शनिवार, 15 दिसंबर 2012

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - सरकार शहर में

सरकार शहर में

यशवन्‍त कोठारी

बाअदब बा मुलाहिजा। होशियार। हर खास और आम को सूचित किया जाता है कि सरकार, प्रशासन, पुलिस सब अब जनता की सेवा करने के लिए शहर में आ रहे है। होशियार ․․․․।

जब से शहर में सरकार के आने की खबर सुनी है तब से हर तरफ अफवाहों का बाजार गरम हो गया है। मंत्री, संत्री, सचिव, कलेक्‍टर, एस․पी․, इन्‍जीनियर, डाक्‍टर, नर्सें, सब शहर के मैंगो मेन की समस्‍याओं को दूर करने के लिए दौड़ पड़े है। आम आदमी इस बनाना रिपब्‍लिक के अन्‍दर हैरान․ परेशान ठगा सा सब देख रहा है। सभी समस्‍याओं का समाधान अब हो कर रहेगा। क्‍योंकि सरकार सब समस्‍याओं का खात्मा करने के लिए शहर में आ गई है प्रशासनिक अमले के सामने बेचारी बोनी समस्‍याएं कहां तक टिक सकेगी।

इधर कालोनी वाले अपनी समस्‍याओं का पिटारा लेकर शिविर स्‍थल की और दौड़ रहे है। पता नहीं कब कौन सी समस्‍या का निवारण करने का दौरा सरकार को पड़ जाये अतः सभी मैंगो मेन सभी समस्‍याओं को एक साथ लेकर चल पड़े है। समस्‍याओं का कोई अन्‍त नहीं है। हर आदमी एक समस्‍या है। बस शिविरों में हर आदमी एक फाईल है और फाइल का निस्‍तारण सरकार की मरजी पर भी है और उस फाइल पर रखे वजन की औकात पर भी है।

हर तरफ समस्‍याएं ही समस्‍याएं। कोई पट्‌टा चाहता है तो कोई रुपान्‍तरण। कोई पानी की मांग कर रहा है तो कोई बिजली के बिलों की परेशानी से ग्रस्‍त है। बीपीएल कार्ड वाले सस्‍ता राशन मांग रहे है तो कई बीमार, बूढे, लाचार, अपाहिज, मोहताज लोग वृद्धावस्‍था पेंशन के लिए मारे मारे फिर रहे है। सरकार शहर में आ गई है, मगर अफसरों के काम करने की गति वहीं है जो आफिसों में होती है। वे हर काम को टालने की कोशिश में लगे हुए हैं। कैसे भी करो कोई न कोई कमी निकाल दो। एक मैंगो मेन ने बताया तीस साल से कृषिभूमि के मकान को नियमित कराने में लगा हुआ हूँ कई बार सरकार शहर में आई और गई, आज तक कुछ नहीं हुआ। मैंने भी देखा पट्‌टे बांटने के लिए सरकार तैयार है, मैंगो मेन तैयार है मगर पट्‌टे बनने की फाइल तैयार करने में पसीने आ रहे हैं। स्‍टाम्‍प, टाइप,  नोटेरी पब्‍लिक, पानी बिजली के बिल, सोसायटी का पट्‌टा, रसीद, साइट प्‍लान, खातेदारी, गृह निर्माण समिति और ऐसे ही सैकड़ों काम। हर काम के लिए बिचोलिये तैयार। बस राशि दो फाइल तैयार है। तैयार फाइल सरकार के बस्‍ते में बन्‍द। बस्‍ता कब खुलेगा कोई नहीं जानता प्रशासन शहर में और दफ्तर खाली। रोजमर्रा के कामकाज भी प्रभावित। इधर अफसर थक जाते है। सड़क पर लगे केम्‍प में काम करना आसान है क्‍या ? उपर वालों की नीतियों को कछुआ चाल से चलाना सरकारी अमले को खूब आता है। पटवारी की टीप पर कलेक्‍टर, सचिव, मंत्री सब चिड़िया बैठा देते हैं। हर मैंगो मेन को घर से तेल की शीशी लेकर अंगद के पांव में मालिश करनी पड़ती है। लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात।

प्रशासन न तो दफ्‌तर में काम करता है और नहीं शिविर में। शिविर में जाओ तो दफ्‌तर में आना। दफ्‌तर में जाओं तो साहब शिविर में है। सब काम ठप्‍प। पचास कालोनियों में कुल सौ-दो सौ पट्‌टे। सौ समस्‍याओं में से पांच का निस्‍तारण। बाकी के लिए दफ्‌तर में आना।

अफसरों की मानसिकता ये कि ये सरकार जा रही है और जाती सरकार की चिंता क्‍यों करनी क्‍योंकि कहा भी है, आने वाली का बोल बाला जाने वाली का मुहँ काला। प्रशासन दिल्‍ली से चलकर राजधानियों में आये। राज्‍य की राजधानी से चल कर शहर की ओर आया लेकिन समस्‍याऐं नहीं सुलझी। छोटी-मोटी चीजें जो सामान्‍य ज्ञान से ही ठीक हो सकती है। सरकार उनकी ओर ध्‍यान नहीं दे पाती। गैस की टंकी की मामूली समस्‍या को कहां से कहां तक खींच डाला। जब से केश सबसीडी की खबर आई है शिविर में नकद रुपये लेने वाले भी सरकार को ढूंढ रहे है। केश मिले तो मजा आ जाये यही सोचकर सब शि‍विर में दौड़े चले आ रहे है। लेकिन होना-जाना कुछ नहीं है। इधर अफसरों की लाल बत्‍ती की गाडि़यां एक शिविर से दूसरे शिविर की और धूल उड़ाती दौड़ रही है आम आदमी परेशान है, इधर फिर नई अफवाह आई है प्रशासन शहरों से निपट गया है अब गांवों की बारी है गांव वालों होशियार।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2

फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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