शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

प्रतिभा शुक्ला की लघुकथा - बेटियाँ

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बेटियां

प्रतिभा शुक्ला

मेरी बेटियां, मेरे उपवन के दो फूल। हमारी सुबह पति के गुनगुनाते गीतों के साथ चाय की प्याली और कुनकुने पानी से रोज सुहानी हो जाती है। इनके जगाने का यह तरिका हमारी जिंदगी में अब एक स्वभाव बन चुका है। पहले बेटियों के पास जाकर, "उठो लाल अब आँखे खोलो पानी लाया हूँ, मुंह धो लो" से जगाने की कोशिश। फिर भी आँखें न खुलीं तो गुड मार्निंग, सत श्री अकाल, वाहे गुरु, सुप्रभातम समेत ढेर सारे पर्यायवाची जोर-जोर उवाचना शुरू कर देंगे। अब ऐसे में भला कौन नहीं जाग जाएगा। इन शब्दों से मेरे भीतर बहुत नन्हा सा शिशु पैठ जाता है। तीनों साथ निकले तो मैं लक्ष्य बन गयी। बड़ी बेटी मेरी माँ। पता नहीं कहाँ से उसमे इतनी फुर्ती आ जाती है कि अपने आलस को परे फेंकते हुए मुझ पर पिल पड़ेगी, "उठो-उठो। भला देखो तो सही। पांच बज गए और मैडम जी का सपने देखना बंद न हुआ।" फिर तो छोटी और ये मिलकर जो गुदगुदाना शुरू करेंगे कि मैं क्या पहाड़ भी कूद कर खड़ा हो जाए।


बड़ी बेटी जितनी तेजी से मात्र ग्यारह साल की उम्र में बहुत बड़ी और जिम्मेदार हो गई है, उससे तो भविष्य के बिलगाव की कल्पना भी असह्य हो जाती है। न चाहते हुए भी आंसुओं को रोक नहीं पाती। खुद से स्कूल के लिए तैयार होना और छोटी के लिए भी रोटियां पका कर अपने हाथों खिला देना, लौट कर आने के बाद पूरी तरह उपग्रह की तरह मेरे गिर्द चक्कर लगाना, सूझ बूझ की बड़ी-बड़ी बातें करना हैरत में दाल देता है।


यही कोई महीने भर पहले वह दादी के पास से लौटी तो झट सामान रख बोली, "माँ मैं अभी आती हूँ। सहेलियों को एक जरूरी बात बतानी है।


कौन सी बात?
तुम नहीं समझोगी।
क्यों नहीं समझूंगी? तू बता तो सही।
अरे, वही, जो लड़कियों को होता है।
क्या होता है?
ऑफ़ ओ, समझती ही नहीं। जो महिलाओं को होता है।
क्या होता है? कुछ बताएगी भी!
अब कैसे बताऊँ। समझ लो जिसमें पैड लेना जरुरी हो जाता है।


??????? हे भगवान! ग्यारह साल की मेरी बेटी इतनी समझदार कैसे हो गयी।
इसके पहले मै कुछ बोलती, उसकी बेचैनी फिर प्रकट हो आई, "हम उनको बता दें, नहीं तो वे किसी दिन मुसीबत में पड़ जाएँगी और लोग जान जायेंगे तो बेज्जती हो जायेगी।
मैंने रोका, इसमें बताना क्या है?


यही कि वे हमेशा अपने बैग में पेड रखें।
मैंने फिर रोका, तू नाहक परेशान हो  रही है। वे आएँगी तो मैं समझा दूंगी।
फिर ठीक है। वैसे मैं जाती तो शायद काफी अच्छे से समझा पाती।
मैं मुस्कुराए बिना न रह पायी। वह मेरी बांहों में झूल गयी। जैसे सब कुछ भूल गयी हो।


अनजाने में ही सही, उसने जीवन के एक नंगे सच को समय से पहले ही समझ लिया था

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पुलिस अस्पताल के पीछे
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर,
उत्तर प्रदेश।

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