो लिफ़ाफ़ा उसके हाथों के लिखे हुए शब्‍द जिनमें उसके स्‍पर्श की खूशबू बसी हुई मिलती थी... वो कहाँ हैं इस मशीन पर उभरे हुए शब्‍दों में” मशीन के कलपुर्ज़ो और मानवी जज़्‍बो में बहुत अंतर है... मगर... तुम नही समझ सकोंगे येबाते... वो धीमे-धीमे कदम उठाती कमरे से बाहर चली गईं।

इमरान थोड़ी देर हक्‍का-बक्‍का बैठा रहा फिर उनके कमरे की तरफ़ आया दरवाज़ा बंद था वो परेशान सा लौट आया- दो तीन दिन दादी जान चुप-चुप सी रहीं फिर इमरान को अपने कमरेमें बुलाया नफ़ीसा के पुराने पत्र उन के सिरहाने रखे थे और एक मुड़ा तुड़ा ऐरोग्राम हाथ में था देखो बेआ वो ठहरे हुए लहजे (स्‍वर) में बोली जब भी तुम्‍हें फ़ुरसत हो दो लाइनें हमारी तरफ़ से अपनी फ़िसा फूफू को लिख देना कि जब भी उन्‍हें फरसत मिले हमें अपने हाथ से ख़त लिख कर भेज़ें और रही तुम्‍हारी ये टिपटिप वाली मशीन, तो इसके द्वारा अपनी कुशलता बता दिया करें।

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बानो अरशद

एक चैलेंज

घर में सब बहनों से बड़ी होने के कारण मुझमें जिम्‍मेदारी की भावना भी बहुत थी। अम्‍मा को तो सदैव बीमार देखा, इसलिए घरेलू कामों में भी उनका हाथ बटाती। घर का ऐसा कौन सा काम था जो मुझे न आता हो, हर वक्‍त घर संभालते-संभालते कुशलता मेरी दूसरी आदत बन गई थी। अब्‍बा को समय पर भोजन देना, उनका बटुआ भरना, बहनों को तैयार करना, बस। अम्‍मा भी निश्‍चित रहती परंतु कभी-कभी पड़ोस से आने-जाने वालियों से यह अवश्‍य चर्चा करती, “मेरी बेटी बहुत नेक और आज्ञाकारी है, खुदा उसको ससुराल अच्‍छी दे।” अब्‍बा भी ढेर सारी दुआएँ दिया करते। छोटी सी थी जब से हंटर कलिया पकाना और गुड़िया खेलना, उनके कपड़े सिलना मेरा काम था। अब्‍बा के हठ पर स्‍कूल में दाख़िला लिया परंतु छः सात कक्षा से अधिक न पढ़ा सके क्‍योंकि फिर छोटे भाई-बहनों को कौन देखता। रेहाना, फ़रज़ाना भी बड़ी हो रही थी और मुन्‍ना जो घर में हम सब का लाड़ला था। उसकी देखभाल भी मेरे ही जिम्‍मे थी। उसे समय पर स्‍कूल भेजना, कपड़ों पर इस्‍त्री करना, यह सब काम करके मुझे बहुत मज़ा भी आता था। शाम को घर में बड़ी चमक-दमक होती। सब साथ खाना खाते, अब्‍बा चुटकुले सुनाते और फिर बारी-बारी करके हम लोगों से कहा जाता एक शेर और एक चुटकुला प्रतिदिन सुनाने के लिए। अम्‍मा को शायरी में रूचि थी वह प्रायः बातों-बातों में कोई न कोई शेर सुना दिया करती। हम लोग फटेहाल तो नही थे लेकिन धनवान भी न थे। धीरे-धीरे हम सब युवा हो रहे थे। कभी-कभी अब्‍बा को मैं देखा करती कि वह खालाओं में खो जाते। मैं पूछती “अब्‍बा क्‍या बात है?” कुछ नही कुछ नहीं बोलकर फिर कहते “तुम्‍हारी माँ की जिंदगी की दुआ माँग रहा हूँ।”

क्‍योंकि वह दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होती जा रही थीं मगर सदा मुस्‍कुराती रहती और यही स्‍वभाव हम सबने उनसे सीखा था। एक-दूसरे को छेड़ना बात-बात पर हँसना। अब्‍बा प्रायः संध्‍या के समय कार्यालय से वापसी पर कभी तरबूज़ कभी ख़रबूजे और कभी आम लाया करते। जब भी किसी फल का मौसम आता हमारे घर में वह सब से पहले खाए जाते। हमारा छोटा सा संसार था, जिसमें पत्रिका, पुस्‍तकें, अख़बार, रेडियो, टी.वी. पर भी तर्क-वितर्क होता, सब का प्रयास होता कि कोई न कोई पहले नई खबर सुना दे। सर्दियों में मूली और शलजम का अचार होता। अम्‍मा ने मुझे अचार डालना भी सिखा दिया था कि बेटा गृहस्‍थी के लिए और पति को प्रसन्‍न रखने के लिए पत्‍नी को स्‍वादिष्‍ट खाना पकाना अवश्‍य आना चाहिए। मैं सब कुछ लगन के साथ सीखती शबे-बरात का हलवा हो या ईद पर शीरखुरमा या मुहर्रम पर हलीम पकाना, क्‍या था जो अम्‍मा ने मुझे नहीं सिखाया था। खानदान वाले बल्‍कि दादी माँ जब भी आतीं कहती “अरी बिटिया तुम पूरी रसोइया हो गई हो।” यह नन्‍हीं ने अभी से इतनी छोटी सी लड़की को गृहस्‍थी में डाल रखा है। फिर स्‍वयं ही मुँह लटकाकर कहतीं” गरीब डरती है कि कहीं आँख न बंद हो जाए तो बड़ी बेटी को सब कुछ सिखा दूँ। और मैं फौरन दादी माँ के मुँह पर हाथ रख दिया करती खुदा न करे। वह भी आप की तरह पोते-पोतियाँ देखेंगी। लड़कियाँ तो बढ़ती ही गाजर मूली की तरह हैं। अब दिन गुजर रहे थे, हम लोग बड़े हो रहे थे।

रेहाना और फ़रज़ाना तो बिलकुल गुड़ियाँ लगती थी। इधर मुन्‍ना भी युवा हो रहा था। अब घर में रिश्‍ते आना प्रारंभ हो गए। कभी चुड़ी वाली मनिहारिन रेहाना का रिश्‍ता लाती तो कभी धोबन फरज़ाना के ब्‍याह की बात करती। अम्‍मा हँसकर टाल दिया करती कि अभी तो हम बड़ी का रिश्‍ता देख रहे हैं। इसके लिए देखो पहले तो हर तरफ से जवाब मिलता “बेटा आजकल तो लोग पैसा देखते हैं या फिर शिक्षा, यदि लड़की बहुत सुन्‍दर हो तो फिर शिक्षा की परवाह नहीं करते। परंतु रूखसाना बीबी के लिए कोई धनवान या राजकुमार मिलना तो कठिन है। कहीं उचित रिश्‍ता देखा तो बताएँगे। ये बातें सुनकर पहले तो मैं हँसकर टाल दिया करती, परंतु जब रेहाना, फरज़ाना के रिश्‍ते धड़ाधड़ आने शुरू हुए तो मेरी उलझन भी बढ़ी और अब्‍बा भी चिंतित नजर आने लगे। जो भी आता वह या तो रेहाना का रिश्‍ता माँगता या फिर फरज़ाना पर दृष्‍टि पड़ती। मेरे बालों में चाँदी के तार आना शुरू हो गए। अब्‍बा के बाल भी सफेद होते जा रहे थे। अब्‍बा भी ये कह-कह कर विवश हो गए थे कि हम पहले बड़ी बेटी का ब्‍याह करेंगे। कभी रेहाना की पढ़ाई का बहाना, कभी फ़रज़ाना के मेडिकल कोर्स का बहाना। मगर समय कहाँ रूकता है वह तो की रफ्‍तार से भी आगे निकल जाता है। मेरे भी कान पकने लगे और धीरे-धीरे मेरे दिल में उदासी की जड़ें फैलने लगीं। जब अब्‍बा ने मेरे यौवन की शाख के पीले पत्‍ते बिखरते देखे तो वह और भी चिंतित एवं शांत रहने लगे। अम्‍मा को गले (कंठ) का कैंसर डॉक्‍टर ने बताया इधर उनकी बीमारी उधर अब्‍बा की परेशानी। अंततः एक दिन मैंने बड़ी हिम्‍मत की और आकर अम्‍मा से कहा “ अब्‍बा से कहिए जिस का भी उचित रिश्‍ता पहले आए उसके उत्‍तरदायित्‍व से मुक्‍त हो जाएँ।” अम्‍मी की आँखों में नमी थीं परंतु उन्‍होंने मुस्‍करा कर माथे पर बीसा दिया। “अल्‍लाह तुझे अवश्‍य इसका फल देगा।” ये बात थी भी वैसे मुनासिब। अम्‍मा-अब्‍बा की समझ में आने लगी। उन्‍होंने फ़रज़ाना के हाथ पीले कर दिए और राजकुमार अपनी दुल्‍हन को ले गया।

दो साल बाद हमारे ख़ालाज़ाद भाई मंसूर अमरीका से आए हमारे घर में जब उन्‍होंने रेहाना को देखा तो बस निछावर। आगे पीछे खालाजान को लेकर हाथ में मिठाई का डिब्‍बा। छुट्‌टी पर आए थे बल्‍कि ब्‍याह की ही नीयत से, वह भी परी कोलेकर परिस्‍तान यह जा वह जा। बस घर में मुन्‍ना था और मैं थी। मुन्‍ना तो अभी फर्स्‍ट ईयर में कॉलेज में था परंतु मैं तो अब शादी की उम्र को लांघ रही थी। अब्‍बा को यह चिंता हर समय बनी रहती, परंतु कहीं दूर-दूर से आशा की किरण न नजर आती। लड़कों की माताएँ सभाओं में कहती सुनाई पड़ती कि लड़की सुदंर हो दहेज में ये हो वो हो। यदि लड़की शिक्षित हो तो वह भी अच्‍छा है और यदि कोई लड़का बाहर से आता तो उसकी माँग और भी बढ़ जाती। माँ कहती कि हम को नगद दे दें, दहेज नहीं चाहिए। बस ये बातें सुनकर अब्‍बा तो बिल्‍कुल ही उदास हो जाते थे। अम्‍मा तो खैर किसी दिन भी हमसे बिछड़ने वाली थीं। उनके कंठ (गले) का कैंसर ऑप्रेशन के बावजूद काबू से निकला जा रहा था। अब्‍बा मानसिक कैन्‍सर का शिकार होते जा रहे थे।

एक दिन मुन्‍ने ने एक जटिल समस्‍या खड़ी कर दी कि वह पढ़ाई छोड़कर दुबई जा रहा है, उसका एक दोस्‍त उसको निमंत्रण दे रहा है। शहर की दशा देखकर अब्‍बा ने शांति के साथ स्‍वीकृति दे दी। भैया चले परदेश, अम्‍मा तो दूसरे ही परदेश की डोली में बैठने वाली थीं। बस भैया का जाना इधर अम्‍मा का दिल टूटना। फिर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी बीमार के लिए जलते पर तेल का काम करता है। अम्‍मा भी सिधारी अब अब्‍बा थे और मैं।

रिश्‍तेदारों ने आकर और दबाव डालना शुरू किया कि लड़की के उत्‍तरदायित्‍व से मुक्‍त हो और कहीं निकाह कर लें। अब्‍बा बेचारे अम्‍मी का वियोग इधर बुढ़ापे की कमजोरी। बस बुढ़ापे से चिड़चिड़े भी रहने लगे। मुझे अपना भार स्‍वयं ही भारी लगने लगा। फिर अब्‍बा मेरे कारण बाहर नहीं निकलते कि जवान लड़की घर में अकेली कैसे रहेगी। यदि मर्द नौकर रखते हैं तो समस्‍या औरत रखे तो ये डर कि लोग क्‍या कहेंगे। बस मैं उनके लिए साँप के मुँह में छछूँदर सी हो गई थी। मेरा अधिकतर समय रसोईघर में ही गुजरता बर्तन धोने, और थालियाँ चमकाने में कुशल होती जा रही थी। एक दिन मैंने अख़बार में खबर पढ़ी की पचपन वर्षीय तलाकशुदा ब्रिटिश नेशनल के लिए तीस से पैंतीस साल तक की अच्‍छे स्‍वभाव वाली नेक चरित्र की लड़की की आवश्‍यकता है। रिश्‍ते के इच्‍छुक लोग पूरे ब्‍यौरे के साथ एक हफ्‍ते के अंदर-अंदर रवाना कर दें। लड़के को वापस जाना है और पत्‍नी को साथ लेकर जाएगा। मैंने तुरंत ही अब्‍बा की तरफ से खत लिख दिया कि वह संबंध स्‍थापित करे। बस वह तो जैसे प्रतीक्षा ही में था।

वह हमारे घर अपने किसी मित्र के साथ आया। उसने अपने परिवार और अपने बारे में अब्‍बा को बताया। देखने में ठीक-ठाक, चाय-नाश्‍ता लगा दिया गया। अब्‍बा ने मुझे भी बुला लिया और कहा कि आप लोग आपस में भी बातचीत कर सकते हैं। दो-चार बार वह श्रीमान तशरीफ लाए और मुलाकातें बढीं, परंतु उन्‍होंने बातों-बातों में मुझे बताया कि उनकी पत्‍नी मौजूद है मगर उसके कोई बच्‍चा नहीं है। वह हर दशा में उसको छोड़ना चाहते हैं। उनकी बनती नहीं है। पहले अब्‍बा को ये बात बिलकुल पसंद नहीं आई, परंतु जब उन्‍होंने दबाब डाला और कहा कि “मैं ऐसा अन्‍याय नहीं करूँगाा कि एक की मौजूदगी में दूसरी लाऊँ। ये दोनों पर अत्‍याचार है।” बातों से वह बहुत उचित लग रहे थे। अब्‍बा ने कहा कि अगर आप तलाक़नामा ले आएँ तो हम अवश्‍य विचार करेंगे। परंतु अब्‍बा से मैंने अस्‍वीकार कर दिया कि ये कोई चाल न हो। इससे मैं दो-चार बार अवश्‍य मिलुँगी। चूँकि अब्‍बा, तो मुझे सेल पर लगाए बैठे थे कि बस औने-पौने दामों में बेच कर अपनी दुकान बंद करे। माना Closing down Sale की अंतिम बकरी मैं हूँ। इधर वह श्रीमान भी बहुत चिंतित थे, श्रीमती की आवश्‍यकता का विज्ञापन बने हुए थे।

मैंने एकांत में उनसे पूछा कि अपनी पत्‍नी को छोड़ने का कोई उचित कारण बताइये। चलिए, तो सुनिए, वह मुझे सब लोगों में बदनाम करती है कि मैं संतान पैदा करने के योग्‍य नहीं हूँ और उनको मैं ये साबित करना चाहता हूँ। मैं आपको ये भी बता दूँ कि मैं उस औरत से बहुत प्रेम करता हूँ, परंतु मेरे स्‍वाभिमान और मर्दानगी (पुरूषत्‍व) को वह और चैलेंज कर रही है।

