रविवार, 23 दिसंबर 2012

पंकज अग्रवाल की कविता - वो बॅचलर जिंदगी

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वो बॅचलर ज़िंदगी

जो चाहे वो कह दिया, जो चाहे वो सुन लिया…
जब चाहे और सो गये, कोई सपना बुन लिया...
ना कोई दर था, और ना कोई शर्मिंदगी…
क्या बतायें तुमको, वो बॅचलर ज़िंदगी…

बेस्वाद बनता था खाना, और जलती थी रोटियाँ..
सपनों में ही छू लेते थे, महत्वकांक्षाओं की चोटियाँ..
चाहे कमरे फैली रहती थी, चारों ओर गंदगी….
क्या बतायें तुमको, वो बॅचलर ज़िंदगी…

लड़कियों को देख कर, दिल में घंटियाँ बाज जाती थी…
अगर कोई आइटम दिख जाए, तो जैसे साँस ही रुक जाती थी…
कोई हसीना अगर हंस के बात कर लेती, तो करने लगते उसकी बंदगी…
क्या बतायें तुमको, वो बॅचलर ज़िंदगी…

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