राजीव आनंद की कविता - जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है

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जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है

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स्‍वागत है गुडि़या

बेटी हो तो क्‍या हुआ

तुम अपनी पिता को

मुखाग्‍नि दे सकती हो

तुम्‍हारे पिता भी तो

कहा करते थे

मेरी बेटी ही मेरे

लिए बेटा है

बढ़ो आगे बेटी

धड़कते दिल को पस्‍त मत होने दो

भावनाओं में इसे मत बहने दो

माना कि तुम्‍हारी उम्र कम है

नाजुक कंधे पर पिता के मौत का गम है

तुम रोयी तो कोई नहीं रोएगा तुम्‍हारे साथ

मत रोओ शाश्वत सत्‍य का सामना करने में

ऐसा सब के साथ होता है

जो आया है वह जाएगा

तुम्‍हें तोड़ना है वह परंपरा

सिर्फ बेटा ही श्‍मशान बाप को ले जाएगा

करने जा रही हो तुम कुछ नया

हिन्‍दू कर्मकांड़ की नींव हिला रही हो

बेटियों का जमाना तुम्‍हें लाना है

इसलिए पिता को तुम्‍हें जलाना है

राम-नाम सत्‍य नहीं

जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है !

रिश्‍ता संवादहीन हो गया

पहली बार उसे देखा तो प्‍यार हो गया

आज शादी हुयी कल तलाक हो गया !

छत्‍तीस में से बत्‍तीस गुण मिल गया

न मालूम वो परिवार कोर्ट के दरवाजे क्‍यों गया ?

तसफीया, त्‍याग, बलिदान जानता नहीं था वो

उसका दाम्‍पत्‍य जीवन इसलिए बिखर गया !

पहले तो गाहे-बगाहे हो जाती थी बातें दोनों में

अब तो पति-पत्‍नी का रिश्‍ता संवादहीन हो गया !

 

राजीव आनंद

मो․ 9471765417

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1 टिप्पणी "राजीव आनंद की कविता - जीना-मरना सत्‍य कहते जाना है"

  1. सच में
    उज्वलता और सहनशीलता की प्रतीक होती हैं बेटियाँ

    उत्तर देंहटाएं

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