यदि दूसरे विवाह से भी संतान न हुई तो फिर? आप एक दूसरी ओरत की जिंदगी से खेलना चाहते हैं, मैं चकरा गईं।

अब आप जो भी समझ लें, मैंने तो तय किया है कि मैं उस औरत को मज़ा चखाऊँगा, यहाँ नहीं तो कहीं और।

मुझे ऐसा लगा कि ये खरीदार यदि हमारी दुकान से सौदा नहीं लेगा तो कहीं और से लेगा। मैंने सोचा मैं भी तो तंग आ चुकी थी इस उलझन भरी जिंदगी से। चलो जुआ खेल ही लो। फिर मैंने कहा कि उस औरत की आह लग जाएगी आपको और साथ मुझे भी जला डालेगी। उसने कहा नहीं आप सोच लें।

अब्‍बा ने भी निर्णय मुझ पर छोड़ दिया। मैंने कहा ठीक है, आप जब तलाकनामा ले आएँगे मैं तैयार हूँ फिर।

हमारा निकाह जल्‍द ही हो गया। शादी सादगी से हो गई। मैं जीवन के नए सफर पर बढ़ गई थी। हवाई जहाज मुझे ऐसी मंजिल पर उड़ा रहा था कि सिवाए बादलों के मुझे कुछ नजर नहीं आ रहा था। नया देश, लंदन देखने की इच्‍छा ने थोड़ा सा दिल को बहलाए रखा था। सारे रास्‍ते वह व्‍यक्‍ति मेरे आव-भगत में लगा रहा। उसके चेहरे पर जीत का प्रभाव था और ये मेरे लिए स्‍वप्‍नफल की तरह था। मुझे उसने दो-चार दिन तो खूब सैर कराई घर नहीं था एक फ्‍लैट था, जिसका एक कमरा बंद था जैसे कहानियों में होता है कि चौथे खोट नहीं जाना है। बार-बार मेरा जी चाहता कि उस कमरे को खोल कर देखूँ कि उसमें क्‍या है। लेकिन सुहेल मुझे टाल देते। अब्‍बा ने चलते समय सलाह दी थी कि बेटी इस घर से तुम्‍हारी डोली जा रही है, अब वहाँ से तुम कर कर ही निकलना। ‘देर आयद, दुरूस्‍त आयद' लड़का शरीफ है। मुझे तुमसे आशा है कि एक आज्ञाकारी पत्‍नी बनोगी क्‍योंकि तुम एक पूर्वी लड़की हो। जाने क्‍या-क्‍या अब्‍बा ने कानों में डाला था। हमारी इच्‍छा पूरी हो गई, तुम्‍हारी माँ की आत्‍मा को भी शांति मिली होगी। मरते समय तुम्‍हारी चिंता थी उनको।

यहाँ यह दशा कि विवाह होते ही मैं गर्भवती हो गई। सुहेल का प्रसन्‍नता के कारण अजीब हाल था जैसे वर्ल्‍डकप किसी देश ने जीत लिया हो। कभी मछली लिए चले आ रहे हैं, और कभी फल। मेरा ध्‍यान अधिक रखने लगे। समीना मछली खाओ बच्‍चे बुद्धिमान होते हैं। कभी कलेजी कि उसमे आयरन होता है। परंतु प्रायः शाम को देर से आते। और वह दरवाजा मेरे लिए रहस्‍मय कभी न खुलता। प्रायः सुहेल मुझसे कहते देखा वह मुझे नामर्द कहती थी, अब पता चला उसको। मुझे हर समय ताना देती थीं दिन में दो-चार बार तो अवश्‍य ही वह समीना को याद करता। कभी कहता तुम भी हरे रंग का कपड़ा पहना करो, वह हरा रंग ही पहनती थी। कभी कहता तुम शामी कबाब बना तो लेती हो परंतु वैसे नहीं, कोशिश करो। और हाँ थोड़ा सा अपने को दुबला कर लो वह बहुत कोमल सी थी। कभी मेरे लिए परफ्‍यूम लाता। लो यह परफ्‍यूम लगाओ ये उसे भी पसंद था। और मैं समीना बनन के प्रयास में हर वह काम करती जिसकी सुहेल माँग करता। कपड़ों के रंग लिपिस्‍टिक के शेड सुगंध हर वस्‍तु वह मुझे वही लाकर देता जैसी समीना के पास होती थी।

एक दिन मैंने खींझ कर कह दिया कि मैं समीना नहीं हूँ, मैं रूखसाना हूँ। आप होश में आएँ क्‍योंकि कभी-कभी वह विवेकहीन होकर मुझे समीना कहकर संबोधित (पुकारता) करता।

वह धीरे-धीरे देर से आने लगा और कभी-कभी उसके मुँह से शराब के भभके आते। एक दिन मैंने ज़िद (हठ) करके पूछा कि उस कमरे में क्‍या है? उन्‍होंने कहा कि जब हमारा बच्‍चा जन्‍म लेगा तब उसको खोलेंगे, उसका उद्‌घाटन करेंगे। अच्‍छा मैंने टाल दिया। अब हमारे यहाँ मुन्‍ना आ चुका था। सुहेल की शराब की लत न छूटी बल्‍कि वह बढ़ती चली गई। नौकरी से भी निकाल दिए गए। मैं अब्‍बा को भी ये नहीं लिखती अक्‍सर उनके दोस्‍त बताते कि यह हमारे पास बोतल लिए बैठे होते हैं। पहले तो मैं उनके दुख दर्द में भागी रहा करती परंतु उनकी नशे की आदत बढ़ती गई। ससुराल वालों को पता होता तो वह पत्र में लिखते, यदि पत्‍नी चाहे तो शराब और सिगरेट छुड़ा सकती है परंतु मैं तो एक कमज़ोर ज़माने की ठुकराई हुई औरत थी जिसे उस मर्द ने सहारा दिया था। एक दिन मेरा हाथ पकड़कर मुझे उस कमरे में ले गया। लो देखो ये, वह कमरा खुला जिसमें बोतलें और ग्‍लास टूटे हुए थे और सामने फ्रेम में अनगिनत समीना की तस्‍वीरें लगी थीं। उन्‍होंने कहा देखो समीना ये बच्‍चा देखो मैं नामर्द नहीं हूँ। मैं शांतिपूर्वक कमरे से बाहर आ गई। वह अकसर जाकर उस कमरे में बैठ जाते। घंटो सिगरेट के धुएँ में समीना की तस्‍वीरों से बातें किया करते। वह समीना को अपने दिल से न निकाल सके और हमारे यहाँ दूसरा बेटा पैदा हो गया। मैं एक कठपुतली थी जिसको बचपन से धुन में लगी रहने की आदत थी। सुहेल को न घर में रूचि थी न बच्‍चों से।

कभी-कभी मुड में आकर कहता “तुम समीना नहीं बन सकती” ओर फिर कहते- “तुमको एक पति की खोज थी उसने तुमको पति दिया, तुम्‍हारे माता-पिता का भार हल्‍का हो गया और मैं समीना के सामने सिर उठाने के योग्‍य बन गया, शुक्रिया रूखसाना शुक्रिया” और फिर बिलख-बिलख कर बच्‍चों की तरह रोता। मैं उसको गले से लगाती। परंतु शराब और समीना तो उसकी रग-रग में बस चुकी थी।

कुछ समय के बाद पता चला कि समीना ने भी दूसरा ब्‍याह कर लिया हो और एक दिन खबर आई कि समीना के घर बेटी पैदा हुई है। यह खबर सुहेल के दोस्‍त ने उसको दी। वह घर आकर बहुत चिल्‍लाया। तुमने मेरी समीना मुझ से छीन ली, वह भी इस योग्‍य थी, बांझ नहीं थी मैं तुम्‍हारे बाप की बातों में आ गया और उसको तलाक दे दी। उफ्‌ ये क्‍या हुआ। अब तो सुहेल की शराब ने सोचने-समझने की शक्‍ति भी छीन ली। वह मुझे अपशब्‍द भी कहने लगा। मुझे ओर मेरे बाप को बुरा-भला कहता। मैं सोचा करती मैं इससे तो कुँवारी भली थी। परंतु अपने दो फूल से बच्‍चों को देखकर आँसू पोंछ लिया करती। एक दिन मैंने गुस्‍से से उसको घर से बाहर निकाल दिया। वह सड़कों पर मारा-मारा फिरता, जाने रात कहाँ गुजारता। फिर पता चला कि शासन ने उसको ‘होमलेस' समझ कर फ्‍लेट दे दिया। वह अकसर नीचे चक्‍कर लगाता, पुकार-पुकारकर मुझे अपशब्‍द बकता। लोग खिड़कियों से सिर निकाल कर उसका तमाशा देखते। और फिर कहता तेरे बाप ने मुझ पर अत्‍याचार किया, तूने मुझसे समीना को छीन लिया और फिर फूट-फूट कर रोने लगता। मैं चिंतित हो जाती, परंतु बच्‍चे मुझे रोक देते कि यह शराबी हैं, आप को मार देंगे निकट मत जाइएगा। शराब ने उसका जिगर और लीवर बिल्‍कुल खराब कर दिया था। पता चला कि वह अस्‍पताल में पड़ा है। हम लोग साहस करके अस्‍पताल पहुँचे, वहाँ भी मुझे देखते ही उसने फल और फूल जो हम ले गऐ थे ज़मीन पर दे मारा। और कहा “तुमने मुझसे समीना को छीन लिया, और अब मैं अपने आपको तुमसे छीनता हूँ।” यह कहकर उसने वह गुलदान अपने सिर पर दे मारा। अचानक नर्सें दौड़ी आई नाक से खून बह रहा था और वह अंतिम साँस ले रहा था। धड़ाम से बिस्‍तर से गिरा प्राण-पखेरू उड़ गए।

मैं घर आई, मैंने सिजदे में पड़कर खुदा से प्रार्थना की “ये खुदा मुझे कठोर कारावास से छुटकारा मिला। अल्‍लाह मुझे साहस दे कि इन दो फूल से बच्‍चों को पाल सकूँ।” फिर उठकर दो फोन किए कि अब्‍बा जिस तरह मुझे बिदा करके आपने संतोष की सांस ली थी। आज सुहेल को संसार से विदा करके मुझे भी लगा जैसे मेरी बेटी की बारात गई है, और एक फोन समीना को किया। सुहैल की अंतिम सांसों पर तुम्‍हारा अधिकार है। वह वहाँ भी तुम्‍हारी प्रतीक्षा कर रहा होगा। वह केवल तुम्‍हारा था, तुम्‍हारा अपना, मेरा कभी नहीं हो सका। रहा तुम्‍हारा चैलेंज, तो वह जीत गया और तुम हार गई।

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बानो अरशद

नन्‍ही परी

हेड टीचर के कहने पर सरवत ने स्‍कूल के समस्‍त मुस्‍लिम बच्‍चों के लिए नमाज़ पढ़ने के स्‍थान की जिम्‍मेदारी स्‍वीकार कर ली थी। वैसे उसके स्‍कूल में मुस्‍लिम बच्‍चे आटे में नमक के बराबर थे। परंतु सरवत को अपनी इस्‍लामीं संस्‍कृति, भाषा और जीवन मूल्‍य की हिफ़ाज़त का एहसास था, यद्यपि वह स्‍वयं इतना अधिक इन पाबंदियों को पूरा न कर पाती मगर एक बार जब से वह अपने मुल्‍क से बाहर आई थी एक बात का बहुत ध्‍यान रखती कि वह यहाँ अपने देश की प्रतिनिधि है और अँग्रेजी समाज हर रूप में उसको एक इस्‍लामी एवं पाकिस्‍तानी नागरिक मानता है और उसके प्रत्‍येक कदम पर उस को उसी दृष्‍टि से देखेगा, जैसे चावल दम होने पर एक दाना देखकर राय का़यम की जाती है कि चावल गल गये। न्‍याय-अन्‍याय का उसको बहुत ध्‍यान रहता था। इसीलिए स्‍कूल में अपने परिधान (लिबास), अपनी प्रतिष्‍ठा के कारण बहुत सम्‍मान से देखी जाती । भोजन के समय स्‍कूल के कुछ विद्यार्थी उसके पास भेज दिये जाते जो नमाज़ के पाबंद हुआ करते थे। उन बच्‍चों को वह उस कमरे में भेज दिया करती थी जो उसने स्‍कूल से बहुत प्रयास के बाद उन शिष्‍यों के लिए हासिल किया था। कभी-कभी सरवत भी बल्‍कि रमजान के ज़माने में जाकर उन बच्‍चों के साथ फर्ज़ नमाज़ अदा कर लेती वहीं पर एक सांवली सी लड़की बहुत ही प्रभावित करती, उसके चेहरे की बनावट भी कोई खास तीखे न थे। नमकीन चेहरा लेकिन मोनालिज़ा सा चेहरा पवित्रता से भरपूर और अधखुले होठों पर मुस्‍कान बिखरा रहता। उस खामोश पसंद लड़की पर सरवत की नजर प्रायः पड़ा करती। चूँकि सरवत उसे पढ़ाती नहीं थी तो सरवत उसको ज्‍यादा जानती भी नहीं थी। मगर उसका चंबेली सा बदन सरवत पर एक प्रभाव छोड़ गया था।

सरवत चूँकि स्‍कूल में अत्‍यधिक प्रसिद्ध थी जिसका कारण यह था कि वह बाहर से आए हुए बच्‍चों की समस्‍याओं को हल करने में बहुत रूचि लिया करती। एक प्रकार से वह कॉउन्‍सलिंग भी करती। दो-तीन भाषाओं को जानने के कारण उसकी अहमियत स्‍कूल के विद्यार्थियों में कम न थीं।

एक दिन उस लड़की अर्थात्‌ जिस को सरवत मोनालिज़ा के नाम से पुकारती यानी स्‍टाफरूम में अपने स्‍वभाव के कारण वह नाम रख लिया करती थी, वास्‍तव में उस लड़की का नाम तान्‍या था। तान्‍या की क्‍लास टीचर ने कहा सरवत मेरी क्‍लास में तान्‍या जो है बल्‍कि जिस को तुम मोनालीज़ा कहती हो उसके सिलसिले में काफी चिंतित हूँ क्‍या तुम उससे बात कर सकती हो? कभी-कभी वह बहुत दुखी हो जाती है। उसके साथ में वह जो पूनम बैठती है न, वह उसकी गहरी दोस्‍त है। आज उसने बताया कि वह बहुत ही कठोर दुखों से पीड़ित है। सरवत ने कहा कि समय मिलते ही मैं पता लगाऊँगी कि समस्‍या क्‍या है? दूसरे दिन सरवत ने जाकर उस लड़की को क्‍लास से बुलाकर बात की और कहा कि शायद तुम अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्‍यान नहीं दे पा रही हो और होमवर्क भी पूरा नहीं करती हो। मैं तुम्‍हारी सहायता स्‍कूल के बाद कर दिया करूँगी। विशेष रूप से अँग्रेजी में और विज्ञान में, क्‍या विचार है। उसकी मोनालीज़ा वाली उदास मुस्‍कान लौट आई आँखों में चमक आ गई। अरे हाँ मिस मैं तो स्‍वयं आपसे पूछने वाली थी। अब तान्‍या से सरवत धीरे-धीरे निःसंकोच होने लगी। एक दिन सरवत स्‍कूल के बाद उसको अपने कमरे में ले गई, वहाँ मेज पर सरवत के बच्‍चों की तस्‍वीरें मेज पर एक फ्रेम में लगी रखी थी। तान्‍या ने कहा कि मिस ये कौन हैं? “.... ये मेरे बच्‍चे हैं” ये लड़की उसने मेरी बेटी के चेहरे पर हाथ रखकर पूछा, ये कौन है? यह मेरी बेटी है, बस एक ही बेटी है और दो बेटे हैं। “ये तो बिल्‍कुल आपकी शक्‍ल है। आप ऐसी ही होंगी जब इसके बराबर होंगी।” हाँ तान्‍या सामान्‍य रूप से लड़कियाँ अपनी माँ की शक्‍ल की होती हैं। बड़े होकर वह बहुत मिलने लगती हैं चूँकि वह माँ के शरीर का अंश होती है न।

