गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

यशवन्‍त कोठारी का आलेख - एक लड़की का अन्त

एक लड़की का अन्‍त।

एक लड़की को जो गिद्धों और भेडि़यों के सहारे जी रही हो,कोई भी कभी भी कहीं भी मार सकता है। कभी भी उसकी आंते निकाल सकता है। सरिया उसके शरीर में घुसा कर पैशाचिक अट्‌टहास कर उसे मरने के लिए ठण्‍डी सर्द रात में सड़क पर फेंक सकता है। व्‍यवस्‍था केवल जुगाड कर कार के काले पर्दे उतारने के आदेश दे सकती है। व्‍यवस्‍था जानती है कि लड़की घायल है तन, मन और धन से। वह बच नहीं सकती है। उड़ नहीं सकती है। हँस नहीं सकती है। केवल रो सकती है। उसके पंख नोच लिए गये है। उसका अन्‍त तय है, आज नहीं तो कल या शायद परसों तरसों या नरसों।

कभी कभी व्‍यवस्‍था उसे सुरक्षा देने के पहले सड़क से उठा कर लाती है। उसे गिद्धों के हवाले कर के चली जाती है। व्‍यवस्‍था उसे एक सम्‍पूर्ण आकाश, शुद्ध हवा, पानी और थोड़ी सी जमीन देने का वादा करती है, मगर लड़की इन सब को पाने के पहले ही गिद्धों, भेडि़यों, की मांद में घसीट ली जाती है। गिद्ध, भेडि़ये उसे बताते है कि उसे उनकी शर्तों पर जीना पड़ेगा। सम्‍पूर्ण व्‍यवस्‍था का आकाश हमारे पांवों के नीचे है। पर लड़की का मन कुछ उंचा उड़ने के लिए बेताब होता है। लड़की एक चिडि़या की तरह चहकना चाहती थी, गिद्धों भेडि़यों को यह ना मंजूर था। भेडि़यों को एक लड़की का लड़कपना, हँसना, बोलना, मुस्‍कराना सब गैर वाजिब लगता था।

कल लड़की को चोंचों से गोद-गोद कर मार डाला गया। वे सब इस बात से दुखी थे कि इतने दिन लड़की को क्‍यों बचाये रखा वे तो कभी भी नाश्‍ते में , भोजन में या किसी पार्टी में उसे चखकर पेट भर कर खा सकते थे।

लड़की के पंख नोच लिए गये। अन्‍तिम कराह भेडि़यों की मनहूस आवाज और गिद्धों के हँसी-ठट्‌टे में दब गई। एक प्रतिभा का करुण, त्रासदायक अन्‍त।

अपना आकाश तलाश्‍ना कितना मुश्‍किल है यह लड़की ही नहीं उसकी सभी नस्‍ले जानती है। लेकिन लड़की ने मरते-मरते भी अन्‍त में एक जोरदार -शानदार-मजेदार बात कहीं कि आकाश, धरती, हवा, पानी, रोशनी और जीवन की खुशियां, इन भेडि़यों, गिद्धों के बाप की नहीं है।

महा भोज के बाद भी गिद्ध मस्‍ती में घूम रहे है। भेडि़ये टहल रहे है। गूंगी, बहरी, लूली, लगड़ी व्‍यवस्‍था यह सब देख सुन रही है। हम सब उस लड़की की खबरों को देख-सुन रहे है। सिहर रहे है। चैनल टी आर पी बढ़ा रहे है। अखबार बिक्री बढ़ा रहे है, लेकिन लड़की का अन्‍त कभी गिद्धों और भेडि़यों में दया, ममता, जगायेगी ? कभी भेडि़ये सोचेगे कि इन जश्‍नों में हमारी हिस्‍सेदारी खतम होगी।

गिद्ध-भेडिये हंस रहे है। लड़की की नस्‍ल मातम मना रही है। व्‍यवस्‍था मौन है। मगर आम आदमी मुखर हैं। यही मुखरता भवितव्‍य है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

e-mail ID - ykkothari3@gmail़com

m--09414461207

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी6:32 pm

    dukhad par satya.badlana hoga yeh sab.shuruat aap kren ya main par karni hogi rakesh

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