रविवार, 16 दिसंबर 2012

राजीव आनंद की कविता - जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है

जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है

DSCN2028 (Mobile)

स्‍वागत है गुडि़या

बेटी हो तो क्‍या हुआ

तुम अपनी पिता को

मुखाग्‍नि दे सकती हो

तुम्‍हारे पिता भी तो

कहा करते थे

मेरी बेटी ही मेरे

लिए बेटा है

बढ़ो आगे बेटी

धड़कते दिल को पस्‍त मत होने दो

भावनाओं में इसे मत बहने दो

माना कि तुम्‍हारी उम्र कम है

नाजुक कंधे पर पिता के मौत का गम है

तुम रोयी तो कोई नहीं रोएगा तुम्‍हारे साथ

मत रोओ शाश्वत सत्‍य का सामना करने में

ऐसा सब के साथ होता है

जो आया है वह जाएगा

तुम्‍हें तोड़ना है वह परंपरा

सिर्फ बेटा ही श्‍मशान बाप को ले जाएगा

करने जा रही हो तुम कुछ नया

हिन्‍दू कर्मकांड़ की नींव हिला रही हो

बेटियों का जमाना तुम्‍हें लाना है

इसलिए पिता को तुम्‍हें जलाना है

राम-नाम सत्‍य नहीं

जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है !

रिश्‍ता संवादहीन हो गया

पहली बार उसे देखा तो प्‍यार हो गया

आज शादी हुयी कल तलाक हो गया !

छत्‍तीस में से बत्‍तीस गुण मिल गया

न मालूम वो परिवार कोर्ट के दरवाजे क्‍यों गया ?

तसफीया, त्‍याग, बलिदान जानता नहीं था वो

उसका दाम्‍पत्‍य जीवन इसलिए बिखर गया !

पहले तो गाहे-बगाहे हो जाती थी बातें दोनों में

अब तो पति-पत्‍नी का रिश्‍ता संवादहीन हो गया !

 

राजीव आनंद

मो․ 9471765417

1 blogger-facebook:

  1. सच में
    उज्वलता और सहनशीलता की प्रतीक होती हैं बेटियाँ

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------