“सच” उसने आश्‍चर्य से पूछा।

अरे तुम साइंस तो पढ़ती हो न। बच्‍चे में माँ-बाप का रूप होता है। सरवत ने लापरवाही से जवाब दिया।

“और, आवाज़....?” उसने बेचैन होकर पूछा।

“आवाज़, आवाज़ तो बहुत मिलती है। विशेष रूप से टेलिफोन पर बिल्‍कुल धोका हो जाता है सब को। जो भी मुझे फोन करता है “हाय अल्‍लाह” उसके मुँह से सहसा निकला। “मेरी ही क्‍या, मेरी तमाम सहेलियों की बेटियों की आवाज़ इसी तरह भ्रम पैदा करती है।” सरवत ने जवाब दिया।

“मिस एक बात और बताइये क्‍या मैं भी अपनी माँ जैसी निकलुंगी। मेरी आवाज़ और मेरा रूप भी वैसा ही होगा” उसने गंभीर भावनाओं के स्‍वर में डूब कर पूछा।

“हाँ भई होना तो चाहिए लेकिन आवश्‍यक नहीं” सरवत ने उत्‍तर दिया।

“मैं अपने पापा की शक्‍ल बिल्‍कुल नहीं हूँ” उसने कहा।

“तुम को कैसे मालूम?” सरवत ने कहा।

“इसलिए कि आईना जो रोज़ देखती हूँ ” वह मुस्‍कुराई तुम्‍हारी अम्‍मी जैसी शक्‍ल होगी फिर।

वह बोली - “मुझे क्‍या पता जब ही तो आप से पूछ रही हूँ।”

“तो तुम्‍हारी अम्‍मी कहाँ हैं?” सरवत ने जानने की इच्‍छा ने अँगड़ाई ली।

“वह..... तो ..... चलिए छोड़िए।”

“नहीं बताओ”

“वह तो बेल्‍जियम में है।”

“तुम किसके साथ रहती हो?”

मैं अपने पापा के साथ।

“और...?”

“पापा की बीवी-बच्‍चों के साथ रहती हूँ।”

“तुम्‍हारी सौतेली माँ?”

“जी”

“वह कैसी हैं तुम्‍हारे साथ?”

“आप ये बात किसी को बताइएगा नहीं।”

“नहीं मैं किसी को नहीं बताऊँगी तुम्‍हारी निजी बात है।”

आप बहुत अच्‍छी है अपने बच्‍चों के साथ रहती हैं उसने सरवत के दुखती रग पर उंगली रख दी।

“मैं तुम्‍हारी बात कर रही हूँ।”

आप को एक बात बताऊँ? ये सब लोग बहुत खराब हैं उसने नज़रें झुका कर बहुत धीमे स्‍वर में कहा। क्‍यों? सरवत को तान्‍या की समस्‍याओं का सिरा मिलना प्रारम्‍भ हुआ।

“वह लोग मुझे पसंद नहीं करते। उसने बुझे हुए अंदाज में उत्‍तर दिया। आप को देखकर मन चाहता है कि काश! आप मेरे पापा से विवाह कर लेतीं।”

उसकी पलकों पर आँसू चमक रहे थे।

“अरे कैसी बातें करती हो” सरवत हक्‍का-बक्‍का रह गई उसके भोले भाले अंदाज पर।

“अच्‍छा मैं चलती हूँ।” सरवत ने लज्‍जाते हुए काह।

“मेरी भी क्‍लास है आप नाराज़ तो नहीं हो गईं।” वह बोली नहीं चलो तुम्‍हारी भी क्‍लास है मेरी भी। सरवत ने कमरे की चाभी उठाते हुए कहा।

फिर तान्‍या अकसर सरवत से मदद लेने आ जाया करती। एक दिन तान्‍या और पूनम सरवत के कमरे में आई। पूनम ने सरवत को एक नोट दिया जो उसकी टीचर ने भेजा था, उसमें लिखा था, उसके शरीर पर नील के चिह्‍न है। वैसे भी उस दिन के बाद से सरवत सावधान भी हो गई थी लेकिन लगातार इस बारे में सोच रही थी।

“हाँ तान्‍या आओ” सरवत ने कहा।

“पूनम तुम अपनी क्‍लास में जाओ।”

“आज पापा ने मुझे पाइप से मारा है बहुत। मुझ से चाय की प्‍याली टूट गई।”

“इतनी सी बात पर”

“रात को मैं होमवर्क कर रही थी तो चूल्‍हे पर हंडिया रखी थी। वह जल गई और घर में धुआँ भर गया। अम्‍मी ने रात को उनसे शिकायत कर दी तो सुबह को मुझे डर लग रहा था। पापा ने आवाज़ दी, मैं चाय पी रही थी, मेरे हाथ से प्‍याली गिर गई, हमारे रसोईघर के फर्श पर टाइल्‍स लगे हैं जो भी चीज़ गिरती है, टूट जाती है। बस मेरा दुर्भाग्‍य आ जाता है। अम्‍मी रात को पापा से शिकायत कर देती है।”

“फिर अक्‍सर तुम को मार पड़ती है।”

“कभी भैया शिकायत कर देता है, कभी रफिया”

“तुम को पता है इस देश में मारना-पीटना अपराध है।”

“खुदारा मिस किसी को न बताइएगा। यदि स्‍कूल में रफिया को पता चल गया तो वह घर में बताएगी और मुझे इससे भी ज़्‍यादा मार पड़ेगी।”

“अरे वह रफिया जो बहुत बदतमीज़ लड़की है?”

“जी-जी” उसने हकलाते हुए कहा।

“नहीं यह रहस्‍य की बात है परंतु स्‍कूल के उन सारे लोगों को बताना है जिनका इस बात को जानना आवश्‍यक है।”

“क्‍यों?”

“इसलिए कि यहाँ का कानून है कि शारीरिक दण्‍ड बच्‍चों को माँ-बाप या गुरू नही दे सकते,” कठोर कानून है।

“फिर क्‍या होगा अब?”

आओ तुमको तुम्‍हारी टीचर के पास ले चलूँ।

सोशल वर्कर-हेड टीचर ऑफ डिपार्टमेंट स्‍कूल की मिशनरी सक्रिय हो गई।

तान्‍या के माँ-बाप को वार्निंग दे दी गई।

अब उसको शारीरिक चोट तो नहीं लगाई जाती परंतु तानों के, बुरी-भली बातों के ढेर लगते चले गए। वह कभी-कभार आकर सरवत को बता दिया करती।

वास्‍तव में उसका चेहरा जब भी उदास होता सरवत समझ जाती कि अवश्‍य ही घर में कोई कार्यवाही उसके विरूद्ध हुई है, और वह उसको बुलाकर कॉउन्‍सलिंग करती। एक दिन सरवत के दरवाजे पर दस्‍तक हुई।

“अन्‍दर आ जाओ!”

दरवाजा़ खुला। अन्‍दर आने वाली तान्‍या थी उसके मुख पर विश्‍वास का भाव बिखरा हुआ था जो बहुत गज़ब का था बल्‍कि आश्‍चर्य चकित कर देने वाली सीमा तक। “गुड मार्निंग मिस।” आप से एक बात करना है, समय है।

“हां-हां आओ कापियाँ देख रही थी।” उसने कापियाँ समेटते हुए कहा।

“आप एकदिन क़ानून की बात कर रही थीं। मैं उस घर से जाना चाहती हूँ। क्‍या आप मुझे एडोप्‍ट कर लेंगी?”

“हें - ये क्‍या कर रही हो!”

“जी मिस मैं आपके घर का सारा काम कर दिया करूँगी जैसे लोग इस्‍पेअर रख लेते हैं न वैसे ही रख लीजिए” तान्‍या ने हठ किया।

“ये मुमकिन नहीं भई।”

मैं तो खाना भी कम खाती हूँ।

आपका फोन भी इस्‍तेमाल नहीं करूंगी। शावर लेती हूँ रोज़ प्रातःकाल नाश्‍ता में केवल एक कप चाय की प्‍याली।

अरे ये नहीं हो सकता।

मैं फिर सेटर-डे जॉब भी कर लूँगी तो बिलों मैं अपना हिस्‍सा दे दूँगी।

“मेरे पास जगह नहीं है।” मैंने जवाब दिया।

जी मैं अब वहाँ नहीं रह सकती। उसकी आँखों में आँसू झिलमिला रहे थे।

“क्‍यों?”

मेरी सौतेली माँ अपने भाई से मेरा ब्‍याह कराना चाहती है। वह इस देश से बाहर पाकिस्‍तान में है, बस उसको बुलाना चाहती है।

“तुम घर से भागना नहीं” सरवत ने स्‍नेहपूर्वक हाथ रखा।

“मैं ओर एक बात बताऊँ यदि आप किसी से न कहें” उसने रहस्‍यमय ढंग से कहा।

“नहीं कहूंगी बताओ क्‍या बात है?”

रात को भैया ने दराज़ खोली, इसमे उसको Valentine Card मिल गया। उसने तुरंत पापा को दिया तो फिर बस पापा ने कहा अब तुम इसके बाद नहीं पढ़ोगी क्‍योंकि अब तुम सोलह वर्ष की हो गई हो पढ़ाई खत्‍म, और चुपके से वह लोग मुझे झेलम ले जा रहे हैं यानी तैयारी कर रहे हैं, क्‍योंकि मैं ब्रिटिश नेशनल हूँ न।

“उफ्‌ खुदाया” सरवत के मुँह से सहसा निकला। “मैं घर से भागना नहीं चाहती हूँ क्‍योंकि यहाँ पर हमारे समाज की बहुत बदनामी होती है कि पाकिस्‍तानी लड़कियाँ घर से भाग जाती हैं।”

“अब क्‍या करोगी मैं तुम को सलाह नहीं दे सकती” सरवत ने जान छुड़ाना चाही।

“फिर”

“बस अब तुम बड़ी हो गई हो स्‍वयं अच्‍छे बुरे का निर्णय ले सकती हो।” मेरे पास तो अम्‍मी का पता भी नहीं है, वह कभी उपहार भेजती हैं परंतु पापा मुझे उनका पता नहीं देते। एक दिन उन्‍होंने केवल खत दिखाया था, जिसमें लिखा था कि शुक्रिया आप इसका ध्‍यान रखते हैं.... बस। अच्‍छा सुनो पढ़ाई पर ध्‍यान दो, ऐसा नहीं होगा कि वह तुम को ज़बरदस्‍ती ले जाएँ तुम स्‍वयं बहुत बुद्धिमान हो।”

वह मुँह लटका कर चली गई। सरवत ने सारी रिर्पोट लिख कर उसके फाइल में नत्‍थी कर दी।

सरवत रजिस्‍टर लेकर कार्यालय में प्रवेश कर रही थी तो क्‍लर्क ने उसको लिफाफा दिया कि यह हेड टीचर ने आप को आपके Comment के लिए भेजा है। उसे खोला तो वह किसी लड़के की तरफ से तान्‍या के नाम था उस पर लिखा था-

“तान्‍या चिंता मत करो, अब तुम सोलह वर्ष की हो चुकी हो, हम को अब कोई जुदा नहीं कर सकता है। हम सिविल मैरिज कर लेंगे और यह पवित्र आत्‍मा हमारे प्रेम की साक्षी होगी।”

तुम्‍हारा अपना

जावेद

उस पर दो दिल बने थे और क्‍यूपेड का तीर जो एक नन्‍हें बच्‍चे की शक्‍ल में उस पर भोलेपन के साथ थामे हुए था। सरवत के हाथ में कार्ड और उसके चेहरे पर “न निगलते बनता, न उगलते बनता” के हाव-भाव प्रश्‍नवाचक चिह्‍न की तरह बिखर गए। नन्‍हीं परी के मुख पर मोनालीज़ा की मुस्‍कान चकनाचूर होकर रह गई।

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बिछड़ती धूप

पल-पल गुज़रती ठंडी रात सुबह की ओर सफर कर रही है सर्दी की तीव्रता इतनी ज़्यादा है कि खिड़की से हाथ निकालने पर हाथ शरीर से अलग होने का एहसास दिलाता है। हल्का-हल्का हिमपात भी हो रहा है। मैं अपने टैरिस हाउस की लाइब्रेरी में बैठा देखने में कोई किताब पढ़ रहा हूँ लेकिन मेरे कान घर के दरवाज़े पर लगे हुए हैं और वह इस इंतज़ार में हैं कि कब चाबी घूमने की आवाज़ सुनाई दे, दरवाज़ा खुले और सिम्मी प्रवेश करे। फिर वह सावधानी से नपे-तुले कदम उठाती हुई काठ की सीढ़ी तय करके पहली मंज़िल पर पहुँच जाएगी और दायें हाथ घूम कर अपने कमरे में दाख़िल हो जाएगी। उस समय वह अनजाना डर, जो हरदम सीने पर कुंडली मारे बैठा रहता है, एकाएक दूर हो जाएगा और मैं लाइब्रेरी के सोफे पर पसर कर नींद की गोद में चला जाऊँगा। लगभग हर वीकऐंड पर सिम्मी का फ्रेंड्स के साथ, जिनमें ज़्यादातर इंग्लिश लड़के-लड़कियाँ हैं, कोई न कोई प्रोग्राम अवश्य रहता है। कभी डिस्को, कभी म्यूज़िकल नाइट, कभी बर्थडे पार्टी, कभी ड्रिंक पार्टी, कभी लिट्रेरी सेशन, कभी लेट नाइट फिल्म शो और कभी लांग ड्राइव- और मुझे ज़बरदस्ती उसका इंतज़ार करना पड़ता है। ज्यों-ज्यों रात आगे बढ़ती है त्यों-त्यों मेरा डर भी बढ़ता जाता है कई बार तो यूँ भी लगता है कि मैं डर के हाथों अपनी सूझ-बूझ भी खो बैठूँगा और लाइब्रेरी में ही मेरे प्राणपखेरू उड़ जाएँगे और अगले दिन लोगों को पता चलेगा कि मैं दुनिया से चल बसा हूँ।

सिम्मी से मेरा संबंध ठीक एक साल बाद पैदा हुआ था जब मैं अंग्रेज़ों की धरती पर दाना-पानी की तलाश में चला आया था। यूँ तो मैं अपने देश में रोज़गार में लगा हुआ था। सुखी था। शिक्षित होने के नाते इतनी आमदनी अवश्य थी, किसी के आगे हाथ फैलाना नहीं पड़ता था। पर बेहतर ज़िन्दगी की इच्छाएँ, दुनिया भर की सुविधाएँ, दौलत की रेल-पेल और भविष्य की सुरक्षा मुझे यहाँ खींच लाई थी। इस बात को बीते हुए लगभग बीस वर्ष हो चुके हैं, हज़ार मिन्नतें मान कर मैंने सिम्मी को पाया है। उसकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को अपनी इच्छा समझ कर पूरा किया है यहाँ तक कि कई बार मुझे अपनी सीमा से बाहर जाना पड़ा है। सिम्मी को इन तमाम बातों का एहसास है, वह यह भी जानती है कि मैं आत्मिक रूप से उससे जुड़ा हुआ हूँ और वह मेरी हर साँस में शामिल है।

हर वीकऐंड पर मुझे वह दिन प्रायः याद आता है जब सिम्मी ने पहली बार अपने फ्रेंड्स के साथ प्रोग्राम बनाया था तो उसने मुझसे उसमें भाग लेने की आज्ञा चाही थी। मैं लाउंज में बैठा टी.वी. पर Dallas देख रहा था। करीब ही राकेश बैठा हुआ था, वह भी प्रोग्राम में बढ़-बढ़ कर दिलचस्पी ले रहा था। गर्मियों में सुहाने दिन थे, शाम ढल चुकी थी और मिटता हुआ उजाला अंधेरे में आत्मसात हो रहा था। बाहर सिम्मी की बेस्ट फ्रेंड जोन्स कार में बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी। मैं सिम्मी की बात सुनी-अनसुनी करके प्रोग्राम में खोया रहा पर जब उसने निर्णायक अन्दाज़ में अपनी बात को दोहराया तो मेरे बदन में हज़ार वोल्ट की विद्युत तरंग दौड़ गई थी और जब मैं सँभला था तो वह साक्षात् एक प्रश्न बनी मेरे सामने खड़ी थी जिसका जवाब मेरे पास नहीं था। मैंने जानबूझ कर इधर-उधर की बातें छेड़ कर उसे टालना चाहा था लेकिन उसने आत्म-विश्वास के साथ कहा था- "मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ-मैं कोई ऐसा कदम नहीं उठाऊँगी जिससे आपको सदमा पहुँचे।" विवश होकर मुझे अपनी ज़बान खोलनी पड़ गई थी-

"यूँ तो मुझे तुम पर पूरा भरोसा है- हर बात का बुरा- भला मुझसे बेहतर समझती हो-पर मुझे यहाँ के वातावरण से बड़ा डर लगता है।"

इस पर सिम्मी ने खुल कर ठहाका लगाया और मेरे गले में बांहें डाल कर कहा था, "Oh, Dad आप बिल्कुल ईस्ट्रन हैं, यहाँ इतने साल रहकर भी आपकी सोच नहीं बदली।"

"मैं मजबूर हूँ- मैं जानता हूँ तुम्हारे सोचने का ढंग मुझसे अलग है पर वातावरण किसी को नहीं बख़्शता। वह हर किसी पर अपना असर छोड़ता है। चाहे आदमी का चरित्र कितना की ऊँचा क्यों न हो। बहुत से तो खुली आँख रखते हुए भी गुमराह हो जाते हैं।"

"Listen Dad" उसने मेरी टाई की गाँठ ठीक करते हुए कहा था, "गुमराह वह होते हैं जो वातावरण से परिचित न हों। मैं इस सोसाइटी की ऊँच-नीच से खूब परिचित हूँ फिर फ्रेंड्स के साथ शाम गुज़ारना या उनके साथ घूमना-फिरना कोई बुरी बात तो नहीं?"

"तुम चाहो तो अपने फ्रेंड्स के साथ दिन में घूम-फिर सकती हो- कौन रोकता है तुम्हें?"

"इससे क्या फर्क पड़ेगा। जिसे ग़लत कदम उठाना है वह दिन के उजाले में भी उठा सकता है।"

"यूनिवर्सिटी में पढ़ कर तुम्हारे विचार काफी आज़ाद हो गए हैं।"

उसने मेरे लहज़े का व्यंग्य महसूस कर लिया था। उसके होंठों पर फीकी-सी मुस्कान उभर आई थी। बोली, "यूनिवर्सिटी में पढ़ कर मेरे विचार आज़ाद ज़रूर हुए हैं मगर ख़राब नहीं हुए, फिर एक जवान लड़की को Personal freedom न मिले तो उसे Suffocation होने लगती है।"

"ऊँह।" मैं एक लम्बी ऊँह कह कर ख़ामोश हो गया था, मुझे एहसास होने लगा था कि हमारी बातचीत उस ख़तरनाक मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ विद्रोह कुछ फासले पर सिर उठाए खड़ा होता है और आदमी उससे आलिंगित होकर विद्रोह पर आमादा हो बैठता है। मैं एक गहरा लंबा सांस भर कर रह गया था।

"मैं तुम्हें जाने से नहीं रोक सकता और न ही तुम पर कोई पाबन्दी लगा सकता हूँ, केवल इतना कह सकता हूँ कि तुम्हारे बाप की इज़्ज़त तुम्हारे हाथ में है।"

उसने मेरे गाल को चूमा और मेरी चिन्ता दूर करने के लिए कहा- " I Wont't be long, I will try to be early."

वह दरवाज़े की ओर बढ़ गई थी और मैं जड़ बना सोच रहा था कि वह उस कीचड़ में पाँव रखने जा रही है जो दूर से कीचड़ दिखाई देता है लेकिन वास्तव में वह दलदल है जहाँ एक बार पाँव रखने से वह अन्दर ही अन्दर धंसता चला जाता है और कोशिश के बावजूद बाहर निकल नहीं पाता। मेरी बीवी कृष्णा जो दरवाज़े पर खड़ी हमारी बातें ध्यानपूर्वक सुन रही थी, सिम्मी के जाते ही उसने घर सिर पर उठा लिया था। उसके चीख़ने-चिल्लाने से दीवारें काँप गई थीं और वह मुझे कसूरवार ठहरा कर कहे जा रही थी-

"तुमने सिम्मी को रोका क्यों नहीं... तुमने उसे जाने क्यों दिया... तुम खुली छुट्टी देकर उसे बर्बाद कर रहे हो... तुम्हें औलाद की ज़रा परवाह नहीं।"

मुझे भी ताव आ गया था पर मैंने खुद को संयम में रखा।

"तुम समझती क्यों नहीं, सिम्मी वयस्क है और स्वाधीन भी- हम उसे किस आधार पर रोक सकते हैं। हम उस पर अनावश्यक दबाव डालेंगे तो वह कोई भी उल्टा-सीधा कदम उठा सकती है और हम कानूनी तौर पर उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।" लेकिन मेरी बात का उस पर कोई असर न हुआ था बल्कि वह घायल शेरनी की तरह गरज उठी थी-

"क्या बात करते हैं? हमने उसे जन्म दिया है, यहाँ के कानून ने उसे जन्म नहीं दिया। वह हमसे पूछे बिना कहीं नहीं जा सकती।" राकेश अपनी माँ की बात सुन कर हँस पड़ा था, ताली बजा कर हँसते-हँसते बोला...

" Mum तुम बड़ी Innocent हो। मैं कई बार कह चुका हूँ यह इंडिया नहीं इंग्लैंड है इंग्लैंड, यहाँ सोलह वर्ष की उम्र में लड़की-लड़का Free हो जाते हैं, फिर वह अपनी मर्ज़ी से कहीं भी जा सकते हैं, कहीं भी रह सकते हैं।"

"तुम चुप रहो, तुम अभी सोलह वर्ष के नहीं हुए।" राकेश फिर हँसने लगा और हँस कर ही बोला-

"Mum केवल एक महीने की बात है। मैं भी सोलह वर्ष का हो जाऊँगा फिर आपको मेरी चिंता करने की ज़रूरत नहीं, मैं अपनी चिन्ता खुद ही करूँगा।"

"लो सुन लो।" कृष्णा ने राकेश की ओर इशारा किया फिर कठोर स्वर में मुझे से कहा- "लड़की तो हाथ से गई सो गई, यह भी निकलने की तैयारी कर रहा है। तुम्हारी आँखें तब खुलेंगी जब औलाद पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं रहेगा। तब दीवार से तुम अपना सिर फोड़ना। पाँच वर्ष पहले मेरी बात मान ली होती तो आज यह दिन देखना न पड़ता।"

मुझमें ज़्यादा सुनने की हिम्मत न थी। मैं तेज़ी से बाहर निकल गया था लेकिन कृष्णा की कड़वी-कसैली बातें मेरा पीछा करती रहीं जो कई दिनों तक मेरे कानों में गूंजती रहीं थीं और मेरी मानसिक शांति भंग कर चुकी थी।

मैं किताब का पन्ना पलट कर आगे पढ़ने की सोचता हूँ पर पिछले पन्ने पर जो कुछ मैंने पढ़ा है उसका एक शब्द भी मेरे ज़ेहन में मौजूद नहीं है। मैं पन्ने पर फैली हुई पंक्तियाँ अवश्य पढ़ रहा हूँ पर मेरा ज़ेहन आँखों का साथ नहीं दे रहा है बल्कि वह कहीं और ही खोया हुआ है। किताब को एक और रख कर मैं घड़ी पर नज़र डालता हूँ। छोटी सुई एक पर और बड़ी सुई तीन के अंक पर पहुँच चुकी है। सिम्मी के अतिरिक्त सर्दी भी मुझे परेशान कर रही है। हालांकि सेंट्रल हीटिंग अंतिम डिग्री पर चल रही है लेकिन नारवे से आई हुई हिमानी हवाओं ने सारा इंग्लैंड अपने निशाने पर ले रखा है। सांझ होते ही लोग घरों में दुबके बैठे हैं और इस क्षण बेख़बर सो रहे हैं, लेकिन मैं जाग रहा हूँ और अपनी जवान बेटी का इंतज़ार कर रहा हूँ जो हर शय से निस्पृह दोस्तों की संगति में कहकहे बिखेर रही होगी या खुद बेहतर जानती है किस हालत में होगी? मैं शैल्फ पर धरी हुई किताबों के पीछे से ब्रांडी की बोतल निकाल लेता हूँ और मुँह से लगा कर दो-तीन चुसकियां भरता हूँ। सामने मेज़ पर सिम्मी और राकेश की बचपन की तस्वीरें रखी हुई हैं। बच्चों के शगुफ़्ता चेहरों पर भोलापन, नेकी और शराफत फैली हुई है। वह इतने बेबाक, आज़ाद और एक क्यों हो जाते हैं? केवल यही नहीं, बल्कि दूसरों की नींद और मुस्कान भी ग़ायब कर देते हैं। पिछले कई महीनों से मैं और कृष्णा ज़रा भी नहीं मुस्कराए, बल्कि भूल ही गए कि मुस्कान किस चीज़ का नाम होता है। बुझे-बुझे चेहरों से एक दूजे को देख कर महसूस करते हैं कि अजनबी धरती की बू-बास हमारे बच्चों को भी अजनबी बनाए जा रही है और वह धीरे-धीरे हमसे दूर हुए जा रहे हैं। मैं भारी मन के साथ कुरसी पर आकर बैठ जाता हूँ और बैक पर सिर टेक कर आँखें मूंद लेता हूँ। ज़ेहन के पर्दे पर कुछ परछाइयाँ उभरती हैं जो एक-दूसरे में लीन होने लगती हैं। पाँच साल पहले की वह रात मुझे याद आने लगती है और धीरे-धीरे उसकी रेखाएँ स्पष्ट होने लगती हैं। मैं हड़बड़ाकर आँखें खोल देता हूँ जैसे Nightmare से जाग उठा हूँ। मैं और कृष्णा बेड-रूम में सोने की तैयारी कर रहे थे। बच्चों के इम्तिहान सिर पर थे और वे अपने-अपने कमरों में किताबें खोले पढ़ रहे थे। वह उम्र की उस सीमा में दाख़िल हो चुके थे जब विवेक तेज़ी से जागरूक होने लगता है और बच्चे बुरे-भले की पहचान करने लगते है। यूँ भी यहाँ के वातावरण, मीडिया और शिक्षा ने उनकी बु(ि के कई कोने रोशन कर रखे थे। उनकी हर बात में तर्क आगे-आगे हुआ करता था। कृष्ण ने अप्रत्याशित रूप से मुझसे दो-तीन प्रश्न ऐसे पूछे थे कि मैं धड़ाम से सिर के बल आ गिरा था। उसने गंभीरता से कहा था-

"मैंने जब तुमसे शादी की थी तो तुम्हें देखा तक न था। जहाँ मेरे बाप ने रिश्ता तय किया था, मैंने फर्ज़ समझ कर कबूल कर लिया था- लेकिन क्या तुम सिम्मी से इस बात की आशा कर सकते हो?"

मैं कुछ बौखला गया था पर कुछ सोच कर बोला था-

"ज़माना बदल गया है कृष्णा। सिम्मी अभी बहुत छोटी है। बड़ी होगी तो देखेंगे उसका इरादा क्या है, पर इसमें सन्देह नहीं कि उसका इरादा जानना बहुत ज़रूरी है।"

"मैं मानती हूँ लेकिन जिस ढंग से हमारे बच्चे यहाँ के बच्चों से घुल-मिल रहे हैं और उनकी सोच भी अंग्रेज़ बच्चों की तरह ढलती जा रही है- वह कुछ वर्ष और यहाँ रह गए तो केवल शक्ल से ही हिन्दुस्तानी लगेंगे वरना वह ऊपर से नीचे तक अंग्रेज़ होंगे।"

"यह तुम कैसे कह सकती हो?"

"मैं अपने बच्चों को तुमसे बेहतर समझती हूँ, ज़्यादा वक़्त उनके साथ रहती हूँ- उनकी बोल-चाल, सोच-समझ, खाना-पीना, पहनावा और रुचियों से ज़रा भी पता नहीं चलता कि वह हिन्दुस्तानी बच्चे हैं।"

"आख़िर तुम कहना क्या चाहती हो?"

"मैं। बच्चों की माँ हूँ। मुझे डर लग रहा है- उनके जवान होने पर मैं उन्हें खो बैठूँगी, यही समय है कि हम हमेशा के लिए इंडिया लौट जाएँ।"

"इंडिया...?" मैं लगभग चीख़ उठा था।

"हाँ, इसी में हमारी भलाई है। ज़रा सोचो तो, कुछ वर्ष बाद अगर सिम्मी कोई अंग्रेज़ लड़का लेकर घर पर चली आए और उसे हमारे सामने खड़ा करके बोले कि मैं उससे शादी करना चाहती हूँ तो तुम्हारी क्या हालत होगी...? तुम पर क्या बीतेगी?"

मैं चकित कृष्णा को देखता जा रहा था।

"और भगवान न करे, अगर यही हरकत राकेश कर बैठा तो क्या तुम अंग्रेज़ दामाद और अंग्रेज बहू को दिल से स्वीकार कर सकोगे?"

मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन सरक गई थी। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि मेरी पत्नी, जिसकी शिक्षा बस नाममात्र की थी, वह अपने बच्चों के बारे में यूँ चिंतित हो सकती है। आने वाले ख़तरों को इतने करीब से महसूस कर सकती है और मैं, जिसने कई डिग्रियाँ हासिल कर रखी थीं, हज़ारों किताबें चाट रखी थीं, कभी अपनी संतान के बारे में यह न सोच पाया था कि उन पर यहाँ का सांस्कृतिक रंग किस हद तक चढ़ता जा रहा है। उनके पाँव पराई धरती में कहाँ तक धँसते जा रहे हैं और वह भविष्य में कौन-सी डगर चुन सकते हैं। मुझे पर तो दिन-रात पौंड कमाने और जोड़ने की धुन सवार थी। मैं तो आँखें पर पट्टी बाँध जायदाद बनाने के चक्कर में था। दोनों हाथों से सिर थाम कर मैं कृष्णा के पहलू में बैठ गया और सोचने लगा कि अगर बच्चों ने जवान होकर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक कदम उठाया और अपनी जाति के बाहर किसी से नाता जोड़ लिया तो मेरी ज़िन्दगी की हर खुशी नष्ट हो जाएगी, जीने का आनन्द जाता रहेगा और मैं कहीं का न रहूँगा। दूसरे ही क्षण कृष्णा का हाथ मेरे कंधे पर था। मैंने पलट कर देखा तो उसका परेशान चेहरा भी हज़ार चिंताओं में डूबा हुआ था। मैं अनायास उससे लिपट गया था।

मैं कई वर्षों के बाद इंडिया लौट आया था। हालात काफी बदल चुके थे, लोगों के सोचने का ढंग भी बदल गया था। वह काफी पश्चिम-ग्रस्त हो चुके थे। मैं बेपनाह खुश था कि मेरा देश आत्म-निर्भर हो चुका था और वह सुई से लेकर हवाई जहाज तक बना रहा है पर दूसरी ओर बढ़ती हुई आबादी, बेरोज़गारी, दिखावा, ग़रीबी और महँगाई देख कर मेरा ज़ेहन सँभल नहीं पा रहा था। मुझे ग़रीबी कुछ ज़्यादा ही दिखाई दे रही थी। शायद इसकी वजह यह थी कि मैं एक अमीर मुल्क से आया था, रात के समय फुटपाथ अनगिनत लोगों से भरे रहते थे, गगनचुंबी इमारतों के नीचे झोंपड़ियाँ थीं, साफ-सुथरे इलाकों में भी गन्दगी देखने को मिल जाती थी। भीड़ का यह आलम था कि सड़कों पर चलना बहुत कठिन था। हर मोड़ पर हर उम्र का भिखारी, गन्दगी और फटे-पुराने लिबास प्रायः दिखाई देते थे। यह सब देख कर मेरा भाग जाने को जी चाहता था। एक ही ख़याल मुझे परेशान किया करता था कि मेरे बच्चे इस वातावरण को देख कर क्या सोचेंगे? वह क्योंकर इस वातावरण को स्वीकार करेंगे? उन्हें तो हर कदम पर घुटन महसूस होगी फिर यहाँ के सामाजिक मूल्य भी उनके लिए अपरिचित साबित होंगे, मौसम उन्हें अलग परेशान करेगा। अब तो मुझसे भी यह गर्मी सहन नहीं होती। उनका तो बदन झुलस कर रह जाएगा फिर महँगाई इतनी बढ़ चुकी है कि ज़िन्दगी के मापदण्ड जो हमने वहाँ स्थापित कर रखे हैं उनसे उतर कर यहाँ बसर करना मुश्किल होगा। मैं और कृष्णा तो ख़ैर इस वातावरण की पैदावार हैं, किसी न किसी रूप से कबूल कर ही लेंगे लेकिन बच्चों का क्या बनेगा? उनमें तो खरे-खोटे का विवेक जागरूक हो चुका है, वह चंद दिन भी यहाँ रह गए तो अवश्य उनकी हालत उन परिन्दों की तरह होगी जिनके पंख उड़ान से पहले ही काट दिए जाते हैं।

अचानक दूर से किसी कार के आने की आवाज़ आती है। धीरे-धीरे कार की रफ्तार कम होती जाती है और वह मेरे घर के बाहर आकर रुक जाती है। मेरे विचारों का सिलसिला टूट गया है। दो बज कर बीस मिनट हो चुके हैं। मैं समझ जाता हूँ सिम्मी आ गई है। मैं लपक कर खिड़की से पर्दा सरकाता हूँ। काँच पर फैली हुई धुंध के कारण कुछ दिखाई नहीं देता। मैं हाथ से धुंध साफ करके नीचे देखता हूँ। बाहर गाढ़ा अंधेरा फैला हुआ है। वह कार जो सड़क पर खड़ी है न तो सिम्मी की है और न ही जोन्स की। वह एक ही झटके से स्टार्ट होकर आगे बढ़ जाती है। सारा इलाका मकबरे की तरह ख़ामोश है। दूर-दूर तक मानव की छाया नज़र नहीं आती केवल आकाश से गिरती हुई बर्फ दिखाई देती है। मेरी निराशा चरम सीमा को छू गई है। मैं कुर्सी पर आकर ढेर हो जाता हूँ और एक लंबी सांस भर कर बाहर को छोड़ता हूँ। नींद से बोझिल आँखें बंद करके सोचता हूँ कि औलाद का इंतज़ार करना पीड़ादायक होता है। जाने यह इंतज़ार कब, कैसे और कहाँ जाकर समाप्त होगा हालांकि कई बार मेरा दिमाग़ मुझसे कह चुका है कि मैं नाहक सिम्मी का इंतज़ार करना रहता हूँ। वह अपने आप बुद्धिमान है, ज़िम्मेदार है, अपनी देखभाल अच्छी तरह से कर सकती है, वह विकसित देश की पैदावार है। आज़ाद वातावरण की पाली-पोसी हुई है जहाँ संतान और माता-पिता का रिश्ता परिन्दों की जीवन-शैली से मिलता-जुलता है। नई उम्र का परिन्दा जब उड़ने के लिए पर फड़फड़ाता है तो उसका जन्मदाता अपने संरक्षण में उसे आकाश की खुली फिजाओं में ले जाता है। अपने बच्चे को उड़ता देख कर जब उसे विश्वास हो जाता है कि वह अपना दाना-पानी खुद तलाश कर सकता है तो वह चुपके से अपने बच्चे को अकेला छोड़ कर अलग हो जाता है लेकिन मैं अपने दिल के हाथों मजबूर हूँ। वह अजीब ढंग से बना है। वह सिम्मी के घर लौटने पर ही शांत होता है, वह डर से घिरा रहता है। सिम्मी का दो-ढाई बजे लौटना नित्य-नियम बन चुका है। शुरू-शुरू में वह जल्द लौट आया करती थी लेकिन धीरे-धीरे समय की कल्पना उसके ज़ेहन से मिटती जा रही है। वह खुद ही समय की मालिक बन बैठी है। मुझे सन्देह गुज़रता है कि उसके देर से आने में जोन्स का पूरा हाथ है जिसका व्यक्तित्व सिम्मी की सोच पर काफी भारी है। मुझे जोन्स से बड़ा डर लगता है, वह बला की ज़हीन, तेज़ और जंगजू है। उसके क्रांतिकारी विचार इतने ख़तरनाक हैं कि उसकी हर बात से वैयक्तिकता टपकती है। वह खुद पर किसी प्रकार का दबाव सहन नहीं कर सकती और हर समय सारे ज़माने से लड़ने के लिए तैयार रहती है। मुझे धड़का लगा रहता है कि सिम्मी उससे प्रभावित होकर उसकी राह पर न चल निकले। अचानक वह धुंधली शाम कहीं से उभर कर मेरी आँखों के सामने फैल गई है कुछ समय पहले की बात है- मैं आरामकुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था, जोन्स का टेलीफोन आया था, वह सिम्मी को बता रही थी कि उसने अपने Parent से अलेहदगी इख़्तियार कर ली है और रहने के लिए उसने स्टूडियो फ़्लैट किराए पर ले लिया है। सिम्मी मारे खुशी के दीवानी हो गई थी। उसके पाँव ज़मीन पर नहीं टिक रहे थे। वह जोन्स को मुबारकबाद देते हुए कह रही थी- "कितनी खुशकिस्मत हो तुम- अब तुम अकेली रहोगी। बिल्कुल Free bird, कोई कर्फ़्यू तुम पर नहीं होगा, जिस तरह से चाहोगी दुनिया को परखोगी, समझोगी और सच पूछो तो दुनिया की असल समझ तभी आती है जब आदमी हर पाबन्दी से आज़ाद अपनी ज़िन्दगी खुद जीता है और वह किसी पर Depend नहीं होता।"

मैं डर के मारे सिमट गया था। अख़बार मेरे हाथों से छूटते-छूटते रह गया था। ठीक वही डर मेरे मन में बैठ गया था जिसकी कल्पना से ही मैं काँप उठता हूँ। मुझे विश्वास हो चला था कि बहुत जल्द इसी प्रकार का ड्रामा मेरे घर में खेला जाएगा। मैं लाख दलीलें पेश करूँगा, लाख भावनात्मक युक्तियाँ दूँगा लेकिन अवश्य सिम्मी के आगे बाज़ी हार जाऊँगा।

मैं ख़ासा सावधान हो गया था, कई बार मैंने चालाकी से काम लेकर सिम्मी को जोन्स से अलग करना चाहा था लेकिन वह जोन्स को बहुत ज़्यादा पसन्द करती थी। हर सिलसिले में उससे मशवरा लेना ज़रूरी समझती थी बल्कि मुझसे कहा करती थी- "आप जोन्स को बिल्कुल Understand नहीं करते। She got a golden heart. वह बिल्कुल Possessive नहीं है और न ही किसी को अपनी राह पर चलने के लिए मजबूर करती है। हमारी दरमियान बड़ी Deep understanding है। लेकिन मैं सिम्मी की बातों से संतुष्ट नहीं हुआ करता था बल्कि मेरी कोशिशें जारी थीं कि अगर मैं उन्हें अलग नहीं कर सकता तो इतना फासला ज़रूर पैदा कर दूँ कि वह एक-दूसरे से रूठ जाएँ ताकि उनके बीच कुछ रंजिश, कुछ खिंचाव, कुछ मतभेद उभर आएँ लेकिन मैं अपने मकसद में सफल नहीं हो पा रहा था।

मैं मेज़ की दराज़ से सिगरेट का पैकिट निकालता हूँ। यूँ तो मैं सिगरेट पीने का आदी नहीं हूँ। तभी पीता हूँ जब मेरे दिल इर्द-गिर्द धीमा-धीमा दर्द होने लगता है या मेरे दिमाग़ की नसें अधिक बोझ उठाने से इंकार कर देती हैं। सिगरेट सुलगा कर अपने आप मेरी नज़रें घड़ी की ओर उठ जाती हैं। गतिशील सुइयाँ अपने दायरे में घूमकर तीन बज कर दस मिनट पर पहुँच चुकी हैं। मैं सोचता हूँ सुबह होने में देर ही कितनी रह गई है। कुछ ही देर में डबलडेकर बसें सड़कों पर दौड़ती नज़र आएँगी।

अचानक दरवाज़े में चाबी घूमने की आवाज़ आती है। मेरे कान खड़े हो जाते हैं और मैं लपक कर लाइब्रेरी से निकल आता हूँ। सिम्मी दाख़िल होकर दरवाज़ा ज़ोर से बन्द करती है। हाल-वे की बत्ती जला कर वह पहली सीढ़ी पर पाँव रख कर खड़ी हो जाती है, चंद पल के लिए कुछ सोचती है फिर ज़ीने की रेलिंग पर बाँह फैला कर सिर उस पर टेक देती है और सिर को कभी बाएँ कभी दाएँ तरफ झटके देती है। उसकी हालत देख कर मैं महसूस करता हूँ कि वह काफी डिस्टर्ब है। वह कुछ देर उसी अंदाज़ में खड़ी रहती है- निश्चल, मौन, खोई-खोई-सी, फिर डगमगाते कदमों से सीढ़ियाँ तय करने लगती है। उसके बाल बिखरे हुए हैं, चेहरा उतरा हुआ है, आँखें चिंता से भरी हुई हैं। ब्लाउज के दो-तीन बटन भी खुले हैं। मुझे देख कर उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती बल्कि वह हर प्रभावान्विति से ख़ाली, सपाट नज़रों से मेरा जायज़ा लेती हुई मेरे करीब आकर रुक जाती है और थकी-मांदी आवाज़ में कहती है-

"आप कब तक मेरा इंतज़ार करते रहेंगे?"

मैं जवाब देने के बजाए उसकी हालत कुछ और देख कर चिंतित हो जाता हूँ। कुछ कहने के लिए होंठ हिलाता हूँ पर वह मुझे यूँ देखती है जैसे मैं उसकी ज़िन्दगी में एकमात्र रुकावट बना बैठा हूँ। वह कुछ कटुता से कहती है-

"आप रात-रात मेरा इंतज़ार करते हैं, आपको हरदम मेरी चिंता रहती है, अपनी सेहत का आपको बिल्कुल ख़याल नहीं It's not fair at all. बेहतर यही होगा कि मैं कोई दूसरी जगह लेकर..." मैं जल्दी से हाथ बढ़ा कर उसके होंठों पर रख देता हूँ और घबरा कर कहता हूँ, "ऐसा कभी न करना वरना मैं कहीं का न रहूँगा। अब तुम कम से कम घर तो आ जाती हो।"

"तो फिर आप वादा करें आप मेरा कभी इंतज़ार नहीं करेंगे।"

मैं हारे हुए शख़्स की तरह ख़ामोश उसे देखता रह जाता हूँ। कुछ कहने के लिए न मेरे पास शब्द बचे हैं और न ही भावनाएँ।

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बुरा वक्त

अभी दिन पूरी तरह नहीं निकला था, फ़िर भी बादशाह जानी बिस्‍तर छोड़ कर उठा ख्‍ड़ा हुआ। उसने चेहरे पर उल्‍टा हाथ फेर कर देखा अगर दाढ़ी ज़्‍यादा न बढ़ी हो तो शेव न करे लेकिन उसको याद आ गया कि आज तो ईद है। उसने ताक पर रखे आइने के टुकड़े में मुख्‍तलिफ़ जावियों से अपना चेहरा देखा और कुछ सोचने लगा।

पिछले कई महीनों में वह इतने सवेरे नहीं उठा था। ईद होने की वजह से उस्‍ताद ने उसको ईदगाह के इलाके में काम करने की हिदायत की थी। उसके गिरोह में मुसलमान काम करने वाले अब दो तीन ही रह गए थे। ज़्‍यादातर साथी शहर में काम की कमी की वजह से दूसरी जगहों पर चले गए थे। जो हिन्‍दू, मसीही या सिख थे, उन पर पाबन्‍दी थी कि ईदगाह की चहादीवारी के अन्‍दर क़दम रखने की भी कोशिश न करें। इसी तरह की पाबन्‍दी मुसलमानों पर थी। वह भी महाबीहरों को मेले में सिफ़र् आस-पास ही काम कर सकते थे। इबादतगाहों के अहाते में जाने की इजाज़त उनको नहीं थी। उस्‍ताद नेपोलियन को अच्‍छी तरह मालूम था कि इन कायदों में ज़रा भी बेएहतियाती हुई, कोई मुसलमान किसी मन्‍दिर या गुरुद्वारे के पास या कोई गैर मुस्‍लिम किसी मस्‍जिद या इमामबाड़े की हुदूद में काम करता पकड़ा गया तो ख्‍वामखाह का फसाद होगा। शहर में कई दिन तक सन्‍नाटा रहेगा और सब के काम पर असर पड़ेगा।

बादशाह जानी को भी मालूम था कि पूरे शहर की हालत ख़राब थी। जो लोग शहर छोड़ कर चले गए थे उनसे उसको कोई शिकायत नहीं थी। खुद उसने भी कई बार इस तरह सोचा था मगर शहर छोड़ कर न जा सका क्‍योंकि इस गई गुजरी हालत में भी इसका काम ठीक ठाक चल रहा था। वह नौवीं जमाअत (कक्षा) तक पढ़ा हुआ था। गाड़ी चलाना जानता था। छोटी रानी की ड्‌योढ़ी का ड्राइवर जब छुट्‌टी पर जाता या बीमार पड़ जाता तो फिर उसको आरजी तौर पर ड्राइवरी मिल जाती। वह साफ सुथरी पतलून या बुशर्ट पर धुली हुई कमीज या बुशर्ट पहनता। उसके कंधे पर सियासी कारकुनों (कारिंदो) की तरह एक सूती झोला लटकता रहता जिसमें सिनेमा के गानों के किताबचे और इब्‍ने सफी को कोई ताज़ा जासूसी नावेल पड़ा रहता। जब छोटी रानी की कोठी पर नई नस्‍ल की चटाख-पटाख करती बीवी लोग छुटि्‌टयों पर आतीं और उनको पर्दे में रहना पड़ता तो बादशाह जानी को ज़रूर बुलाया जाता। वह पर्दा लगी हुई नई फिएट गाड़ी चलाने में बड़ा फ़भ महसूस करता बीवी लोगों को सिनेमा घर और दूसरे तफरीही मकामात (जगहों पर) ले जाता। बीवी लोगों को बादशाह जानी के जरिए नई शुरू होने वाली फिल्‍मों के टिकट भी आसानी से मिल जाते। फिल्‍म खत्‍म होने पर बाजारों से इधर-उधर की फुजूल खरीदारियों के बाद वह गाड़ी नगरामी जी किताबी दुनिया से ज़रा दूर खड़ी करता। नगरामी जी पहले तो बादशाह जानी को सिग्रेट पेश करते जिसे वह कान में लगा लेता, फिर एक झोले में पाकिस्‍तान में छपने वाले जाली एडीशन (यह एडीशन नगरामी जी खुद छपवाते थे) वही वहानवी के नाम से शाया (छपने) होने वाले फहश (अश्‍लील) कोकशास्‍त्रनुमा नावेल और उरयां (नवंगी) और रंगीन तस्‍वीरों वाले अंग्रेज़ी रिसाले भर देते। बादशाह जानी यह झोला बीवी लोगों के सुपुर्द कर देता। पर्दे के पीछे खूब सुखर-पुसर होती और दबी-दबी हँसी की आवाजें आतीं। बिटिया लोग सब से मज़ेदार और ज़्‍यादा से ज़्‍यादा फ़ोहोश रिसाले और किताबें मुन्‍तखिब (चुन) लेती और दस-दस के नोट देकर झोला बादशाह जानी को वापस कर देती। बादशाह जानी जब यह नोट नगरामी जी को देता तो वह उनमें से रिसालों और किताबों की कीमत निकालने के बाद बाकी रकम वापस कर देते। ऐसा करते वक़्‍त दो चार रुपये बादशाह जानी को उसके चाय पानी के अलग से देते।

बादशाह जानी की इस ‘बाइज़्‍ज़त' हैसियत का इल्‍म उस्‍ताद नेपोलियन को था इसलिए वह ज़रा अच्‍छी जगहों पर उसकी ड्‌यूटी लगाता। उसने बादशाह जानी को कभी रेस कोर्स में काम करने नहीं भेजा जहाँ पैसा तो खूब बनता था मगर जब कोई कारीगर हाथ की सफाई दिखाते हुए पकड़ा जाता तो सब जॉकी लोग मिलकर उसके साथ वजा-एगैर फितरी करते। उस्‍ताद ने काम के गुर बताते वक़्‍त बादशाह जानी के साथ डाँट फटकार से भी काम नहीं लिया। अब तो बादशाह तक़रीबन ख़ुद मुख्‍तार था फिर भी उस्‍ताद के हुक्‍म नामे कभी-कभी आते “हमारा नज़राना दो सौ से कम नहीं होगा आज, समझ लिया कि नहीं?”

उस्‍ताद नेपोलियन की आपनी हालत भी ज़्‍यादा अच्‍छी नहीं थी लेकिन चूँकि शहर में कोई मुक़ाबला नहीं था इसलिए वह एक तरह से नवाबी कर रहा था। वह तीसरे दर्जे के फ़िल्‍मों में दिखाए जाने वाले बदमाशों की तरह काली ऐनक लगता। साफ सुथरे बुशर्ट्र और पतलून डालकर माली खाँ की सराया में आराम कुर्सी पर आधा लेटा, आधा बैठा रहता। उसके एक हाथ में कोका कोला की बोतल रहती और दूसरा हाथ तरह-तरह के इशारों के लिए इस्‍तेमाल करता। इस दूसरे हाथ की तक़रीबन तमाम उँगलियों में अँगूठियाँ भरी रहतीं। वह सीधे हाथ की कलाई में शगुन के तौर पर सोने का कंगन पहने रहता। इलेक्‍शन या किसी सियासी ‘आन्‍दोलन' के ज़माने में मुख्‍़तलिफ ‘पार्टियों' के नेता लोग उसके ‘जल पान' की फ़िक्र करते। उसका रंग बहुत गोरा था जिस पर वह काली ऐन लगाकर बैठता तो मामूली एम.एल.ए. लोग एहसासे कमतरी में मुब्‍तिला हो जाते। अगर उसकी एक आँख ख़राब न होती तो वह वाकई बम्‍बई की मारधाड़ की फ़िल्‍मों में काम कर सकता था।

बादशाह जानी को उस्‍ताद का पैगाम हजरत शम्‍सी के जरिए मिला था। शम्‍शी जी उर्दू के ‘ऊंचे' शायर थे। उनका कद छह फुट से भी ज़्‍यादा बुलंद था। वह दूर-दूर के मुशायरों में जाते। सिग्रेटों के पैकेट नक्‍शी लोटे, चादरें, दरियां, शमा दाम और अगर कुछ न मिल तो खूब सूरत हमाएल शरीफ, कुआर्न शरीफ और पन्‍ज सूरे वगैरह अपने सामान में भूले से बांध लाते। यह सब सामान वह नेपोलियन की नज्र कर देते। वह बगैर देखे भले जेब में हाथ डालकर जो भी होता उनको दे देता। रात गए मुशायरे पढ़ने के बाद हजरत शमसी नेपाली के ‘मदिरालय' में पहुंचते तो उस्‍ताद के मुताद्‌दिद शगिर्दों से उनकी अच्‍छी निभती। शम्‍सी जी बादशाह जानी को अपना शागिर्द करते थे क्‍योंकि एक बार अपने स्‍कूल के मुशायरे में उसने शम्‍सी जी की गज़ल अपने नाम से पढ़ी थी।

बादशाह जानी नहा धोकर तैयार हुआ। बुशर्ट और पतलून के बाजाए उसने खास तौर पर शोख धारियों वाली कमीज और सफेद धुली हुई शलवार पहनी। उसने खूब फ़य्‍याजी से (बहुत ज़्‍यादा) बालों में तेल लगाया और तिरछी माँग निकाली आँखों में सुरमा लगा ही रहा था कि पिछले दरवाज़े से रामलाल दाखिल हुआ और ब़गैर कुछ कहे सुने चारपाई पर आड़ा-आड़ा लेट गया। दीवार के खुरदुरेपन से बचने के लिए उसने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फॅँसा कर जोड़ा और उनकी टेक बनाकर बादशाह जानी को देखने लगा।

बादशाह जानी ने चंद सानियों तक इन्‍तिज़ार किया कि शायद रामलाल कुछ कहे। फिर उसकी ख़ामोशी से उलझ कर ख़ुद ही पूछ बैठा “क्‍यों मास्‍टर। कैसे सबेरे निकल पड़े?” रामलाल थोड़ा उठा, एक हाथ की उँगली से दूसरे हाथ की हथेली पर तिरछी लकीरें बनाने लगा फिर बादशाह जानी के चेहरे पर भरपूर नज़र डालकर कहा, “यार। तेरी वजह से ज़िन्‍दगी हराम हो गई है, वही साली चन्‍दो का झगड़ा है, न जीने देती है न मरने।”

“अमाँ चुप रहो, बड़े हीरो बनते हो। चाँदनी कहो चाँदनी। तुम कौन होते हो चंदो कहने वाले।”

“अबे वह... तेरी है न मेरी। वह तो है...”

उसके बाद रामलाल ने कुछ अजीब तरह उँगलियों से इशारा किया जिस पर बादशह जानी हँस पड़ा और कहने लगा “तो फिर बेटा! आज तो वह हमारी है, सोने का गहना लेकर जाऊँगा।”

रामलाल जरा खफ़गी आमेज हसरत के साथ कहने लगा, “हाँ बेटा ईद मनाओ। माल काटो, माल। हम तो... वह जुमला खत्‍म किए बगै़र ही चुप हो गया।”

बादशाह जानी अपने को मुख्‍़तलिफ जावियाँ से आईने में देख रहा था। उसने पलट कर रामलाल को हैरत से देखा और कहने लगा “अजीब यार है तू भी बस आदमी ही हो। अमाँ महाबीरों के मेले में, अलीगंज में इतना कमाया, सब कहाँ गया?”

यह कह कर बादशाह जानी बढ़ा और कोठरी का दरवाज़ा इस तरह पकड़ा कि रामलाल को अच्‍छी तरह अन्‍दाज़ा हो जाए कि वह चलने को तैयार है। रामलाल भी खड़ा हो गया और तल्‍खी से बोला “ बस यार। जी जलाने की बातें न किया करो, किस भिकवे ने कमाया। सारे शहर के काम करने वाले वहीं मर रहे थे। महाबीरों का मेला कोई दीवाली दशहरा थोड़े ही है कि ऐश हो जाए। दिन भर की दौड़ धूप के बाद दो तीन तोते हाथ लगे। उस्‍ताद ने नज़राना वहीं धरा लिया। बाक़ी में क्‍या ऐश होता। बस पान सिगरेट का ख़र्चा निकल आया। अपनी कहो। आज तो चाँदी है। अरब लोग भी आएँगे। नवाब होते हैं साले यह लोग भी, एक ही हाथ में पौ बारे हो जाएँगे। जेवर गहना अलग। ज़रा से रियाज़ से हज़ार बारह सौ तोते फँस जाएँगे।”

रामलाल सौ रुपये के नोट को तोता कहता था। उसका कहना था कि सौ रुपये के नोट की रंगत तोते की तरह हरी होती है। जेब में सौ सौ के नोट हों तो आदमी तोते की ही तरह टें टें भी खूब करता है और तोते ही तरह अपने मुँह मियाँ मिट्‌ठू भी बनता है। फिर यह साले हरे हरे नोट तोते ही की तरह फुर से उड़ जाते हैं और तोते ही की तरह आँखें फेर लेते हैं। रामलाल तो अब सौ का लफ़्‍ज ही भूल गया था, जब भी सौ कहना होता उसकी जगह तोता कहता।

उस दिन के बारे में रामलाल का कहना कुछ ज़्‍यादा सही न था क्‍योंकि बादशाह जानी बहुत पुरउम्‍मीद नहीं था। शहर के मुसलमान लोग तो ज़्‍यादातर गरीब गुरबा थे। जो लकड़ी वाले चमड़े वाले और तम्‍बाकू वाले नए-नए सय्‍यद बने थे वह एक-एक पाई के बारे में बहुत होशियार थे। खलीजी रियासतों से जो लोग चमचमाती घड़ियाँ लगाए आते थे वह सब शानो-शौकत तो बहुत दिखाते थे मगर टेंटें करते, हरियल तोते किसी की जेब में न होते। उन लोगों के पास महँगे सिगरेट केस, कीमती कलम, नई-नई वजा (डिजाइन) के महँगे रिकार्ड और कैमरे होते जिनको पार करना तो बहुत आसान होता मगर ठिकाने लगा कर नकदी बनाना बड़ा मुश्‍किल होता।

रामलाल और बादशाह जानी आम शहरियों की तरह चल रहे थे और उस्‍ताद ही के बारे में बातें कर रहे थे। इसी के साथ उनकी तेज नज़रें भी ईदगाह की तरफ़ जाने वालों पर थी। रामलाल ने बताया कि तुम्‍हारा आशिक मासूक वाली ग़ज़लें बनाने वाला भी रो रहा था। और ये कह कर वह हँसने लगा। रामलाल बहुत अच्‍छी उर्दू बोलता मगर उस वक़्‍त नेपाली के मदिरालाय में अपने साथियों की नकल करते हुए शीन और काफ़ के तलफ़्‍फुज का मज़ाक उड़ा रहा था उसका इशारा शम्‍सी जी की तरफ़ था।

बादशाह जानी बे-ख्‍़याली में बोला “उस भिकवे को क्‍या हुआ, ऐसे तो करता है। मंत्री जी के गुलदान तो ठिकाने लगा चुका है।”

“नहीं बे। परसों कम्‍युनिस्‍टों का मुशायरा था। वहाँ उसका पाँच-पाँच के जाली नोट मिले और सिगरेट चाय अपने जेब से पीना पड़ी।”

बादशाह जानी हँसने लगा। शम्‍सी जी अपनी आदतों से बाज नहीं आते थे। थोड़ी मुद्‌दत पहले ही वह राजभवन से चाँदी के कई चमचे ले आए थे। उनके चमचों पर सरकारी मुहरें खुदी हुई हुई थीं। उस्‍ताद तो देखकर घबरा गया। उसने अपने जानने वालों से कह सुनकर मामला दबा दिया। उसके बाद शम्‍सी जी पर सरकार मुशायरों के दावतनामे बन्‍द हो गए थे। शम्‍सी जी ने मशहूर कर दिया कि उन्‍होंने गवर्नर के सामने एक इन्‍किलाबी नज़्‍म पढ़ दी थी जिसमें राजभवन के दरवाज़े उन पर बन्‍द हो गए थे। लेकिन जिन दिनों शम्‍सी जी को मुशायरे न मिलते तो वह अपने नाम आने वाले उर्दू रिसाले आधे दामों पर निगरामी जी के हाथ बेच देते।

रामलाल मालूम नहीं क्‍यों बहुत खफ़ा सा था। दो मिनट ठिठक कर शैकत खान को गालियाँ देने लगा, “यह साला सौखत खान भी शबराती छछूंदर है। हर जगह बेफायदा बेफुजूल में लफड़ा खड़ा कर देता है। उसने उस्‍ताद को बहुत नाराज़ कर दिया। कहने लगा कि अगर हिन्‍दू-मुसलमान एक दूसरे के तीज त्‍योहार में काम नहीं कर सकते तो सड़कों पर लेट कर ही कुछ नावां बना सकते हैं।”

बादशाह जानी को अपने कानों पर यक़ीन न आया ताज़्‍जुब से रामलाल को देख कर कहने लगा “अबे नहीं? क्‍या कह रहा था।”

“अरे ईद की बात हो रही थी। कहने लगा कि कारीगर अपने बदन पर हल्‍दी चूना लगाए। लाल लाल फटि्‌टयाँ (पटि्‌टयाँ) बाँध कर मेले इश्‍नान और उरस के रास्‍तों में लेट जाया करें तो कर्म धर्म करने वाले कुछ दान पुन ज़रूर करेंगें। इस तरह भी एक आध तोता फँस जाएगा।”

बादशाह जानी ने अपना सर बेयक़ीनी की हालत में ज़ोर सा झटका और फिर पूछा... “फिर? उस्‍ताद क्‍या बोला?”

“अबे उसके तो मिर्च लग गई। चारों तरफ़ घूम कर चिल्‍लाने लगा। सुन रहे हो सालो। सुन रहे हो। जनानो, हीजड़ो अबे सालो, सुना यह जनखा क्‍या कह रहा है। अब हमारे लोग भीख माँगने निकलेंगे... अबे भिकवो... कुछ तो शर्म करो। उस्‍ताद के मुँह में कालिख लगाओगे। हमारी बेजती (बेइज़्‍जती) ख़राब करता है। पुलिस वाले, एम.एल.ए. लोग, नेता लोग, रिपोर्टर जब कहेंगे कि नेपोलियन उस्‍ताद अपने चेलों से भीख मँगवाता है तो क्‍या मैं तुम सालों की माँ बहनों की... मैं मुँह कि छपाऊँगा। जिस साले का काम नहीं करना है अभी निकल जाए नहीं तो मार-मार कर गू निकाल दूँगा।”

बादशाह जानी उस्‍ताद की नशरी नज़मों जैसी गालियों के बारे में सोच कर हँसा और इश्‍तियाक से बोला, “फ़िर सौखत खान का क्‍या बना?”

“बनता क्‍या। उस्‍ताद सचमुच बहुत गर्म हो गया था। कहने लगा निकल जाओ मेरे सामने से नहीं तो अभी जेल भिजवा दूँगा। सड़ते रहोगे साले उम्र भर। उसके जाने के बाद हम लोगों को भी समझाने लगा। बेटा लोगो, काम करना है तो हुनर सीखो। मेहनत की कमाई खाओ। पुलिस और नेता लोगों में इज़्‍ज़त बनी रहती है। मर्द होकर भीक माँगने की बात करते हो। सालो, पहले अपने अपने टोटे कटा लो तब भीक माँगना। जब भीक भी नहीं मिलेगी तो क्‍या करोगे। अपनी-अपनी माँ बहन... लगोगे?”

वह दोनों बातें करते-करते महल की सरहद से निकल आए थे। बादशाह जानी को अन्‍दाज़ा हो गया कि उस ने ऐसा रास्‍ता चुना था जिस पर से अमीर लोग गुज़रते ही नहीं थे। छोटे-मोटे हाथ तो वह चला ही सकता था मगर आज बरस के दिन इस तरह का गीला काम करना बादशगुनी के बराबर था। इसलिए वह जी आई लाँडरी के खाली तखते से टेक लगा कर ईदगाह की तरफ़ जाने वालों को देखने लगा।

रामलाल अब भी ज़माने का रोना रोए जा रहा था, “बड़ा खराब वख़त आ गया है” -उस ने गहरी नज़र से ईदगाह की तरफ़ जाने वालों का जायजा लिया और कहने लगा, “अबे हाँ, वह यूसुफ घड़ी वाला भी बग़ैर बताए कहीं निकल गया।”

बादशाह जानी ने सर से ऐसा इशारा किया जैसे उस को पहले से यह बात मालूम हो चुकी हो, इस रू में खुद भी बोला, “वह जन्‍नत बी का काले पालक नहीं था। मजीदा जो गुल मोहम्‍मद अत्तार के वहाँ नुस्‍खे बनाया करता था, वह भी साला चुपके से कहीं सटक गया। अब जन्‍नत बी कह रही है कि कोठरी खाली कर दो। बेचना है। वह कहीं अरब में जाने को कह रही है।”

“अबे वह कहीं नहीं जाएगी। मैं सब जानता हूँ। वह तुझे कोठरी खाली कराना चाहती है, बस। मुलतानी शाह इस में दुकान खोलने की बात कह रहा था। वह जन्‍नत बी को सात-आठ तोते पगड़ी देने को तैयार है। बस इत्‍ती सी बात है।”

बादशाह जानी को जन्‍नत बी की बात पर पहले भी यक़ीन नहीं था। अब रामलाल से मुल्‍तानी शाह का जिक्र सुनकर उसको बड़ा गुस्‍सा आया। वह ज़रा देर को रुक गया। वह दोनों नादान महल रोड के मकबरों के आगे निकल आए थे। हर तरफ़ ईदगाह जाने वालों का हुजूम बढ़ रहा था। रामलाल ने ठिठक कर कहा कि अब सीधा रकाब गंज जाएगा या यहिया गंज होता हुआ उधर से ही राजा की बाज़ार तक निकल जाएगी और वह आफ़त कर देगा।

बादशाह जानी भी गहरी साँस लेकर बोला, “अपना भी बुरा वख़त आ गया है।”

यही बात अभी कुछ मिनट पहले रामलाल ने कही थी मगर अब बादशाह जानी के मुँह से सुनकर बोला, “अरे बाबू, सभी का बुरा वख़त है। पूरे शहर की रौनक ढाँए-ढाँए फिश हो कर रह गई है। इसी शहर में हमने भी वह तोते उड़ाए हैं कि...”

वह दोनों ज़रा दिलचस्‍पी से देखने लगे। आगे रास्‍ता तंग हो गया था, पुलिस ने पैदल चलने वालों के लिए एक अलग पट्‌टी बना दी थी। सब लोग इस तरह उस पर जा रहे थे जैसे कोई बड़ा जासूस जा रहा हो। रामलाल और बादशाह जानी दोनों ने क़रीब से गुज़रने वालों को आंका और फिर दोनों एक दूसरे को देखकर खिसिया गए। बादशाह जानी खिफ़्‍फत मिटाने के लिए बड़बड़ाया “ठन ठन गोपाल” (मतलब यह था कि यह सब बने ठने) लोग पैसे कोड़ी के एतबार से कुड़क थे।) रामलाल ने हल्‍के चटखारे के अन्‍दाज़ में कहा “अच्‍छा पार्टनर माल कटो माल। अपने राम तो चल दिए।”

बादशाह जानी ने किसी माहिर सिविल इंजीनियर की तरह ईदगाह के मैदान का जायज लिया। इधर-उधर घूमते हुए उसने दो तीन सिगरेट फूँक डाले। मजमा बहुत था और ईदगाह की चहारदीवारी के अंदर दाखिल होने में बड़ी मुश्‍किल नज़र आ रही थी। फिर भी बादशाह जानी इस तरह घूम रहा था जैसे किसी पुरसूकून बाग में टहल रहा हो। अस्‍ल काम तो नमाज के बाद ही शुरू होता था, जब सब लोग हड़बोंग में एक साथ निकलने की कोशिश करते या सब कुछ भुला कर एक दूसरे से गले मिलने में मशगूल हो जाते।

वह खस फाटक के सामने लगे हुए खेमों की कतार का जायजा लेने लगा। उन खेमों में मज़हबी किताबों जानमाजों, मज़हबी ज़रूरयात की चीज़ों, फूलों फलों, सामानों आराइश (सजावट का सामान) और मिठाइयाँ और खिलौने की दुकान सजी हुई थी। उससे नवे दर्जे के जाविये से एक कतार दूसरी तरफ थी जहाँ सिर्फ चाय, शर्बत, खीर और हलवे पराठे वाले थाल सजाए हुए बैठे थे। हर खेमे में नातों के कैसेट, कव्‍वालियों के रिकार्ड या किरअत के रिकार्ड बज रहे थे। एक बड़ा खेमा किसी मज़हबी जमाअत के मुबलगों का था जिसमें मज़हबी किताबों, तबलीगी कामोें और मज़हबी फिर्के के लोगों के रिसाले भरे थे। इस्‍लामी कैलेण्‍डरों, जन्‍तरियों और अजान देने वाली घड़ियों की भरमार थी और जमाअत के रहनुमा के बडे़ बड़े फ्रेम शुदा फोटो भी बिक रहे थे। इस कैम्‍प के दूसरे हिस्‍से में एक नौजवान मुल्‍ला अपने नए-नए सरसरातें कपड़ों में सचमुच का दूल्‍हा बना हुआ तागूती ताक़तों का जिक्र कर रहा था। उसके हाथ पर बहुत ही नफीस घड़ी सजी हुई थी। जब वह हाथ उठाकर किसी नुक्‍ते पर ज़ोर देता तो घड़ी के हीरे अंधेरी रातों में आतिशबाजी के रंगों की तरह चमकते। बादशाह जानी को याद आया कि यही मुल्‍ला गुजिश्‍ता रोज़ दरिया के क़रीब मसनूई आबशार के पास फैशनेबिल लड़कों और लड़कियों के साथ पिकनिक मना रहा था।

बादशाह जानी इस तरह टहलता रहा। दुकानों के बीच में, फकीरों में मजमे में,दर्जियों के गिरोह में, बर्फ खाने वालों और तम्‍बाकू फ़रोश ‘सय्‍यदों' के हुजूम में महारत से जायजा लेते हुए वह बराबर इस बात का कायल होता जा रहा था। वह दिल ही दिल में मुसलमानों के उर्सों और त्‍योहारों का हिन्‍दूओं और सिक्‍खों के त्‍योहारों और मेलों से मुक़ाबला कर रहा था। इसलिए उसको रामलाल की परेशानी का यक़ीन नहीं आया। वहाँ आए दिन ही तीरथ स्‍नान और त्‍यौहार रहा करते थे। रामलाल को काम की क्‍या परेशानी थी।

ज़रा देर में लोग खड़े होने लगे। इमाम साहब जो लाउड स्‍पीकर से वाज (भाषण) देने में मशगूल थे जब उतर कर अपनी जगह पर पहुँच गए थे और नमाज पढ़ाने के लिए तैयारी कर रहे थे। बादशाह जानी एक सफ से गुज़र कर दूसरी तरफ फलांगता और तीसरी एक सफ से आगे बढ़ कर उसने एहतियात से मुट्‌ठी खोली।

‘धत तेरे की' वह अपने पर नफरीन करता हुआ बड़बड़ाया। यह बजाहिर किसी मियाँ भाई की मताए कुल (कुल रकम) थी। सात आठ रुपये, कुछ रोजगारी और एक हकीम का नुस्‍खा उसने मरोड़ कर एक तरफ फेंका और रकम बदौली से जेब में डाल ली।

वह एक दूसरी तरफ से एक नई सफ में घुस गया। उसके बराबर में लोग चिल्‍ला रहे थे। हजरात, सफें बराबर कर लीजिए, बादशाह जानी भी इधर-उधर बहुत ही बनावटी बेजारी और झुंझालाट से चिल्‍लाया- “सफें बराबर कर लो भाइयों।” यह कहते हुए उसने बायां हाथ चलाने से पहले आँख के गोशे से देखा। उसके बराबर एक नौजवान मजिस्‍ट्रेट अदब से खड़ा नमाज शुरू होने का मुन्‍तज़िर था। बादशाह जानी उसको भी पहचान गया। दो तीन महीने पहले उस मजिस्‍ट्रेट ने उसको एक गलत जगह पेशाब करने के जुर्म में सौ रुपये जुर्माना किया था। मजिस्‍ट्रेट को अपने क़रीब पाकर बादशाह जानी का जज्‍बा-ए-इन्‍तिकाम भड़क उठा। उसने बाएं हाथ से ‘कोशिया' की और वहाँ से खिसक गया। चंद सानियों बाद वह एक घने दरख्‍़त की छाँव में बैठे हुए बच्‍चों की एक टोली में था। उसने अपने हाथ में लहराता हुआ रूमाल खिसका कर देखा, एक चौकोर सिगरेटकेसनुमा बटवा था जिसके अन्‍दर शर्बती रंग की दो तीन चूड़ियाँ और एक नन्‍हीं बच्‍ची की तस्‍वीर थीं।

उस नौजवान मजिस्‍ट्रेट की बच्‍ची अपने मकान की छत पर बंदरों से डर कर भागी तो छज्‍जे पर गिर पड़ी थी। उसने जब उठने की कोशिश की तो नीचे गली में गिर कर मर गई थी। बादशाह जानी ने यह कि�स्‍सा सुना था। अब उसको मजिस्‍ट्रेट पर तरस आ गया और वह सोचने लगा कि किसी तरक़ीब से यह बटवा, चूड़ियाँ और तस्‍वीर मजिस्‍ट्रेट को वापस भिजवा देगा।

ज़्‍यादातर लोग अल्‍लाहो-अबकर कह कर ख़ामोश खड़े थे मगर ‘चुप रहिए नमाज़ शुरू होने वाली है' के नारे लगाने वालों की आवाज़ से कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। नज़म व जब्‍त की तमाम ज़बानी कोशिशें के बावजूद एक हंगामा मचा था। इस हालत में इमाम साहब ने ‘अल्‍लाह अकबर' कहा और उनकी तकलीद में बड़े से मैदान में जगह-जगह बने हुए मकबरों पर जमें हुए जमनी इमामों ने अल्‍लाह अकबर की बाज गश्‍त में हिस्‍सा लिया। बादशाह जानी एक किनारे पर सफ में खड़ा हुआ आँखों के मोशों से आस-पास देखे जा रहा था। उसके सीधे हाथ पर एक कोई सरकारी अफ़सर खड़ा था उसके साथ कई बच्‍चे भी थे जो नमाज पढ़ने की नकल में मस्रूफ़ थे। बादशाह जानी ने आसानी से एक लड़की का बन्‍दा उतार लिया और साथ ही हाथ की सफाई से काम लेते हुए अफसर की जेब में भी कैंची लगा दी।

नमाज ख़त्‍म होते ही वह उठ खड़ा हुआ, जो लोग आस-पास बैठे थे वह भी नफसा नफसी के आलम में खडे़ होकर एक दूसरे से गले मिलने लगे। एक कयामतखेज़ हंगामा बर्पा हो गया। बादशाह जानी फुर्ती से इधर-उधर घूमने लगा। उसको दो एक कारीगर और भी नज़र आए, वह तल्‍खी से हँस कर उनकी नज़रों से बच कर अपनी मेहनत में मस्रूफ़ रहा। उसको पुलिस वालों से भी होशियार रहना था क्‍योंकि अगर उनमें कोई भी जानने वाला होता तो वह बादशाह जानी से फौरन अपना हक़ तलब करता।

इमाम साहब के जुलू के उनके अहाली मवाली हटो बचो करते हुए उस शामियाने की तरफ़ जा रहे थे जहाँ रियासती गवर्नर, वजीर आला और मुमताज़ गैर मुस्‍लिम अमाएद गदीले सोफों में धंसे हुए इमाम साहब और मुसलमान भाइयोें को ‘मुबारकबादिया' देने जमा हुए थे। बादशाह जानी उस गिरोह में शालिम हो गया जिसमें कप्‍तान पुलिस वगैरा इमाम साहब के साथ चल रहे थे। उस वक़्‍त अगर कोई पुलिस वाला उसको पहचान भी लेता तब भी चुप रहता क्‍योंकि उसको डर होता कि ख़बर बादशाह जानी किसी अहम ओहदेदार या लीडर की गाड़ी चलाने पर लगा हो।

एक तरफ़ से इमाम साहब अपने मुरीदों और खदम व चश्‍म के साथ आ रहे थे और दूसरी तरफ से किसी अरब मुल्‍क का एक सफ़ारती नुमाइन्‍दा आगे बढ़ कर उनसे बगल गीर हुआ। यह मौक़ा गनीमत समझ कर बादशाह जानी वहाँ से निकल गया।

बीस बाईस ‘कैंचियाँ' लगाने और ‘क्रोशिया' करने के अलावा उसने एक जगह ‘बुनाई' भी की। इसके बाद उसका ख्‍़याल आया कि अच्‍छा मौका देख कर अपना जूता भी बदल ले। उसका अपना पम्‍प बहुत पुराना हो गया था। उसने ईदगाह के जुनूब (दक्षिण) की तरफ एक चक्‍कर लगया। वहाँ लकड़ी की अल्‍मारियों पर जूतों और चप्‍पलों का ढेर था जिनकी देखभाल और हिफ़ाजत के लिए हस्‍बे मामूल (हमेशा की तरह) दरगाही बैठा था। दरगाही के बाप दादा के वक़्‍त से अब तक ईदगाह में आने वालों के जूतों और छतरियों की देख भाल का ज़िम्‍मेदार और कोई न था। दरगाही बहुत बूढ़ा था और उसकी नज़र बचा कर कोई अच्‍छा कीमती जोड़ा उड़ा लेना मुश्‍किल न था लेकिन उसी तरफ खालिक बाज़ार का इंचार्ज दरोगा गुलाठी, इक़बाल भट्‌टी से बातें कर रह था। इकबाल भट्‌टी एक हफ़तरोजा अखबार निकालता था जिसमें पुलिस की कारगुजारियाँ ज़ोरदार अल्‍फाज में छापता था। उसके बदले में उसको इलाके के तमाम सिनेमाघरों, फुटबॉल, क्रिकेट और दंगल के मुक़ाबलों के टिकट मुफ्‍त मिलते थे। अगर गुलाठी बादशाह जानी को रोक कर महज उसकी खैरियत ही पूछता तब भी इकबाल भट्‌टी अपने अखबार में मोटी मोटी सूर्खियाँ लगाता कि खालिक बाज़ार पुलिस ने गिरह कटों के आलमी (विश्‍वव्‍यापी) गिरोह को बड़ी बहादुरी से बन्‍दूकों और चाकुओं का मुक़ाबला करते हुए पकड़ा। इकबाल भट्‌टी ने जब शाकिर अली और इज़्‍ज़त आपा के बारे में शरारतअंगेज मजमून छापे तो वह बीच बाज़ार में इकबाल भट्‌टी को जूते लगवाएगा। तब से मकामी तालिबात के स्‍कूल के बारे में बे-बुनियाद अफवाहें बन्‍द हो गई थीं। बादशाह जानी ने उस वक़्‍त इकबाल भट्‌टी और गुलाठी की नज़रों से बच निकलना ही मुनासिब समझा। मगर चलते-चलते उसने इकबाल भट्‌टी को यही कहते सुना- भाई बहुत बुरा ज़माना आ गया है।

बादशाह जानी ईदगाह से ज़रा दूर एक पराठे कबाब की दुकान में घुस गया। खाने के बाद उसने सुर्ख रंग का कोई मज़ेदार शर्बत भी पिया। रास्‍ते में उसने भिखारियों को कुछ पैसे भी दिए और ‘दोपहर की छुट्‌टी' के लिए अपनी कोठरी पर पहुँचा।

दरवाजे बंद करके उसने अभी तक की कमाई का हिसाब किया। ज़्‍यादातर बटुओं में नोटों की जगह लांड्री की रसीदें, तरह-तरह के बिल और अदाएगी के मुतालिबे और तकाजे थे। उसने उन सब काग़ज़ों को फाड़ चीर कर कूड़े में डाल दिया और नकद रकम का हिसाब किया तो सिर्फ सात तोते बनते थे जिनमें उस्‍ताद का नज़राना भी था।

वह आराम करने के बाद लाल बाग की तरफ जाना चाहता था जहाँ सिनेमाघरों में ईद की ख़ुशी में नए-नए फिल्‍म शुरू हो रहे थे। ऐसे मौकों पर दो बजे दिन से ही खूब जमघट हो जाता है और फिर वह हड़बोंग होता है कि पुलिस को लाठी चार्ज तक करना पड़ता है। बादशाह जानी का दिल आराम में न लगा। वह नावेल्‍टी टाकीज और बसन्‍त टाकीज की तरफ काम करने के ख्‍़याल से तैयार हो गया। लेकिन बे-ख्‍याली में कपड़े बदल कर और बुशर्ट और पतलून पहनकर हरचरन के मकान भैरों जी रोड पहुँचा।

हरचरण की दुकान चाँदी वाली गली के नुक्‍कड़ पर थी और उसका खास दरवाज़ा चौक की तरफ खुलता था। पिछला दरवाज़ा चाँदी वाली गली में था। वह अपनी दुकान पर छोटे-मोटे जेवर बनाता था लेकिन अस्‍ल काम पुराने जेवर सस्‍ते दामों में खरीदने का था शरीफ घरों की बहू बेटियाँ बुर्के ओढ़े दुकान का पिछला दरवाज़ा खटखटातीं और कोई ‘अदद' हरचरण के हाथों में पकड़ा देती। वह जो कुछ नकद रकम देता ख़ामोशी से लेकर वहाँ से खिसक जाती।

उस दिन ईद की छुट्‌टी की वजह से दुकानें बन्‍द थीं इसलिए बादशाह जानी हरचरन के मकान पर पहुँचा और बुन्‍दा उसके हाथ में पकड़ा दिया। हरचरण ने उसको रोशनी के रुख करके देखा। दो-तीन बार हाथ से घिसा और फिर जेब से कसौटी निकाल कर उस पर घिसा। उसने मलामती नज़रों से बादशाह जानी को देखा और शिकायत करने लगा “क्‍यों यार! हम से भी उस्‍तादी करोगे?”

“क्‍या बात है सेठ?” बादशाह जानी इधर-उधर मोहतात (सावधान) नज़रों से देख रहा था। इसलिए ताज़्‍जुब से पूछा।

“बात क्‍या है। देखते नहीं हो?” उसने कसौटी बादशाह जानी के सामने कर दी जिस पर बुन्‍दे की रगड़ से सुनहरी चमक के बजाय अजीब किस्‍म का स्‍याही माएल बैंगनी रंग झलक रहा था।

“यार। मैं तेरी चीज़ों को कभी नहीं परखता। जो माँगता है दे देता हूँ। पर अब ऐसा तो न कर।”

बादशाह जानी खिसियाना हो गया। शर्म से बोला। “हटाओ यार। माफ कर दो। आज साली कि�स्‍मत ही ख़राब है।” वह जिस तरह खिसियाकर वहाँ से क़रीबन रूहांसा हो कर चला उससे हरचरण को यक़ीन हो गया कि बादशाह जानी से उसको दाँव देने की कोशिश नहीं की थी।

वापसी में कहारों वाली गली पड़ी। बादशाह जानी के क़दम जम गए। जानी को देखकर बनावटी लगाव से उठकर खैर मकदम (स्‍वागत) को आई। अपने दो चार जानने वालों को नज़र अन्‍दाज़ करते हुए उसने बादशाह जानी के दोनों हाथ अपने हाथ में लिए और उसी तरह उसको कमरे में बिछे तख्‍़त के फर्श तक लाई और बड़ी तिरछी अदा से बोली।” क्‍यों जी लाए मेरा हार। आज मैंने इन्‍तिज़ार में अभी तक कोई गहना नहीं पहना है, चलो निकालो जल्‍दी से।”

बादशाह जानी ख़ामोशी से फ़र्श पर एक धब्‍बे को देखे जा रहा था। उसने इधर-उधर नज़र डाल कर यह न देख कि वहाँ नागर जी और शम्‍सी साहब दोनों दूध और बालाई में घुटी रामलाल का चमचा रतनसिंह मठारू शहनाई पर पूरबी धुन बजाने की कोशिश कर रहा था और सब लोग हँस रहे थे।

बादशाह जानी की ख़ामोशी से चाँदनी समझ गई। फिर भी जाहिरी तौर पर किसी तरह का असर लिए बगैर उसने तपाक से बादशाह जानी को बड़े लिहाज से बिठाया और पूरे तकल्‍लुफ के साथ उसके लिए चाँदी का वर्क लगी सिवइयाँ मँगाई। आस-पास बैठे लोग बादशाह जानी की इस मदारात पर खूब छींटे कस रहे थे मगर बादशाह जानी बिल्‍कुल जैसे बहरा और गूंगा था।

“लाना बरादर... ज़रा एक पनामा तो पिलाना।” बादशाह जानी को अब भी अन्‍दाज़ा न हुआ कि कोई उससे मुख़ातिब था, वह तो बराबर हरचरण की कसौटी के बारे में सोच रहा था।

“प्‍यारे नवाब। हमारी ईद कहाँ गई।” चाँदनी ने ऐसे बेतकल्‍लुफ और अजीब लहज़े में कहा कि बादशाह जानी चौंक उठा उसने जेब से रूमाल निकाल कर मुँह पोंछा और उसी रूमाल में सब कुछ लपेट कर चाँदनी के हाथों में पकड़ा दिया, और उसी तरह जल्‍दी से वहाँ से उठा जैसे पकड़े जाने का ख़ौफ हो।

वह मेरा पुराना साथी था। जब हम दोनों आठवीं जमाअत में पढ़ते थे तो वह घर से रुपए चुरा कर लाता था। हम दोनों स्‍कूल से भाग कर शहर के अच्‍छे-अच्‍छे होटलों में जाकर खूब उलल्‍ले-तलल्‍ले करते। बहुत से होटल वालों को अच्‍छी तरह अन्‍दाज़ा था कि हम चोरी करके पैसे लाते थे मगर उनको क्‍या पड़ी थी कि हमारे घरों में या स्‍कूल में जाकर शिकायत करते।

बादशाह जानी जब किसी तरह न सुधरा तो उसके बाप ने उसको घर से निकाल दिया। वह भी पलट कर न गया और शहर में गीला काम करने वालों के गिरोह में शामिल हो गया। मैं भी कई बार मेट्रिक फेल होने के बाद बंबई भाग गया। वहाँ बहुत दिनों आवारागर्दी के बाद मुझे काम मिल गया जिसमें मजदूरी करते हुए लीवर पूल पहुँच गया। वहाँ मैंने कई बरसों तक काम किया फिर अपना कारोबार शुरू कर दिया। मैं बड़े गोदामों से सामान लेता (जो ज़्‍यादातर चोरी का होता) और आस-पास कई लारियाँ हो गईं और फिर मैंने जायज तरीके पर ख�ुद बराहेरास्‍त सामान मँगाना शुरू कर दिया, जो मैं एशियाई दुकानदारों को सप्‍लाई करता। उस मुद्‌दत में मेरे पास इतना पैसा जमा हो गया कि सब लोग मुझको अच्‍छा आदमी समझने लगे। बहुत से लोगों ने मशहूर कर दिया कि मैं बहुत दीनदार और नमाज रोज़ा का पाबन्‍द अच्‍छा मुसलमान हूँ।

अब मैं बहुत बरसों बाद अपने शहर आया था। बादशाह जानी को मालूम नहीं कैसे ख़बर लगी, वह मुझसे मिलने आ गया और पुराने दिनों की बातें करते हुए मुझसे कहने लगा कि मैं उसको लंदन बुला लूँ।

हम लोग सहपहर शहीद स्‍मारक के पास एक होटल में बैठे थे। वह तरह-तरह की बातें करता रहा। मैं ज़्‍यादातर सुनता ही रहा, मेरे कई बार पूछने पर उसने बताया कि उस्‍ताद नेपोलियन शहर के हालात से बद दिल होकर कलकत्‍ता और बम्‍बई निकल गया पर वहाँ भी उसका काम बना नहीं।

‘क्‍यों। उसका वहीं तो काम बन सकता था। वह तो सचमुच का दादा था। उस्‍ताद था।”

“बम्‍बई के दादा लोगों में बड़ी तनातनी थी। हर बात में हिन्‍दू मुसलमान का मामला खड़ा कर दिया जाता था। हिन्‍दू लोगों ने उसको मुसलमान समझ कर बहुत मारा। दूसरी तरफ मुसलमान दादा लोग भी उस को हिन्‍दू समझते रहे। उन्‍होंने उसको घेर कर ऐसा मारा कि हाथ पैर तोड़ कर रख दिये।

“तो फिर अब वह कहाँ है?” मैंने अफसोस अमेज इश्‍तियाक के साथ पूछा। बादशाह जानी जैसे ख़ुद से बातें करते हुए बड़बड़ाया। “मर ही जाता तो अच्‍छा था।”

मैंने फिर बेवकूफ़ों की तरह पूछा “क्‍या मतलब?”

“मैंने बहुत दिन हुए उसको टोंडला के स्‍टेशन पर देखा था।”

“अरे तो वहाँ वह क्‍या कर रहा था।”

“वह वहाँ स्‍टेशन के बाहर एक टाट पर पड़ा भीख माँग रहा था। उसके हाथों में उँगलियाँ तो थीं ही नहीं। वह मुझको नहीं पहचाना। मैं भी जल्‍दी से उसके सामने से हट आया।”

थोड़ी देर हम दोनों बिल्‍कुल ख़ामोश रहे।

“तुम मुझको लंदन बुला लो... ऐसा हो सकता है?” उसने दरख्‍़वास्‍त भी की और साथ ही ख�ुद ही मुश्‍किलों के एहसास को इज़हार भी कर दिया।

“हो क्‍यों नहीं सकता... मगर... क्‍या किया जाए। भई, आज कल तो बड़ा बुरा वक़्‍त आ गया है।”

“हाँ यार... बड़ा बुरा वख़त है। बुरा वख़त है” उसने मेरी बात से इत्‍तिफाक किया

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